शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 356 में से
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शार्ङ्गधरसंहिता
[ पूर्वखण्डे
राँगा, लोहा, अभ्रक तथा इनके यौगिक अन्य खनिज द्रव्य।
इस दृष्टि से संसार की सम्पूर्ण वस्तुएँ 'द्रव्य' हैं।
मधुररस के लक्षण
(स्नेहन-प्रीणनाह्लाद मार्दवैरुपलभ्यते।
मुखस्थो मधुरश्चास्यं व्याप्युर्वल्लिम्पतीव च।। 17।।)
जिस रस से स्नेहन, प्रीणन (तृप्ति), आह्लाद (आनन्द)
तथा मृदुता की प्राप्ति हो और जो मुख में रखा हुआ मुख के
चारों ओर फैलकर लिपट जाये, उसे मधुर रस कहते हैं।
वक्तव्य-मधुर आदि छः रसों के वर्णन का विशद
विवेचन चरकसंहिता सू० अ० 26 श्लोक 74 से 79 तक में
देखें।
अम्लरस के लक्षण
(दन्तहर्षान्मुखस्रावात् स्वेदनानमुखबोधनात्।
विदाहाच्चास्य कण्ठस्य प्राश्यैवाम्लरसं वदेत्।। 18।।)
जिसको चखने मात्र से दाँत खट्टे हों, मुख से पानी का
स्राव होने लगे, पसीना होने लगे, मुख का बोधन हो, अर्थात्
मुख का फीकापन दूर हो जाये, जिसका अधिक सेवन कर
लेने से मुख तथा गले में विदाह (जलन) होने लगे, उसे
'अम्लरस' कहना चाहिये।
वक्तव्य-अंग्रेजी में अम्ल तथा क्षार का एक पर्याय
Acid भी है। इसमें विदाहक गुण होता है। अतएव गीता में
ऐसे पदार्थों के अधिक सेवन का निषेध किया गया है।
देखें-'कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः'। गीता अ०
17.9।
लवणरस के लक्षण
(प्रलीयन् क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे।
यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च।। 19।।)
जो मुख में रखा हुआ शीघ्र ही घुल जाये, सूखे हुये मुख
के भीतरी भाग को गीला कर दे, लालास्राव को पैदा करे और
अधिक सेवन करने पर मुख के भीतर जलन पैदा करे, उसे
लवणरस समझें।
वक्तव्य-'प्रलीयन्' के स्थान पर श्रीगणनाथसेन
'प्रीणयन्' पाठभेद को स्वीकार करते हैं। 'स विदाहान्मुखस्य
च' यह स्थिति मात्रा से अधिक लवणरस के सेवन से उत्पन्न
होती है।
कटुरस के लक्षण
(संवेजयेद् यो रसनां निपाते तुदतीव च।
विर्दहन् मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः।। 20।।)
द्रव्य का लक्षण
(द्रव्यमेव रसादीनां श्रेष्ठं ते हि तदाश्रयाः।
पञ्चभूतात्मकं तत्तु क्ष्मामधिष्ठाय जायते।। 14।।
अम्बुयोन्यग्निपवननभसां समवायतः।
तन्निर्वृत्तिर्विशेषश्च व्यपदेशस्तु भूयसा।। 15।।)
रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव की अपेक्षा द्रव्य को
ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि उपर्युक्त रस आदि गुण द्रव्य के
ही आश्रित होते हैं। द्रव्य के बिना उक्त रस आदि की सत्ता
कहीं नहीं देखी जाती। इस प्रकार का वह द्रव्य पञ्चभूतात्मक
होता है। वह द्रव्य पृथ्वी तत्त्व का आश्रय (सहारा) लेकर
व्यक्त (प्रकट) होता है, उसकी जल योनि (उत्पन्न करने
वाली) है। अग्नि, वायु तथा आकाशतत्त्व के योग से उसकी
उत्पत्ति और विशेष (स्वरूप-भेद) होता है। इन द्रव्यों में
उक्त पंचभूतों की तर-तम भाव से अधिकता होने से ये द्रव्य
पार्थिव, आप्य, तथा तैजस आदि संज्ञा वाले हो जाते हैं।
वक्तव्य-प्राचीन तन्त्रकारों ने भी एकमत से द्रव्य को
पाञ्चभौतिक स्वीकारा है। इसके विशेष विवेचन के लिए
देखें-अ० हृ० सू० अ० 9.1-2।
रसों के छः भेद
मधुरोऽम्लः पटुश्चैव कटुतिक्तकषायकाः।
इत्येते षड्रसाः ख्याता नानाद्रव्यसमाश्रिताः।। 16।।
- मधुर (मीठा-गुड़ आदि), 2. अम्ल (खट्टा-नींबू
आदि), 3. पटु (नमकीन-लवण आदि), 4. कटु (कडुआ-
सोंठ, मरिच, पीपल, तथा (लालमिर्च आदि), 5. तिक्त
(तीता-नीम, चिरायता, तथा कुटज आदि) और 6. कषाय
(कसैला-आँवला आदि)। इस प्रकार ये छः रस कहे गये हैं,
जो भिन्न-भिन्न द्रव्यों में पाये जाते हैं।
वक्तव्य-जीभ द्वारा स्पर्श होने पर उक्त रसों का
ठीक- ठीक निर्णय हो जाता है, अतएव जीभ का एक
नाम 'रसना' भी है। रसना के अकर्मण्य हो जाने पर रसों का
ज्ञान नहीं हो पाता है। इसी प्रकरण में आगे इन रसों के
परिचायक पद्य दिये गये हैं। आप देखेंगे कि कटु और तिक्त
रसों के सम्बन्ध में भ्रान्त-धारणाएँ किस प्रकार समाज में
फैली हैं।