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श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

सम्पादकीय

महावीरी व्याख्याकी अनवरत बढ़ती माँगको देखते हुए इसका चतुर्थ
संस्करण प्रकाशित किया गया है। गुरुदेवके निर्देशानुसार चौपाई २९की
व्याख्यामें एक श्लोक जोड़ा गया है और एक-दो स्थानोंपर मूलपाठमें
साधारण सुधार (यथा चारों के स्थान पर चारिउ) किया गया है। शेष
सब तृतीय संस्करणका ही नया रूप है। मात्र एक दिनमें (१३–१४ मई,
१९८३ ई.) प्रणीत इस व्याख्याके विषयमें डॉ. रामचन्द्र प्रसादने लिखा
था—१
“श्रीहनुमानचालीसा की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या के लिए देखें महावीरी
व्याख्या, जिसके लेखक हैं प्रज्ञाचक्षु आचार्य श्रीरामभद्रदासजी।
श्रीहनुमानचालीसा के प्रस्तुत भाष्य का आधार श्रीरामभद्रदासजी
की ही वैदुष्यमंडित टीका है। इसके लिए मैं आचार्य-प्रवर का
ऋणी हूँ।”
महावीरी व्याख्याका चतुर्थ संस्करण सभी हनुमद्भक्तोंको समर्पित है।
मनीषकुमार शुक्ल नित्यानन्द मिश्र
अपरा एकादशी, वि.सं. २०७८
(६ जून २०२१ ई.)

१ Ram Chandra Prasad (2008) [1990]. Shri Ramacharitamanasa: The
Holy Lake of the Acts of Rama (2nd ed.). Delhi: Motilal Banarsidass, ISBN
978-81-208-0443-2, p. 849, footnote 1.

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आमुख
उद्यच्चण्डकराभभव्यभुवनाभ्यर्चाप्रदीप्तं वपु-
र्बिभ्रन्मञ्जुलमौञ्जसूत्रमनघं घर्मघ्नकान्तस्मितम्।
सीतारामपदारविन्दमधुपः प्रावृट्पयोदद्विषां
झञ्झावातनिभो भवाय भवतां भूयान्मुहुर्मारुतिः ॥
साहित्य-गगनके मरीचिमाली एवं कविता-कामिनी-यामिनीके
शारद निष्कलङ्क शशाङ्क, रामभक्ति-भागीरथी-सनाथित-हृदय-धरातल,
सकल-कविकुल-शेखर, वैष्णव-वृन्द-वृन्दारकेश, सीतारमण-पदपद्म-
पराग-परिमल-मकरन्द-मधुकर, कलिपावनावतार, प्रातःस्मरणीय,
परम आदरणीय श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजकी कृतियोंमें
श्रीहनुमान्-चालीसाको भी बहुचर्चित रूपमें स्थान प्राप्त है। गुणगृह्या
वचने विपश्चितः (कि. २-५) की दृष्टिसे यह विषय विशेष आलोचनीय
नहीं है, तथापि कुछ विचार करना अनुपयुक्त भी नहीं होगा। गोस्वामीजीके
ही द्वारा श्रीकाशीमें प्रतिष्ठित श्रीसंकटमोचन-हनुमान्जीके मन्दिरमें भी यह
हनुमान्-चालीसा स्तोत्ररत्न भित्तिपर लिखा हुआ लेख रूपमें आज भी
दृष्टिगोचर है। मानसजीके तथा गोस्वामीजीके अन्य सर्वमान्य ग्रन्थरत्नोंकी
प्रसंग-संगति भी इस ग्रन्थके प्रसंगोंसे एकवाक्यतापन्न हो जाती है।
यथा—लाय सँजीवनि लखन जियाये (ह.चा. ११), तुम उपकार
सुग्रीवहिं कीन्हा (ह.चा. १६), तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (ह.चा.
१७) इत्यादि प्रसंग मानससे पूर्णतया मिलते हैं। श्रीहनुमान्-विभीषण-संवाद
श्रीमानसजीके अतिरिक्त गोस्वामीजीके अन्य किसी ग्रन्थमें शब्दतः चर्चित

आमुख महावीरी व्याख्या
नहीं है। पर मानसके इस गोपनीयतम प्रसंगरत्नकी चर्चा श्रीहनुमान्‌चालीसामें
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (ह.चा. १७) कह कर सूत्ररूपमें कर दी
गई है। श्रीरामचरितमानसमें कथित प्रसंगोंकी गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंसे
संगति लगाई जाती है। इसीलिए द्वादश ग्रन्थ मानसजीके पूरक माने जाते
हैं। जैसे द्रोणाचलको लेकर श्रीअवधके ऊपर आते हुए हनुमान्जीको
भरतजीने बिना फरके बाणसे विद्धकर नीचे गिराया, यथा—परेउ मुरछि
महि लागत सायक (रा.च.मा. ६-५९-१)। पर पर्वतकी क्या दशा हुई,
इसका स्पष्टीकरण मानसमें न करके गोस्वामीजीने इसके पोषक गीतावली
ग्रन्थमें किया है—पर्यो कहि राम पवन राख्यो गिरि (गी. ६-१०-२)
अर्थात् हनुमान्जीने अपनेको गिरता हुआ जानकर द्रोणाचल पर्वतको
पवनके हाथ सौंप दिया। एवमन्यत्रापि। जैसे गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थ
मानसके प्रसंगोंके पूरक हैं, वैसे ही श्रीहनुमान्-चालीसा भी है। यथा
राघवने हनुमान्जीको मुद्रिका दी—
परसा शीष सरोरुह पानी।
करमुद्रिका दीन्ह जन जानी॥
—रा.च.मा. ४-२३-१०
पर इस मुद्रिकाको हनुमान्जी महाराजने कैसे एवं कहाँ सम्भाला, मानसके
इस निगूढ प्रसंगका स्पष्टीकरण श्रीहनुमान्-चालीसामें ही होता है। यथा—
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
—ह.चा. १९
अतः इस परीक्षणमें भी यह ग्रन्थ खरा उतरा।
भाषा एवं शैलीकी दृष्टिसे भी यह निन्द्य नहीं कहा जा सकता। सामान्य
लोगोंके कल्याणार्थ गोस्वामीजीने सुरसरि सम सब कहँ हित होई
(रा.च.मा. १-१४-९) की मान्यताके अनुसार अति सरल ग्राम्य भाषामें
४

महावीरी व्याख्या आमुख
रचना करके मधुरतम शिष्ट एवं सुबोध ग्रामीण शब्दोंमें इसे सजाया है। यही
कारण है कि यह विद्वानोंकी भी हृदयतन्त्रीको झङ्कृत करता है एवं अति गँवार
निरक्षर महिलाओंके भी हृदय-श्रद्धा-सुमनका परम पावन मकरन्द होकर
ग्रामीण भारती मधुकरीको भी गुनगुनवाता रहता है। आज यह हनुमन्-
चालीसा हिमाचलसे कन्याकुमारीतक प्रत्येक भारतवासीके मनोमन्दिरका
देवता बना हुआ है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदायका हो।
विदेशोंके भी ७५ प्रतिशत भागोंमें जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर (ह.चा.
१) का नारा बुलन्द हो रहा है। गोस्वामीजीके अतिरिक्त और किसी
मनीषीकी लेखनीमें ऐसी उत्कृष्ट लोकप्रियताका प्रवाह नहीं दृष्टिगोचर होता।
अन्य ग्रन्थों जैसी लोकप्रियता तुलसीकृत हनुमन्-चालीसामें विद्यमान है।
प्रत्येक सनातन-धर्मी श्रीमानसजीके पाठ-प्रारम्भ तथा पाठ-विश्राममें हनुमन्-
चालीसाका संपुट लगाता है।
यदि भाषापर विचार करें तो गोस्वामीजीके श्रीरामललानहछूसे सरल
हनुमन्-चालीसाकी भाषा नहीं है। गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंके समान इसमें
भी स्वभावतः अलंकार आए हैं। यथा—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
—ह.चा. ४
अतः भले ही यह हनुमन्-चालीसा तुलसीग्रन्थावलीमें न मुद्रित हो, पर
गोस्वामीजीकी रचना होनेमें किसी भी सहृदयको संदेह नहीं होगा। इसका
श्रद्धासे पाठ करनेपर बहुत-से लोगोंको सफलमनोरथ होते देखा एवं
सुना गया है। प्रायः भक्त महात्मा जन हनुमन्-चालीसाका उनचास(४९)-
दिवसीय तथा अष्टोत्तरशत(१०८)-दिवसीय अनुष्ठान किया करते हैं। भीषण
रोगसे आक्रान्त व्यक्ति भी इसका अनुष्ठान-विधिसे पाठ कर अति
शीघ्र लाभ पाते हैं। परम श्रद्धेय, ब्रह्मलीन, अनन्तश्रीविभूषित स्वामी
५

