श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
चौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू महावीर व्याख्या
पराक्रमी इन्द्रने इनका नाम हनुमान् रखा। कुछ लोग वामो हनुरभज्यत
(वा.रा. ४-६५-२२) का अर्थ करते हैं कि वामो हनुर्भग्नोऽभवत् अर्थात्
हनुमान्जीका 'वाम हनु किञ्चित् भङ्ग हो गया'। यह अर्थ उन्होंने भञ्ज धातुसे
(भञ्जोँ आमर्दने, धा.पा. १४५३) निष्पन्न अभज्यत शब्दके आधारपर
किया है। पर अभज्यत रूप भज् धातुसे (भजँ सेवायाम्, धा.पा. ९९८)
कर्मवाच्यमें लङ्लकारके प्रथमपुरुषके एकवचनमें भी निष्पन्न होता है।
अभज्यत असेव्यत सेवितोऽभवत्, अर्थात् इन्द्रके वज्रसे हनुमान्जीका वाम
हनु सेवित हुआ, टूटा नहीं, इसलिए इन वानरका आजसे हनुमान् नाम
विख्यात होगा। क्योंकि यदि श्रीहनुमान्का हनु टूट गया होता, तब हनुमान्
शब्दमें मतुप् प्रत्यय कैसे निष्पन्न होता? क्योंकि मतुप् प्रत्यय सत्ता और
प्रशंसा अर्थमें होता है—
भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने।
सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥
—भा.पा.सू. ५-२-९४
भाष्यकारके उदाहरणोंके अनुसार निन्दा अर्थमें इनि प्रत्यय होता है, तथा
प्रशंसा अर्थमें मतुप् ही होता है। जैसे किसी निर्धनको धनवान् नहीं कहा
जा सकता, उसी प्रकार टूटे हुए हनु वाले व्यक्तिको हनुमान् कैसे कहा
जाएगा? विनयपत्रिकामें भी गोस्वामीजी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि करते हैं,
यथा—जाकी चिबुक-चोट चूरन किए रद-मद कुलिश कठोर को
(वि.प. ३१-४)।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकीय-रामायणके अनुसार हनुमान्जीने
सूर्यको निगला नहीं, पर हनुमान्-चालीसामें लील्यो ताहि मधुर फल
जानू कह रहे हैं। इस पक्षकी पुष्टि गोस्वामीजी विनयपत्रिकामें करते
हैं—चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता (वि.प. २५-२)। इस विरोधका समाधान
कल्पभेदसे हो जाता है। वाल्मीकि-कथामें हनुमान्जीने सूर्यनारायणको नहीं
५०
महावीरी व्याख्या चौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू
ग्रसा था, विनयपत्रिका तथा हनुमान्-चालीसाके घटना-कल्पमें ग्रस लिया
था। देवताओंकी विनतीपर छोड़ा। सूर्यनारायणको ग्रसना असंभव नहीं है
क्योंकि कार्य कारणमें विलीन होते हैं। अतः तेजस्तत्त्व-रूप सूर्य वायुतत्त्व-
रूप हनुमान्में विलीन हों, यह अत्यन्त उचित है।
विशेष—मनुष्योंका एक चतुर्युग—जिसमें संध्या और संध्यांश
सहित १२,००० देववर्ष होते हैं—देवोंका एक युग कहलाता है।
यथा—एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते (म.स्मृ. १-७१)।¹ तदनुसार
यहाँ प्रयुक्त जुग (संस्कृत: युग) शब्द ‘देवयुग’ वैकल्पिक अर्थ ग्रहण
करनेपर १२,०००की संख्याका वाचक हुआ। सहस्र शब्द १,०००का
वाचक है ही और जोजन (संस्कृत: योजन) शब्द ८ मीलका परिमाण
है।² इस प्रकार जुग सहस्र जोजनका एक और अर्थ हुआ १२,०००
सहस्र योजन—अर्थात् १,२०,००,००० योजन अथवा ९,६०,००,००० मील।
