शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
को देखकर मात्रा की कल्पना (निर्धारण) करनी चाहिये।
8 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
तथा पाचनशक्ति), वय (बालक, युवा तथा वृद्ध), बल
(शारीरिक तथा मानसिक), प्रकृति (स्वभाव), दोष (वात,
पित्त तथा कफ) तथा देश (आनूप, जांगल तथा साधारण)
को देखकर मात्रा की कल्पना (निर्धारण) करनी चाहिये।
वक्तव्य—मात्रा-निर्धारण करने के लिए संहिताकार ने
जिन मानकों का विचार करने का संकेत किया है, ये सब
विचार औषध मात्रा तथा आहार मात्रा के लिए ही हैं। एक
बात इस प्रसंग में और भी विचारणीय है—औषध-निर्माणकाल
में जिस द्रव्य का परिगणन एक ही योग में दो बार हो जाता है,
उस द्रव्य को दूना ले लिया जाता है किन्तु जब चिकित्सक
किसी रोगी के लिए अनेक योगों को मिलाकर एक योग की
कल्पना करता है, उस समय भी उसे यह विचार कर लेना
चाहिये कि उक्त योगों में कौन-कौन से द्रव्य समान हैं और
इन्हें परस्पर मिला देने से वे-वे द्रव्य कहीं आवश्यकता से
दूने, तिगुने तो नहीं हो गये हैं? इस ओर भी चिकित्सक को
अवश्य ध्यान देना चाहिये, क्योंकि यह भी मात्रा-निर्धारण
क्षेत्र का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
कालिंग-मान
यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ ।। ३८ ।।
अतस्तु मात्रा तद् योग्या प्रोच्यते सुज्ञसम्मता।
क्योंकि कलियुग में मनुष्य मन्दाग्नि (पाचन शक्ति की
कमी) वाले, ह्रस्व (छोटे कद वाले) और हीनसत्त्व (थोड़ी
मानसिक शक्ति) वाले होते हैं। इसलिये औषध तथा आहार
द्रव्यों की वही मात्रा उनके सेवन करने योग्य होती है, जिसे
विद्वान् चिकित्सक तत्काल बतलाते हैं।
वक्तव्य—प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ जिस समय लिखी
गयी हैं उसी समय के पुरुषों की क्षमता के अनुसार सामान्य
मात्राओं का निर्देश किया गया है। जैसे-शिलाजीत का प्रयोग
करने की मात्रा आचार्य पुनर्वसु ने बतलायी है-'पलमधर्धपलं
कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता'।- च० चि० अ० 1.3.55। इसका
विशेष व्याख्यान 'चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन' से प्रकाशित
चरक संहिता में देखें। आज सामान्य मानव के लिए पल=4
तोला, अर्धपल=2 तोला और कर्ष=1 तोला की मात्रा
व्यावहारिक नहीं है। शास्त्रज्ञ तथा कर्माभ्यास-निपुण
चिकित्सक मात्रा-निर्धारण में स्वयं चतुर होते हैं।
यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः ।। ३९ ।।
यवद्वयेन गुञ्जा स्यात् त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते।
माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत् क्वचित् ।। ४० ।।
स्याच्चतुर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च।
गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद् दशमाषकः ।। ४१ ।।
चतुष्कर्षैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः।
चतुष्पलैश्च कुडवं प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः ।। ४२ ।।
बारह गौरसर्षपों (पीली सरसों) का एक 'जौ' होता है,
ऐसा कालिंग देश के विद्वान् कहते हैं। दो 'जौ' की एक
'गुञ्जा' (रत्ती) होती है, तीन गुञ्जा (रत्ती) का एक 'वल्ल'
होता है और गुञ्जा का अथवा कहीं-कहीं सात गुञ्जा का एक
'माशा' होता है। चार 'माशा' का एक 'शाण' होता है, उसी
को 'निष्क' तथा 'टंक' भी कहते हैं। छः 'माशा' का एक
'गद्याण' होता है और दस माशा का एक 'कर्ष' होता है। चार
'कर्ष' का एक 'पल' होता है, वह दस 'शाण' के बराबर
होता है। चार 'पल' का एक 'कुडव' होता है। प्रस्थ, आढक
आदि शेष सभी मान मागधमान के समान ही होते हैं।
वक्तव्य—यह 'कालिंगमान' है। इसमें दो मानों का नाम
'मागधमान' से अधिक दिया है। वे मान हैं-वल्ल और
गद्याण। इनका परिमाण ऊपर दिया जा चुका है। इस
'कालिंगमान' के अनुसार कर्ष (तोला) 10 माशा का स्वीकार
किया गया है और यह 10 माशा 70 या 80 रत्ती का होता है,
जब कि मागधमान में 1 कर्ष=12 माशा=96 रत्ती का माना
जाता है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से मागधमान ज्येष्ठ एवं
श्रेष्ठ है, जैसा कि अगले पद्य में कहा गया है। आचार्य शार्ङ्गधर
ने अन्यत्र मागधमान को मान्यता दी है, केवल 'चन्द्रप्रभावटी'
के निर्माण में उन्होंने मागधमान को महत्त्व दिया है। देखें-शा०
सं० म० खं० अ० 7। तदनुसार 4 शाण का 1 कर्ष होता है।
शेष विवेचन 'चन्द्रप्रभावटी' के वक्तव्य में देखें।
द्विविध-मान
कालिङ्गं मागधं चैव द्विविधं मानमुच्यते।
कालिङ्गान्मागधं श्रेष्ठं मानं मानविदो विदुः ।। ४३ ।।
इति मान परिभाषा।
मान दो प्रकार के कहे जाते हैं—1. कालिंग (उड़ीसा
प्रदेश के विद्वानों द्वारा स्वीकृत) मान तथा 2. मागध
(बिहारप्रान्तीय) मान। मान-विषय-विशेषज्ञ विद्वान्
कालिंगमान की तुलना में मागधमान को श्रेष्ठ (मात्रा में बड़ा)
मानते हैं।
वक्तव्य—श्रेष्ठ शब्द का तात्पर्य यहाँ यह है कि जिस मान
प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 9
का व्यवहार अधिक लोग करते हैं, उसे श्रेष्ठ कहा गया है।
यहाँ श्रेष्ठ का तात्पर्य उत्तम अर्थवाचक कदापि नहीं है।
प्राचीनकाल में मान-भेद
वैजयन्ती-कोषकार ने प्रयोग-भेद से तथा द्रव्य-भेद से
समस्त प्रकार के मानभेदों को इस प्रकार तीन भागों में विभक्त
किया है-'पाय्यं हस्तादिभिर्मानं, द्रुवयं कुडवादिभिः। पौतवं
तुलया प्रोक्तम्' । -वै० कोष।
- पौतवमान-तुला (तराजू) द्वारा पदार्थों के भार का जो
मान लिया जाता है, उसे पौतवमान (Measures of
weight) कहते हैं। - द्रुवयमान-विभिन्न प्रकार के द्रव पदार्थों के आयतन को
जिससे नापा या तौला जाता है उसे द्रुवयमान (Meas-
ures of capacity) कहते हैं। - पाय्यमान-वस्त्र आदि लम्बाई, ऊँचाई, नीचाई, वाले
पदार्थों को जो हाथ आदि नापों द्वारा नापा जाता है, उसे
पाय्यमान (Measures of length) कहते हैं।
कतिपय प्राचीन पौतवमान
(1) विष्णूक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजिका
3 राजिका = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यव
3 यव = 1 गुञ्जा
5 गुञ्जा = 1 माषक
12 माषक = 1 अक्षार्ध
16 माषक = 1 सुवर्ण
2 गुञ्जा = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
16 माषक = 1 ताम्रिक कर्ष
(2) मनूक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजसर्षप
3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम
3 मध्यमयव = 1 गुञ्जाकृष्णल
5 कृष्णलगुञ्जा = 1 माषक
16 माषक = 1 सुवर्ण
4 सुवर्ण = 1 पल
10 पल = 1 धरण
2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 रौप्यधरण
16 माषक = 1 कार्षापण
10 रौप्यधरण = 1 शतमान (रजत)
4 सुवर्ण = 1 निष्क (रजत)
(3) याज्ञवल्क्योक्त पौतवमान
8 त्रसरेणु = 1 लिक्षा
3 लिक्षा = 1 राजसर्षप
3 राजसर्षप = 1 श्वेतसर्षप
6 श्वेतसर्षप = 1 यवमध्यम
3 मध्यमयव = 1 कृष्णल (रत्ती)
5 कृष्णल = 1 माषक
16 माषक = 1 सुवर्ण
4-5 सुवर्ण = 1 पल
2 कृष्णल = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
10 धरण = 1 शतमान (रजत)
4 सुवर्ण = 1 निष्क (पल)
(4) सुश्रुतोक्त पौतवमान
12 मध्यमधान्य = 1 सुवर्णमाषक
माष
16 सुवर्णमाषक = 1 सुवर्ण
19 निष्पावमध्यम = 1 धरण
2½ धरण = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
4 पल = 1 कुडव
4 कुडव = 1 प्रस्थ
4 प्रस्थ = 1 आढक
4 आढक = 1 द्रोण
100 पल = 1 तुला
20 तुला = 1 भार
(5) कौटिल्योक्त पौतवमान
16 धान्यमाष = 1 सुवर्णमाषक
10 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
10 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
अथवा
5 रत्ती = 1 सुवर्णमाषक
16 सुवर्णमाषक = 1 सुवर्ण या कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
88 श्वेतसर्षप = 1 रौप्यमाषक
16 रौप्यमाषक = 1 धरण
20 शैव्य = 1 धरण
(सेम के बीज)
(हीरा की तौल में प्रयुक्त मान)
(6) लीलावती-ग्रन्थोक्त पौतवमान¹
2 यव = 1 गुञ्जा
3 गुञ्जा = 1 वल्ल
8 वल्ल = 1 धरण
2 धरण = 1 गद्याणक
14 वल्ल = 1 घटक
5 गुञ्जा = 1 माषक
16 माषक = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
1 कर्ष = 1 सुवर्ण (तोला)
(7) यवन-प्रचारित मान²
36 रत्ती = 1 टंक
72 टंक = 1 सेर
40 सेर = 1 मन
(8) आलमगीरशाह-प्रचारित मान³
192 घटक = 1 सेर
5 सेर = 1 घटिका (घड़ी)
8 घटिका = 1 मन
(9) शार्ङ्गधरोक्त पौतवमान⁴
30 परमाणु = 1 त्रसरेणु या वंशी
6 वंशी = 1 मरीचि
6 मरीचि = 1 राजिका
3 राजिका = 1 सर्षप
8 सर्षप = 1 यव
4 यव = 1 गुञ्जा=1 रत्ती
6 रत्ती = 1 माषक=1 माशा
4 माषक = 1 शाण
2 शाण = 1 कोल
2 कोल = 1 कर्ष=1 तोला
2 कर्ष = 1 शुक्ति=2 तोला
2 शुक्ति = 1 पल=4 तोला⁵
2 पल = 1 प्रसूति=8 तोला
2 प्रसूति = 1 अञ्जलि=16 तोला
2 अञ्जलि = 1 मानिका=32 तोला
2 शराव = 1 प्रस्थ=64 तोला
4 प्रस्थ = 1 आढक=256 तोला
4 आढक = 1 द्रोण=1024 तोला
2 द्रोण = 1 शूर्प=2048 तोला
2 शूर्प = 1 द्रोणी=4096 तोला
4 द्रोणी = 1 खारी=16384 तोला
200 पल = 1 भार=8000 तोला
20 पल = 1 तुला=400 तोला
शार्ङ्गधरोक्त मानों का चतुर्गुण सूत्र
4 माशा = 1 टंक
4 टंक = 1 कर्ष
4 कर्ष = 1 पल
4 पल = 1 कुडव
4 कुडव = 1 प्रस्थ
4 प्रस्थ = 1 आढक
4 आढक = 1 द्रोण
4 द्रोण = 1 द्रोणी
4 द्रोणी = 1 खारी
(10) कालिङ्गोक्त पौतवमान
12 गौरसर्षप = 1 यव
2 यव = 1 गुञ्जा
3 गुञ्जा = 1 वल्ल
7 गुञ्जा = 1 माष
अथवा
8 गुञ्जा = 1 माष
1-3. देखें-'लीलावती' परिभाषा-प्रकरण।
4. इनके पर्यायवाची शब्द मूल ग्रन्थ में देखें।
5. तोला में 5 का भाग देने से लब्धि छटांक और इनमें 16 का भाग देने से सेर प्राप्त होंगे।
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 11
4 माष = 1 शाण | 32 बिन्दु = 1 शुक्ति=2 तोला
6 माष = 1 गद्याण | 64 बिन्दु = 1 पाणिशुक्ति=4 तोला²
10 माष = 1 कर्ष | 1 कुडव = 16 तोला³
4 कर्ष = 1 पल | ( 2 ) यूनानी द्रुवयमान
4 पल = 1 कुडव | 4½ माशा = 1 चम्मच
( 11 ) यूनानी पौतवमान | 12½ तोला = 1 पियाली
2 खशखश = 1 खर्दल=1 राई | 20 तोला = 1 पियालंह
