शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
264 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
264 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
करें। यह भी पित्तजनित तथा रक्तपित्तजनित शिरोरोग को नष्ट
करता है।
कफज शिरोरोगहर लेप
हरेणुनतशैलेयमुस्तैलागरुदारुभिः ।
मांसीरास्नारुबूकैश्च कोष्णो लेपः कफार्तिनुत् ।। ६७ ।।
सम्भालू के बीज, तगर, छड़ीला, मोथा, इलायची, अगुरु,
देवदारु, जटामांसी, रास्ना तथा एरण्ड की जड़-इनको पीसकर
और गर्म करके लेप करें। इससे कफजनित शिरोरोग नष्ट हो
जाता है।
दूसरा लेप
शुण्ठीकुष्ठप्रपुन्नाटदेवकाष्ठैः सरोहिषैः ।
मूत्रपिष्टैः सुखोष्णैश्च लेपः श्लेष्मशिरोऽर्तिनुत् ।। ६८ ।।
सोंठ, कूठ, चक्रमर्द, देवदारु तथा रोहिषतृण-इस सबको
गोमूत्र में पीसकर और गर्म करके लेप करें। यह लेप कफजनित
शिरोरोग को नष्ट करता है।
आधा-शीशी पर लेप
सारिवाकुष्ठमधुकवचाकृष्णोत्पलैस्तथा ।
लेपः सकाञ्जिकस्नेहः सूर्यावर्त्तार्धभेदयोः ।। ६९ ।।
सारिवा, कूठ, मुलेठी, वच, पीपल तथा कमल इन सबको
काँजी में पीसकर तथा स्नेह (एरण्ड तैल) में पकाकर इसका
'सूर्यावर्त्त' एवं अर्द्धावभेदक नामक शिरोरोगों में लेप करना
चाहिये।
सभी शिरोरोगों पर लेप
वरी नीलोत्पलं दूर्वा तिलाः कृष्णाः पुनर्नवा ।
शङ्खकेऽनन्तवाते च लेपः सर्वशिरोऽर्तिजित् ।। ७० ।।
शतावर, नीलकमल, दूब, तिल, पीपल तथा पुनर्नवा का
लेप 'शंखक' तथा 'अनन्तवात' नामक शिरोरोगों में करना
चाहिये। यह सब प्रकार के शिरोरोगों को जीतता है।
दूसरी लेप-विधि
अथ लेपविधिश्चान्यः प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः ।
द्वौ तस्य कथितौ भेदौ प्रलेपाख्यप्रदेहकौ ।। ७१ ।।
चर्माईं माहिषं यद्वत् प्रोन्नतं सा मितिस्तयोः ।
शीतस्तनुर्विशोषी च प्रलेपः परिकीर्तितः ।। ७२ ।।
आर्द्रो घनस्तथोष्णः स्यात् प्रदेहः श्लेष्मवातहा ।
रोमाभिमुखमादेयौ प्रलेपाख्यप्रदेहकौ ।। ७३ ।।
वीर्यं सम्यग् विशत्याशु रोमकूपैः शिरामुखैः ।
न रात्रौ लेपनं कुर्याच्छुष्यमाणं न धारयेत् ।। ७४ ।।
शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीड़नं प्रति ।
(तमसा पिहितो ह्युष्मा रोमकूपमुखे स्थितः ।। ७५ ।।
विना लेपेन निर्याति रात्रौ नो लेपयेदतः ।)
रात्रावपि प्रलेपादिविधिः कार्यों विचक्षणैः ।। ७६ ।।
अपक्वशोथे गम्भीरे रक्तश्लेष्मसमुद्भवे ।
इसके पश्चात् अब एक और लेपविधि कही जाती है जो
विद्वान् चिकित्सकों को सम्मत है। उसके दो भेद हैं-1. प्रलेप
(साधारण लेप) और 2. प्रदेह (जो गर्म करके बनाया जाता
है, जिसको 'पुल्टिस' भी कहते हैं)। इन दोनों की मोटाई भैंस
के गीले चमड़े के समान होनी चाहिये। इनमें शीत (जो गर्म
नहीं किया गया), तनु (पतला यथा चन्दनलेप), विशोषी
(सूखने वाला अर्थात् व्रणशोथ को पीड़न करने वाला,
यथा-गन्धाविरोजा आदि का लेप) अथवा अविशोषी (विशोषी
के विपरीत गुण वाला) प्रलेप कहलाता है। आर्द्र (गीला),
घन (मोटा) तथा उष्ण (गर्म किया हुआ) 'प्रदेह' कहा जाता
है। यह प्रदेह कफ-वातनाशक और प्रलेप पित्तनाशक होता
है। प्रलेप तथा प्रदेह का प्रयोग रोमाभिमुख (रोमों की ओर)
करना चाहिये। इससे औषधि का वीर्य (सार) रोमकूपों में
लगी हुई सिराओं द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। रात्रि में
लेप न करें और सूखने से पहले ही उसे उतार दें, किन्तु पीड़न
के लिये प्रयुक्त किये गये प्रदेह को सूखने देना चाहिये।
अन्धकार से रुकी हुई व्रणशोथ की ऊष्मा रोमकूपों के मुख में
स्थित रहती है (अर्थात् रात्रि के स्वाभाविक शीत के कारण
वह नहीं निकल पाती, लेप करने से तो और भी रुक जाता
है), लेप न करने से कुछ-कुछ निकल जाती है, इसलिये
रात्रि में लेप नहीं करना चाहिये। विद्वान् चिकित्सक रात्रि में
भी लेप का प्रयोग किया करते हैं। यथा-कच्चे फोड़ों पर,
गम्भीर नामक फोड़े पर और रक्त तथा कफ के फोड़ों पर।
वक्तव्य-उक्त पाठ को सु० सू० अ० 18 में विस्तारपूर्वक
देखें।
व्रणशोथ-चिकित्सा-क्रम
आदौ शोथहरो लेपो द्वितीयो रक्तसेचनः ।। ७७ ।।
तृतीयश्चोपनाहः स्याच्चतुर्थः पाटनक्रमः ।
पञ्चमः शोधनो भूयात् षष्ठो रोपण इष्यते ।। ७८ ।।
सप्तमो वर्णकरणो व्रणस्यैते क्रमा मताः ।
पहले (जब फोड़ा उठ रहा हो) शोथहर लेप लगायें,
यदि इससे लाभ न हो तो दूसरा रक्तसेचन (जोंक अथवा
एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 265
सिंगी द्वारा रक्त निकालना) कर्म करें, यदि इससे भी लाभ न पाचन लेप
हो तो तीसरा क्रिया उपनाह (पकाने का प्रयत्न) या पुल्टिस शणमूलकशिग्रूणां फलानि तिलसर्षपाः।
का प्रयोग करें, यदि न पके तो चौथी पाटन क्रिया (चोरा सवचः किण्वमतसी प्रदेहः पाचनः स्मृतः॥84॥
लगाना) करें, पाँचवीं शोधन-क्रिया (जिससे दोष पूर्ण रूप शण (सनई), मूली, सहजन के बीज, तिल, सरसों,
से निकल जाते हैं) करें छठी रोपण-क्रिया (व्रण को भरने वच, खली या अलसी (तीसी) को पीसकर और पकाकर
का उपाय) करें और सातवीं सवर्णकरण-क्रिया (व्रणस्थान उसका प्रदेह (मोटा लेप या पुल्टिस) करने से व्रणदोष का
पर सफेद दाग या काला दाग न पड़ जाये) करें। इस प्रकार पाचन होता है।
फोड़ो में सात क्रम (चिकित्सा-विधियाँ कही गयी) हैं। दारण लेप (1)
वक्तव्य-देखें-सु०सू०अ० 17। दन्ती चित्रकमूलत्वक्स्नुह्यर्कपयसी गुडः।
वातिक व्रणशोथहर लेप भल्लातकास्थि कासीसं सैन्धवं दारणः स्मृतः॥85॥
बीजपूरजटा हिंस्रा देवदारु महौषधम् ॥ 79 ।। दन्ती, चीते के मूल का छाल, सेहुण्ड तथा आक का
रास्नाग्निमन्थो लेपोऽयं वातशोथविनाशनः। दूध, गुड़, भिलावा, लाल कासीस तथा सेंधा नमक का लेप
बिजौरा नींबू की जड़, हींस की जड़, देवदारु, सोंठ, दारण (व्रण को फोड़ने वाला) होता है।
रास्ना तथा अरणी की छाल इनका लेप वातजनित शोथ को दारण लेप (2)
नष्ट करता है। चिरबिल्वोऽग्निको दन्ती चित्रको हयमारकः।
पैत्तिक व्रणशोथहर लेप कपोतकङ्कगृध्राणां मलं लेपेन दारणम्॥86॥
