शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
262 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
262 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
श्वित्रहर लेप (२)
वायस्येडगजाकुष्ठकृष्णाभिर्गुटिका कृता।
बस्तमूत्रेण सम्पिष्टा प्रलेपाच्छ्वित्रनाशिनी ॥ ४१ ॥
मकोय, चकवड़ (पवाँर) के बीज, कूठ तथा पीपल को
बकरे के मूत्र के साथ पीसकर गुटिका (लम्बी गोली) बना
लें। उसका लेप श्वित्र को नष्ट करता है।
श्वित्रहर लेप (३)
तालकं शाणमात्रं स्याच्चतुःशाणा च बाकुची।
गोमूत्रपिष्टं तच्चूर्णं लेपनाच्छ्वित्रनाशनम् ॥ ४२ ॥
हरिताल एक शाण (चौथाई भर) और बाकुची चार
शाण (१ तोला) दोनों को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से
श्वित्र का नाश होता है।
श्वित्रहर लेप (४)
बाकुची वेतसो लाक्षा काकोदुम्बरिका कणा।
रसाञ्जनमयश्चूर्णं तिलाः कृष्णास्तदेकतः ॥ ४३ ॥
चूर्णयित्वा गवां पित्तैः पिष्ट्वा च गुटिका कृता।
अस्याः प्रलेपाच्छ्वित्राणि प्रणश्यन्त्यतिवेगतः ॥ ४४ ॥
बाकुची, वेत, लाही (लाख), कठगूलर, पीपल, रसवत,
लोहचूर्ण और काला तिल-इन सबको एक साथ पीसकर
और गाय के पित्त की भावना देकर गुटिका बना लें। इसके
लेप से श्वित्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
सिध्महर लेप (१)
धात्री सर्जरसश्चैव यवक्षारश्च चूर्णितः।
सौवीरेण प्रलेपोऽयं प्रयोज्यः सिध्मनाशने ॥ ४५ ॥
आँवला, राल तथा जौखार को पीसकर चूर्ण बना लें
और फिर काँजी के साथ मिलाकर लेप करें। इसे 'सिध्म' या
सेहुँआ का विनाश करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये।
सिध्महर लेप (२)
दार्वी मूलकबीजानि तालकं सुरदारु च।
ताम्बूलपत्रं सर्वाणि कार्षिकानि पृथक् पृथक् ॥ ४६ ॥
शङ्खचूर्णं शाणमात्रं सर्वाण्येकत कारयेत्।
लेपोऽयं वारिणा पिष्टः सिध्मनां नाशनः परः ॥ ४७ ॥
दारुहल्दी, मूली के बीज, हरताल, देवदारु तथा पान के
पत्ते, प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (१ तोला) और शंखभस्म
एक शाण (चौथाई भर)-सबको एक साथ मिलाकर और
जल में पीसकर लेप करें। सिध्म का नाश करने के लिए यह
भी उत्तम लेप है।
नेत्ररोगहर लेप (१)
हरीतकी सैन्धवं च गैरिकं च रसाञ्जनम्।
बिडालको जले पिष्टः सर्वनेत्रामयापहः ॥ ४८ ॥
बड़ी हड़, सेंधा नमक, गेरू तथा रस्रवत इन सबको
जल से पीसकर 'बिडालक' (आँख की बरौनियों पर जो लेप
किया जाता है, उसको बिड़ालक कहते हैं) करने से सम्पूर्ण
नेत्रों में होने वाले रोगों (अभिष्यन्द आदि) को नष्ट करता है।
वक्तव्य-चिकित्सक इस लेप में कपूर, हल्दी, केसर
तथा अफीम भी मिलाते हैं।