संभवतः यह ज्योतिषविद् गोस्वामी तुलसीदासजीके द्वारा दी हुई पृथ्वीसे
सूर्यकी दूरीकी गणना है।³ ऐसा भी प्रतीत होता है कि खगोलीय दूरियोंके
मापनमें समयकी इकाई (युग)का सर्वप्रथम प्रयोग गोस्वामीजीने ही किया
है।⁴
¹ इस श्लोकपर अपने मनुभाष्यमें मेधातिथिने मनुष्योंके द्वादश सहस्र चतुर्युगोंको देवोंका एक
युग कहा है, पर कुल्लूकभट्टने इस अर्थका सप्रमाण खण्डन करते हुए द्वादश सहस्र देववर्षों अर्थात्
एक चतुर्युगको ही देवयुग सिद्ध किया है—संपादक।
² Vaman Shivram Apte (1985) [1890]. The Practical Sanskrit-English
Dictionary (4th ed.). Delhi: Motilal Banarsidass, p. 789: “A measure of
distance equal to four Krosas or eight or nine miles.”—संपादक।
³सन् २०१२में पारित अन्ताराष्ट्रिय खगोलीय सङ्घके बी-२ प्रस्ताव के अनुसार सूर्यकी पृथ्वीसे
औसत दूरी ९,२९,५५,८०७ मील है। इस आधुनिक वैज्ञानिक मानसे उपर्युक्त संभावित मान ३.३
प्रतिशत अधिक है—संपादक।
⁴ प्रकाश-वर्ष (light-year) इकाईके सर्वप्रथम प्रयोगका श्रेय जर्मनीके वैज्ञानिक फ्रीड्रिश
बेसेल (१७८४–१८४६)को दिया जाता है—संपादक।
५१
चौ. १९: प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥
शब्दार्थ—मेलि ▸ डालकर। जलधि ▸ समुद्र।
अर्थ—प्रभो! आप श्रीरामजीकी दी हुई रामनामाङ्कित मुद्रिकाको मुखमें
लेकर शतयोजन-विस्तीर्ण समुद्रको लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
व्याख्या—दो शरणागतियोंमें प्रधान भूमिकाका निर्देश कर हनुमान्जीमें
तारणत्व गुणका वर्णन किया। अब तरणत्वका वर्णन कर रहे हैं। अर्थात्
हनुमान्जी सुग्रीव एवं विभीषणको सागरसे तारकर स्वयं भी तर जाते हैं।
सुग्रीवके लिए नाम-सेतु तथा विभीषणके लिए कृपा-सेतुकी व्यवस्था करते
हैं, एवं स्वयं प्रभु-मुद्रिकाको मुखमें लेकर राम-नामामृत चूसते हुए कौतुकमें
समुद्रको पार करते हैं। यथा—
कौतुक सिंधु नाघि तव लंका।
आयउ कपि-केहरी अशंका॥
—रा.च.मा. ६-३६-४
५२
महावीरी व्याख्या चौ. २०: दुर्गम काज जगत के जे ते
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
दुर्गम काज जगत के जे ते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते ॥ २० ॥
शब्दार्थ—दुर्गम ▸ कठिन। सुगम ▸ सरल। अनुग्रह ▸ कृपा।
अर्थ—हे महावीरजी! संसारके जितने भी कठिन-से-भी-कठिन कार्य
हैं, वे सब आपकी कृपासे सरल हो जाते हैं।
व्याख्या—क्योंकि आप सुग्रीव तथा विभीषणके लिए तारण एवं स्वयं
तरण हैं तथा जटिल-से-जटिल कार्य आपने किया है। यथा—
मन को अगम तन सुगम किये कपीश
काज महाराज के समाज साज साजे हैं।
देव बंदीछोर रनरोर केसरी-किसोर
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर
सुनि सकुचाने साधु खल-गन गाजे हैं।
बिगरी सँवारि अँजनीकुमार कीजे मोहि
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं॥
—ह.बा. १५
यहाँ आञ्जनेयके चरित्र-वर्णनका उपसंहार करके अब कृपाकी
आवश्यकताका उपपादन करते हैं।
५३
चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—पैसारे ▸ प्रवेश।
अर्थ—हे अञ्जनीपुत्र! आप श्रीरामभद्रजूके राजद्वारके रक्षक, प्रतिहार,
द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञाके बिना किसीका भी श्रीरामजीके परमधाममें
प्रवेश नहीं हो सकता।
व्याख्या—श्रीरामोपासनामें श्रीहनुमान्जीकी कृपा परम उपादेय है
क्योंकि ये ही राजाधिराजके जागरूक द्वारपाल हैं। इनकी प्रतिकूलतामें
जीवको श्रीराघवका आनुकूल्य नहीं प्राप्त हो सकता। अन्यत्र द्वारपाल
स्वामीकी आज्ञासे आगन्तुकको भवनमें प्रविष्ट करता है, पर यहाँ तो स्वामी
एवं सेवककी इतनी एकता है कि आञ्जनेयकी आज्ञा ही सर्वोपरि हो जाती
है। सुग्रीव एवं विभीषणकी शरणागतिमें प्रभुसे बिना पूछे ही इन्होंने दोनोंको
प्रवेशपत्र दे दिया; कारण कि वे अपने प्रभुसे इतने एकरूप हो चुके हैं कि
इनके विरुद्ध कभी कोई चेष्टा करते ही नहीं और श्रीरामजी भी आञ्जनेयका
अदब मानते हैं। यथा—सेवक स्योकाई जानि जानकीश मानै कानि
(ह.बा. १२)।
पैसारे शब्द पदसार शब्दका तद्भव है। पदेन पादेन सरणं सारः पदसारः
प्रवेश इत्यर्थः। यह शब्द प्रवेशके अर्थमें श्रीमानसजीमें भी प्रयुक्त हुआ है।
यथा—अति लघु रूप धरौं निशि नगर करौं पैसार (रा.च.मा. ५-३)।
भगवान्के अन्य द्वारपाल श्रीआञ्जनेयके समान नहीं देखे जाते। कहीं-
कहीं तो स्वामीको सूचित किए बिना ही प्रतिहार अपनी उच्छृङ्खलताके
५४
महावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
कारण आगन्तुकको बहुत क्षुब्ध किया करते हैं। इस विषयकी स्पष्टताके
लिए भागवतके तृतीय स्कन्धका जय-विजय-उपाख्यान द्रष्टव्य है।
सनकादिक एक बार भगवान् मधुसूदनके दर्शनार्थ श्रीवैकुण्ठ धाम पधारे।
छः द्वारोंको सहजतया लाँघकर वे सप्तम द्वारको भी लाँघनेकी चेष्टा कर रहे
थे कि उनका यह स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार भगवान्के प्रिय द्वारपाल जय-
विजयको नहीं भाया। सन्तोंका व्यक्तित्व चमत्कार-शून्य तथा नमस्कार-
प्रधान हुआ करता है। उनकी रहनीमें संसारका दिखावा तथा आडम्बर नहीं
होता। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमारको यह आशा भी न थी कि
उन जैसे विधि-निषेधसे बहिर्भूत परम अन्तरङ्गतम भगवत्प्रेमी महात्माओंके
साथ भी द्वारपालसे आदेश-रूप निरर्थक सांसारिक औपचारिकताकी अपेक्षा
की जाएगी। जय-विजयने उन पञ्चवर्षीय दिगम्बर मुनिकुमारोंको बिना
अनुमतिके ही भगवन्मन्दिरमें प्रवेश करते देख ईषत् क्रोधजडीभूत होकर
परिहासपूर्वक अपने बेंतका प्रहार कर नीचे गिरा दिया। जय-विजयका
यह स्वभाव भगवान् तथा भगवान्के भक्त दोनोंके लिए प्रतिकूल था।
भागवतकारने वेत्रेण चास्खलयताम्का प्रयोग किया है। स्खलनका अर्थ
होता है गिरना। अस्खलयताम् प्रेरणार्थक णिजन्त रूप है, जिसका अर्थ
होता है 'उन दोनोंने गिरा दिया'। यथा—
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ
तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥
—भा.पु. ३-१५-३०
इस उद्दण्डताकी पराकाष्ठासे वीतराग महर्षियोंका भी हृदयसागर क्रोधकी
लहरसे कुछ क्षुब्ध-सा हो गया। तथा वे बोल पड़े, “तुम सर्वान्तर्यामी परम