मधुकं चन्दनं मूर्वा नलमूलं च पद्मकम्॥80॥ करञ्ज (डिठोरा) के बीज, भिलावा, दन्ती, चीता, कनेर
उशीरं बालकं पद्मं पित्तशोथे प्रलेपनम्। कबूतर कंक (चील) तथा गिद्ध की बीट, इनका लेप भी
मुलेठी, लालचन्दन, मरोड़फली, नरसल का जड़, दारण होता है।
पदमकाठ, खस, नेत्रबाला तथा कमल का लेप पित्तजनित दारण लेप (3)
शोथ में करना चाहिये। स्वर्जिकायावशूकाद्याः क्षारा लेपेन दारणाः।
श्लैष्मिक व्रणशोथहर लेप हेमक्षीर्यास्तथा लेपो व्रणे परमदारणः॥87॥
कृष्णा पुराणपिण्याकं शिग्रुत्वक्सिकता शिवा ।। 81 ।। सज्जीखार एवं जौखार आदि क्षार अत्यन्त दारण होते हैं
मूत्रपिष्टः सुखोष्णोऽयं प्रदेहः श्लेष्मशोथहा। और सत्यानाशी के पञ्चाङ्ग का लेप तो परम दारण (फोड़ों को
पीपल, पुरानी खली, सहजन का छाल, बालू (रेत) फोड़ने वाला) होता है।
तथा हरड़-इन सबको गोमूत्र में पीसकर और गर्म करके मोटा वक्तव्य-दारण-लेप पके हुये फोड़ों पर किये जाते हैं।
लेप करने से कफजनित शोथ का नाश हो जाता है। इनसे फोड़े फूट जाते हैं। विद्रधि जाति के अर्थात् गम्भीर फोड़े
रक्तज व्रणशोथहर लेप नहीं फूटते, उनमें चीरा लगाना ही पड़ता है। दोनों का लक्ष्य
द्वे निशे चन्दने द्वे च शिवा दूर्वा पुनर्नवा ।। 82 ।। एक ही पाटन या फाड़ना है। रक्तसेचन-क्रम का वर्णन अगले
उशीरं पद्मकं लोध्रं गैरिकं च रसाञ्जनम्। अध्याय में देखें।
आगन्तुके रक्तजे च शोथे कुर्यात् प्रलेपनम् ।। 83 ।। शोधन-लेप
हल्दी, दारुहल्दी, लालचन्दन, सफेदचन्दन, हरड़, दूब, तिलरौन्धवयष्ट्याह्वनिम्बपत्रनिशायुगैः ।
पुनर्नवा, खस, पद्मकाठ, लोध, गेरू और रसवंत का लेप त्रिवृद्घृतयुतैः पिष्टैः प्रलेपो व्रणशोधनः ।। 88 ।।
आगन्तुज (चोट आदि से उत्पन्न होने वाले) शोथ में तथा तिल, सेंधा नमक, मुलेठी, नीम के पत्ते, हल्दी, दारुहल्दी
रक्तजनित शोथ में करना चाहिये। तथा निसोत को पीसकर और घी मिलाकर लेप करने से व्रण
वक्तव्य-उक्त लेप तब किये जाते हैं, जब फोड़ा उत्पन्न का शोधन हो जाता है।
हो रहा हो। इन्हीं लेपों का एक नाम 'शोथहर' है। वक्तव्य-उक्त लेप से पूर्ण रूप में पूय निकल कर व्रण
266 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
[स्तम्भ १]
शुद्ध हो जाता है। शुद्ध व्रण के लक्षण इस प्रकार हैं-
'जिह्वातलाभोऽतिमृदुः श्लक्ष्णः स्निग्धोऽल्पवेदनः। सुव्यवस्थो
निरास्रावः शुद्धो व्रण इति स्मृतः'।।
शोधन-रोपण लेप
निम्बपत्रघृतक्षौद्रदार्वीमधुकसंयुतः ।
तिलैश्च सह संयुक्तो लेपः शोधनरोपणः।।89।।
नीम के पत्ते, घी, मधु, दारुहल्दी, मुलेठी तथा तिल-इन
सबको भली-भाँति पीसकर लेप करने से व्रण (घाव) का
शोधन और रोपण (भरना) भी हो जाता है।
कृमिनाशक लेप
करञ्जारिष्टनिर्गुण्डी लेपो हन्याद् व्रणक्रिमीन्।
लशुनस्याथवा लेपो हिङ्गुनिम्बभवोऽथवा।।90।।
करञ्ज, नीम तथा सम्भालू का लेप व्रण के कृमियों को
नष्ट करता है। उसी प्रकार लहसुन का लेप अथवा हींग और
नीम के पत्तों का लेप भी व्रण के कृमियों को नष्ट करता है।