नेत्ररोगहर लेप (२)
रसाञ्जनं व्योषयुतं समिष्टं वटकीकृतम्।
कण्डूं पाकान्वितां हन्ति लेपादञ्जननामिकाम् ॥ ४९ ॥
रस्रवत् तथा त्रिकटु को पीसकर गोली बना लें। इसका
लेप खुजली तथा पाक से युक्त 'अञ्जननामिका' (बरौनी पर
होने वाली फुन्सी) को नष्ट करता है।
पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (१)
प्रपुन्नाटस्य बीजानि बाकुची सर्षपास्तिलाः।
कुष्ठं निशाद्वयं मुस्तं पिष्ट्वा तक्रेण चैकतः ॥ ५० ॥
प्रलेपादस्य नश्यन्ति दद्रूकण्डूविचर्चिकाः।
चक्रमर्द (पँवार) के बीज, बाकुची सरसों, तिल, कूठ,
हल्दी, दारुहल्दी तथा नागरमोथा-इन सबको मट्ठा के साथ
पीस लें। इस लेप से दाद पामा (खुजली) तथा विचर्चिका
का विनाश हो जाता है।
पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (२)
हेमक्षीरी विडङ्गानि दरदं गन्धकस्तथा ॥ ५१ ॥
दद्रुघ्नः कुष्ठसिन्दूरे सर्वाण्येकत मर्दयेत्।
धत्तूरनिम्बताम्बूलीपत्राणां स्वरसैः पृथक् ॥ ५२ ॥
अस्य प्रलेपमात्रेण पामादद्रूविचर्चिकाः।
कण्डूश्च रसकश्चैव प्रशमं यान्ति वेगतः ॥ ५३ ॥
सत्यानाशी के बीज, वायविडंग, शिंगरफ, गन्धक,
चक्रमर्द (पँवार) के बीज, कूठ तथा सिन्दूर-सबको एक
साथ पीसकर धतूरा, नीम तथा पान के पत्तों के स्वरस की
पृथक्-पृथक् भावनायें देकर गोलियाँ बना लें। इसका लेप
(जल में घिसकर) करने से पामा, दाद, विचर्चिका, सूखी
खुजली तथा रसक (चर्मरोग-विशेष) शीघ्र ही शान्त हो
जाती है।
एकादशोऽध्यायः ]
लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः
263
[बायाँ पृष्ठ/कॉलम]
वक्तव्य—इसका जितना ही पतला लेप किया जाता है, उतना ही अधिक लाभ होता है।
पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (3)
दूर्वाऽभया सैन्धवं च चक्रमर्दः कुठेरकः।
एभिस्तक्रयुतो लेपः कण्डूदद्रूविनाशनः ॥ 54 ॥
सफेद दूध, हरड़, सेंधा नमक, चक्रमर्द, तथा तुलसी–इन सबको तक्र (मट्ठा) के साथ पीसकर लेप करने से खुजली तथा दाद का विनाश हो जाता है।
पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (4)
दूर्वानिशायुतो लेपः कण्डूपामाविनाशनः।
कृमिदद्रूहरश्चैव शीतपित्तापहः स्मृतः ॥ 55 ॥
दूध तथा हल्दी का लेप कण्डू (खुजली) तथा पामा का विनाश कर कृमि, दाद तथा शीतपित्त का विनाश करता है।
पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (5)
सिद्धार्थरजनीकुष्ठप्रपुन्नाटतिलैः सह।
कटुतैलेन सम्मिश्रं दद्रुघ्नं च प्रलेपनम् ॥ 56 ॥
सरसों, हल्दी, कूठ, चक्रमर्द तथा तिल को पीसकर और कटुतैल (सरसों का तेल) को मिलाकर लेप करने से दाद का विनाश होता है।
वातविसर्पहर लेप
रास्ना नीलोत्पलं दारु चन्दनं मधुकं बला।
घृतक्षीरयुतो लेपो वातवीसर्पनाशनः ॥ 57 ॥
रास्ना, नीलकमल, देवदारु, लालचन्दन, मुलेठी तथा बरियारा–इनको पीसकर घी तथा दूध के साथ मिलाकर लेप करने से वातजनित वीसर्प का नाश होता है।
पित्तविसर्पहर लेप
मृणालं चन्दनं लोध्रमुशीरं कमलोत्पलम्।
सारिवामलकी पथ्या लेपः पित्तविसर्पनुत् ॥ 58 ॥
कमलनाल, लालचन्दन, लोध, खस, लालकमल, नीलकमल, सारिवा, आँवला तथा हरड़ का लेप पित्तजनित विसर्प को नष्ट करता है।
कफविसर्पहर लेप
त्रिफला पद्मकोशीरं समङ्गा करवीरकम्।
नलमूलमनन्ता च लेपः श्लेष्मविसर्पहा ॥ 59 ॥
त्रिफला, पद्माकाष्ठ, खस, मजीठ, कनेर के पत्र र्पनरसल की जड़ तथा अनन्तमूल का लेप कफजनित वीसर्प को नष्ट करता है।
[दायाँ पृष्ठ/कॉलम]
वातरक्त, रक्तपित्तहर लेप
मांसी सर्जरसो लोध्रं मधुकं सहरेणुकम्।
मूर्वा नीलोत्पलं पद्मं शिरीषकुसुमैः सह ॥ 60 ॥
प्रलेपः पित्तवातास्त्रे शतधौतघृतप्लुतः।
आमलं घृतभृष्टं तु पिष्टं काञ्जिकवारिभिः ॥ 61 ॥
जयेन्मूर्ध्नि प्रलेपेन रक्तं नासिकया स्रुतम्।
जटामांसी, राल, लोध, मुलेठी, सम्भालू के बीज, मरोड़फली, नीलकमल, लालकमल तथा सिरस के फूल–इन सबको पीसकर तथा सौ बार धोये हुये घृत में मिलाकर वातरक्त में लेप किया जाता है। आँवले को घृत में थोड़ा भूनकर तथा काँजी के जल में पीसकर मस्तक पर लेप करने से नाक से गिरने वाला रक्त (नकसीर) बन्द हो जाता है।
वातिक शिरोरोगहर लेप (1)
कुष्ठमेरण्डतैलेन लेपात् काञ्जिकपेषितम् ॥ 62 ॥
शिरोऽर्तिं वातजां हन्यात् पुष्पं वा मुचुकुन्दजम्।
कूठ को काँजी में पीसकर और एरण्ड के तैल में पकाकर लेप करें अथवा मुचुकुन्द के फूलों का उक्त विधि से लेप करें। ये लेप वातजनित शिरोरोग को नष्ट करते हैं।
वातिक शिरोरोगहर लेप (2)
देवदारु नतं कुष्ठं नलदं विश्वभेषजम् ॥ 63 ॥
सकाञ्जिकः स्नेहयुक्तो लेपो वातशिरोऽर्तिनुत्।
देवदारु, तगर, कूठ, खस तथा सोंठ को काँजी में पीसकर और स्नेह (एरण्ड तैल) में काकर लेप करें। यह भी वातजनित शिरोरोग को नष्ट करता है।
पैत्तिक शिरोरोगहर लेप (1)
चन्दनोशीरयष्ट्याह्वबलाव्याघ्रनखोत्पलैः ॥ 64 ॥
क्षीरपिष्टैः प्रलेपः स्याद् रक्तपित्तशिरोऽर्तिजित्।
सफेद चन्दन, खस, मुलेठी, बरियारा, नाखूना तथा कमल को दूध में पीसकर लेप करें। यह रक्तजनित तथा पित्तजनित शिरोरोग को जीतता है।
पैत्तिक शिरोरोगहर लेप (2)
धात्रीकसेरुहीबेरपद्मपद्मकचन्दनैः ॥ 65 ॥
दूर्वोशीरनलानां च मूलैः कुर्यात् प्रलेपनम्।
शिरोऽर्तिं पित्तजां हन्याद् रक्तपित्तरुजं तथा ॥ 66 ॥
आँवला, कसेरू, नेत्रवाला, कमल, पद्मकाष्ठ, श्वेतचन्दन, दूब, खस् तथा नरसल की जड़–इन सबको पीसकर लेप