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सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 110 में से

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आमुख महावीरी व्याख्या
नहीं है। पर मानसके इस गोपनीयतम प्रसंगरत्नकी चर्चा श्रीहनुमान्‌चालीसामें
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (ह.चा. १७) कह कर सूत्ररूपमें कर दी
गई है। श्रीरामचरितमानसमें कथित प्रसंगोंकी गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंसे
संगति लगाई जाती है। इसीलिए द्वादश ग्रन्थ मानसजीके पूरक माने जाते
हैं। जैसे द्रोणाचलको लेकर श्रीअवधके ऊपर आते हुए हनुमान्जीको
भरतजीने बिना फरके बाणसे विद्धकर नीचे गिराया, यथा—परेउ मुरछि
महि लागत सायक (रा.च.मा. ६-५९-१)। पर पर्वतकी क्या दशा हुई,
इसका स्पष्टीकरण मानसमें न करके गोस्वामीजीने इसके पोषक गीतावली
ग्रन्थमें किया है—पर्यो कहि राम पवन राख्यो गिरि (गी. ६-१०-२)
अर्थात् हनुमान्जीने अपनेको गिरता हुआ जानकर द्रोणाचल पर्वतको
पवनके हाथ सौंप दिया। एवमन्यत्रापि। जैसे गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थ
मानसके प्रसंगोंके पूरक हैं, वैसे ही श्रीहनुमान्-चालीसा भी है। यथा
राघवने हनुमान्जीको मुद्रिका दी—
परसा शीष सरोरुह पानी।
करमुद्रिका दीन्ह जन जानी॥
—रा.च.मा. ४-२३-१०
पर इस मुद्रिकाको हनुमान्जी महाराजने कैसे एवं कहाँ सम्भाला, मानसके
इस निगूढ प्रसंगका स्पष्टीकरण श्रीहनुमान्-चालीसामें ही होता है। यथा—
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
—ह.चा. १९
अतः इस परीक्षणमें भी यह ग्रन्थ खरा उतरा।
भाषा एवं शैलीकी दृष्टिसे भी यह निन्द्य नहीं कहा जा सकता। सामान्य
लोगोंके कल्याणार्थ गोस्वामीजीने सुरसरि सम सब कहँ हित होई
(रा.च.मा. १-१४-९) की मान्यताके अनुसार अति सरल ग्राम्य भाषामें
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