कृपालु प्रभु भगवान् विष्णुके पार्षद होनेके योग्य नहीं हो। आज भी तुम्हारा
५५
चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
हृदय महत्त्वाकाङ्क्षाकी आगसे जल रहा है। अतः इस अपराधका उचित
दण्ड ही तुम्हारे लिए उपयुक्त है। तुम काम, क्रोध, लोभ इन तीनोंसे पीड़ित
हो। इसलिए तीन पापिष्ठ लोकोंमें जाओ।” अर्थात् प्रथम जन्ममें क्रोध-प्रधान
दैत्य बनो (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष), द्वितीय जन्ममें काम-प्रधान राक्षस
बनो (रावण और कुम्भकर्ण), एवं तृतीय जन्ममें लोभ-प्रधान दानव-रूप
मानवताहीन मानव (शिशुपाल और दन्तवक्र) बनो। यहाँ तीन जन्म पर्यन्त
पापिष्ठ लोकोंमें जानेका शाप भी साभिप्राय था। सनकादि महर्षियोंने जय-
विजयको तीन जन्मके लिए इस कारण शाप दिया कि जय-विजयने उन्हें
तीन-तीन बेंत लगाये थे। यही त्रय इमे शब्दके प्रयोगका कारण प्रतीत होता
है, यथा—
तद्धाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः
कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम्।
लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या
पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र॥
—भा.पु. ३-१५-३४
गोस्वामीजी भी इस प्रसंगकी चर्चा मानसजीमें बड़े ही रोचक ढंगसे करते
हैं—
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।
जय अरु विजय जान सब कोऊ॥
बिप्र-शाप तें दूनउ भाई।
तामस असुर-देह तिन पाई॥
—रा.च.मा. १-१२२-४,५
मुक्त न भये हते भगवाना।
तीनि जनम द्विज-बचन प्रमाना॥
— रा.च.मा. १-१२३-१
५६
अन्तिम भाग: चौपाई ३१ से ४०, समापन दोहा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक
महावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
अर्थात् अन्य द्वारपाल अप्रत्याशित रूपमें स्वामीके यहाँ जानेवालोंको
बेंतके प्रहारसे निरस्त करते हैं, किन्तु श्रीहनुमान्जी महाराज रावणके द्वारा
कृत चरण-प्रहारसे पीड़ित विभीषणको भी भगवान्के श्रीचरणारविन्दका
शरणागत बना देते हैं। श्रीराघवकी शरणमें समागत विभीषणके प्रति जब
सुग्रीव नाना प्रकारके आक्षेप-प्रत्याक्षेप करने लगे, तब आञ्जनेयको बहुत
दुःख हुआ, पर श्रीराघवने मम पन शरनागत-भयहारी (रा.च.मा. ५-
४३-८) कहकर विभीषणको स्वीकारनेका निश्चय किया। तब हनुमान्जी
अत्यन्त प्रसन्न हुए, यथा—
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
शरनागत-वत्सल भगवाना॥
—रा.च.मा. ५-४३-९
इस प्रकार अन्य द्वारपालकी अपेक्षा आगन्तुकको प्रभुके चरणोंमें जोड़नेकी
श्रीहनुमान्जीमें विलक्षण क्षमता है।
५७
चौ. २२: सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥ २२ ॥
शब्दार्थ—शरना ▸ शरण में। लहहिं ▸ प्राप्त करते हैं।
अर्थ—हे हनुमान्जी महाराज! आपकी शरणमें आकर साधक जन
समस्त सुख प्राप्त कर लेते हैं। आप रक्षक हैं, अतः अब किसीका डर नहीं
है।
व्याख्या—जय-विजयकी भाँति आप किसी आगन्तुकको भगवान्के
दर्शनसे वञ्चित नहीं करते, अपितु उनसे पूछे बिना भी अपनी कृपालुतासे
