शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ] भैषज्याख्यान 19
--- [बायाँ स्तम्भ] ---
पर विविध प्रकार के रुचिकर, किन्तु पथ्य भोजनों में मिलाकर
औषध-सेवन करना चाहिये। समान वायु की विकृति से होने
वाले (पक्वाशय सम्बन्धी) रोगों में, मन्दाग्नि (जठराग्नि के
मन्द पड़ जाने) में, अग्नि की शक्ति को बढ़ाने वाले औषधयोग
को भोजन के बीच में कुशल चिकित्सक दे। व्यानवायु के
प्रकोप से होने वाले (अर्दित = मुखप्रदेश का लकवा तथा
पक्षाघात आदि) रोगों में भोजन के अन्त में औषध-सेवन
करना चाहिये। हिचकी, आक्षेपक (वातव्याधि-विशेष देखें-
मा० नि०) तथा कम्पवात आदि रोगों में भोजन के तथा
भोजन करने के बाद औषध-सेवन करना चाहिये। इस प्रकार
यह औषध-सेवन करने के दूसरे काल का वर्णन कर दिया
गया है।
औषध-सेवन का तृतीय काल
उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि।।8।।
ग्रासे ग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने।
प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते च दीयते।।9।।
औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात् तृतीयकः।
स्वरभंग (स्वरभेद) आदि (कास, श्वास, तथा हिक्का
जैसे) रोगों को उत्पन्न करने वाले उदान नामक वायु (जो
कंठ, श्वासमार्ग में निवास करता है, उस) के प्रकुपित हो जाने
पर सायंकालीन भोजन के समय प्रत्येक ग्रास के साथ औषध
देना चाहिये और हृदयगति का संचालन करने वाली प्राणवायु
के कुपित होने पर सायंकालीन भोजन के अन्त में विद्वान्
चिकित्सक को औषध प्रयोग कराना चाहिये। इस प्रकार यह
औषध-सेवन करने का तीसरा काल है।
औषध-सेवन का चतुर्थ काल
मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च।।10।।
सान्नं च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः।
तृट् (प्यास), छर्दि (वमन, उल्टी या कै), हिचकी,
श्वास (दमा) तथा विविध गरों (दूषीविषों के प्रयोग के कारण
उत्पन्न रोगों) में बार-बार (अनेक बार) भोजन में मिलाकर
औषध का सेवन कराना चाहिये। यह औषध-सेवन का चौथा
काल कहा गया है।
औषध-सेवन का पञ्चम काल
ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा।।11।।
पाचनं शमनं देयमनन्नं भेषजं निशि।
इति पञ्चमकालश्च प्रोक्तो भेषज्यकर्मणि।।12।।
--- [दायाँ स्तम्भ] ---
जत्रु (Collar bone = ग्रीवा के सामने उभरी हुई
अस्थि) के ऊपरी भाग में होने वाले अवयवों (गला, मुख,
नाक, कान, आँख तथा सिर) के रोगों में लेखन (कर्षण =
खुरचकर निकालने या कृश करने) में, बृंहण (स्थूल करने)
में पाचन तथा शमन औषधयोगों का प्रयोग रात में भोजन के
पहले ही कराना चाहिये। यह औषध सेवन का पाँचवाँ काल
कह दिया गया है।
वक्तव्य-प्रायः देखा जाता है कि रोगी चिकित्सक से
पूछा करते हैं-यह औषध कब-कब खानी है, इसके उत्तर के
लिए इन श्लोकों में कहे गये विषयों का अभ्यास करें। विशेष
जानकारी प्राप्त करने के लिए चरक चि० अ० 30, श्लोक
296 से 312 का भी अवलोकन कर लेना चाहिये। उपर्युक्त
श्लोक में प्रयुक्त 'निशि' शब्द का अर्थ सामान्य स्थिति में
'रात्रि का प्रथम प्रहर' है।
द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ
द्रव्ये रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
संवेदनक्रमादेताः पञ्चावस्थाः प्रकीर्तिताः।।13।।
द्रव्य का सेवन करने पर उसमें अनुभवी-क्रम से रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) ये पाँच अवस्थाएँ
कही गयी हैं।
वक्तव्य-रस आदि का परिचय-जीभ द्वारा जिसका
परिचय प्राप्त होता है उसे 'रस' कहते हैं। इसकी उत्पत्ति मूल
रूप से जल द्वारा मानी गयी है। रसों की संख्या छः है। यथा-
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, तथा कषाय। गुण-इनकी
संख्या बीस है-गुरु, मन्द, हिम, स्निग्ध, श्लक्ष्ण, सान्द्र, मृदु,
स्थिर, सूक्ष्म, विशद (इन गुणों के विपरीत क्रमशः ये दस
गुण हैं) लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, खर, द्रव, कठिन, सर,
स्थूल, तथा पिच्छिल। वीर्य-यह दो प्रकार का होता है-उष्ण
और शीतल। विपाक-इसकी परिभाषा इसी अध्याय के
33वें श्लोक में देखें। यह रसभेद से तीन प्रकार का होता
है-मधुर, अम्ल, तथा कटु। शक्ति-द्रव्यों की शक्ति अचिन्त्य
होती है। द्रव्य-यह स्थावर, जंगम तथा पार्थिव भेद से तीन
प्रकार का होता है। स्थावर द्रव्य-जड़, छाल, सार, गोंद,
नाल, स्वरस, पत्र, पुष्प, फल, दूध, क्षार, भस्म, तथा तेल
आदि। जङ्गम द्रव्य-दूध, मधु, पित्त, स्नेह (वसा), मज्जा,
रक्त, मांस, हड्डी, चर्म, मल, मूत्र, स्नायु, नख, लोम, खुर,
तथा सींग आदि। पार्थिव द्रव्य-सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा,