श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. १८: जुग सहस्र जोजन पर भानू महावीर व्याख्या
पराक्रमी इन्द्रने इनका नाम हनुमान् रखा। कुछ लोग वामो हनुरभज्यत
(वा.रा. ४-६५-२२) का अर्थ करते हैं कि वामो हनुर्भग्नोऽभवत् अर्थात्
हनुमान्जीका 'वाम हनु किञ्चित् भङ्ग हो गया'। यह अर्थ उन्होंने भञ्ज धातुसे
(भञ्जोँ आमर्दने, धा.पा. १४५३) निष्पन्न अभज्यत शब्दके आधारपर
किया है। पर अभज्यत रूप भज् धातुसे (भजँ सेवायाम्, धा.पा. ९९८)
कर्मवाच्यमें लङ्लकारके प्रथमपुरुषके एकवचनमें भी निष्पन्न होता है।
अभज्यत असेव्यत सेवितोऽभवत्, अर्थात् इन्द्रके वज्रसे हनुमान्जीका वाम
हनु सेवित हुआ, टूटा नहीं, इसलिए इन वानरका आजसे हनुमान् नाम
विख्यात होगा। क्योंकि यदि श्रीहनुमान्का हनु टूट गया होता, तब हनुमान्
शब्दमें मतुप् प्रत्यय कैसे निष्पन्न होता? क्योंकि मतुप् प्रत्यय सत्ता और
प्रशंसा अर्थमें होता है—
भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने।
सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः ॥
—भा.पा.सू. ५-२-९४
भाष्यकारके उदाहरणोंके अनुसार निन्दा अर्थमें इनि प्रत्यय होता है, तथा
प्रशंसा अर्थमें मतुप् ही होता है। जैसे किसी निर्धनको धनवान् नहीं कहा
जा सकता, उसी प्रकार टूटे हुए हनु वाले व्यक्तिको हनुमान् कैसे कहा
जाएगा? विनयपत्रिकामें भी गोस्वामीजी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि करते हैं,
यथा—जाकी चिबुक-चोट चूरन किए रद-मद कुलिश कठोर को
(वि.प. ३१-४)।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकीय-रामायणके अनुसार हनुमान्जीने
सूर्यको निगला नहीं, पर हनुमान्-चालीसामें लील्यो ताहि मधुर फल
जानू कह रहे हैं। इस पक्षकी पुष्टि गोस्वामीजी विनयपत्रिकामें करते
हैं—चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता (वि.प. २५-२)। इस विरोधका समाधान
कल्पभेदसे हो जाता है। वाल्मीकि-कथामें हनुमान्जीने सूर्यनारायणको नहीं
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