4 खर्दल = 1 उरुज्जह=1 चावल | ( 3 ) दाशमिक द्रुवयमान
4 उरुज्जह = 1 शईरह=1 जौ | (Metric system)
2 शईरह = 1 सुर्ख=1 रत्ती | 1 डेसीलीटर = 1/10 लिटर
4½ माशा = 1 मिस्काल | 1 सेण्टीलीटर = 1/100 लिटर
20 किरात = 1 दीनार | 1 मिलीलीटर = 1/1000 लिटर
20 माशा = 1 इस्तार | 1 डेकालीटर = 10 लिटर
33½ माशा = 1 औकिय्यह | 1 हेक्टोलीटर = 100 लिटर
2 सुर्ख = 1 किरात | 1 किलोलिटर = 1000 लिटर
6 सुर्ख = 1 दांग | ( 1 ) आयुर्वेदीय पाय्यमान
8 सुर्ख = 1 माशा | आयुर्वेद में पौतवमान की भाँति अन्य (द्रुवय, पाय्य)
3½ माशा = 1 दिरहम=1 ड्राम | मानों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध नहीं होता है, तथापि इसमें
90 मिस्काल = 1 रतल तिब्बी | उक्त कार्य का निर्वाह करने के लिए जिन मानवाचक शब्दों
2 रतल तिब्बी = 1 मन तिब्बी | का प्रयोग किया जाता है, वे इस प्रकार हैं-
64 तोला = 1 सेर आलमगीरी | 1 अंगुल = 8 जौ ¾ इंच⁴
84 तोला = 1 सेर शाही | 12 अंगुल = 1 वितस्ति=9 इंच⁵
( 12 ) दाशमिक पौतवमान | 21 अंगुल = 1 अरत्नि=16 ½ इंच
(Metric system) | 2 वितस्ति = 1 हस्त=18 इंच⁶
1 ग्राम = लगभग 1 माशा | 1 व्याम = 4 हस्त=6 फीट
1 डेसीग्राम = 1/10 ग्राम | 4 हाथ = 1 दण्ड
1 सेंटीग्राम = 1/100 ग्राम | 2000 दण्ड = 1 कोश
1 मिलीग्राम = 1/1000 ग्राम |
1 डेकाग्राम = 10 ग्राम |
1 हेक्टोग्राम = 100 ग्राम | 2. देखें-सु० चि० अ० 40.28 तथा वृद्धहारीतसंहिता।
1 किलोग्राम = 1000 ग्राम | 3. शार्ङ्गधरसंहिता के अनुसार 4 अंगुल चौड़े, 4 अंगुल ऊँचे मिट्टी,
( 1 ) आयुर्वेदीय द्रुवयमान | पत्थर, बाँस आदि के पात्र में आने योग्य द्रव पदार्थ।
1 बिन्दु = 1 बूँद¹ | 4. धागे में पिरोये हुये 8 जौ की लम्बाई।
8 बिन्दु = 1 शाण= ½ तोला | 5. इसके अन्तर्गत-प्रादेश, ताल, गोकर्ण मान भी होते हैं।
| देखें-अमरकोष।
| 6. कुहनी से कानी उंगली के छोर तक की नाप (अमरकोष)।
- तर्जनी अंगुली के दो पर्वों को किसी द्रव पदार्थ में डुबाकर उठाने | अथवा कुहनी से बीच की उंगली के छोर तक की नाप (हलायुध
से उससे गिरी हुई 1 बूँद। देख-अ० ह० सू० 20.9 | कोष)।
12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
12 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
( २ ) दाशमिक पाय्यमान (Measures of length)
1 मीटर = 39.37 इंच
1 डेसीमीटर = 1/10 मीटर
1 सेंटीमीटर = 1/100 मीटर
1 मिलीमीटर = 1/1000 मीटर
1 डेकामीटर = 10 मीटर
1 हेक्टोमीटर = 100 मीटर
1 किलोमीटर = 1000 मीटर
नवीन तथा प्राचीन द्रव्य
नवान्येव हि योज्यानि द्रव्याण्यखिलकर्मसु।
विना विडङ्गकृष्णाभ्यां गुडधान्याज्यमाक्षिकैः ॥ ४४ ॥
सभी प्रकार के व्यवहारों में नवीन (ताजे) द्रव्यों का ही उपयोग करना चाहिये, किन्तु निम्नलिखित द्रव्यों को ताजा न लें-वायविडंग, पीपल, गुड, धनियाँ, आज्य (घी) और माक्षिक (मधु या शहद)।
वक्तव्य-यह सूत्र रूप में दिया गया निर्देश विचारणीय है-यहाँ उपर्युक्त पुराने द्रव्यों का प्रयोग औषधयोगों के लिए ही निर्दिष्ट है, शेष कार्यों में इनको नया लिया ही जाता है। नया गुड़, घी, मधु, तथा धनियाँ ये प्रतिदिन बड़े आदर के साथ प्रयुक्त होते हैं। शास्त्र का भी निर्देश है कि भोजन तथा बृंहण कार्यों के लिए इन्हें नया ही लें। भावमिश्र ने 'धान्य' का अर्थ 'धनियाँ' न करके अन्न किया है। नया मधु पुष्टिकारक तथा सर होता है और वही पुराना हो जाने पर मल-संग्राहक, रूक्ष, मेदनाशक तथा दस्तावर हो जाता है। घी एक वर्ष पुराना, गुड़ तीन साल पुराना लेने की परम्परा है। चिकित्सा की दृष्टि से पुराने से पुराना घी अच्छा माना गया है, परन्तु औषधसिद्ध घी साल भर के बाद प्रभावहीन हो जाता है और औषधसिद्ध तैल पुराने उत्तम होते हैं। विशेष-देखें-सुश्रुत सू० अ० 36.7-9।
गीले द्रव्यों का प्रयोग
गुडूची कुटजो वासा कूष्माण्डश्च शतावरी।
अश्वगन्धा सहचरी शतपुष्पा प्रसारिणी ॥ ४५ ॥
पटोलं च तथा निम्बो बला नागबला तथा।
पथ्या पुनर्नवा चैव विदारी चेन्द्रवारुणी ॥ ४६ ॥
पलङ्कषा तथा छत्रा केतकी चेति विंशतिः।
प्रयोक्तव्याः सदैवार्द्रा द्विगुणा नैव कारयेत् ॥ ४७ ॥
(शुष्का यदि च गृह्यन्ते क्रियन्ते द्विगुणा न च।)
गिलोय (गुरूच), कुटज (कुरैया की छाल), अडूसा की पत्तियाँ, कूष्माण्ड (पेठा), शतावरी (शतावर की जड़ें), असगन्ध, सहचरी (कटसरैया), शतपुष्पा (पूर्ववर्ती सभी टीकाकारों ने इसका पर्याय 'सौंफ' लिखा है, वास्तव में यह 'सोया' है। इसके गुण-धर्मों पर ध्यान दें), गन्धप्रसारिणी, परबल की पत्ती, नीम की छाल, बला (बरियारा), नागबला (कंघी), पथ्या (हरड़), पुनर्नवा, विदारीकन्द, इन्द्रायण (इनारू का फल), पलंकषा (गुग्गुलु), छत्रा (छत्ता), केवड़ा का फूल-इन बीस द्रव्यों को सदैव गीले (सरस) या हरे लेकर प्रयोग में लाना चाहिये, किन्तु इनकी मात्रा को दूना नहीं किया जाता। कभी-कभी व्यवहार में ऐसा भी देखा जाता है कि ये द्रव्य सूखे तो ले लिये जाते हैं, किन्तु मात्रा में दूने नहीं लिये जाते।
वक्तव्य-यहाँ 'विंशतिः' शब्द प्रायिक वचन है। इस प्रकार के द्रव्यों की संख्या बीस से भी अधिक देखी जा सकती है, आप संहिता ग्रन्थों का परिशीलन करें। वहाँ यद्यपि इस प्रकार का स्वतन्त्र विचार नहीं किया गया है, तथापि प्रसंगानुसार यह निर्देश तो किया ही गया है, इस योग में किस द्रव्य को किस प्रमाण में कैसा (हरा, गीला या सूखा) लेना चाहिये।
सूखे तथा गीले द्रव्यों का विचार
शुष्कं नवीनं यद् द्रव्यं योज्यं सकलकर्मसु ॥ ४८ ॥
आर्द्रं च द्विगुणं युञ्ज्यादेष सर्वत्र निश्चयः।
चूर्ण, क्वाथ आदि सभी कार्यों में सूखे, किन्तु नवीन (ताजे-गुणवान्) द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये। उनके न मिलने पर ताजे (हरे-गीले) द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु वे आर्द्र (गीले) द्रव्य परिमाण में दूने लेने होंगे। यह सिद्धान्त सर्वत्र मान्य होता है।
वक्तव्य-यहाँ 'नवीन' शब्द 'प्रत्यग्रोऽभिनवो नव्यः' का पर्याय मात्र नहीं है, अपितु भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में इसकी क्या कालावधि है, इसके लिए देखें-इसी अध्याय के 54वें श्लोक के उत्तरार्ध से 57वें श्लोक के पूर्वार्ध तक के श्लोकों के आशय को। नवीन शब्द का एक आशय यह भी है कि वे द्रव्य सड़े, गले, घुने तथा किसी प्रकार से विकार युक्त न हो गये हों।
अनुक्त परिभाषा
कालेऽनुक्ते प्रभातं स्यादङ्गेऽनुक्ते जटा भवेत् ॥ ४९ ॥
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 13
भागोऽनुक्ते तु साम्यं स्यात् पात्रेऽनुक्ते च मृन्मयम्।
द्रवेऽनुक्ते जलं ग्राह्यं तैलेऽनुक्ते तिलोद्भवम् ।। ५० ।।
(दुग्धे सर्पिषि मूत्रे च ग्राह्यं गोसम्भवं बुधैः।)
यदि ग्रन्थकार द्वारा औषध सेवन करने का समय-निर्देश
न किया गया हो, तो प्रातःकाल समझ लेना चाहिये। यदि
औषधद्रव्य के पत्र, पुष्प, मूल, त्वचा, निर्यास (गोंद) आदि
का संकेत न किया गया हो, तो उसकी जड़ का ग्रहण करना
चाहिये। यदि किसी औषधयोग के द्रव्यों का अलग-अलग
मान=परिमाण न कहा गया हो, तो सभी द्रव्यों को समभाग में
लेना चाहिये। यदि क्वाथ, अवलेह आदि का निर्माण करने
के लिए किसी पात्र-विशेष का उल्लेख न किया गया हो, तो
मिट्टी के पात्र का ग्रहण करना चाहिये। औषध-निर्माण के
लिए अथवा औषध सेवन करने के लिए जहाँ किसी द्रव
(तरल पदार्थ) का उल्लेख न किया गया हो, वहाँ जल का
ग्रहण करना चाहिये। यदि तिल, सरसों, तीसी (अलसी),
बादाम आदि का नाम-निर्देश न किया गया हो तो वहाँ तिलों
के तेल का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ किसी विशेष प्राणी के
दूध, घी, मल, मूत्र का निर्देश न किया गया हो, वहाँ ये सभी
द्रव्य गाय से ही लेने चाहिये।
वक्तव्य-प्रायः ग्रन्थकार इस प्रकार की सामान्य बातों
को चर्चा नहीं किया करते, ऐसी परिस्थिति में ऐसे वचनों का
बड़ा महत्त्व होता है। निघण्टु-ग्रन्थों में प्रायः यह देखा जाता
है कि किसी औषधद्रव्य के कौन-से अंग (अवयव) के क्या
गुण हैं, लिखा रहता है, कहीं नहीं भी मिलता। ऐसे अवसरों
पर इस परिभाषा का प्रयोग होता है। मृन्मय-इसे अनेक
सम्पादकों टीकाकारों ने 'मृण्मय' लिखा है जो व्याकरण की
दृष्टि से अशुद्ध है। द्रवेऽनुक्ते-द्रव पदार्थों का प्रयोग किसी न
किसी प्रकार से चिकित्सा-क्षेत्र में होता ही है। अनुपान,
सहपान आदि में तो विशेष रूप से देखा ही जाता है। ऐसे
संदिग्ध अवसरों पर जल का प्रयोग शास्त्र द्वारा अनुमोदित है।
तिलोद्भवम्-तिलों से उत्पन्न तेल वास्तविक तेल है, शेष
तो आकार की साम्यता होने के कारण तेल कहे जाते हैं।
जितने 'तिलहन' द्रव्य हैं, उन सबसे तेल निकाला जाता है।
ध्यान दें-'तिलहन' नाम में भी तिल शब्द की ही प्रधानता है।
प्राणिज द्रव्यग्रहण-विधि
(जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम्।। ५१।।
क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारे च संहरेत्।)
रक्त (खून), रोम (लोम तथा केश), नख (नाखून) आदि
(अस्थि, माँस, वसा तथा शुक्र) द्रव्य युवा पशुओं के शरीर
से ही ग्रहण करने चाहिये। यदि दूध, मूत्र, मल इनका ग्रहण
करना हो तो उन पशुओं का जब आहार पच जाये तभी ग्रहण
करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य सु० सू० अ० 36.16 से लेकर यहाँ
ग्रन्थ की क्षति-पूर्ति की गयी है। आज भी वैज्ञानिक पद्धति
वाले रक्त का ग्रहण 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की अवस्था वाले
स्त्री-पुरुषों से ही करते हैं। दूध आदि का ग्रहण आहार के पच
जाने पर करना चाहिये, किन्तु देखा जाता है कि गो-पालनकर्ता
चारा सामने रखकर गाय को दुहते हैं, ऐसा दूध उक्त सिद्धान्त
के विरुद्ध है। संहरण (संग्रह) भी दो प्रकार का होता है-एक
तो द्रव्य को लेकर तत्काल प्रयोग कर लेना और दूसरा लेकर
रख देना।
पुनरुक्त द्रव्य का मान
एकम्प्यौषधं योगे यस्मिन् यत् पुनरुच्यते ।। ५२ ।।
मानतो द्विगुणं प्रोक्तं तद् द्रव्यं तत्त्वदर्शिभिः ।
यदि एक द्रव्य किसी योग में दो बार कहा गया हो, तो
औषध-निर्माण में कुशल विद्वान् उस द्रव्य को दुगुना कर
लेते हैं।
वक्तव्य-यहाँ किसी योग के द्रव्यों को समभाग में लेने
की आज्ञा ग्रन्थकार ने दी हो, वहाँ तो आप उस पुनरुक्त द्रव्यों
को दूना ले लेंगे और जहाँ पहली बार वह द्रव्य दूसरे द्रव्यों के
साथ दूसरे परिमाण में परिगणित हो और दूसरी बार दूसरे
परिमाण वाले द्रव्यों के बीच में परिगणित हो तो वहाँ उसका
वही-वही परिमाण होगा। इसका सावधानीपूर्वक विचार
कर लें।
लाल एवं सफेद चन्दन का विचार
चूर्णस्नेहासवा लेहाः प्रायशश्चन्दनान्विताः ।। ५३ ।।
कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम्।
चूर्ण, स्नेह (घी, तेल, वसा तथा मज्जा), आसव तथा
अवलेह इनके निर्माण में प्रायः सफेद चन्दन का और कषाय
(क्वाथ) एवं लेप आदि में लाल चन्दन का प्रयोग करना
चाहिये।
वक्तव्य-लाल तथा सफेद चन्दन के गुण-धर्मों का
विचार कर युक्ति-विशेषज्ञ चिकित्सक इन उपर्युक्त नियमों में
परिवर्तन भी कर सकता है। यह अनुमति 'प्रायः' शब्द का
प्रयोग करके ग्रन्थकार ने दी है।
पाठ भेद—यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता अधिकांश संस्करणों
14 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
में 'प्रायशश्चन्दनान्विताः' पाठ प्राप्त होता है, परन्तु इसका
एक पाठभेद है-'साध्या धवलचन्दनैः'। इस पाठ से
'सफेदचन्दन' की कामना तो पूर्ण हो जाती है, किन्तु 'प्रायः'
शब्द का गौरवपूर्ण भाव समाप्त हो जाता है ऐसा कुछ टीकाकारों
का मत है। इसके लिए उन्हें श्लोक के उत्तरार्ध में पठित प्रायः
शब्द का प्रयोग कर ही लेना चाहिये।
चूर्णादि में गुणहीनता का विचार
गुणहीनं भवेद् वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम् ।। ५४ ।।
मासद्वयात् तथा चूर्णं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्।
हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरात् परम् ।। ५५ ।।
हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकात् तथा।
ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निर्वीर्या वत्सरात् परम् ।। ५६ ।।
पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः।
एक वर्ष के बाद प्रत्येक वानस्पतिक औषधद्रव्य जैसे
लाये थे, वैसे ही यदि पड़ा हो, तो वह गुणहीन हो जाता है,
अर्थात् वह अपने रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव से
रहित हो जाता है। तद्रूप का एक अर्थ यह भी है यदि उन काष्ठ
औषध द्रव्यों का वास्तविक रूप बदलकर किसी रासायनिक
योग के साथ प्रयोग कर लिया जाता है, तो उनके गुणों में
चिरस्थायिता आ जाती है। दो मास के बाद चूर्ण (पीसे हुये
काष्ठ द्रव्य) शक्तिहीन हो जाते हैं। एक वर्ष के पश्चात् गोली
तथा अवलेह के रूप में बनाकर रखे गये काष्ठ औषधद्रव्य
तथा एक वर्ष चार मास (अर्थात् 16 मास) के बाद काष्ठ
औषधों के योग से तैयार किये गये घी, तेल, तथा वसा आदि
हीनवीर्य हो जाते हैं। लघुपाकी (शीघ्र पक जाने वाले
औषधद्रव्य जैसे-बरसाती घास, आदि) औषधियाँ भी एक
वर्ष के बाद शक्ति रहित हो जाती हैं, किन्तु आसव, अरिष्ट,
तथा लोह आदि धातुओं की भस्में तथा रस (पारद-गन्धक
के योग से निर्मित) औषधयोग जितने अधिक पुराने होते हैं,
उतने अधिक गुणवान् होते जाते हैं।
वक्तव्य-जहाँ जिन द्रव्यों की गुणहीनता की जो अवधि
कहीं गयी है, वह प्रयोगात्मक दृष्टि से क्रमशः अपने गुण,
वीर्य आदि से हीन होती देखी जाती है। 'चतुर्मासाधिकात्
तथा'-यद्यपि प्रसंगानुसार इसका अर्थ सोलह मास से अधिक
होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इसका अर्थ 'वर्षाऋतु के चार
मास बीतने पर' ऐसा अर्थ करते हैं। व्याकरण की दृष्टि से यह
अर्थ प्राप्त नहीं होता है, परन्तु चूर्ण आदि बनाने के बाद बीच
में जब भी वर्षा ऋतु आ जाती है, उसका दुष्प्रभाव तो पड़ता
ही है। घी, तेल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत प्राप्त होते हैं।
तो भी ताजा घी का प्रयोग करने का जहाँ निर्देश है, वहाँ
सालभर के भीतर का ही लेना चाहिये। पुराने घी की जहाँ
प्रशंसा है, उसका वर्णन हम यथास्थान करेंगे। तेल पुराने
अच्छे माने जाते हैं। जौ, गेहूँ, तिल, तथा माष आदि अन्न नये
ही लिये जाते हैं। कहीं-कहीं इनको पुराना ग्रहण करने की भी
चर्चा है। आसव-अरिष्ट पुराने होने पर उनकी मादकता क्रमशः
कम हो जाती है और लाभ की दृष्टि से उनमें कमी नहीं आती
है। अतएव उन्हें अच्छा कहा गया है। विशेष-देखें-सु० सू०
अ० ३६ सम्पूर्ण।
गुणहीनता का निर्णय
(विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः ।। ५७ ।।
नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेव विनिर्दिशेत्।)
जिस औषधद्रव्य में दुर्गन्ध (द्रव्य की स्वाभाविक गन्ध
से विपरीत गन्ध) उत्पन्न न हुई हो, जिसके अपने स्वाभाविक
रस, गुण आदि नष्ट न हो गये हों, वह द्रव्य यदि नया हो
अथवा पुराना ही हो, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य (सु० सू० अ० 36.15) में नये तथा
पुराने द्रव्यों के ग्रहण के सम्बन्ध में यह तो बतलाया गया है
कि वे द्रव्य कैसे होने चाहिये, किन्तु यह नहीं कहा गया है,
कि किन द्रव्यों को नया लें और किन द्रव्यों को पुराना।
इसका विचार महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार किया है-'चिकित्सा
के लिए सभी नये द्रव्यों का ही प्रयोग करना चाहिये। केवल
मधु, घी, गुड़, पिप्पली और वायविडंग को एक वर्ष पुराना
लेना चाहिये।' इस प्रसंग में कुछ टीकाकारों का मत है, कि
'धनियाँ' भी पुराना ही लेना चाहिये, किन्तु लोकव्यवहार में
ये सभी द्रव्य नये ही लिये जाते हैं। देखें-सु० सू० अ०
36.8-9।
भेषज-भण्डार
(प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् ।। ५८ ।।
प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते।)
प्लोत (साफ-सुथरे वस्त्रों के टुकड़े), मिट्टी के पात्र,
फलक (लकड़ी की पट्टियाँ), तथा शंकु (नुकीली कील)
आदि में औषध द्रव्यों को जहाँ सुरक्षित रखते हैं, उसे
औषध-भंडारगृह कहते हैं। इस भंडारगृह को पूर्व दिशा की
ओर पवित्र स्थान पर बनवाना चाहिये।
प्रथमोऽध्यायः ] परिभा॒षा 15
वक्तव्य-प्लोत शब्द से थैला, बोरा या कपड़े की गठरी
का, मृद्भाण्ड शब्द से चीनी मिट्टी के मर्तबान, बोयाम,
काँच या शीशा के जार, बरनी, शीशी, बोतल आदि का,
फलक शब्द से लकड़ी की टाँड, आलमारी, बक्सा आदि का
तथा न्यङ्कु शब्द से खूँटी, छत पर लटका हुआ कुंडा आदि का
ग्रहण करना चाहिये। इन्हीं में औषधद्रव्यों को भरकर,
सँभालकर लटकाकर यथायोग्य रखें, क्योंकि यह भेषजागार
है। इसमें सभी आवश्यक औषधद्रव्यों आदि का संग्रह करके
रखा जाता है। देखें-सु० सू० अ० 38.81।
भेषज-भण्डार-स्वरूप
(धूमवर्षानिलक्लेदैः सर्वर्तुष्वनभिद्रुते ।। 59 ।।
ग्राहयित्वा गृहे न्यस्येद् विधिनौषधसङ्ग्रहम्।)
जिस घर में धुआँ, वर्षा, अनिल (दूषित वायु) तथा
क्लेद (गीलापन) का अहितकर प्रभाव औषधद्रव्यों पर न
पड़ सके, उस घर में विधिपूर्वक संग्रह किये गये उन औषधद्रव्यों
को रखना चाहिये।
वक्तव्य-संग्रह करके रखी हुई प्रत्येक वस्तु की
समय-समय पर देख-रेख भी करते रहना चाहिये, नहीं तो वे
काम में लाने योग्य नहीं रह जातीं। इनमें उपयुक्त धुआँ आदि
को प्रधान कारण माना गया है। वर्षानिल-इस पद का
टीकाकारों ने भिन्न-भिन्न अर्थ किया है-वर्षा के कारण
औषधद्रव्य सड़ जाते हैं, वर्षानिल = बरसाती हवा के कारण
उनमें बुकनी या फफूंदी लग जाती है, अथवा अनिल = दूषित
वायु के कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है। इस प्रकार ये
सभी अर्थ प्रकरणोचित हैं।
विशेष-यह पाठ सुश्रुतसंहिता से लिया गया है। देखें-सु०
सू० अ० 38.81।
उचित-अनुचित द्रव्य
व्याधेरयुक्तं यद् द्रव्यं गणोक्तमपि तत् त्यजेत् ।। 60 ।।
अनुक्तमपि यद् युक्तं योजयेत् तत्र तद् बुधः।
बुद्धिमान् चिकित्सक का प्रमुख कर्तव्य है कि वह गण
में कहे गये भी उस द्रव्य का ग्रहण न करे, जो द्रव्य रोगी के
रोग का शमन करने में उपयुक्त न हो और जो द्रव्य उस गण
में नहीं कहा गया हो, किन्तु रोग-शमन में उपयोगी हो तो भी
उस द्रव्य का ग्रहण कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-आयुर्वेदीय संहिताओं में अनेक प्रकार के
औषधद्रव्यों के गणों का उल्लेख मिलता है, जिनका संग्रह
सामान्य दृष्टि से किया गया था, किन्तु यहाँ उक्त निर्देश विशेष
परिस्थिति के लिए किया गया है। अतः शास्त्रोक्त क्वाथ,
चूर्ण, आसव, अरिष्ट, तथा अवलेह आदि के योगों में कहे गये
उस-उस अनुपयोगी द्रव्य या द्रव्यों को निकालकर उपयोगी
द्रव्यों को मिला लेने की अनुमति ग्रन्थकार चिकित्सक को दे
रहा है।
स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार
आग्नेया विन्ध्यशैलाद्याः सौम्यो हिमगिरिर्मतः ।। 61 ।।
अतस्तदौषधानि स्युरनुरूपाणि हेतुभिः ।
अन्येष्वपि प्ररोहन्ति वनेषूपवनेषु च ।। 62 ।।
गृह्णीयात् तानि सुमनाः शुचिः प्रातः सुवासरे।
आदित्यसम्मुखो मौनी नमस्कृत्य शिवं हृदि ।। 63 ।।
विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वत श्रेणियाँ आग्नेय
(अग्निगुण-प्रधान) अर्थात् उष्ण प्रभाव वाली होती हैं और
हिमगिरि (हिमालय) सौम्य (सोमगुण युक्त) होता है, अर्थात्
शीत प्रभाव वाला होता है। इसलिये उक्त प्रकार की पर्वत
श्रेणियों में पैदा होने वाली औषधियाँ अपने-अपने स्थान में
उत्पन्न होने के कारण से तदनुरूप गुणों वाली होती हैं। अर्थात्
विन्ध्य आदि पर्वत श्रेणियों में पैदा होने वाली उष्णगुण-प्रधान
तथा हिमालय परिसर में पैदा होने वाली शीतगुण-प्रधान
औषधियाँ होती हैं। इसके अतिरिक्त स्थानों (समतल प्रदेशों)
में, वनों तथा उपवनों (बगीचों) में भी औषधियाँ उगती या
उगायी जाती हैं। उक्त सभी प्रकार की औषधियों को चिकित्सक
प्रसन्नचित्त होकर, मनसा, वाचा पवित्र होकर, प्रातःकाल,
शुभवार (दिन) में, सूर्य की ओर मुख करके मौन धारण कर
तथा हृदय में शिव जी को प्रणाम कर ग्रहण करे।
वक्तव्य-विन्ध्याचल आदि पर्वत आग्नेय और हिमालय
सौम्यगुण-प्रधान है। उक्त स्थानों पर होने वाली औषधियाँ