**वक्तव्य-**कभी-कभी असावधानी के कारण व्रण में
कृमि पड़ जाते हैं। ऐसी दशा में लेप उपयोगी होते हैं।
शोधन-रोपण-लेप
निम्बपत्रं तिला दन्ती त्रिवृत्सैन्धवमाक्षिकम्।
दुष्टव्रणप्रशमनो लेपः शोधनरोपणः।।91।।
नीम के पत्ते, तिल, दन्ती, निसोत, सेंधा नमक तथा मधु
का लेप दूषित व्रण को शान्त करता है। यह शोधन तथा
रोपण है।
उदरशूलहर लेप
मदनस्य फलं तिक्तां पिष्ट्वा काञ्जिकावारिणा।
कोष्णं कुर्यान्नाभिलेपं शूलशान्तिर्भवेत् ततः।।92।।
मैनफल तथा कुटकी को काँजी में पीसकर तथा गर्म कर
नाभि के आस-पास अर्थात् समस्त उदर पर लेप करें। इससे
शूल की शान्ति हो जाती है।
वातविद्रधिहर लेप
शिग्रुशेफालिकैरण्डयवगोधूममुद्गकैः ।
सुखोष्णो बहलो लेपः प्रयोज्यो वातविद्रधौ।।93।।
सहजन की छाल, सम्भालू, एरण्ड की जरु अथवा बीज,
जौ, गेहूँ तथा मूँग-इनको पीसकर तथा गर्म कर मोटा लेप
वातजनित विद्रधि में करना चाहिये।
पित्तविद्रधिहर लेप
पैत्तिके सर्पिषा लाजामधुकैः शर्करान्वितैः।
प्रलिम्पेत् क्षीरपिष्टैर्वा पयस्योशीरचन्दनैः।।94।।
[स्तम्भ २]
पित्तजनित विद्रधि में लावा मुलेठी तथा चीनी को घी में
मिलाकर अथवा विदारीकन्द, खस तथा श्वेतरन्दन को दूध
में पीसकर लेप करना चाहिये।
कफविद्रधिहर लेप
इष्टिका सिकता लोहकिट्टं गोशकृता सह।
सुखोष्णः स्यात् प्रदेहोऽयं मूत्रैः स्याच्छ्लेष्मविद्रधौ।।95।।
ईंट का चूर्ण, बालू, मण्डूर, तथा गाय के गोबर को
गोमूत्र में पीसकर तथा गर्म कर कफजनित विद्रधि में प्रदेह
(मोटा लेप) करें।
आगन्तुज विद्रधिहर लेप
रक्तचन्दनमञ्जिष्ठानिशामधुकगैरिकैः ।
क्षीरेण विद्रधौ लेपो रक्तागन्तुनिमित्तजे।।96।।
लालचन्दन, मजीठ, हल्दी, मुलेठी तथा गेरू को दूध में
पीसकर रक्तजनित तथा आगन्तुज विद्रधि में लेप करें।
गलगण्ड लेप (1)
निचुलः शिग्रुबीजानि दशमूलमथापि वा।
प्रदेहो वातगण्डेषु सुखोष्णः सम्प्रदीयते।।97।।
जलवेत, सहजन के बीज तथा दशमूल (देखें-शा०
सं०, म० खं० अ० 2, श्लोक 28)-इन सबको जल के साथ
पीसकर और गर्म कर वातजनित गलगण्ड में प्रदेह किया
जाता है।
गलगण्डलेप (2)
देवदारु विशाला च कफगण्डे प्रदेहकः।
देवदारु तथा इन्द्रायण की जड़ का लेप कफजनित
गलगण्ड में किया जाता है।
अपचीनाशक लेप (1)
सर्षपारिष्टपत्राणि दग्ध्वा भल्लातकैः सह।।98।।
छागमूत्रेण सम्पिष्टमपचीघ्नं प्रलेपनम्।
सरसों, नीम के पत्र एवं भिलावे को (मिट्टी के पात्र में
बन्द करके) जलाकर और बकरे के मूत्र में पीसकर लेप
करने से अपची (पकने वाली गण्डमाला) का नाश होता है।
अपचीनाशक लेप (2)
सर्षपाः शिग्रुबीजानि शणबीजातसीयवाः।।99।।
मूलकस्य च बीजानि तक्रेणाम्लेन पेषयेत्।
गण्डमालाम्बुदं गण्डं लेपेनानेन शाम्यति।।100।।
सरसों, सहजन के बीज, शण के बीज अलसी, जौ तथा
मूली के बीज को खट्टे तक्र (मट्ठा) के साथ पीस लें। इस
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एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 267
