सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 110 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

महावीरी व्याख्या चौ. ३४: अंत-काल रघुबर-पुर जाई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अंत-काल रघुबर-पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई॥ ३४ ॥
शब्दार्थ—रघुबर-पुर ▸ श्रीसाकेतलोक।
अर्थ—हे राम-दूत! आपके भजनके प्रतापसे वह साधक इसी भौतिक
शरीरसे भगवान् श्रीरामभद्रका दर्शन करके शरीरावसान (अन्तकाल)के
समय श्रीसाकेतलोक जाकर पुनः मर्त्यलोकमें जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ
श्रीहरिका भक्त ही कहलाता है। अर्थात् पुनर्जन्ममें भी उसके भक्तिके संस्कार
धूमिल नहीं होते।
व्याख्या—इसी शरीरसे साधक इसी लोकमें इन्हीं चक्षुओंसे श्रीरामजूके
कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्प-दलन सगुण साकार नीलनीरधरश्याम लोकाभिराम
श्रीविग्रहका दर्शन करता है और अन्तकालमें वह मोक्ष नहीं चाहता।
क्योंकि—सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं (रा.च.मा. ६-११२-७)। फिर
प्रारब्धका क्षय करके शरीरको विसर्जित कर अपनी इच्छानुसार
श्रीसाकेतलोकमें विश्राम कर पुनः भगवल्लीलारसकी अनुभूतिकी लालसासे
भगवान् श्रीराघवके अवतार-कालमें संसारमें आकर किसी भाग्यशालिनी
माँकी कोखको पवित्र कर रघुनाथजीकी प्रतीक्षामें निरत रहता है। यथा—
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोक्ष सुख त्यागि॥
—रा.च.मा. ४-२६
७३