आमुख महावीरी व्याख्या
हरिहरानन्दजी सरस्वती (श्रीकरपात्रीजी महाराज) तो यहाँ तक कहते थे
कि श्रीहनुमान्-चालीसा आर्ष मन्त्रोंकी भाँति ही परमप्रमाण, सर्वशक्तिमान्,
तथा सर्ववाञ्छाकल्पतरु है। यह अवधी भाषामें उपनिबद्ध तैंतालीस छन्दोंमें
लिखा हुआ एक स्तोत्रकाव्य है, जिसे हम गोस्वामीजीकी सिद्ध रचना मानते
हैं। श्रीहनुमान्-चालीसाकी भाषा-शैली गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंसे मिलती-
जुलती है। श्रीहनुमान्-चालीसाकी सार्वभौमता एवं सर्वजन-सुलभताको
देखते हुए कोई भी सहृदय सन्त इसे अनार्ष नहीं मान सकता। गोस्वामीजीकी
द्वादश-ग्रन्थावलीके अन्तर्गत इस ग्रन्थका संग्रह न होना कोई विशेष
महत्त्वका नहीं है क्योंकि बहुत-से ऐसे पद श्रीगोस्वामीजीके नामसे मिलते
हैं जिनका संग्रह ग्रन्थावलीमें नहीं है, जबकि उनकी रचना-शैली क्वचित्-
क्वचित् गोस्वामीजीके संगृहीत पदोंसे भी अधिक रुचिकर लगती है। यथा—
ठुमुकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ॥
किलकि किलकि उठत धाय परत भूमि लटपटाय।
धाय मातु गोद लेत दशरथ की रनियाँ॥
अंचल रज अंग झारि बिबिध भाँति सौं दुलारि।
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियाँ॥
विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर।
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियाँ॥
तुलसिदास अति अनंद देख के मुखारबिंद।
रघुबर-छबि के समान रघुबर-छबि बनियाँ॥
अहो! इस पदमें उपस्थित की हुई राघव सरकारकी यह भुवनमोहन झाँकी
किस सहृदय मनको बालरूप श्रीरामभद्रकी ओर झटिति नहीं खींच लेती!
यह पद अलंकार, रस, भक्ति, तथा संगीतकी दृष्टिसे अनुपम होता हुआ भी
गोस्वामीजीके किसी भी ग्रन्थमें संगृहीत नहीं हो सका, पर ४०० वर्षोंसे चली
आ रही अविच्छिन्न परम्परामें अद्यावधि यह गोस्वामीजीकी गेय रचनाओंका
६

महावीरी व्याख्या
आमुख

चूडामणि माना जाता है। ठीक यही तथ्य श्रीहनुमान्-चालीसाके विषयमें भी
जानना चाहिए।
श्रीहनुमान्-चालीसाकी श्रीतुलसीदासजीकी रचना होनेके पक्षमें एक और
सशक्त प्रमाण उद्धृत किया जा रहा है। प्रायः गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंमें
उनके द्वारा रचित एकमें दूसरे ग्रन्थके कतिपय पद्य उद्धृत देखे जाते हैं। यथा
दोहावलीका प्रथम दोहा (राम बाम दिसि जानकी, दो. १) रामाज्ञाप्रश्न
(रा.प्र. ७-३-७) तथा वैराग्य-संदीपनी (वै.सं. १)में ज्यों-का-त्यों उद्धृत
है। इसी प्रकार श्रीमानसजीके लगभग १०० दोहे और सोरठे यथानुपूर्वी
श्रीदोहावलीमें संगृहीत हैं। उदाहरणके लिए दो-एक देखे जाएँ—
एक छत्र एक मुकुटमनि सब बरनन पर जोउ।
तुलसी रघुबर-नाम के बरन बिराजत दोउ॥
—रा.च.मा. १-२०
यही दोहा दोहावली ग्रन्थका ९वाँ है। बालकाण्डका २७वाँ दोहा
(राम-नाम नरकेसरी) दोहावलीका २६वाँ है। ठीक इसी पद्धतिका
अनुसरण श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रारम्भमें किया गया। अयोध्याकाण्डके
प्रथम दोहेका श्रीहनुमान्-चालीसाके मङ्गलाचरणमें प्रस्तुतीकरण ही हनुमान्-
चालीसाको निःसंदिग्ध कर देता है। अयोध्याकाण्डका प्रथम दोहा श्रीगुरु-
चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि इत्यादि ज्यों-का-त्यों हनुमान्-
चालीसाके मङ्गलाचरणके रूपमें सनातन-धर्मावलम्बी आबालवृद्ध जन-
जनके मुखमण्डलपर विराजमान है। अतः—
एतेहु पर करिहैं जे शंका।
मोहि ते अधिक ते जड़ मति-रंका॥
—रा.च.मा. १-१२-८
इत्यलमतिपल्लवितेन।

