श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
कारण आगन्तुकको बहुत क्षुब्ध किया करते हैं। इस विषयकी स्पष्टताके
लिए भागवतके तृतीय स्कन्धका जय-विजय-उपाख्यान द्रष्टव्य है।
सनकादिक एक बार भगवान् मधुसूदनके दर्शनार्थ श्रीवैकुण्ठ धाम पधारे।
छः द्वारोंको सहजतया लाँघकर वे सप्तम द्वारको भी लाँघनेकी चेष्टा कर रहे
थे कि उनका यह स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार भगवान्के प्रिय द्वारपाल जय-
विजयको नहीं भाया। सन्तोंका व्यक्तित्व चमत्कार-शून्य तथा नमस्कार-
प्रधान हुआ करता है। उनकी रहनीमें संसारका दिखावा तथा आडम्बर नहीं
होता। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमारको यह आशा भी न थी कि
उन जैसे विधि-निषेधसे बहिर्भूत परम अन्तरङ्गतम भगवत्प्रेमी महात्माओंके
साथ भी द्वारपालसे आदेश-रूप निरर्थक सांसारिक औपचारिकताकी अपेक्षा
की जाएगी। जय-विजयने उन पञ्चवर्षीय दिगम्बर मुनिकुमारोंको बिना
अनुमतिके ही भगवन्मन्दिरमें प्रवेश करते देख ईषत् क्रोधजडीभूत होकर
परिहासपूर्वक अपने बेंतका प्रहार कर नीचे गिरा दिया। जय-विजयका
यह स्वभाव भगवान् तथा भगवान्के भक्त दोनोंके लिए प्रतिकूल था।
भागवतकारने वेत्रेण चास्खलयताम्का प्रयोग किया है। स्खलनका अर्थ
होता है गिरना। अस्खलयताम् प्रेरणार्थक णिजन्त रूप है, जिसका अर्थ
होता है 'उन दोनोंने गिरा दिया'। यथा—
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ
तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥
—भा.पु. ३-१५-३०
इस उद्दण्डताकी पराकाष्ठासे वीतराग महर्षियोंका भी हृदयसागर क्रोधकी
लहरसे कुछ क्षुब्ध-सा हो गया। तथा वे बोल पड़े, “तुम सर्वान्तर्यामी परम
कृपालु प्रभु भगवान् विष्णुके पार्षद होनेके योग्य नहीं हो। आज भी तुम्हारा
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