आप श्रीराघवका दर्शन करा देते हैं। अब हम निर्भीक हो गए हैं। यथा—
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह
लोकपाल-पालन को फिर थिर थल भो।
—ह.बा. ६
५८
महावीरी व्याख्या चौ. २३: आपन तेज सम्हारो आपे
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
आपन तेज सम्हारो आपे।
तीनों लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥
शब्दार्थ—सम्हारो ▸ स्मरण करें।
अर्थ—हे प्रभो! जब आप अपने तेजको स्मरण कर लेते हैं, तब आपकी
हाँकसे ही त्रैलोक्य कम्पित हो उठता है।
व्याख्या—सम्हारो शब्दका अर्थ है स्मरण। यथा—दीन दयाल बिरद
संभारी (रा.च.मा. ५-२७-४)। क्योंकि ऋषियोंके शापसे इन्हें अपना तेज
विस्मृत रहता है, इसलिए जाम्बवान्को स्मरण दिलाना पड़ा। यथा—
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥
—रा.च.मा. ४-३०-५
अतः आज भी भक्त लोग विरुदावली गाकर हनुमान्जीके तेजका उद्बोधन
करते हैं।
तीनों लोक हाँक ते काँपे—इनकी हाँकका वर्णन कवितावलीके
युद्धकाण्डमें इस प्रकार है—
मत्तभट-मुकुट-दशकंध-साहस-सइल-
सृंग-बिद्दरनि जनु बज्र टाँकी।
दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज कमठ
शेष संकुचित संकित पिनाकी।
५९
चौ. २३: आपन तेज सम्हारो आपे महावीरी व्याख्या
चलित महि मेरु उच्छलित सागर सकल
बिकल बिधि बधिर दिसि बिदिसि झाँकी।
रजनिचर-घरनि घर गर्भ-अर्भक स्त्रवत
सुनत हनुमान की हाँक बाँकी॥
—क. ६-४४
६०
महावीरी व्याख्या चौ. २४: भूत पिशाच निकट नहिं आवै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥
शब्दार्थ— भूत पिशाच ▸ अकाल मृत्युको प्राप्त उग्र आत्मा अथवा
निम्न देवयोनि।
अर्थ—जब भावुक भक्त महावीर नाम सुना-सुना कर कीर्तन करते हैं,
उस समय भूत पिशाच उनके निकट नहीं आते।
व्याख्या—अब महावीर नाम विशेषकी महत्ता कहते हैं। यह भूत-
पिशाचोंका त्रासक है। यथा—पूतना पिशाची जातुधानी जातुधान वाम
रामदूत की रजाइ माथे मान लेत हैं (ह.बा. ३२)।
६१
चौ. २५: नासै रोग हरै सब पीरा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ २५ ॥
शब्दार्थ—निरंतर ▸ नित्य, सदा।
अर्थ—सदैव भक्तोंके द्वारा जपके विषय-भूत होनेपर वीर हनुमान्जी
रोगोंको नष्ट कर देते हैं एवं समस्त पीड़ाओंको हर लेते हैं।
व्याख्या—रोग यहाँ शारीरिक रोगोंका वाचक है। पीरा शब्दका
कामादि आध्यात्मिक पीड़ाओंसे तात्पर्य है। भाव यह है कि गुरुदीक्षालब्ध
श्रीहनुमन्मन्त्रका जप करनेसे साधकके शरीरके रोग तथा आध्यात्मिक ताप
नष्ट हो जाते हैं।
६२
महावीरी व्याख्या चौ. २६: संकट तें हनुमान छुड़ावै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥
शब्दार्थ—संकट ▸ विपत्ति।
अर्थ—जो मन, कर्म, और वचनसे एकाग्र होकर हनुमान्जीको ध्यानमें
ले आते हैं, उन्हें श्रीहनुमान्जी सभी संकटोंसे मुक्त कर देते हैं।
व्याख्या—इनका नाम ही संकटमोचन है। यथा—को नहिं जानत है
जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो (सं.ह.अ. १,२,३,४,५,६,७,८)
और गुण गनत नमत सुमिरत जपत समन सकल संकट बिकट (ह.बा.
