श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहावीरी व्याख्या आमुख
रचना करके मधुरतम शिष्ट एवं सुबोध ग्रामीण शब्दोंमें इसे सजाया है। यही
कारण है कि यह विद्वानोंकी भी हृदयतन्त्रीको झङ्कृत करता है एवं अति गँवार
निरक्षर महिलाओंके भी हृदय-श्रद्धा-सुमनका परम पावन मकरन्द होकर
ग्रामीण भारती मधुकरीको भी गुनगुनवाता रहता है। आज यह हनुमन्-
चालीसा हिमाचलसे कन्याकुमारीतक प्रत्येक भारतवासीके मनोमन्दिरका
देवता बना हुआ है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदायका हो।
विदेशोंके भी ७५ प्रतिशत भागोंमें जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर (ह.चा.
१) का नारा बुलन्द हो रहा है। गोस्वामीजीके अतिरिक्त और किसी
मनीषीकी लेखनीमें ऐसी उत्कृष्ट लोकप्रियताका प्रवाह नहीं दृष्टिगोचर होता।
अन्य ग्रन्थों जैसी लोकप्रियता तुलसीकृत हनुमन्-चालीसामें विद्यमान है।
प्रत्येक सनातन-धर्मी श्रीमानसजीके पाठ-प्रारम्भ तथा पाठ-विश्राममें हनुमन्-
चालीसाका संपुट लगाता है।
यदि भाषापर विचार करें तो गोस्वामीजीके श्रीरामललानहछूसे सरल
हनुमन्-चालीसाकी भाषा नहीं है। गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंके समान इसमें
भी स्वभावतः अलंकार आए हैं। यथा—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
—ह.चा. ४
अतः भले ही यह हनुमन्-चालीसा तुलसीग्रन्थावलीमें न मुद्रित हो, पर
गोस्वामीजीकी रचना होनेमें किसी भी सहृदयको संदेह नहीं होगा। इसका
श्रद्धासे पाठ करनेपर बहुत-से लोगोंको सफलमनोरथ होते देखा एवं
सुना गया है। प्रायः भक्त महात्मा जन हनुमन्-चालीसाका उनचास(४९)-
दिवसीय तथा अष्टोत्तरशत(१०८)-दिवसीय अनुष्ठान किया करते हैं। भीषण
रोगसे आक्रान्त व्यक्ति भी इसका अनुष्ठान-विधिसे पाठ कर अति
शीघ्र लाभ पाते हैं। परम श्रद्धेय, ब्रह्मलीन, अनन्तश्रीविभूषित स्वामी
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