तदनुरूप होती हैं, ऐसा जो कहा गया है, वह सामान्य वचन
है। उदाहरणस्वरूप आप 'वत्सनाभ' विष का परिचय देखें।
यह हिमालयप्रदेश में 10 से 14 हजार फुट की ऊँचाई पर पैदा
होता है। यह हिमालय के अनुरूप न होकर उष्णवीर्य होता है।
ऐसी विशेषताएँ सामान्य वचनों के बीच में सर्वत्र मिलती
ही हैं।
वनेषूपवनेषु च-'वनेषु' प्राकृतिक वनों में, जहाँ वृक्ष,
लता, गुल्म आदि स्वयं पैदा हो जाते हैं। उपवनेषु-ये वे
बगीचे हैं जिन्हें 'भैषज्योद्यान' कहा जाता है। इस प्रकार के
16 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
उपवन आयुर्वेदीय शिक्षा देने की दृष्टि से महाविद्यालयों,
विश्वविद्यालयों की भूमि पर लगाये जाते हैं। औषध-ग्रहण या
संग्रहण की विधि तन्त्रशास्त्र में भी देखी जाती है। यहाँ 'प्रातः'
शब्द का अर्थ सूर्योदय के पूर्व भी लिया जा सकता है और
'आदित्यसम्मुखः' का अर्थ पूर्वाभिमुख भी देखा जाता है।
सुवासरे का अर्थ है-शुभ दिन में। ज्योतिःशास्त्र के अनुसार
तिथि, वार, चन्द्र तथा नक्षत्र जिस दिन अनुकूल हों, उसे
'सुवासर' कहा जाता है। इसके लिए मुहूर्तचिन्तामणि का
नक्षत्र-प्रकरण देखें। मौनी शब्द से औषधिग्रहण के मन्त्र का
मन ही मन जप करने का यह संकेत मिलता है। नमस्कृत्य
शिवं हृदि-शिव संसार का कल्याण करने वाले देव हैं और
इन्हीं का एक नाम 'मृत्युञ्जय' है। चिकित्सा का मूल लक्ष्य
मृत्यु को जीतना ही है। अतएव औषधिग्रहण काल में इन्हें
प्रणाम करने का निर्देश किया है।
त्रिविध देश-लक्षण
(बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान्।
जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ।। 64 ।।
संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ।)
जिस देश में जल अधिक बरसता हो; झील, नदी, नाले,
तथा कुएँ, आदि अधिक हों तथा नग अर्थात् पेड़, पहाड़
अधिक हों और कफ एवं वात दोष के कारण होने वाले रोग
जहाँ अधिक होते हों, वह 'आनूप देश' है। जिस देश में जल
तथा वृक्ष (अनूप देश की अपेक्षा) कम हों और पित्त, रक्त
तथा वात दोष सम्बन्धी रोग अधिक मात्रा में होते हों, वह
'जांगल देश' है। उक्त दोनों (आनूप तथा जांगल) देशों के
लक्षणों से युक्त लक्षण जिसमें दिखलायी दें, वह 'साधारण
देश' माना जाता है।
वक्तव्य-औषध-संग्रह, रोग-निर्णय, तथा साध्यासाध्य-
विचार आदि के अवसर पर इन देशों का भी सहारा लिया
जाता है। इस दृष्टि से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा
सकता है। इनका विशेष विवरण देखें-च० वि० अ० 3..
47-48। च० क० अ० 1.8। अत्रिसंहिता। सु० सू० अ० 36
तथा राजनिघण्टु में।
द्रव्यग्रहण-निर्देश
साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।। 65 ।।
(द्रव्याणि तत्र जायन्ते तद्गुणानि विशेषतः ।)
साधारण भूमि (देश) में उत्पन्न उस औषधद्रव्य को
ग्रहण करना चाहिये, जो उत्तर दिशां की ओर उत्पन्न हुआ हो,
क्योंकि वहाँ (उस ओर) जो द्रव्य उत्पन्न होते हैं, वे विशेष
रूप से अपने-अपने गुणों से युक्त होते हैं।
वक्तव्य-'उत्तराश्रितम्' इसका महत्त्व ऊपर 61वें पद्य
में इस प्रकार वर्णित है-'सौम्यो हिमगिरिर्मतः' अर्थात् उत्तर
दिशा सौम्यगुण से समृद्ध होती है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी
संहिता में इस पद्य को दिया है, जिसका पूर्वार्ध भिन्न है।
देखें-सु० सू० अ० 36.14।
निन्दित भेषज द्रव्य
वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः ।। 66 ।।
जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसिद्धदाः ।
वल्मीक (वामी या दीमकों से बनाया गया मिट्टी का
टीला) पर उत्पन्न या उससे घिरी हुई, कुत्सित (निन्दित,
गन्दे) स्थान में पैदा हुई, अनूपदेशज, श्मशान भूमि (जहाँ
मरे हुये पुरुषों को जलाया अथवा गाड़ दिया जाता है, उस
स्थान) पर, ऊषर (बंजर भूमि अथवा नमक या रेह के कणों
से व्याप्त) भूमि पर तथा मार्ग के बीच में या उसके
अगल-बगल में उत्पन्न हुई अर्थात् जो पथिकों के पैरों से
कुचल दी गयी हो और जो कीड़ों से खायी गयी हो, जो आग
से जल गयी हो एवं हिम (बर्फ या पाला या ओला) से
व्याप्त हो, ऐसी ओषधियाँ कार्य में सिद्धि नहीं देती हैं। अतः
ऐसी औषधियों का संग्रह नहीं करना चाहिये।
वक्तव्य-आप ध्यान दें कि ग्रन्थकार ने इस प्रकार की
औषधियों के संग्रह का निषेध क्यों किया है? वल्मीक के
भीतर जहरीले सर्प रहते हैं। उनके स्पर्श या दंश से वे दूषित
हो सकती हैं। कुत्सित शब्द स्वयं ही औषधि की अयोग्यता
का संकेत कर रहा है। अनूपदेशज औषधियाँ कफवर्धक तथा
वातकारक होती हैं। श्मशान-प्रदेश में उत्पन्न औषधियाँ भूत-प्रेत
तथा चिता-धूम से दूषित होती हैं। मार्गज औषधियाँ अपने
स्वरूप में प्राप्त नहीं हो पाती हैं। शेष स्पष्ट है। तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण गुणसम्पन्न औषधद्रव ही कार्य (चिकित्सा) में
सिद्धि प्रदान कर सकते हैं।
ऋतुभेद से औषधद्रव्य-संग्रह
शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् ।। 67 ।।
विरेक-वमनार्थं च वसन्तान्ते समाहरेत् ।
सभी कार्यों (चूर्ण, गुटिका, लेप, अवलेह, आसव, तथा
अरिष्ट आदि) के लिए शरद् ऋतु (आश्विन-कार्तिक मासों) में
प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 17
सरस (जो सूखी न हो अर्थात् ताजी, हरी, तथा गीली)
औषधियों का ग्रहण (संग्रह) करना चाहिये और विरेचन
तथा वमन कराने के लिए जिनका उपयोग करना हो, उन्हें
वसन्त ऋतु (फाल्गुन-चैत्र) के अन्त में ग्रहण करना चाहिये।
वक्तव्य-वसन्त तथा शरद् ऋतुओं में औषधद्रव्य अपने
रस, वीर्य, विपाक आदि से परिपूर्ण पाये जाते हैं, क्योंकि इन
दोनों ही ऋतुओं का काल समशीतोष्ण होता है। अतएव इन
अवसरों पर औषध-ग्रहण का शास्त्रकार ने निर्देश किया है।
तन्त्रान्तर में ऋतु के अनुसार औषधियों में रसस्थिति का
वर्णन इस प्रकार मिलता है-ग्रीष्म ऋतु में मञ्जरियों के अग्रभाग
में, वर्षा ऋतु में पत्तों तथा त्वचा (छाल) में, वसन्त ऋतु में
वृक्षों को जड़ों में रस की स्थिति होती है। इस प्रसंग में शेष
ऋतुओं का उल्लेख नहीं किया गया है।
द्रव्यों के अवयवों का ग्रहण
अतिस्थूलजटा याः स्युस्तासां ग्राह्यास्त्वचो बुधैः ।। 68 ।।
गृह्णीयात् सूक्ष्ममूलानि सकलान्यपि बुद्धिमान्।
न्यग्रोधादेस्त्वचो ग्राह्याः सारः स्याद् बीजकादितः ।। 69 ।।
तालीसादेश्च पत्राणि फलं स्यात् त्रिफलादितः ।
धातक्यादेश्च पुष्पाणि स्नुह्यादेः क्षीरमाहरेत् ।। 70 ।।
(विदार्यादेश्च कन्द्वानि गुन्दं सर्जरसादितः ।
मज्जा अक्षोटकादेश्च शेषं वृद्धोपदेशतः ।। 71 ।।)
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे परिभाषा नाम
प्रथमोऽध्यायः ।। 1 ।।
जो औषधियाँ अधिक मोटी जड़ों वाली होती हैं, विद्वान्
वैद्यों को उनकी जड़ों की छालें ग्रहण करनी चाहिये और
जिनकी जड़ें छोटी हैं, उन्हें सम्पूर्ण लेना चाहिये। अर्थात्
उनके पंचांग (जड़, शाखा, पत्र, पुष्प तथा फल) का ग्रहण
करना चाहिये। बरगद आदि बड़े वृक्षों की भीतरी त्वचा
(छाल) लेनी चाहिये (क्योंकि बाहरी छाल. निःसार होती
है)। बीजक (विजयसार) आदि वृक्षों का सार (बीच की
लकड़ी) लेना चाहिये (यहाँ आदि शब्द से खैर, चीड़, देवदारु,
तथा चन्दन जैसे वृक्षों का ग्रहण करना चाहिये)। तालीस
आदि (तुलसी, पान, तेजपत्ता, तथा सनाय जैसे द्रव्यों) के
पत्र; त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, तथा आँवला) आदि
(कालीमिर्च, पीपल, वायविडंग, सौंफ, सोया, मैनफल,
प्रियंगु तथा जैसे द्रव्यों) के फल तथा धातकी (धाय) आदि
वृक्षों के फूल तथा स्नुही (थूहर) आदि क्षीरी वृक्षों का दूध
ग्रहण करना चाहिये। विदारीकन्द आदि (कन्दवर्ग में कहे
गये द्रव्यों) के कन्दों का, सर्जरस (राल) आदि के गोंद का
तथा अखरोट आदि (काजू, बादाम, तथा पिस्ता जैसे द्रव्यों)
की मज्जा का ग्रहण करें। जिन द्रव्यों के ग्राह्य अवयवों का
उल्लेख यहाँ नहीं किया गया है, उनका आयुर्वेदवेत्ता वृद्धों के
कथनानुसार ग्रहण करें।
वक्तव्य-ऊपर ग्रन्थकार न औषधद्रव्यों के किन-किन
अवयवों का ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार का जो निर्देश
किया है, वह सामान्य स्वरूप है। ज्ञातव्य है कि प्रायः
सभी औषधद्रव्यों के एकाधिक अवयवों का ग्रहण शास्त्र-निर्देश
द्वारा अथवा लोकव्यवहार द्वारा देखा जाता है। जैसे न्यग्रोध
(बरगद) की त्वचा भी ली जाती है और क्षीरीवृक्ष होने के
कारण उसके दूध का भी ग्रहण किया जाता है, इसी तरह
परबल की पत्ती तथा उसके फल दोनों का ग्रहण होता है। इस
प्रकार की विसंगतियों अथवा विशेषताओं के सम्यक् ज्ञान के
लिए औषध-निर्माण कुशल गुरुजनों की चिरकाल तक
उपासना तथा उनका सहवास करना चाहिये। औषध-विक्रेता
भी इन विषयों के ज्ञाता होते हैं। उनसे हरड़ माँगेंगे तो वे
उसका फल ही देंगे, न कि जड़ या उसकी छाल। इसके
विशद विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 39 गद्य 3-6 ।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित
दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता
पूर्वखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
द्वितीयोऽध्यायः
भैषज्याख्यान
औषध-सेवन-काल
भैषज्यमभ्यवहरेत् प्रभाते प्रायशो बुधः।
कषायांश्च विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः॥१॥
बुद्धिमान् रोगी का कर्तव्य है कि वह प्रायः (अधिकांश,
विशेष निर्देश के अभाव में) औषध का सेवन प्रातःकाल ही
करे। विशेष करके कषायों (स्वरस, कल्क, क्वाथ, हिम,
तथा फाण्ट) का सेवन तो अवश्य ही प्रातःकाल करे। औषध-
सेवन के सम्बन्ध में जो भेद (मतभेद) है, वह आगे दिखलाया
गया है।
वक्तव्य-इस पद्य में कषाय शब्द को बहुवचनान्त प्रयुक्त
किया गया है। इसका तात्पर्य है कि कषाय शब्द से पंचकषायों
का ग्रहण किया जाता है। देखें-शा० सं० म० खं० अ० 1.1।
औषध-सेवन के पाँच काल
ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्।
किञ्चित् सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने॥२॥
सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि।
मनुष्यों के लिए औषध-सेवन के पाँच कालों का निर्देश
किया गया है-1. कुछ सूर्य के उदय होने पर (यह अरुणोदय
से सूर्योदय होने तक की मध्य अवधि है), 2. दिन के भोजन
के समय में, 3. सायंकाल के भोजन के समय में, 4. बार-बार
और 5. रात्रि में (सोने के समय)।
वक्तव्य-उक्त औषध-सेवन के पाँचों कालों का विशद
विवेचन आगे किया जा रहा है।
औषध-सेवन का प्रथम काल
प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः॥३॥
लेखनार्थं च भैषज्यं प्रभाते तत् समाहरेत्।
एवं स्यात् प्रथमः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम्॥४॥
पित्त अथवा कफ दोष की वृद्धि होने पर विरेचन या
वमन कराने के लिए और दोषों को विशेष करके कफदोष
को अपने स्थान से खुरच कर बाहर निकालने के लिए प्रायः
(अधिकांश) प्रातःकाल औषधयोग का प्रयोग करना चाहिये।
इस प्रकार यह मनुष्यों के लिए औषध-सेवन का प्रथम काल
कहा गया है।
वक्तव्य-साहित्यिक लेखन-कार्य से आयुर्वेदिक लेखन-
कार्य सर्वथा भिन्न है। यद्यपि दोनों स्थानों के लेखन शब्द की
मूल प्रवृत्ति समान है। आज जिसे साहित्यिक भाषा में लेखन
कहा जाता है, वह वास्तव में लेपन (लीपना) है। लेखन
शब्द का सही प्रयोग शिलालेख के रूप में होता है। आप देखें
कि जिस प्रकार शिला पर लिखने के लिए उसे खुरचना
पड़ता है, ठीक उसी प्रकार कफ अपने आशय के उन-उन
अवयवों में सटा रहता है, अतः उसका लेखन किया जाता है।
उद्रेक-वमन तथा विरेचन कराने के पूर्व कफ तथा पित्त को
अपने स्थान से विचलित करा दिया जाता है, जिससे उसका
उचित प्रकार से निर्हरण किया जा सके।
औषध-सेवन का द्वितीय काल
भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते।
अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत्॥५॥
समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावग्निदीपनम्।
दद्याद् भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक्॥६॥
व्यानकोपे च भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्।
हिक्काऽऽक्षेपककम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात्॥७॥
एवं द्वितीयकालश्च प्रोक्तो भैषज्यकर्मणि।
अपानवायु की विकृति से होने वाले (मलाशय, वस्ति
तथा गर्भाशय सम्बन्धी) रोगों में भोजन करने के पहले औषध-
सेवन करना उत्तम होता है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाने
द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्याख्यान 19
--- [बायाँ स्तम्भ] ---
पर विविध प्रकार के रुचिकर, किन्तु पथ्य भोजनों में मिलाकर
औषध-सेवन करना चाहिये। समान वायु की विकृति से होने
वाले (पक्वाशय सम्बन्धी) रोगों में, मन्दाग्नि (जठराग्नि के
मन्द पड़ जाने) में, अग्नि की शक्ति को बढ़ाने वाले औषधयोग
को भोजन के बीच में कुशल चिकित्सक दे। व्यानवायु के
प्रकोप से होने वाले (अर्दित = मुखप्रदेश का लकवा तथा
पक्षाघात आदि) रोगों में भोजन के अन्त में औषध-सेवन
करना चाहिये। हिचकी, आक्षेपक (वातव्याधि-विशेष देखें-
मा० नि०) तथा कम्पवात आदि रोगों में भोजन के तथा
भोजन करने के बाद औषध-सेवन करना चाहिये। इस प्रकार
यह औषध-सेवन करने के दूसरे काल का वर्णन कर दिया
गया है।
औषध-सेवन का तृतीय काल
उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि।।8।।
ग्रासे ग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने।
प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते च दीयते।।9।।
औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात् तृतीयकः।
स्वरभंग (स्वरभेद) आदि (कास, श्वास, तथा हिक्का
जैसे) रोगों को उत्पन्न करने वाले उदान नामक वायु (जो
कंठ, श्वासमार्ग में निवास करता है, उस) के प्रकुपित हो जाने
पर सायंकालीन भोजन के समय प्रत्येक ग्रास के साथ औषध
देना चाहिये और हृदयगति का संचालन करने वाली प्राणवायु
के कुपित होने पर सायंकालीन भोजन के अन्त में विद्वान्
चिकित्सक को औषध प्रयोग कराना चाहिये। इस प्रकार यह
औषध-सेवन करने का तीसरा काल है।
औषध-सेवन का चतुर्थ काल
मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च।।10।।
सान्नं च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः।
तृट् (प्यास), छर्दि (वमन, उल्टी या कै), हिचकी,
श्वास (दमा) तथा विविध गरों (दूषीविषों के प्रयोग के कारण
उत्पन्न रोगों) में बार-बार (अनेक बार) भोजन में मिलाकर
औषध का सेवन कराना चाहिये। यह औषध-सेवन का चौथा
काल कहा गया है।
औषध-सेवन का पञ्चम काल
ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा।।11।।
पाचनं शमनं देयमनन्नं भेषजं निशि।
इति पञ्चमकालश्च प्रोक्तो भेषज्यकर्मणि।।12।।
--- [दायाँ स्तम्भ] ---
जत्रु (Collar bone = ग्रीवा के सामने उभरी हुई
अस्थि) के ऊपरी भाग में होने वाले अवयवों (गला, मुख,
नाक, कान, आँख तथा सिर) के रोगों में लेखन (कर्षण =
खुरचकर निकालने या कृश करने) में, बृंहण (स्थूल करने)
में पाचन तथा शमन औषधयोगों का प्रयोग रात में भोजन के
पहले ही कराना चाहिये। यह औषध सेवन का पाँचवाँ काल
कह दिया गया है।
वक्तव्य-प्रायः देखा जाता है कि रोगी चिकित्सक से
पूछा करते हैं-यह औषध कब-कब खानी है, इसके उत्तर के
लिए इन श्लोकों में कहे गये विषयों का अभ्यास करें। विशेष
जानकारी प्राप्त करने के लिए चरक चि० अ० 30, श्लोक
296 से 312 का भी अवलोकन कर लेना चाहिये। उपर्युक्त
श्लोक में प्रयुक्त 'निशि' शब्द का अर्थ सामान्य स्थिति में
'रात्रि का प्रथम प्रहर' है।
द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ
द्रव्ये रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
संवेदनक्रमादेताः पञ्चावस्थाः प्रकीर्तिताः।।13।।
द्रव्य का सेवन करने पर उसमें अनुभवी-क्रम से रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) ये पाँच अवस्थाएँ
कही गयी हैं।
वक्तव्य-रस आदि का परिचय-जीभ द्वारा जिसका
परिचय प्राप्त होता है उसे 'रस' कहते हैं। इसकी उत्पत्ति मूल
रूप से जल द्वारा मानी गयी है। रसों की संख्या छः है। यथा-
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, तथा कषाय। गुण-इनकी
संख्या बीस है-गुरु, मन्द, हिम, स्निग्ध, श्लक्ष्ण, सान्द्र, मृदु,
स्थिर, सूक्ष्म, विशद (इन गुणों के विपरीत क्रमशः ये दस
गुण हैं) लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, खर, द्रव, कठिन, सर,
स्थूल, तथा पिच्छिल। वीर्य-यह दो प्रकार का होता है-उष्ण
और शीतल। विपाक-इसकी परिभाषा इसी अध्याय के
33वें श्लोक में देखें। यह रसभेद से तीन प्रकार का होता
है-मधुर, अम्ल, तथा कटु। शक्ति-द्रव्यों की शक्ति अचिन्त्य
होती है। द्रव्य-यह स्थावर, जंगम तथा पार्थिव भेद से तीन
प्रकार का होता है। स्थावर द्रव्य-जड़, छाल, सार, गोंद,
नाल, स्वरस, पत्र, पुष्प, फल, दूध, क्षार, भस्म, तथा तेल
आदि। जङ्गम द्रव्य-दूध, मधु, पित्त, स्नेह (वसा), मज्जा,
रक्त, मांस, हड्डी, चर्म, मल, मूत्र, स्नायु, नख, लोम, खुर,
तथा सींग आदि। पार्थिव द्रव्य-सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा,
20
शार्ङ्गधरसंहिता
[ पूर्वखण्डे
राँगा, लोहा, अभ्रक तथा इनके यौगिक अन्य खनिज द्रव्य।
इस दृष्टि से संसार की सम्पूर्ण वस्तुएँ 'द्रव्य' हैं।
मधुररस के लक्षण
(स्नेहन-प्रीणनाह्लाद मार्दवैरुपलभ्यते।
मुखस्थो मधुरश्चास्यं व्याप्युर्वल्लिम्पतीव च।। 17।।)
जिस रस से स्नेहन, प्रीणन (तृप्ति), आह्लाद (आनन्द)
तथा मृदुता की प्राप्ति हो और जो मुख में रखा हुआ मुख के
चारों ओर फैलकर लिपट जाये, उसे मधुर रस कहते हैं।
वक्तव्य-मधुर आदि छः रसों के वर्णन का विशद
विवेचन चरकसंहिता सू० अ० 26 श्लोक 74 से 79 तक में
देखें।
अम्लरस के लक्षण
(दन्तहर्षान्मुखस्रावात् स्वेदनानमुखबोधनात्।
विदाहाच्चास्य कण्ठस्य प्राश्यैवाम्लरसं वदेत्।। 18।।)
जिसको चखने मात्र से दाँत खट्टे हों, मुख से पानी का
स्राव होने लगे, पसीना होने लगे, मुख का बोधन हो, अर्थात्
मुख का फीकापन दूर हो जाये, जिसका अधिक सेवन कर
लेने से मुख तथा गले में विदाह (जलन) होने लगे, उसे
'अम्लरस' कहना चाहिये।
वक्तव्य-अंग्रेजी में अम्ल तथा क्षार का एक पर्याय
Acid भी है। इसमें विदाहक गुण होता है। अतएव गीता में
ऐसे पदार्थों के अधिक सेवन का निषेध किया गया है।
देखें-'कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः'। गीता अ०
17.9।
लवणरस के लक्षण
(प्रलीयन् क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे।
यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च।। 19।।)
जो मुख में रखा हुआ शीघ्र ही घुल जाये, सूखे हुये मुख
के भीतरी भाग को गीला कर दे, लालास्राव को पैदा करे और
अधिक सेवन करने पर मुख के भीतर जलन पैदा करे, उसे
लवणरस समझें।
वक्तव्य-'प्रलीयन्' के स्थान पर श्रीगणनाथसेन
'प्रीणयन्' पाठभेद को स्वीकार करते हैं। 'स विदाहान्मुखस्य
च' यह स्थिति मात्रा से अधिक लवणरस के सेवन से उत्पन्न
होती है।
कटुरस के लक्षण
(संवेजयेद् यो रसनां निपाते तुदतीव च।
विर्दहन् मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः।। 20।।)
द्रव्य का लक्षण
(द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं ते हि तदाश्रयाः।
पञ्चभूतात्मकं तत्तु क्ष्मामधिष्ठाय जायते।। 14।।
अम्बुयोन्यग्निपवननभसां समवायतः।
तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च व्यपदेशस्तु भूयसा।। 15।।)
रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की अपेक्षा द्रव्य को
ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि उपर्युक्त रस आदि गुण द्रव्य के
ही आश्रित होते हैं। द्रव्य के बिना उक्त रस आदि की सत्ता
कहीं नहीं देखी जाती। इस प्रकार का वह द्रव्य पञ्चभूतात्मक
होता है। वह द्रव्य पृथ्वी तत्त्व का आश्रय (सहारा) लेकर
व्यक्त (प्रकट) होता है, उसकी जल योनि (उत्पन्न करने
वाली) है। अग्नि, वायु तथा आकाशतत्त्व के योग से उसकी
उत्पत्ति और विशेष (स्वरूप-भेद) होता है। इन द्रव्यों में
उक्त पंचभूतों की तर-तम भाव से अधिकता होने से ये द्रव्य
पार्थिव, आप्य, तथा तैजस आदि संज्ञा वाले हो जाते हैं।