लेप से गण्डमाला, अर्बुद (रसौली) तथा गलगण्ड शान्त हो
जाता है।
अपबाहुक आदि के लेप
तक्षयित्वा क्षुरेणाङ्गं केवलानिलपीडितम्।
तत्र प्रदेशे दद्याच्च पिष्टं गुञ्जाफलैः कृतम्।। 101।।
तेनापबाहुजा पीडा विश्वाची गृध्रसी तथा।
अन्यापि वातजा पीडा प्रशमं याति वेगतः ।। 102 ।।
केवल वायु से पीड़ित अवयव पर क्षुर (छुरा या उस्तरा)
से पछ् लगाकर घुंघची को पीसकर लेप करें। इससे
अपबाहुक, विश्वाची, गृध्रसी तथा अन्यान्य वातरोग शीघ्र ही
शान्त हो जाते हैं।
श्लीपदहर लेप
धत्तूरैरण्डनिर्गुण्डीवर्षाभूशिगुसर्षपैः ।
प्रलेपः श्लीपदं हन्ति चिरोत्थमपि दारुणम्।। 103 ।।
धतूरा के पत्ते, सम्भालू, पुनर्नवा, सहजन एवं सरसों का
लेप पुराने तथा भीषण श्लीपद (फीलपाँव) को नष्ट करता है।
अण्डवृद्धिहर लेप
अजाजीहपुषाकुष्ठमैरण्डबदरान्वितम् ।
काञ्जिकेन तु सम्पिष्टं कुरण्डघ्नं प्रलेपनम् ।। 104 ।।
काला जीरा, हाऊबेर, कूठ, एरण्ड की जड़ तथा बेर को
काँजी में पीसकर लेप करने से 'कुरण्ड' (अण्डवृद्धि) का
नाश होता है।
उपदंशहर लेप (1)
करवीरस्य मूलेन परिपिष्टेन वारिणा।
असाध्यापि व्रजत्यस्तं लिङ्गोत्था रुक्प्रलेपनात् ।। 105 ।।
कनेर की जड़ को जल में पीसकर लेप करने से लिंग में
होने वाले असाध्य रोग (उपदंश के व्रण) नष्ट हो जाते हैं।
उपदंशहर लेप (2)
दहेत्कटाहे त्रिफलां सा मषी मधुसंयुता।
उपदंशे प्रलेपोऽयं सद्यो रोपयति व्रणम् ।। 106 ।।
त्रिफला को कड़ाही में डालकर (जलते हुये चूल्हे में
रखकर) जला दें। यह मषी (त्रिफला का काली भस्म) मधु
के साथ मिलाकर लेप करने से उपदंश के व्रणों को शीघ्र ही
भर देती है।
उपदंशहर लेप (3)
रसाञ्जनं शिरीषेण पथ्यया च समन्वितम्।
सक्षौद्रं लेपनं योज्यमुपदंशगदापहम्।। 107।।
रसवत्, शिरीष की छाल तथा हरड़ को पीसकर, मधु के
साथ मिलाकर लेप करना चाहिये। इससे उपदंशरोग का नाश
हो जाता है।
अग्निदग्धहर लेप (1)
अग्निदग्धे तुगाक्षीरीप्लक्षचन्दनगैरिकैः।
सामृतैः सर्पिषा स्निग्धैरालेपं कारयेद् भिषक् ।। 108 ।।
तिन्दुकीत्वक्कषायैर्वा घृतमिश्रैः प्रलेपयेत्।
वंशलोचन, पिलखन की छाल, सफेदचन्दन, गेरू तथा
गिलोय को पीसकर घी में मिलाकर अथवा तिन्दुक की छाल
के स्वाथ को घी में फेंट कर आग से जले पर लेप करना
चाहिये।
अग्निदग्धहर लेप (2)
यवान् दग्ध्वा मषी कार्या तैलेन युतया तया ।। 109 ।।
दद्यात् सर्वाग्निदग्धेषु प्रलेपो व्रणरोपणः।
जौ को जलाकर राख बना लें, फिर इसे तेल में मिलाकर
सभी प्रकार के अग्निदग्ध पर लेप करने से घाव भर जाते हैं।
भगसंकोचक लेप
पलाशोदुम्बरफलैस्तिलतैलसमन्वितैः ।। 110 ।।
मधुना योनिमालिम्पेद् गाढीकरणमुत्तमम्।
पलाश के फल तथा गूलर के फल दोनों को पीसकर,
मधु के साथ मिलाकर भग में लेप करें, इससे वह संकुचित
हो जाती है।
माकन्दफलसंयुक्तमधुकर्पूरलेपनात् ।। 111 ।।
गतेऽपि यौवने स्त्रीणां योनिर्गाढाऽतिजायते।
आम की गुठली का चूर्ण, मधु तथा कपूर के साथ