७

आमुख महावीरी व्याख्या
श्रीहनुमन्बाहुककी भाँति यह छोटे-छोटे मात्र ४३ छन्दोंमें उपनिबद्ध
है। यह परम स्वस्त्ययन स्तोत्ररत्न समस्त ऐहलौकिक एवं पारलौकिक
कामनाओंकी पूर्ति करता है। मैंने भी इसके विधिवत् प्रयोगका सद्यः
फल देखा है। गोस्वामीजीकी ग्रन्थावलीमें संगृहीत न होनेके कारण
आज तक पाश्चात्त्य-वासना-वासित-मनस्क साहित्यिक टीकाकार महानुभावों
द्वारा उपेक्षया इसकी कोई टीका न लिखी जा सकी। कुछ वर्षों पूर्व
श्रीइन्दुभूषण रामायणी द्वारा इसपर एक संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत की गई।
उसमें भी विषयका यथेष्ट व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण नहीं हो पाया। अत एव
गतवर्ष चौद्वार (उड़ीसा) में समायोजित श्रीसंकटमोचन हनुमान्जीके प्रतिष्ठा-
महोत्सवके शुभ-अवसरपर अपने सद्गुरुदेव अनन्तश्रीविभूषित श्री श्री १०८
श्रीरामचरणदासजी महाराज (फलाहारी बाबा सरकार, अरैल, प्रयाग) के
आदेशानुसार मैंने श्रीहनुमन्-चालीसापर लघु व्याख्या प्रस्तुत करनेका बाल-
सुलभ प्रयास किया है। यह कितने अंशोंमें सफल हो पाया है, इसका
आकलन सन्त महानुभाव ही कर सकते हैं; क्योंकि हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ
विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा (र.वं. १-१०)। शास्त्र-स्वाध्यायमें असमर्थता
तथा मानव-स्वभावजन्य-प्रमाद-वशात् यदि कुत्रचित् त्रुटि हो गई हो तो
भगवद्भक्तजन उसे क्षमा करेंगे।
श्रीहनुमन्-चालीसामें कुल ४३ पद हैं, जो दोहा तथा चौपाई छन्दमें
निबद्ध हैं। इसके प्रारम्भमें दो दोहे तथा उपसंहारमें एक दोहा है, शेष
४० चौपाइयाँ हैं। ३२ मात्राओंकी एक पङ्क्तिको एक चौपाई मानकर
प्रत्येक पङ्क्तिको पूर्ण छन्द स्वीकार करके ही उनकी ४० संख्याके
आधारपर ग्रन्थका नाम श्रीहनुमन्-चालीसा रखा गया। ६४ मात्राओंकी
दो-दो पङ्क्तियोंको एक चौपाई मानना भ्रमपूर्ण और अशास्त्रीय है। यदि
दो-दो पङ्क्तियोंको मिलाकर चौपाई होगी तो हनुमन्-चालीसा सिद्ध न
होगा क्योंकि चालीस पङ्क्तियोंमें बीस ही चौपाइयाँ होंगी। इस दृष्टिसे
८

महावीरी व्याख्या आमुख
हनुमान्-बीसा कहना उचित होगा; जबकि तुलसीदासजीने स्वयं हनुमान्-
चालीसा कहा है, यथा—जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा (ह.चा. ३९)।
श्रीमानसजीमें भी जहाँ-जहाँ विषम संख्यापर पङ्क्ति आई है, उस प्रत्येक
पङ्क्तिको प्रत्येक टीकाकारने स्वतन्त्र चौपाईके रूपमें मानकर उसकी टीका
की है। उदाहरणार्थ—
(१) बालकाण्ड २-१३
अकथ अलौकिक तीरथराऊ।
देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥
(२) अयोध्याकाण्ड ८-७
गावहिं मंगल कोकिलबयनी।
बिधुबदनी मृगशावक-नयनी॥
(३) अरण्यकाण्ड १२-१४ (कुछ प्रतियोंमें १२-१३)
जहँ लगि रहे अपर मुनि-बृंदा।
हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥
(४) किष्किन्धाकाण्ड १०-५
मम लोचन-गोचर सोइ आवा।
बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥
(५) सुन्दरकाण्ड १-९
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
कह मैनाक होहु श्रमहारी॥
(६) युद्धकाण्ड ८०-११
सखा धर्ममय अस रथ जाके।
जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताके॥
(७) उत्तरकाण्ड ६४-९
९

आमुख महावीरी व्याख्या
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई।
तब शिशुचरित कहेसि मन लाई॥
यह दिग्दर्शन मात्र प्रस्तुत किया गया। पद्मावतकी समीक्षामें आचार्य रामचन्द्र
शुक्लने भी कहा है कि जायसीने सात-सात चौपाइयों अर्थात् सात-सात
पङ्क्तियोंके बाद दोहा रचा है। चौपाईका तात्पर्य चार यतियों वाले बत्तीस
(३२) मात्राओंके मात्रिक वृत्तसे है। महर्षि वाल्मीकिजीको जिस प्रकार
बत्तीस अक्षरों वाला अनुष्टुप् सिद्ध है, उसी प्रकार वाल्मीकिजीके अवतार
गोस्वामी तुलसीदासजीको बत्तीस मात्राओं वाली चौपाई सिद्ध है।
यह व्याख्या लगभग एक वर्ष पहले पूर्वदेशमें ही उपनिबद्ध की गई
थी। मुझे लगता है कि इसी हनुमान्-चालीसाकी व्याख्याके फलने दासको
रामभद्रदास कहलानेका सौभाग्य दे दिया। मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण
विश्वास है कि इस ग्रन्थके अनुशीलनसे आस्तिक सनातन-धर्मी हनुमत्परायण
तथा श्रीमानसके कथावाचक महानुभाव परम सन्तोषका अनुभव करेंगे। मैं
समस्त वैष्णव सन्तोंके ही कर-कमलोंमें इस ग्रन्थोपहारको समर्पित कर
उनके पादपद्मोंमें साष्टाङ्ग प्रणत हो रहा हूँ।
श्रीवैष्णवेभ्यो नमो नमः।
इति निवेदयति राघवदीयः
रामभद्रदासः
फलाहारी आश्रम, अरैल
प्रयाग (उत्तरप्रदेश)
गङ्गा दशहरा, वि. सं. २०४१ (जून ८, १९८४ ई.)
परिशोधित-मार्गशीर्ष पूर्णिमा, वि. सं. २०७२ (दिसम्बर २५, २०१५ ई.)
१०