१)।
६३
चौ. २७: सब-पर राम राय-सिरताजा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सब-पर राम राय-सिरताजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥
शब्दार्थ—सब-पर ▸ सर्वोपरि। सब-पर शब्द सर्वपरका तद्भव है। यहाँ
सर्वत्र लवराम् (प्रा.प्र. ३-३) इस प्राकृत व्याकरण के सूत्रसे रका लोप
हुआ।
अर्थ—श्रीराम परब्रह्म और राजाओंके मुकुटमणि हैं। उनके भी संपूर्ण
कार्योंको आपने ही संपन्न किया।
व्याख्या—श्रीरामजी सर्वोपरि हैं। यथा—
शंभु बिरंचि बिष्णु भगवाना।
उपजहिं जासु अंश ते नाना॥
—रा.च.मा. १-१४४-६
अर्थात् श्रीराम राजाधिराज हैं फिर भी उनके संपूर्ण कार्योंको आपने ही संपन्न
किया। भाव यह है कि सर्वोपरि परब्रह्म राजाधिराज भगवान् श्रीरामको भी
जिनकी निरन्तर अपेक्षा रहती है, तो हम जैसे जीवोंकी उनके बिना कैसी
स्थिति होगी? यथा—
संकट-समाज असमंजस भो रामराज
काज जुग पूगनि को करतल पल भो।
—ह.बा. ६
६४
महावीरी व्याख्या चौ. २८: और मनोरथ जो कोइ लावै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और मनोरथ जो कोइ लावै।
तासु अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥
शब्दार्थ—मनोरथ ▸ अभिलाषा। अमित ▸ असीम।
अर्थ—हे प्रभो! और जो आपके समक्ष कोई भी मनोरथ लेकर आता
है, उस मनोरथका अपने इसी जीवनमें असीम फल पाता है।
व्याख्या—सोइ अमित जीवन फल पावै यह पाठ माननेपर "वह
व्यक्ति इसी जीवनमें उस इच्छाका असीम फल पा लेता है" अर्थ होगा।
भाव यह है कि मानवकी इच्छाएँ प्रायः पूर्ण नहीं होतीं, यदि होती भी
हैं तो शरीरान्तके पश्चात्। परन्तु हनुमान्जीके समक्ष इसी जीवनमें समस्त
इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यथा—नाम कलि-कामतरु केसरी-कुमार को
(ह.बा. ९)।
६५
चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
चारिउ जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत-उजियारा॥ २९ ॥
शब्दार्थ—उजियारा ▸ उजाला।
अर्थ—हे प्रभो! आपका प्रताप कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, एवं
कलियुग—इन चारों युगोंमें प्रसिद्ध है। इससे जगत्में उजाला छाया हुआ
है।
व्याख्या—श्रीराम सार्वकालिक हैं। अतः प्राकट्यके पहले स्वायम्भुव
मन्वन्तरके कृतयुगमें मनु-शतरूपाको द्विभुज रूपमें ही दर्शन दिया। यथा—
भृकुटि बिलास जासु जग होई।
राम बाम दिशि सीता सोई॥
—रा.च.मा. १-१४८-४
उसी प्रकार इनका नाम भी चारों युगोंमें प्रसिद्ध है, यथा—चहुँ जुग चहुँ
श्रुति नाम प्रभाऊ (रा.च.मा.१-२२-८)। अतः कृतयुगमें प्रह्लाद भी रामनाम
जपते थे। यथा—राम कहाँ सब ठौर हैं खम्भ में हाँ सुनि हाँक नृकेहरि
जागे (क. ७-१२८)। प्रह्लाद दैत्य-बालकोंसे स्वयं कहते हैं—
रामनामजपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥
तद्वत् श्रीरामजीके परिकर श्रीहनुमान्जी भी चारों युगोंमें रहते हैं। वैवस्वत
मन्वन्तरके २४वें त्रेतायुगके अन्तमें प्रभुका प्राकट्य हुआ। पश्चात् प्रभुने
आञ्जनेयको तब तकके लिए अमरत्व प्रदान किया, जब तक श्रीराम-
कथाका प्रवाह धराधामपर अक्षुण्ण रहे। अतः उस समयसे अद्यावधि
६६
महावीरी व्याख्या चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा
श्रीराम-कथाके साथ आञ्जनेयका स्वस्थ रहना सुस्पष्ट है। यह २८वाँ
कलियुग है। प्रभुके प्राकट्यसे आज तक चार चतुर्युगियाँ बीत ही गईं।
अतः हनुमान्जीके अमरत्वमें किमपि संदेह नहीं है।
कृते साकेतलोके स्यात्रेतायामवधे तथा।
द्वापरे पार्थकेतौ तु कलौ राज्यं करिष्यति ॥
जगत-उजियारा—प्रतापकी उपमा सूर्यसे दी जाती है। यथा—प्रभु-
प्रताप-रबि छबिहिं न हरिही (रा.च.मा. २-२०९-३)। इसलिए इससे
जगत्में उजाला कहना उचित है।
६७
चौ. ३०: साधु संत के तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर-निकंदन राम-दुलारे ॥ ३० ॥
शब्दार्थ—असुर-निकंदन ▸ राक्षसोंको मारने वाले।
अर्थ—हे राक्षसोंको नष्ट करने वाले श्रीरामजीके दुलारे श्रीहनुमान्जी
महाराज! आप साधु तथा सन्तोंके रक्षक हैं।
व्याख्या—यहाँ साधु शब्द साधनारत भक्तोंकी ओर संकेत करता है
एवं संत शब्द साधनसंपन्न भक्तको सूचित करता है। दोनोंको हनुमान्जीकी
अपेक्षा है। साधु सुग्रीव तथा सन्त विभीषण दोनों हनुमान्जीसे रक्षित हैं।
यथा—दुर्जन को काल सो कराल पाल सज्जन को (ह.बा. १०)।
राम-दुलारे—हनुमान्जी राघवजीके दुलारे हैं। यथा—राम को दुलारो
दास (ह.बा. ९)।
६८
महावीरी व्याख्या चौ. ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥
शब्दार्थ—दाता ▸ देने वाले।
अर्थ—आप अष्ट सिद्धियों एवं नव निधियोंके देने वाले हैं। जनकनन्दिनी
श्रीसीता माताने आपको ऐसा वरदान दिया है।
व्याख्या—अशोकवाटिकामें जब श्रीआञ्जनेयके वाक्चातुर्यसे माँ मैथिली
भली-भाँति संतुष्ट हो गईं, तब इन्होंने आञ्जनेयको आशीर्वाद-पुष्पोंसे विभूषित
कर दिया। यहाँ मायाकी सीता अविद्या अथवा विद्या रूपमें नहीं हैं, अपितु
श्रीराघवकी लीलाशक्ति ही माया सीताके रूपमें वर्तमान हैं, अन्यथा मायाके
मिथ्यात्वसे आञ्जनेयको दिए हुए आशीर्वाद भी प्रामाणिक न हो पाएँगे। इस
प्रसंगका संकेत भावी किसी ग्रन्थमें किया जाएगा। अथ प्रकृतमनुसरामः।
यथा—
आशिष दीन्ह राम प्रिय जाना।
होहु तात बल शील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू॥
करिहिं कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
—रा.च.मा. ५-१७-२,३,४
सिद्धियाँ आठ हैं—
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