मिलाकर लेप करने से यौवन के ढल जाने पर भी स्त्रियों का
भग अत्यन्त गाढ़ा (संकुचित) हो जाता है।
वक्तव्य-उक्त लेपों का प्रयोग भग के भीतर नहीं किया
जा सकता। अतः उक्त द्रव्यों की ढीली पोटली बनाकर भग
के भीतर रखनी चाहिये।
लिङ्गवृद्धिकर लेप (1)
मरिचं सैन्धवं कृष्णा तगरं बृहतीफलम् ।। 112 ।।
अपामार्गस्तिलाः कुष्ठं यवा माषाश्च सर्षपाः ।
अश्वगन्धा च तच्चूर्णं मधुना सह योजयेत् ।। 113 ।।
अस्य सन्ततलेपेन मर्दनाच्च प्रजायते।
लिङ्गं स्तनोत्सेधः संहतिर्भुजकर्णयोः ।। 114 ।।
268 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
मरिच, सेंधा नमक, पीपल, तगर, बनभण्टा के फल, दुर्गन्धिनाशक योग (2)
अपामार्ग के बीज, तिल, कूठ, जौ, उड़द, सरसों तथा कुलित्थसक्तवः कुष्ठं मांसी चन्दनजं रजः ।। 118 ।।
असगन्ध-इन सबको पीसकर मधु में मिलाकर रख लें। इसका सक्तवश्चणकस्यैव त्वक् चैवैकत्र कारयेत्।
निरन्तर (महीनों तक लगातार) लेप करने और मर्दन करने स्वेददौर्गन्ध्यनाशश्च जायतेऽस्यावधूलनात् ।। 119 ।।
से लिङ्ग की वृद्धि होती है, स्तनों पर लेप करने से स्तन पुष्ट कुलथी का सत्तू, कूठ, जटामांसी, श्वेतचन्दन का चूर्ण,
हो जाते हैं और बाहु तथा कान दृढ़ हो जाते हैं। चने का सत्तू तथा दालचीनी-ये सब एक साथ मिलाकर
लिङ्गवृद्धिकर लेप (2) शरीर पर अवधूलन करने (बुरकने या चुपड़ने) से स्वेद
सिताश्वगन्धासिन्धूत्थछागक्षीरैर्धृतं पचेत्। (पसीना) तथा दुर्गन्धि का नाश हो जाता है।
तल्लेपान्मर्दनाल्लिङ्गवृद्धिः सञ्जायते परा ।। 115 ।। वक्तव्य-कुलथी आदि उपर्युक्त पदार्थ को भूनकर पीस
मिश्री, असगन्ध तथा सेंधा नमक का कल्क, बकरी का लेने से सत्तू (पाउडर) तैयार हो जाता है। इसके प्रयोग से
दूध मिलाकर विधिपूर्वक घी पकाना चाहिये। इसके लेप तथा शारीरिक दुर्गन्धि का नाश हो जाता है।
मर्दन से आवश्यकतानुसार लिंग की वृद्धि हो जाती है। वशीकरण लेप
वक्तव्य-पति-पत्नी के मनमुटाव, कलह या प्रेमाभाव वचा सौवर्चलं कुष्ठं राजन्यौ मरिचानि च।
का पता उनसे वार्तालाप करते समय लिंगवृद्धि आदि की एतल्लेपप्रभावेण वशीकरणमुत्तमम् ।। 120 ।।
आवश्यकता का पता लग जाता है। कभी-कभी रोगी स्वयं वच, कालानमक, कूठ, हल्दी, दारुहल्दी तथा मरिच
चिकित्सक के पास आकर अपनी दशा सुना देता है। ये को पीसकर लेप करें। इस लेप के प्रभाव से उत्तम वशीकरण
प्रयोग समय की माँग के अनुसार प्रयुक्त होते हैं, समझदारी होता है।
इसी में है कि योनिसंकोचक तथा लिंगवृद्धिकर योगों का शिर पर तैल लगाने की विधि
प्रयोग नहीं करना चाहिये। अभ्यङ्गः परिषेकश्च पिचुर्बस्तिरिति क्रमात्।
योनिद्रावक लेप मूर्धतैलं चतुर्धा स्याद् बलवच्च यथोत्तरम् ।। 121 ।।
इन्द्रवारुणिकापत्ररसैः सूतं विमर्दयेत्। त्रयोऽभ्यङ्गादयः पूर्वे प्रसिद्धाः सर्वतः स्मृताः।
रक्तस्य करवीरस्य काष्ठेन व मुहुर्मुहुः ।। 116 ।। शिरोबस्तिविधिश्चात्र प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः ।। 122 ।।