महावीरी व्याख्या

॥ मङ्गलाचरणम् ॥
तापिच्छनीलं धृतदिव्यशीलं ब्रह्माद्वयं व्यापकमव्ययञ्च।
राजाधिराजं विशदं विराजं सीताभिरामं प्रणमामि रामम् ॥
सीतावियोगानलवारिवाहः श्रीरामपादाब्जमिलिन्दवर्यः।
दिव्याञ्जनाशुक्तिललामभूतः स मारुतिर्मङ्गलमातनोतु ॥
गुरून्नत्वा सीतापतिचरणपाथोजयुगलं
चिरञ्चित्ते ध्यात्वा पवनतनयं भक्तसुखदम्।
गिरं स्वीयां दुष्टां विमलयितुमेवार्यचरितै-
र्महावीरीव्याख्यां विरचयति बालो गिरिधरः ॥
श्रीगुरुदेव गजानन मारुति-आरति-नाशिनि गौरि गिरीशा।
जानकि-जीवन मारुतनंदन पंकज पायन नाइके शीशा।
माधव शुक्ल शुभा परिवा तिथि भार्गववार प्रभातगवीशा।
संबत बीस-शताधिक-चालिस व्याख्या करी हनुमान-चलीसा ॥
अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ॥
—रा.च.मा. ५-मङ्गलाचरण श्लोक ३

दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज निज-मन-मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर-बिमल-जस जो दायक फल चारि॥
शब्दार्थ— मुकुर ▸ दर्पण।
अर्थ—श्रीगुरुदेवजीके श्रीचरणकमलकी पराग-रूप धूलिसे अपने मन-
रूप दर्पणको स्वच्छ करके रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामभद्रजूके निर्मल यशका
वर्णन कर रहा हूँ, जो चारों फलोंको देने वाला है।
व्याख्या—सनातन धर्मके अलंकारभूत परम पावन स्तोत्ररत्न श्रीहनुमान्-
चालीसाकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए कलिपावनावतार, निखिल-
वैष्णवकुल-शेखर, सारस्वत-सार्वभौम, परम रामभक्त, प्रातःस्मरणीय,
कविकुलतिलक, पूज्य श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज प्रतिज्ञा-वाक्यमें
सर्वप्रथम श्रीपदके प्रयोगसे श्रीजीका स्मरण कर रहे हैं, जो समस्त
मङ्गलोंकी खान हैं।
बाम भाग शोभति अनुकूला।
आदिशक्ति छबिनिधि जगमूला॥
—रा.च.मा. १-१४८-२
ये ही श्री जनक महाराजके यशोवर्धन हेतु श्रीमिथिला-भूमिमें प्रकट होती हैं
तथा श्रीसीता रूपसे श्रीरामभद्रजूके वाम भागमें विराजमान होकर जीवके
भगवत्प्रातिकूल्यको निरस्त करती हैं। श्री शब्दका गुरु शब्दसे दो प्रकारका
समास है—
(१) मध्यमपदलोपी तृतीयातत्पुरुष समास— श्रिया अनुगृहीतो गुरुः इति
श्रीगुरुः। अर्थात् श्रीजीके द्वारा अनुगृहीत गुरुदेव। अभिप्राय यह है कि
१२

महावीरी व्याख्या दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज
श्रीसंप्रदायमें दीक्षित गुरुदेवकी ही चरण-धूलिसे मनकी निर्मलता संभव है।
क्योंकि श्रीजीकी कृपाके बिना अविद्याकृत दोष नष्ट नहीं होते। तात्पर्य यह
है कि श्रीजीको गोस्वामीजीने भगवदभिन्न होनेपर भी भक्तिरूपमें स्वीकारा
है। यथा—
लसत मंजु मुनि-मंडली मध्य सीय रघुचंद।
ग्यान-सभा जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंद॥
—रा.च.मा. २-२३९
(२) कर्मधारय समास—श्रीरेव गुरुः इति श्रीगुरुः। अर्थात् श्री ही गुरु हैं।
श्रीसंप्रदायमें श्रीरामानुजाचार्यजी तथा श्रीरामानन्दाचार्यजीने श्रीजीको ही परम
गुरु माना है। पूर्वाचार्योंने श्रीसीता भगवतीको श्रीहनुमान्जीकी आचार्याके
रूपमें स्वीकारा है। यथा—समस्तनिगमाचार्यं सीताशिष्यं गुरोर्गुरुम्,
अर्थात् श्रीहनुमान्‌जी श्रीसीताजीके शिष्य तथा देवगुरु बृहस्पतिजीके भी
गुरु हैं। अतः श्रीहनुमान्‌जीकी संतुष्टिके लिए प्रणीत श्रीहनुमान्-चालीसाके
प्रारम्भमें उनकी आचार्या श्रीसीताजीका स्मरण अत्यन्त उपयोगी है, यही
श्रीगुरु शब्दका अभिप्राय प्रतीत होता है।
रज शब्द यहाँ श्लेषके बलसे कमल-पक्षमें पराग एवं चरण-पक्षमें धूलि
रूप अर्थका द्योतक है। मनको मुकुर कहनेका अभिप्राय यह है कि जैसे
दर्पणमें बिम्बका प्रतिबिम्बन होता है, उसी प्रकार मनमें श्रीभुवनमनोहर
श्रीराघवके रूपका प्रतिबिम्बन होता है। पर वह मन विषय रूप काई
(जलका मल) से मलिन हो चुका है, यथा—काई बिषय मुकुर मन लागी
(रा.च.मा. १-११५-१)। अतः उसे श्रीगुरुदेवके चरण-कमलकी पराग जैसी
मृदु धूलिसे स्वच्छ करके पुनः श्रीरामजीके यशोवर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं,
जिससे स्वच्छ मनोदर्पणमें भली-भाँति उस यशश्चन्द्रका प्रतिबिम्बन हो सके।
श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रारम्भमें रघुबर-बिमल-जस बरनउँ यह
वाक्यखण्ड एक जिज्ञासाका केन्द्र बन जाता है, तथा कुछ सामान्य मस्तिष्क
१३

दो. १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज महावीरी व्याख्या
वालोंको असंगत प्रतीत होता है। पर विचार करने पर इसका सुगमतया
समाधान हो जाता है। श्रीहनुमान्‌जी महाराज श्रीरामभद्रजूके सर्वतोभावेन
समर्पित भक्तोंमें अग्रणी हैं। श्रीरघुनाथजीके अतिरिक्त वे अपना किञ्चित् भी
अस्तित्व मानने को तैयार नहीं हैं। यथा—
ता पर मैं रघुबीर दोहाई।
जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥
—रा.च.मा. ४-३-३
अतः श्रीरघुवर-यशोवर्णनमें ही उनके यशका वर्णन गतार्थ हो जाता है। दूसरी
बात यह भी है कि वैष्णव भक्तोंको अपनी प्रशंसा नहीं भाती। अतः रघुवर-
यशोवर्णनसे ही श्रीहनुमान्‌जीकी प्रसन्नता संभव है। इसी उद्देश्यको ध्यानमें
रखकर श्रीगोस्वामीजीने अभिधावृत्तिसे श्रीरामजीके यशका वर्णन कर
श्रीहनुमान्-चालीसासे श्रीमारुतिको प्रसन्न किया तथा रघुवर-यशोभङ्गिमासे
लक्षणावृत्ति द्वारा श्रीहनुमत्-यशोगान कर इस हनुमान्-चालीसा स्तोत्रको
श्रीराघवकी प्रसन्नताका केन्द्र बना दिया। अतः रघुबर-बिमल-जस बरनउँ
से उपक्रम करके राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर-भूप से
उपसंहार करेंगे। यह रामयश अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—इन चारों फलोंका
प्रदाता है। भाव यह है कि इससे प्रसन्न होकर हनुमान्‌जी महाराज श्रीहनुमान्-
चालीसाके पाठकको पुरुषार्थ-चतुष्टय दे डालते हैं। यद्वा सालोक्य, सामीप्य,
सायुज्य, सारूप्य—इन चारों मुक्तिफलोंको देते हैं। अथवा धर्म, ज्ञान, योग,
जप—इन चारों फलोंको देते हैं। किंवा ज्ञानवादियोंको साधन-चतुष्टयसे
संपन्न कर देते हैं।
१४

महावीरी व्याख्या दो. २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै
॥ श्रीराम ॥
मूल (दोहा)—
बुद्धि-हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार॥
शब्दार्थ—बिकार ▸ दोष।
अर्थ—अपने शरीरको बुद्धिसे हीन जानकर मैं श्रीपवनपुत्र हनुमान्‌जीका
स्मरण कर रहा हूँ। हे प्रभो! आप मुझे बल, बुद्धि, तथा विद्या प्रदान करें
तथा क्लेश एवं विकारोंको समास कर दें।
व्याख्या—यहाँ बुद्धि शब्द भगवत्सेवोपयोगिनी बुद्धिका वाचक है तथा
तनु सूक्ष्म शरीर का, क्योंकि बुद्धिको सूक्ष्म शरीरका अवयव माना गया
है। अर्थात् मेरी बुद्धि तमोगुणके आधिक्यसे भगवान्‌के श्रीचरण-कमलोंसे
विमुख हो गई है, अतः पवनपुत्रका स्मरण करता हूँ। पवन शब्दका अर्थ
है पवित्र करने वाला। यथा—पुनाति इति पवनः। आप उनके पुत्र अर्थात्
अग्नि हैं, यथा—वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१)। इसलिए अग्निवत् बुद्धिमें
परम प्रकाशका आधान करके क्लेश आदि मलोंको ध्वस्त कर दें।
अब गोस्वामीजी हनुमान्‌जीसे तीन वस्तुओंकी याचना करते हैं—
(१) बल शब्द यहाँ काम-राग-विवर्जित-आत्मबल-परक है।
यथा—बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् (भ.गी. ७-११)। यही
आत्मबल भगवत्प्राप्तिमें साधन है, यथा—नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः
(मु.उ. ३-२-४)।
(२) बुधि (संस्कृतः बुद्धि) शब्दसे यहाँ ईश्वरप्रपन्न बुद्धि अभिप्रेत है,
यथा—चरन-सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि (रा.च.मा. ३-४)।
१५