वक्तव्य-प्राचीन तन्त्रकारों ने भी एकमत से द्रव्य को
पाञ्चभौतिक स्वीकारा है। इसके विशेष विवेचन के लिए
देखें-अ० हृ० सू० अ० 9.1-2।
रसों के छः भेद
मधुरोऽम्लः पटुश्चैव कटुतिक्तकषायकाः।
इत्येते षड्रसाः ख्याता नानाद्रव्यसमाश्रिताः।। 16।।
- मधुर (मीठा-गुड़ आदि), 2. अम्ल (खट्टा-नींबू
आदि), 3. पटु (नमकीन-लवण आदि), 4. कटु (कडुआ-
सोंठ, मरिच, पीपल, तथा (लालमिर्च आदि), 5. तिक्त
(तीता-नीम, चिरायता, तथा कुटज आदि) और 6. कषाय
(कसैला-आँवला आदि)। इस प्रकार ये छः रस कहे गये हैं,
जो भिन्न-भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं।
वक्तव्य-जीभ द्वारा स्पर्श होने पर उक्त रसों का
ठीक- ठीक निर्णय हो जाता है, अतएव जीभ का एक
नाम 'रसना' भी है। रसना के अकर्मण्य हो जाने पर रसों का
ज्ञान नहीं हो पाता है। इसी प्रकरण में आगे इन रसों के
परिचायक पद्य दिये गये हैं। आप देखेंगे कि कटु और तिक्त
रसों के सम्बन्ध में भ्रान्त-धारणाएँ किस प्रकार समाज में
फैली हैं।
द्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्यव्याख्यान 21
जो जीभ पर रखने मात्र से घबराहट उत्पन्न करे, जीभ में
चुभे या कष्ट पहुँचाये, दाह उत्पन्न करता हुआ मुख, नासिका
तथा आँखों से स्राव कराने वाला हो, वह कटुरस कहा जाता
है।
वक्तव्य-कटुत्रय में सोंठ, मरिच एवं पिप्पली का ग्रहण
होता है। इन्हीं गुणों से भरपूर लालमिर्च भी होता है। इनमें से
किसी एक को खाकर उक्त लक्षणों से मिलान करें। तिक्त
(तीता) रस इससे सर्वथा भिन्न होता है।
तिक्तरस के लक्षण
(प्रतिहन्ति निपाते यो रसनां स्वदते न च।
स तित्तो मुखवैशद्यशोषप्रह्लादकारकः ॥ 21 ॥)
जो जीभ पर पड़ने से उसे कष्ट दे, अर्थात् अप्रिय लगे
और जो अन्य रसों का स्वाद प्रतीत न होने दे, उसे 'तिक्तरस'
कहते हैं। यह मुख की तिक्तता को दूर करके, लार को
सुखाकर मन को प्रसन्न कर देता है।
वक्तव्य-तिक्तरस-प्रधान द्रव्यों में 'नीम' का ग्रहण किया
जाता है। इसकी दातून करने से उक्त सभी गुणों की प्राप्ति
होती है। कुटकी भी अत्यन्त तिक्त रस वाली होती है। इसका
सेवन करने से मुख का तीतापन दूर हो जाता है। देखें-'मम
द्वयं विस्मयमातनोति, तिक्ताकषायो मुखतिक्तताघ्नः ।'-
वैद्यजीवनम् ।
कषायरस के लक्षण
(वैशद्यस्तम्भजाड्यैर्यो रसनां योजयेद् रसः।
बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ 22 ॥)
जिसके खाने पर जीभ की चिपचिपाहट तो दूर हो जाये,
किन्तु जीभ स्तब्ध तथा जड़ अर्थात् दूसरे रसों का अनुभव
करने में असमर्थ हो जाये, कण्ठ (गला) बँधता या रुकता
हुआ-सा प्रतीत हो तथा जो विकासी (पिच्छिल) गुण का
नाशक हो, वह कषाय (कसैला) रस कहा जाता है।
रसों का उत्पत्ति-क्रम
धराम्बुक्ष्मानलजलज्वलनैनाकाशमारुतैः ।
वावग्निक्ष्मानिलैर्भूतद्वयै रसभवः क्रमात् ॥ 23 ॥
प्रस्तुत क्रम से दो-दो महाभूतों के परस्पर मिलने से
निम्न प्रकार रसों की उत्पत्ति होती है-धरा (भूमि) तत्त्व,
जलतत्त्व से मधुररस; क्ष्मा (भूमि) तत्त्व, अनल (अग्नि)
तत्त्व से अम्ल (खट्टा) रस; जलतत्त्व, ज्वलन (अग्नि) तत्त्व
से लवणरस; आकाशतत्त्व, मरुत् (वायु) तत्त्व से कटुरस;
वायुतत्त्व, अग्नितत्त्व से तिक्तरस तथा क्ष्मा (भूमि) तत्त्व,
अनिल (वायु) तत्त्व से कषाय रस की।
वक्तव्य-सामान्य दृष्टि से रसों का क्रम यह है-1. मधुर,
2. अम्ल, 3. लवण, 4. कटु, 5. तिक्त, तथा 6. कषाय। इस
दृष्टि से जब हम ऊपर के श्लोकोक्त क्रम को देखते हैं, तो
उसका अनुवाद जैसा ऊपर दिया गया है, उसी प्रकार का
होगा, किन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। अतः हम ग्रन्थकार
की उक्ति का सम्मान करने के लिए उक्त रसादि क्रम में
'तिक्तरस' को प्रथम स्थान देकर उसके बाद 'कटुरस' का
स्थान स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि आप देखें कि चरक तथा
सुश्रुत दोनों ही संहिताकारों ने वायु तथा अग्निगुण की अधिकता
से 'कटुरस' और वायु एवं आकाशगुण की अधिकता से
'तिक्तरस' की उत्पत्ति को स्वीकार किया है। विशेष विवेचन
के लिए देखें-च० सू० अ० 36 तथा सु० सू० अ० 42।
पञ्चमहाभूतों के गुण
गुरुः स्निग्धश्च तीक्ष्णश्च रूक्षो लघुरिति क्रमात्।
धराम्बुवह्विपवनव्योम्नां प्रायो गुणाः स्मृताः ॥ 24 ॥
एष्वेवान्तर्भवन्त्यन्ये गुणेषु गुणसञ्चयाः।
गुरु, स्निग्ध, तीक्ष्ण, रूक्ष, तथा लघु ये पाँच गुण क्रमशः
(पृथिवी), अम्बु (जल), वह्नि (अग्नि), पवन (वायु)
तथा व्योमन् (आकाश) नामक महाभूतों के माने गये हैं।
अन्य सभी प्राचीन संहिताकारों द्वारा अपनी-अपनी संहिताओं
में वर्णित गुण-समूह का अन्तर्भाव इन्हीं पाँच गुणों में हो
जाता है।
वक्तव्य-चरक आदि संहिताओं में गुणों की संख्या
बीस है। ये गुण परस्पर विरोधी अथवा विपरीत स्वभाव वाले
होते हैं। आप इन्हें ध्यान से देखें-'गुरु, लघु, मन्द, तीक्ष्ण,
शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, श्लक्ष्ण, खर, सान्द्र, द्रव, मृदु,
कठिन, स्थिर, तथा चल। शीत तथा उष्ण गुणों के द्रव्य-विवेचन
प्रसंग में 'वीर्य' की संज्ञा दी गयी है। इन उपर्युक्त गुणों से
युक्त द्रव्यों का अधिक सेवन करने से उस-उस द्रव्य का
प्रभाव शरीर पर स्पष्ट दिखलायी देता है। जैसे-घी-तेल स्निग्ध
गुण वाले होते हैं। इनका सेवन करने से शरीर में स्निग्धता
आ जाती है और रूक्ष द्रव्यों के सेवन से रूक्षता आ जाती है।
शार्ङ्गधराचार्य ने जिन पाँच गुणों का चयन किया है, उनमें
उक्त सभी गुणों का समावेश किया जा सकता है।
22 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
गुरु गुण के लक्षण
( गुरु वातहरं पुष्टिश्लेष्मकृच्चिरपाकि च ॥ २५ ॥ )
गुरु नामक गुण वात दोष का नाश करता है, शरीर को पुष्ट करता है, कफ को बढ़ाता है और चिरपाकी (देर में पचने वाला) होता है।
स्निग्ध गुण के लक्षण
( स्निग्धं वातहरं श्लेष्मकारि वृष्यं बलावहम् । )
स्निग्ध नामक गुण वातदोष का नाश करता है, कफदोष को बढ़ाता है, वृष्य (वीर्य को बढ़ाने वाला) है तथा बल की वृद्धि करने वाला होता है।
तीक्ष्ण गुण के लक्षण
(तीक्ष्णं पित्तकरं प्रायो लेखनं कफवातहृत् ॥ २६ ॥)
तीक्ष्ण नामक गुण पित्तकारक (पित्त के बढ़ाने वाला), प्रायः लेखन (आँतों में सटे हुये कफदोष को खुरचकर निकालने वाला), कफ एवं वात दोष का विनाशक होता है।
रूक्ष गुण के लक्षण
( रूक्षं समीरणकरं परं कफहरं मतम् । )
रूक्ष नामक गुण वातदोष को बढ़ाने वाला और कफदोष को दूर करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
लघु गुण के लक्षण
( लघु पथ्यं परं प्रोक्तं कफघ्नं शीघ्रपाकि च ॥ २७ ॥ )
लघु नामक गुण अत्यन्त पथ्य (हित करने वाला), कफदोष का विनाशक तथा शीघ्र पच जाने वाला होता है।
**वक्तव्य—**उक्त गुरु, स्निग्ध आदि पाँच गुण जिन-जिन द्रव्यों में रहते हैं, ये सभी वर्णन उन-उन द्रव्यों के हैं। पृथिवी, जल आदि भूतों के रूप में इन गुणों का प्रयोग नहीं देखा जाता। आप इस प्रसंग का प्रयोग आहार-विहार तथा पथ्यापथ्य के क्षेत्र में करके स्वयं अनुभव करें।
वीर्य का वर्णन
वीर्यमुष्णं तथा शीतं प्रायशो द्रव्यसंश्रयम्।
तत्सर्वमग्नीषोमीयं दृश्यते भुवनत्रये ॥ २८ ॥
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति वीर्याण्यन्यानि यान्यपि।
उष्ण तथा शीत भेद से प्रायः वीर्य दो प्रकार का होता है। ये दो भिन्न-भिन्न प्रकार के द्रव्यों में रहते हैं। इसीलिए संसार के सभी द्रव्य अग्नि (आग्नेय = उष्ण) तथा सोम (सौम्य = शीत) वीर्य प्रधान तीनों लोकों में देखे जाते हैं। अन्य वीर्यों (स्निग्ध, रूक्ष आदि) का भी अन्तर्भाव इन्हीं के अन्तर्गत कर लिया जाता है या कर लिया जाना चाहिये।
**वक्तव्य—**आचार्य शार्ङ्गधर के सामने प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ रहीं, अतएव उन्होंने अपना 'द्विविध वीर्य सम्बन्धी' मत पहले देकर मतभेद युक्त दूसरों के मतों को 'अन्यानि यानि अपि' कहकर किसी को छोड़ा नहीं। इस प्रसंग में हम अन्य आचार्यों द्वारा स्वीकृत अष्टविध वीर्यों को यहाँ उद्धृत कर रहे हैं। चरक के अनुसार वीर्य के भेद—'मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, उष्ण, तथा शीतल'। सुश्रुत के अनुसार वीर्य के भेद—शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छिल, तथा विशद। इन प्रसंगों को आप क्रमशः च० सू० अ० 26. 64-65 में तथा सु० सू० अ० 42.5 एवं 11 में देखें। वास्तव में द्रव्य में रहने वाली 'वीर्य' वह शक्ति है, जिसके बल पर वह समस्त कार्य करता है। देखें—'एतानि वीर्याणि स्वबल-गुणोत्कर्षाद् रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति'। सु०सू०अ० 40.5।
उष्ण, शीत वीर्य के लक्षण
( शीतं तु ह्लादनं स्तम्भि मूर्च्छातृट्स्वेददाहनुत् ॥ २९ ॥
उष्णं भवति शीतस्य विपरीतं च पाचनम् । )
शीत नामक वीर्य आह्लाद (प्रसन्नता)कारक, रक्त, मल, तथा मूत्र आदि की अतिप्रवृत्ति (अधिक निकलने) को रोकने वाला, मूर्च्छा, तृट् (प्यास), स्वेद (पसीना) तथा दाह (जलन) को दूर करने वाला होता है। उष्ण नामक वीर्य शीतवीर्य से विपरीत गुणों वाला तथा पाचनकारक होता है।
**वक्तव्य—**जिस प्रकार संहिताकार आचार्यों ने द्रव्य-प्रकरण में द्रव्य की प्रधानता का वर्णन किया था, उसी प्रकार प्रस्तुत वीर्य के प्रकरण में इसकी प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि वीर्य के क्षेत्र में द्रव्य में रहने वाले अन्य गुणों को महत्त्व देना क्रम प्राप्त नहीं है। यहाँ उष्ण तथा शीत दो प्रकार के वीर्यों का उल्लेख किया गया है। अतः उक्त दो वीर्यों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत है—
- **कुलथी—**यह कषाय तथा कटु रस होने पर भी वातदोष की वृद्धि नहीं करती है, क्योंकि यह 'उष्णवीर्य' है। उष्णवीर्य होने के कारण यह वातनाशक है।
- **ईख का रस—**यह रस में मधुर होता है, फिर भी वातदोष का शमन नहीं करता है, क्योंकि यह 'शीतवीर्य' होता है। शीतवीर्य होने के कारण ही यह वातदोष को बढ़ाता है। यहाँ उदाहरण के लिए ऐसे दो द्रव्यों का उल्लेख किया है,
द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्यव्याख्यान 23
जो अन्य गुणों के कारण नहीं, अपितु अपने 'वीर्य' के कारण कार्य करते हैं। ऐसा विचार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये।
विपाक-परिचय
त्रिधा विपाको द्रव्यस्य स्वाद्वम्लकटुकात्मकः ।। ३० ।।
मिष्टः पटुश्च मधुरमम्लोऽम्लं पच्यते रसः ।
कषायकटुतिक्तानां पाकः स्यात् प्रायशः कटुः ।। ३१ ।।
मधुराज्जायते श्लेष्मा पित्तमम्लाच्च जायते ।
कटुकाज्जायते वायुः कर्माणीति विपाकतः ।। ३२ ।।
भिन्न-भिन्न रस वाले द्रव्य का विपाक तीन प्रकार का होता है- 1. मधुर, 2. अम्ल एवं 3. कटु। मधुर तथा लवण रस का विपाक 'मधुर' होता है; अम्ल (खट्टा) रस का विपाक अम्ल ही होता है; कषाय, कटु (सोंठ, मरिच, एवं पिप्पली आदि) तथा तिक्त (नीम, चिरायता जैसे द्रव्यों के रसों) का विपाक प्रायः 'कटु' होता है। मधुर विपाक से कफदोष की, अम्ल विपाक से पित्तदोष की और कटु विपाक से वातदोष की उत्पत्ति होती है। ये विपाकों के कार्य कहे गये हैं।
वक्तव्य- अपने-अपने स्थान पर सब का महत्त्व होता है। यही स्थिति द्रव्य एवं उसमें रहने वाले रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की भी होती है। अर्थात् जिस प्रकार ऊपर द्रव्य, रस, गुण, वीर्य के महत्त्व का वर्णन किया जा चुका है, ठीक उसी प्रकार यहाँ 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है, क्योंकि इस दृष्टि से द्रव्य में स्थित उसका मूल रस तथा विपाक के बाद उत्पन्न होने वाला रस अपने-अपने समय में प्रभावोत्पादक होता ही है। इस विषय के विशेष विवेचन के लिए आप सुश्रुतसंहिता सू० अ० 40 का अध्ययन करें।
विपाक-परिचय
(जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्।
रसानां परिणामान्ते स विपाक इति स्मृतः ।। ३३ ।।)
मधुर आदि रसों का शरीर पर तात्कालिक प्रभाव पड़ जाने के बाद, जठराग्नि के साथ संयोग होने के अनन्तर जो दूसरे रस की उत्पत्ति होती है वह 'विपाक' कहा जाता है।
वक्तव्य- प्रारम्भिक स्थिति में द्रव्य में स्थित रस रसना (जीभ) द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। ये प्रारम्भ में पुरुष की प्रकृति के अनुसार अपने सद्गुणों का प्रभाव दिखलाते ही हैं, किन्तु भोजन के रूप में उन-उन द्रव्यों का सेवन कर लेने के बाद जब उनका जठराग्नि से संयोग होता है, तब जिस एक नये रस की उत्पत्ति होती है, उसका रस स्वरूप विपाक के परिणाम से विदित होता है। इस दृष्टि से 'विपाक' की प्रधानता स्वीकार की गयी है।
प्रभाव का वर्णन
प्रभावस्तु यथा धात्री लकुचस्य रसादिभिः।
समापि कुरुते दोषत्रितयस्य विनाशनम् ।। ३४ ।।
क्वचित्तु केवलं द्रव्यं कर्म कुर्यात् प्रभावतः।
ज्वरं हन्ति शिरोबद्धा सहदेवीजटा यथा ।। ३५ ।।
जिस प्रकार रस, गुण, वीर्य, विपाक में बड़हल नामक फल 'आँवला' जैसा ही होता है, किन्तु आँवला त्रिदोषनाशक होता है और उसी के समान कहा गया बड़हल वैसा नहीं होता। यह आँवले का अपना 'प्रभाव' है। कहीं यह भी देखा जाता है, कि केवल द्रव्य अपने प्रभाव से ही कार्य कर डालता है। जैसे 'सहदेवी' की जड़ को सिर पर बाँध देने मात्र से ही वह ज्वर का नाश कर देती है। यह केवल प्रभाव का वर्णन है।
वक्तव्य- यह 'प्रभाव' जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है, केवल औषधद्रव्यों में ही नहीं पाया जाता, अपितु मणि, मन्त्र आदि को धारण करने से देव, गुरु, माता, पिता के आशीर्वचनों में भी आस्तिक बुद्धि से देखा तथा पाया जाता है। यह 'प्रभाव' प्रयोगशाला में परीक्षा का विषय नहीं है। इसकी विशेष जानकारी के लिए च० सू० अ० 26 श्लोक 67 से 72 तक तथा सु० सू० अ० 40 श्लोक 19 से 21 तक देखें।
प्रभाव का लक्षण
(रस-वीर्य विपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते।
विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ।। ३६ ।।
मणीनां धारणीयानां कर्म यद् विविधात्मकम्।
तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ।। ३७ ।।)
जहाँ दो या उससे अधिक द्रव्यों में रस (गुण), वीर्य, विपाक की समानता देखी जाये, (जैसा ऊपर श्लोक 34 में कहा गया है) किन्तु उनके कर्मों में विशेषता (भिन्नता) हो, वह उस-उस द्रव्य का 'प्रभाव' ही माना जाता है। धारण करने योग्य (हीरा, नीलम, तथा पुखराज आदि) मणियों को धारण करने पर जो विविध प्रकार का शुभ-अशुभ कर्म (फल) देखा जाता है, वह उन मणियों का प्रभाव ही है। अतः प्रभाव को अचिन्त्य (अविज्ञेय) कहा जाता है।
वक्तव्य- वीर्य, विपाक एवं प्रभाव का ऊपर जो वर्णन किया गया है, यह शास्त्र की दृष्टि से प्रामाणिक है और
24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
24 | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
प्रयोगावस्था में शास्त्रोक्त फल को देता है। यह अन्धविश्वास
का क्षेत्र नहीं है। उक्त 36 तथा 37 दोनों पद्य च० सू० अ० 26
के श्लोक संख्या 67 तथा 70 से लिये गये हैं।
रस आदि के कर्म
क्वचिद् रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
कर्म स्वं स्वं प्रकुर्वन्ति द्रव्यमाश्रित्य ये स्थिताः॥३८॥
द्रव्य का आश्रय लेकर रहने वाले ऊपर कहे गये रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव स्वतन्त्र रूप से कहीं-कहीं
अपना-अपना कार्य करते हैं। अर्थात् द्रव्याश्रित रस आदि
सामूहिक रूप से कार्य नहीं करते, अपितु वे स्वतन्त्र रूप से
ही कार्य करते हैं।
वक्तव्य—इसी आशय का एक पद्य च० सू० अ०
26.71 में है, किन्तु उसकी भाषा स्वतन्त्र है। आप निघण्टु
ग्रन्थों का अध्ययन करते समय इस विषय पर विशेष ध्यान
दें, कि जो-जो द्रव्य रस तथा गुण में समान होते हैं, उन-उन
में परस्पर समान वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) नहीं
देखे जाते। यही स्थिति मणियों के प्रभाव की भी है।
ऋतु-भेद से दोषों का चय, कोप, शम
चयकोपशमा यस्मिन् दोषाणां सम्भवन्ति हि।
ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु सङ्क्रमात्॥३९॥
जिसमें प्राकृतिक रूप से वात, पित्त, कफ दोषों का चय
(संचय), कोप (प्रकोप) तथा शम (शमन या उपशम)
होता है, उसे 'ऋतुषट्क' अर्थात् छः ऋतुओं का समूह कहते
हैं। यह एक वर्ष में सूर्य के मेष, वृष आदि बारह राशियों में
संक्रमण (गति) करने के कारण होता है।
राशियों के क्रम से छः ऋतुएँ
ग्रीष्मो मेषवृषौ प्रोक्तो प्रावृङ्मिथुनकर्कयोः।
सिंहकन्ये स्मृता वर्षास्तुलावृश्चिकयोः शरत्॥४०॥
धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः।
मेष तथा वृष राशि में जब सूर्य रहता है, तब ग्रीष्म ऋतु
होती है। मिथुन तथा कर्क राशि में जब सूर्य रहता है, तब
प्रावृट् ऋतु होती है। सिंह एवं कन्या राशि में जब सूर्य रहता
है, तब वर्षा ऋतु होती है। तुला और वृश्चिक राशि में जब सूर्य
रहता है, तब शरद् ऋतु होती है। धनुः तथा ग्राह (मकर)
राशि में जब सूर्य रहता है, तब हेमन्त ऋतु होती है और कुम्भ
तथा मीन राशि में जब सूर्य रहता है, तब वसन्त ऋतु होती है।
वक्तव्य—ऊपर जिस ऋतु-क्रम का वर्णन किया गया
है, वह आयुर्वेदीय दृष्टि से दोष-संशोधन के लिए कहा गया
है। इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए आप देखें—च०
सू० अ० 6.4-8 तथा सु० सू० अ० 6.6 एवं 10। लोक-
व्यवहार की दृष्टि से ऋतुओं का क्रम इस प्रकार है—
संशोधनार्थ ऋतुक्रम
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
|---|---|---|---|
| 1. | वैशाख, ज्येष्ठ | मेष, वृष | ग्रीष्म |
| 2. | आषाढ़, श्रावण | मिथुन, कर्क | प्रावृट् |
| 3. | भाद्रपद, आश्विन | सिंह, कन्या | वर्षा |
| 4. | कार्तिक, मार्गशीर्ष | तुला, वृश्चिक | शरत् |
| 5. | पौष, माघ | धनुः, मकर | हेमन्त |
| 6. | फाल्गुन, चैत्र | कुम्भ, मीन | वसन्त |
| व्यवहारार्थ ऋतुक्रम | |||
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| 1. | चैत्र, वैशाख | मीन, मेष | वसन्त |
| 2. | ज्येष्ठ, आषाढ़ | वृष, मिथुन | ग्रीष्म |
| 3. | श्रावण, भाद्रपद | कर्क, सिंह | वर्षा |
| 4. | आश्विन, कार्तिक | कन्या, तुला | शरत् |
| 5. | मार्गशीर्ष, पौष | वृश्चिक, धनु | हेमन्त |
| 6. | माघ, फाल्गुन | मकर, कुम्भ | शिशिर |
| दोषों का चय, कोप, शम काल | |||
| ग्रीष्मे सञ्चीयते वायुः प्रावृट्काले प्रकुप्यति॥४१॥ | |||
| वर्षासु चीयते पित्तं शरत्काले प्रकुप्यति। | |||
| हेमन्ते चीयते श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति॥४२॥ | |||
| प्रायेण प्रशमं याति च्चयमेव समीरणः। | |||
| शरत्काले वसन्ते च पित्तं प्रावृड् ऋतौ कफः॥४३॥ | |||
| ग्रीष्म ऋतु (वैशाख, ज्येष्ठ) में वायु (वातदोष) का | |||
| संचय होता है और प्रावृट् ऋतु (आषाढ़, सावन) में उस | |||
| (वातदोष) का प्रकोप होता है, अर्थात् वह रोगकारक होता | |||
| है। वर्षा ऋतु (भाद्रपद, आश्विन) में पित्तदोष का संचय होता | |||
| है और शरद् ऋतु (कार्तिक, मार्गशीर्ष) में उस पित्तदोष का | |||
| प्रकोप होता है। हेमन्त ऋतु (पौष, माघ) में कफदोष का | |||
| संचय होता है और वह कफदोष वसन्त ऋतु (फाल्गुन, चैत्र) | |||
| में प्रकुपित होता है। प्रायः शरद् ऋतु में किसी प्रकार की | |||
| चिकित्सा किये बिना ही वातदोष की शान्ति हो जाती है। इसी | |||
| प्रकार वसन्त ऋतु में पित्तदोष और प्रावृड् ऋतु में कफदोष | |||
| भी शान्त हो जाते हैं। |
द्वितीयोऽध्यायः] भैषज्याख्यान 25
वातादि दोषों की चय, प्रकोप, प्रशम तालिका
| दोष | वात | पित्त | कफ |
|---|---|---|---|
| संचय | ग्रीष्म ऋतु <br> मेष, वृष <br> (वैशाख, ज्येष्ठ) <br> मध्याह्न काल | वर्षा ऋतु <br> सिंह, कन्या <br> (भाद्रपद, आश्विन) <br> दिन का चौथा प्रहर | हेमन्त ऋतु <br> धनु, मकर <br> (पौष, माघ) <br> उषःकाल |
| प्रकोप | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल |
| प्रशम | शरद् ऋतु <br> तुला, वृश्चिक <br> (कार्तिक, मार्गशीर्ष) <br> अर्धरात्रि काल | वसन्त ऋतु <br> कुम्भ, मीन <br> (फाल्गुन, चैत्र) <br> पूर्वाह्न काल | प्रावृड् ऋतु <br> मिथुन, कर्क <br> (आषाढ़, श्रावण) <br> अपराह्न काल |