तल्लिप्तलिङ्गसंयोगाद् योनिद्रावोऽभिजायते। शिर-पर तैल का प्रयोग करने के चार प्रकार हैं। यथा-1
पारद को इन्द्रायण के पत्तों के रस में डालकर लाल अभ्यंग (मालिश करना), 2. परिषेक (शिर पर तैल की धार
कनेर का लकड़ी से बार-बार (सात दिन तक) मर्दन करें। गिराना), 3. पिचु (फाहा भिगाकर रखना) और 4. वस्ति।
इसका लेप लिंग पर करके स्त्री संयोग करने से 'योनिद्राव' हो ये उत्तरोत्तर (एक से दूसरा) बलवान् अर्थात् अधिक
जाता है। लोभदायक है। इनमें पहले अभ्यंग आदि तीन प्रयोग सर्वत्र
वक्तव्य-जब योनि स्पर्शसुख रहित हो जाती है, तब प्रसिद्ध है, अर्थात् साधारण लोग भी जानते हैं और शिरोबस्ति
मैथुन करने पर भी स्त्री स्खलित नहीं होती, अत एव मैथुनानन्द का विधि, जो कि विद्वानों को सम्मत (अभीष्ट) है, वह यहाँ
भी प्राप्त नहीं होता। इसी अवस्था को सुधारने के लिये उक्त कही जा रही है।
योग का प्रयोग किया जाता है। शिरोबस्ति की विधि
दुर्गन्धिनाशक योग (1) शिरोबस्तिश्चर्मणः स्याद् द्विमुखो द्वादशाङ्गुलः।
ताम्बूलपत्रचूर्णं तु चूर्णं कुष्ठशिवाभवम् ।। 117 ।। शिरःप्रमाणं तं बद्ध्वा मस्तके माषपिष्टकैः ।। 123 ।।
वारिणा लेपनं कुर्याद् गात्रदौर्गन्ध्यनाशनम्। सन्धिरोधं विधायादौ स्नेहैः कोष्णैः प्रपूरयेत्।
ताम्बूल (पान) के पत्तों का चूर्ण तथा कूठ और हरड़ तावद्धार्यस्तु यावत्स्यान्नासानेत्रमुखस्रुतिः ।। 124 ।।
का चूर्ण लेकर जल में पीसकर लेप करने से शरीर की वेदनोपशमो वापि मात्राणां वा सहस्रकम्।
दुर्गन्धि का नाश हो जाता है। विना भोजनमेवात्र शिरोबस्तिः प्रशस्यते ।। 125 ।।
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एकादशोऽध्यायः] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 269
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
शिरोवस्ति चमड़े की होनी चाहिये, उसके दो मुख (अर्थात्
दोनों ओर से खुली) हों, उसकी ऊँचाई बारह अंगुल हो और
व्यास (चौड़ाई) शिर की परिधि (घेरे) के बराबर हो। इसको
शिर पर बाँधकर और उड़द की पीठी से सन्धिरोध करके
कोष्ण (गुनगुने) स्नेहों (उपयुक्त तैल आदि) से भर दें।
इसको तब तक धारण करें, जब तक नाक, नेत्र तथा मुख से
जल का स्राव न होने लगे और जब तक वेदना शान्त न हो
जाये अथवा एक हजार मात्रा परिमित समय (लगभग 30
मिनट) तक। भोजन किये बिना (प्रातःकाल) शिरोवस्ति का
प्रयोग करना चाहिये।
**वक्तव्य—**कुछ प्रतियों में 'नासाकर्णमुखस्रुतिः' पाठ है।
शिरोवस्ति के प्रयोग से कर्णस्राव से पहले नेत्रस्राव होते देखा
जाता है।
शिरोवस्ति प्रयोगकाल
प्रयोज्यस्तु शिरोवस्तिः पञ्चसप्ताहमेव वा।
विमोच्य शिरसो वस्तिं गृह्णीयाच्च समन्ततः ।। 126 ।।
ऊर्ध्वकायं ततः कोष्णानीरैः स्नानं च कारयेत्।
अनेन दुर्जया रोगा वातजा यान्ति सङ्क्षयम् ।। 127 ।।
शिरःकम्पाद्यस्तेन सर्वकालेषु युज्यते।
पाँच अथवा सात दिन तक प्रतिदिन एक बार उक्त विधि