दो. २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै महावीरी व्याख्या
(३) बिद्या (संस्कृत:विद्या)—यहाँ विद्या विनयसंपन्ना अपेक्षित है, जो
भगवत्संबन्धका विवेक उत्पन्न करके जीवको राघवके चरण-कमलसे जोड़
दे। यथा—सा विद्या या विमुक्तये (वि.पु. १-१९-४१)। अपि च—
बिद्या बिनु बिबेक उपजाए।
श्रम फल पढ़े किए अरु पाए॥
—रा.च.मा. ३-२१-९
अर्थात् श्रीआञ्जनेय बल, बुद्धि, एवं अध्यात्म-विद्यासे भगवान्‌के सौन्दर्य,
ऐश्वर्य, एवं माधुर्यकी अनुभूतिका सामर्थ्य दें।
क्लेश पाँच होते हैं—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश
(मरण)। यथा—अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः (यो.सू.
२-३)। विकार छः कहे जाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, एवं
मात्सर्य। यथा—षट-बिकार-जित अनघ अकामा (रा.च.मा. ३-४७-
७)। इस प्रकार पञ्च क्लेशों और षट् विकारोंका योग ग्यारह (११) हुआ
और आप एकादशरुद्रमय हैं। यथा—रुद्र-अवतार संसार-पाता (वि.प.
२५-३)। अतः मेरे इन एकादश शत्रुओंको समाप्त करें।
१६

महावीरी व्याख्या चौ. १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥
शब्दार्थ—उजागर (उज्जागर) ▸ प्रसिद्ध।
अर्थ—समस्त शास्त्रीय ज्ञान एवं गुणोंके समुद्र श्रीहनुमान्‌जी! आपकी
जय हो! हे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वानरोंमें श्रेष्ठ आञ्जनेय! आपकी जय हो!
व्याख्या—इस चौपाईके पूर्वार्धमें श्रीहनुमान्‌जीके पारलौकिक उत्कर्ष
तथा उत्तरार्धमें लौकिक आदर्शका वर्णन करते हैं। श्रीहनुमान्‌जी समस्त
शास्त्रोंके ज्ञाता हैं। श्रीमद्वाल्मीकीय-रामायणके किष्किन्धाकाण्डमें भगवान्
श्रीराम इनके अलौकिक ज्ञानकी प्रशंसा करते हैं—
नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्॥
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन विधिना श्रुतम्।
बहुव्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम्॥
—वा.रा. ४-३-२८,२९
श्रीरामचन्द्रजी प्रशंसाके स्वरमें कहते हैं, “जिसने ऋग्वेदकी पूर्ण शिक्षा नहीं
पाई तथा जिसने यजुर्वेदको अर्थतः धारण नहीं किया तथा जो सामवेदका
विद्वान् नहीं, वह इस प्रकारका भाषण कभी भी नहीं कर सकता। निश्चित ही
संपूर्ण व्याकरण इसने विधिवत् सुना है क्योंकि धाराप्रवाहसे बोलता हुआ
यह विद्यार्थी कहीं भी एक भी अक्षर अशुद्ध नहीं बोला।”
तिहुँ लोक उजागर—हनुमान्‌जी रुद्रावतार होनेसे तथा जल, थल, एवं
नभमें अव्याहतगति होनेके कारण तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं।
१७

चौ. १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर महावीरी व्याख्या
जय कपीश—हनुमान्‌जी कपियोंके ईश्वर हैं। यथा—
वानराणामधीशम् (रा.च.मा. सुन्दरकाण्ड, मङ्गलाचरण श्लोक ३)।
इन्होंने श्रीरामजीकी सेवाके लिए वानर-शरीर धारण किया, क्योंकि इनके
स्वामी नरवेषमें अवतार लिए—तुमहिं लागि धरिहउँ नरबेसा (रा.च.मा.
१-१८७-१)। स्वामीसे सेवकको निम्न कक्षामें होना चाहिए। यथा—
जेहि शरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र-देह तजि नेह-बश बानर भे हनुमान॥
—दो. १४२
यद्यपि और देवोंको ब्रह्माजीने वानर रूपमें अवतार लेनेका आदेश दिया
था। यथा—
निज लोकहिं बिरंचि गे देवन इहइ सिखाइ।
बानर-तनु धरि धरनि महँ हरि-पद सेवहु जाइ॥
—रा.च.मा. १-१८७
पर महादेवको आदेश नहीं दिया था, अतः देवन इहइ सिखाइ कहा, न
तु महादेवहि सिखाइ। वानर-शरीर धारण करनेमें दूसरा हेतु यह भी है कि
वानर शुद्ध शाकाहारी होता है; अर्थात् वन्य फल, मूल, पत्तोंसे ही अपनी
जीविका चलाता है, जो श्रीराघवको बहुत प्रिय हैं। यथा—फलमूलाशनौ
दान्तौ (रा.र.स्तो. १८), शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः (का.वा.
२-१-६९), और न मांसं राघवो भुङ्क्ते (वा.रा. ५-३६-४१), अर्थात् राघव
मांस कभी नहीं खाते हैं। अतः प्रभुकी वृत्तिके अनुसार श्रीहनुमान्‌जीने विशुद्ध
शाकाहारी वानर-शरीर धारण किया। अतः हनुमान्‌जीके उपासक भावुक
भक्तोंको कभी भी मांस, मत्स्य, तथा मद्यका सेवन नहीं करना चाहिए।
मांसाहारी उपासक निश्चित ही हनुमान्‌जीके कोपका भाजन बनता है।
१८