| वक्तव्य-यह भारतवर्ष का ही सौभाग्य है कि यहाँ बारह | |||
| महीने, छः ऋतुएँ और दो अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन) | |||
| होते हैं। यह व्यवस्था अन्यत्र नहीं है। इन परिवर्तनशील ऋतुओं | |||
| तथा काल का प्रभाव प्राणिमात्र पर पड़ता है। कालप्रभाव के | |||
| लिए देखें-सु० सू० अ० 6.14। इन्हीं ऋतुओं में वातादि दोषों | |||
| का संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है, जैसा कि ऊपर वर्णन | |||
| किया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से इस प्रकार होने वाले | |||
| दोषों के संचय, प्रकोप आदि का ज्ञान परम आवश्यक होता | |||
| है। इसे जानने वाला व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा भी कर | |||
| सकता है। विशेष विवेचन के लिए देखें-सु० सू० अ० 6। | |||
| यमदंष्ट्रा काल-परिचय | |||
| कार्तिकस्य दिनान्यष्टावष्टावाग्रयणस्य च। | |||
| यमदंष्ट्रा समाख्याता स्वल्पभुक्तो हि जीवति।।44।। | |||
| कार्तिक मास के अन्तिम आठ दिन तथा अगहन | |||
| (मार्गशीर्ष) मास में प्रारम्भ के आठ दिन, (कुल मिलाकर ये | |||
| सोलह दिन), यमदंष्ट्रा (यमराज की दाढ़) कहे जाते हैं। इन | |||
| दिनों कम खाने वाला ही जीवित (सुखपूर्वक) रह सकता है। | |||
| चय आदि पर आहार-विहार का प्रभाव | |||
| चयकोपशमा दोषा विहाराऽऽहारसेवनैः। | |||
| समानैर्यान्त्यकालेऽपि विपरीतैर्विपर्ययम् ।। 45 ।। | |||
| ऊपर वात आदि दोषों के संचय, कोप, प्रशम के | |||
| स्वाभाविक कालों (ऋतुओं) का वर्णन किया गया है, किन्तु | |||
| उपर्युक्त कालों के विपरीत काल में भी समान गुण वाले | |||
| (वात, पित्त, एवं कफकारक) आहारों तथा विहारों (रहन- | |||
| सहन) का सेवन करने से भी उक्त दोषों का संचय तथा | |||
| प्रकोप हो जाता है और इन दोषों के विपरीत गुण वाले आहार- | |||
| विहारों का सेवन करने से उन दोषों का शमन हो जाता है। | |||
| वक्तव्य-उक्त श्लोक प्रायः सभी संस्करणों में इसी प्रकार | |||
| का देखा जाता है। हमारे विचार से इसका प्रथम पाद इस | |||
| प्रकार होना चाहिये-'चयकोपौ समा दोषाः'। ऐसा पाठ | |||
| स्वीकार कर लेने पर इसका अन्वय इस प्रकार होगा-'समाः | |||
| दोषाः समानैः विहाराहारसेवनैः अकाले अपि चयकोपौ यान्ति'। | |||
| क्या इतना सुस्पष्ट भाव उक्त पाठ से प्राप्त हो सकता है? कभी | |||
| नहीं। 'विपरीतैर्विपर्ययम्' इस पद्यांश में पठित 'विपर्यय' | |||
| शब्द 'चय-कोप' के विपरीत 'शम' शब्द की अभिव्यक्ति | |||
| कराने में स्वयं समर्थ है। इस प्रसंग को विस्तृत रूप से | |||
| समझने के लिए आप च० सू० अ० 1.43, च० वि० अ० | |||
| 1.7 तथा च० शा० अ० 6.10 का अवलोकन करें। आपको | |||
| स्वयं प्रसंगोचित तथ्यों की प्रतीति होने लगेगी। | |||
| यदि हम समान गुण वाले आहार-विहार का सेवन करने | |||
| से यह चाहें कि उस दोष का शम (शमन या शान्ति) हो जाये | |||
| तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है? जैसे-रूक्षताकारक | |||
| आहार-विहारों से वायु की वृद्धि तो होती है, क्या कोई | |||
| विचारशील पुरुष यह भी स्वीकार कर सकता है कि ऐसे | |||
| आहार-विहारों से वातदोष का शमन भी हो सकता है? फिर | |||
| 'शम' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है? आप ध्यान दें! वातदोष | |||
| का संचय-काल ग्रीष्म ऋतु तथा इसका प्रकोप-काल प्रावृड् | |||
| ऋतु है। इन दिनों यदि आप रोगी को वातनाशक आहार-विहारों | |||
| का सेवन करायेंगे, तो वातदोष का संचय तथा प्रकोप नहीं हो | |||
| पायेगा। इसी प्रकार अन्य दोषों के सम्बन्ध में भी समझ लेना | |||
| चाहिये। | |||
| वातदोष का प्रकोप तथा प्रशम | |||
| लघुरूक्षमिताहारादतिशीताच्छ्रमात् तथा। | |||
| प्रदोषे कामशोकाभ्यां भीचिन्तारात्रिजागरैः ।। 46 ।। | |||
| अभिघातादपां गाहाज्जीर्णेऽन्ने धातुसङ्क्षयात्। | |||
| वायुः प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति ।। 47 ।। | |||
| लघु (भार में हल्के या शीघ्र पचने वाले) तथा रूक्ष | |||
| (स्नेहरहित) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, मिताहार (थोड़ा | |||
| अर्थात् मात्रा से कम भोजन) करने से, अत्यन्त शीतल पदार्थों | |||
| का सेवन करने से, शक्ति से अधिक परिश्रम करने से, | |||
| कामवासना की पूर्ति न होने से, शोक से, भय से, चिन्ता से, |
26 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
रात्रि में जागते रहने (समुचित नींद के न आने) से, चोट
लगने से, शीतल जल में देर तक डुबकी लगाये रहने या
स्नान करने से, रस आदि धातुओं का क्षय हो जाने से, भोजन
के पच जाने पर, इन कारणों से प्रदोष (सायंकाल) में वातदोष
का प्रकोप होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का
सेवन करने से वातदोष का शमन हो जाता है।
पित्तदोष का प्रकोप तथा प्रशम
विदाहिकटुकाम्लोष्णभोज्यैरत्युष्णसेवनात् ।
मध्याह्ने क्षुत्तृषो रोधाज्जीर्यत्यत्रेऽर्धरात्रके ।। ४८ ।।
पित्तं प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।
दाहकारक, कटु (चरपरे, मिर्च आदि), खट्टे तथा उष्ण
भोज्य पदार्थों का सेवन करने से अत्यन्त उष्ण (गर्मी, धूप,
तथा पञ्चाग्नि आदि) का सेवन करने से, भूख तथा प्यास को
रोकने से मध्याह्न काल (दोपहर) में, भोजन के पचते समय
एवं आधी रात में, इन कारणों से तथा उक्त कालों में पित्तदोष
प्रकुपित होता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन
करने से शान्त हो जाता है।
कफदोष का प्रकोप तथा प्रशम
मधुरस्निग्धशीतादिभोज्यैर्दिवसनिद्रया ।। ४९ ।।
मन्देऽग्नौ च प्रभाते च भुक्तमात्रे तथाऽश्रमात्।
श्लेष्मा प्रकोपं यात्येभिः प्रत्यनीकैश्च शाम्यति।। ५० ।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे भेषजव्याख्यानकं नाम
द्वितीयोऽध्यायः ।। २ ।।
मीठे, चिकने, तथा शीतल, आदि (गुरु, पिच्छिल, गुण
वाले) आहार द्रव्यों का सेवन करने से, दिन में सोने से,
जठराग्नि के मन्द पड़ जाने से, प्रातःकाल, भोजन कर लेने के
तत्काल बाद तथा परिश्रम न करने से कफदोष प्रकुपित हो
जाता है और इनके विपरीत आहार-विहारों का सेवन करने
से उसकी शान्ति हो जाती है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का दूसरा अध्याय समाप्त ।। २ ।।
⁓⁓⁓⁓⁓⁓
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
नाड़ी-परीक्षा का स्थान
तृतीयोऽध्यायः
नाडीपरीक्षादिविधिः
नाड़ी-परीक्षा का स्थान
करस्याङ्गुष्ठमूले या धमनी जीवसाक्षिणी।
तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञेयं कायस्य पण्डितैः ॥ 1 ॥
हाथ के अँगूठे के मूल में जो धमनी (स्पर्श द्वारा देखी
जाती) है, वह जीव (जीवात्मा) की साक्षिणी (गवाही देने
वाली) है, अर्थात् इसके माध्यम से जीव की सत्ता का ज्ञान
किया जा सकता है। इसकी चेष्टा (गति-विशेष) से नाड़ी-
विशेषज्ञ शरीर के सुख तथा दुःख का ज्ञान कर सकता है।
वक्तव्य-आयुर्वेदीय चिकित्सा में नाड़ी-परीक्षा का बहुत
बड़ा महत्त्व है, जिसे चिरकाल से विद्वत्समाज स्वीकार करता
चला आ रहा है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन संहिताओं में
नाड़ी-परीक्षा का कोई स्वतन्त्र प्रकरण उपलब्ध नहीं होता है।
किन्तु दूतनाड़ी-विशेषज्ञ 108 श्री सत्यदेव वासिष्ठ (भिवानी-
निवासी) उक्त संहिताओं में नाड़ीज्ञान समर्थक सूत्रों की सत्ता
को स्वीकार करते हैं।
करस्याङ्गुष्ठमूले-हाथ दो होते हैं। आचार्य ने किस हाथ
के अँगूठे के मूल वाली धमनी की ओर संकेत किया है,
इसका यहाँ कोई स्पष्ट निर्देश नहीं किया है। अतः इस प्रश्न
का समाधान इस प्रकार किया जा रहा है-पुरुषों के दाहिने
हाथ की और स्त्रियों के बाँयें हाथ की धमनी देखनी चाहिये।
इस प्रकार के उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी पाये जाते हैं। नाड़ी
सम्बन्धी विशेष परिचय के लिए देखें-1. नाड़ीविज्ञान-
महर्षिकणाद प्रणीत, 2. नाड़ीपरीक्षा-रावणकृत, 3. नाड़ी-
परीक्षा-अग्निवेश लिखित तथा 4. नाड़ीतत्त्वदर्शन-श्रीसत्यदेव
वासिष्ठ रचित।
नाड़ी की उपयोगिता-नाड़ीज्ञान गुरु-परम्परा के उपदेशों
तथा अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है। इसके प्राप्त हो
जाने पर वह चिकित्सक अत्यन्त यशस्वी कहा एवं माना
जाता है, क्योंकि नाड़ी द्वारा वात, पित्त, कफ, द्वन्द्व, सन्निपात,
रस, रक्त आदि का तथा साध्य-असाध्य का ज्ञान प्राप्त किया
जा सकता है। निदान का यही एक आयुर्वेदीय अनुपम साधन
है, जिससे मूक तथा बेहोश आदमी की वास्तविक शारीरिक
स्थिति को भी समझा जा सकता है।
धमनी द्वारा दोषों का ज्ञान-हृदय धमनियों द्वारा सम्पूर्ण
शरीर में रक्त को सदैव प्रवाहित करता रहता है। इन धमनियों
का फैलाव सम्पूर्ण शरीरावयवों में रहता है; केवल मांसपेशियों
से ढँकी हुई धमनियों का स्पर्शज्ञान स्पष्ट रूप से नहीं होता।
नाड़ी के अतिरिक्त ग्रीवा के दोनों ओर तथा गुल्फ के समीप
भी नाड़ी का स्पर्श करके वही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है,
जो अँगूठे के मूल में रहने वाली धमनी के स्पर्श से करने के
लिए कहा गया है। जीवित पुरुष में ही इस नाड़ी की धमन-
क्रिया को देखा जा सकता है, क्योंकि इसका एक विशेषण
है-'जीवसाक्षिणी' और यही सुख (स्वस्थता) तथा दुःख
(रुग्णता) की सूचना अपनी विशेष गति द्वारा 'नाड़ी-विशेषज्ञ'
को प्रदान करती है।
वातदोष में नाड़ी की गतियाँ
नाडी धत्ते मरुत्कोपे जलौका-सर्पयोगतिम्।
वातदोष के प्रकुपित होने पर नाड़ी जलौका (जोंक)
तथा साँप की भाँति चलती है, अर्थात् इन गति-विशेषों पर
चिकित्सक को निरन्तर ध्यान देना चाहिये, क्योंकि इन प्राणियों
की गतियाँ अनेक प्रकार की देखी जाती हैं।
पित्तदोष में नाड़ी की गतियाँ
कुलिङ्ग-काक-मण्डूकगतिं पित्तस्य कोपतः ॥ 2 ॥
पित्तदोष का प्रकोप होने पर नाड़ी की गति कलिंग
(गृहचटक, गौरैया), कौआ तथा मण्डूक (मेंढक) के समान
होती है। ये सभी प्राणी फुदक-फुदक कर चलते हैं।