से शिरोवस्ति का प्रयोग करना चाहिये। शिर से वस्ति को
हटाकर (पहले तेल को सम्भाल कर ग्रहण कर लेना चाहिये)
चारों ओर से शिर को मलना चाहिये और इसके पश्चात्
गुनगुने जल से स्नान करा देना चाहिये। इस प्रकार वस्ति के
सेवन से शिरःकम्प आदि दुःसाध्य वातरोग नष्ट हो जाते हैं।
इसलिये सभी समयों (ऋतुओं) में इसका प्रयोग किया जा
सकता है।
**वक्तव्य—**ऊँचे किनारे वाली तथा छतरहित चमड़े या
गत्ते की टोपी बनवाकर शिर पर बाँध दी जाती है और उसमें
उपयुक्त स्नेह भर दिया जाता है। इसी का नाम 'शिरोवस्ति'
है।
कर्णपूरण-विधि
स्वेदयेत् कर्णदेशं तु किञ्चिन्नुः पार्श्वशायिनः ।। 128 ।।
मूत्रैः स्नेहै रसैः कोष्णैस्ततः श्रोत्रं प्रपूरयेत्।
कर्णं च पूरितं रक्षेच्छतं पञ्च शतानि वा ।। 129 ।।
सहस्त्रं वापि मात्राणां श्रोत्रकण्ठशिरोगदे।
मनुष्य को पार्श्व के बल लेटाकर उसके कान तथा
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
उसके आस-पास थोड़ा स्वेदन करे तत्पश्चात् मूत्र (अजामूत्र
आदि) स्नेह (तेल आदि) तथा आक आदि के पत्तों के रस
को कुछ गर्म कर उससे कान को भर दें। कान के रोगों में एक
सौ मात्रा (लगभग 3 मिनट), कण्ठ के रोगों में पाँच सौ मात्रा
(लगभग 15 मिनट), तथा शिर के रोगों में एक सहस्र मात्रा
(लगभग 30 मिनट) तक कान को भरा रखना चाहिये, अर्थात्
उसी प्रकार पड़े रहना चाहिये।
**वक्तव्य—**शार्ङ्गधरसंहिता के कुछ संस्करणों में मात्राकाल
परिचायक एक पद्य यहाँ भी किया गया है। वास्तव में इस
श्लोक की व्याख्या शा० सं० उ० खं० अ० 5 श्लोक 28 में
की जा चुकी है, अतः उसे यहाँ स्थान नहीं दिया गया है।
रसपूरण का समय
रसाद्यैः पूरणं कर्णे भोजनात् प्राक्प्रशस्यते ।। 130 ।।
तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते।
भोजन के पूर्व (प्रातःकाल) कान में रस आदि भरना
प्रशस्त है और तेल आदि सूर्य के अस्त हो जाने पर (रात्रि में)
भरना चाहिये।
कर्णरोगहर योग (1)
पीतार्कपत्रमाज्येन लिप्तं वह्नौ प्रतापयेत् ।। 131 ।।
तद्रसः श्रवणे क्षिप्तः कर्णशूलहरः परः।
आक के पीले पत्ते को घी लगाकर आग पर गर्म करें,
फिर इसका रस निचोड़ कर कान में डाल दें। इससे कान का
शूल अवश्य नष्ट हो जाता है।
कर्णरोगहर योग (2)
कर्णशूलातुरे कोष्णं बस्तमूत्रं ससैन्धवम् ।। 132 ।।
निक्षिपेत् तेन शाम्यन्ति शूलपाकादिका रुजः।
कर्णशूल से पीड़ित रोगी के कान में थोड़ा सेंधा नमक
मिलाकर बकरे का मूत्र गर्म करके डाल दें। इससे शूल तथा
पाक (पीब जाना) आदि रोग शान्त हो जाते हैं।
कर्णरोगहर योग (3)
शृङ्गबेरं च मधुकं मधु सैन्धवमामलम् ।। 133 ।।
तिलपर्णीरसस्तैलं टङ्कणं निम्बुकद्रवम्।
कदुष्णं कर्णयोर्देयमेतद् वा वेदनापहम् ।। 134 ।।
अदरक, मुलेठी, मधु, सेंधा नमक, आँवला, तिलपर्ण,
का रस, तेल, टंकण तथा नींबू का रस इन सब द्रव्यों का घोल
तैयार कर तथा उसे गर्म कर कान में डालना चाहिये यह भी
वेदना (शूल) को नष्ट करता है।