महावीरी व्याख्या चौ. २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-दूत अतुलित-बल-धामा।
अंजनिपुत्र - पवनसुत - नामा॥ २ ॥
शब्दार्थ—अतुलित-बल-धामा ▸ अतुलनीय बलके आश्रय।
अर्थ—आप श्रीरामजीके विश्वस्त दूत तथा अतुलनीय बलके आश्रय हैं
तथा आप अञ्जनीपुत्र एवं पवनपुत्र नामसे प्रसिद्ध हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्‌जी श्रीराघवके अन्तरङ्गतम दूत हैं। अतः
श्रीसीताजीके प्रति गोपनीय संदेशवाहकका कार्य इन्हींको सौंपा गया।
यथा—
बहु प्रकार सीतहिं समुझाएहु।
कहि बल बीर बेगि तुम आएहु॥
—रा.च.मा. ४-२३-११
सुन्दरकाण्डमें ये श्रीसीताजीके समक्ष स्वयं कहते हैं—रामदूत मैं मातु
जानकी (रा.च.मा. ५-१३-९), और प्रामाणिकताके लिए करुणानिधानकी
शपथ करते हैं—सत्य शपथ करुनानिधान की (रा.च.मा. ५-१३-९)।
भाव यह है कि मुझमें दूत बननेकी कोई पात्रता न होनेपर भी करुणानिधानकी
करुणाने यह महत्त्वपूर्ण पद दे दिया।
अतुलित-बल-धामा—हनुमान्‌जी अतुलनीय बलके आश्रय हैं ही,
यथा—तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों (ह.बा. ३३)। अथवा
अतुलित बलशाली भगवान् श्रीराम हैं, यथा—अतुलित बल अतुलित
प्रभुताई (रा.च.मा. ३-२-१२)। उनके भी आश्रय हैं श्रीहनुमान्‌जी।
यथा—चलेउ हरषि हिय धरि रघुनाथा (रा.च.मा. ५-१-४)।
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चौ. २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा महावीरी व्याख्या
अंजनिपुत्र-पवनसुत-नामा—ये दोनों संबोधन हनुमान्‌जीकी मातृमत्ता
एवं पितृमत्ताको सूचित करते हैं। अञ्जना—जो पहले पुञ्जिकस्थला
नामक अप्सरा थीं—उन्हें अगस्त्यजीके शापसे वानर-शरीर प्राप्त हुआ।
कामरूप-धारणका सामर्थ्य होनेसे कदाचित् अञ्जनाको दिव्यरूप-संपन्न
देखकर वायुदेवने उनका मानसिक स्पर्श कर हनुमान्‌जी जैसे महापराक्रमी
महापुरुषको उनके गर्भमन्दिरमें प्रतिष्ठित किया। वायुके रूपरहित होनेसे
केसरी-पत्नीका न तो सतीत्व भङ्ग हुआ और न ही कोई साङ्कर्य दोष आया,
क्योंकि वायु संपूर्ण प्राणियोंके अन्तःस्थ हैं तथा प्रत्येक वस्तुके त्याग एवं
स्वीकारमें वे ही कारण हैं। वायुके बिना कभी भी न तो गर्भाधान संभव है और
न ही बालकका जन्म—प्रसव पवन प्रेरेउ अपराधी (वि.प. १३६.५)।
यहाँ यह भी ध्यान रहे कि रूपवान्‌का स्पर्श ही पदार्थमें विकृति लाता
है किन्तु वायु रूपरहित स्पर्श वाला है, यथा—रूपरहितस्पर्शवान् वायुः
(त.सं. १३)। वायु सामान्यतः प्रत्येक प्राणीके प्रत्येक अङ्गका स्पर्श करता
है, अतः वायवीय स्पर्शमें दोष नहीं। वायु सबसे पवित्र है, यथा—पवनः
पवतामस्मि (भ.गी. १०-३१)। अतः परम पवित्र पितासे जन्म होनेके कारण
हनुमान्‌जी परम-पवित्रतम-व्यक्तित्व-संपन्न हुए।
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