शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 356 में से
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प्रयोगावस्था में शास्त्रोक्त फल को देता है। यह अन्धविश्वास
का क्षेत्र नहीं है। उक्त 36 तथा 37 दोनों पद्य च० सू० अ० 26
के श्लोक संख्या 67 तथा 70 से लिये गये हैं।
रस आदि के कर्म
क्वचिद् रसो गुणो वीर्यं विपाकः शक्तिरेव च।
कर्म स्वं स्वं प्रकुर्वन्ति द्रव्यमाश्रित्य ये स्थिताः॥३८॥
द्रव्य का आश्रय लेकर रहने वाले ऊपर कहे गये रस,
गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव स्वतन्त्र रूप से कहीं-कहीं
अपना-अपना कार्य करते हैं। अर्थात् द्रव्याश्रित रस आदि
सामूहिक रूप से कार्य नहीं करते, अपितु वे स्वतन्त्र रूप से
ही कार्य करते हैं।
वक्तव्य—इसी आशय का एक पद्य च० सू० अ०
26.71 में है, किन्तु उसकी भाषा स्वतन्त्र है। आप निघण्टु
ग्रन्थों का अध्ययन करते समय इस विषय पर विशेष ध्यान
दें, कि जो-जो द्रव्य रस तथा गुण में समान होते हैं, उन-उन
में परस्पर समान वीर्य, विपाक तथा शक्ति (प्रभाव) नहीं
देखे जाते। यही स्थिति मणियों के प्रभाव की भी है।
ऋतु-भेद से दोषों का चय, कोप, शम
चयकोपशमा यस्मिन् दोषाणां सम्भवन्ति हि।
ऋतुषट्कं तदाख्यातं रवे राशिषु सङ्क्रमात्॥३९॥
जिसमें प्राकृतिक रूप से वात, पित्त, कफ दोषों का चय
(संचय), कोप (प्रकोप) तथा शम (शमन या उपशम)
होता है, उसे 'ऋतुषट्क' अर्थात् छः ऋतुओं का समूह कहते
हैं। यह एक वर्ष में सूर्य के मेष, वृष आदि बारह राशियों में
संक्रमण (गति) करने के कारण होता है।
राशियों के क्रम से छः ऋतुएँ
ग्रीष्मो मेषवृषौ प्रोक्तो प्रावृङ्मिथुनकर्कयोः।
सिंहकन्ये स्मृता वर्षास्तुलावृश्चिकयोः शरत्॥४०॥
धनुर्ग्राहौ च हेमन्तो वसन्तः कुम्भमीनयोः।
मेष तथा वृष राशि में जब सूर्य रहता है, तब ग्रीष्म ऋतु
होती है। मिथुन तथा कर्क राशि में जब सूर्य रहता है, तब
प्रावृट् ऋतु होती है। सिंह एवं कन्या राशि में जब सूर्य रहता
है, तब वर्षा ऋतु होती है। तुला और वृश्चिक राशि में जब सूर्य
रहता है, तब शरद् ऋतु होती है। धनुः तथा ग्राह (मकर)
राशि में जब सूर्य रहता है, तब हेमन्त ऋतु होती है और कुम्भ
तथा मीन राशि में जब सूर्य रहता है, तब वसन्त ऋतु होती है।
वक्तव्य—ऊपर जिस ऋतु-क्रम का वर्णन किया गया
है, वह आयुर्वेदीय दृष्टि से दोष-संशोधन के लिए कहा गया
है। इस विषय के विस्तृत विवेचन के लिए आप देखें—च०
सू० अ० 6.4-8 तथा सु० सू० अ० 6.6 एवं 10। लोक-
व्यवहार की दृष्टि से ऋतुओं का क्रम इस प्रकार है—
संशोधनार्थ ऋतुक्रम
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
|---|---|---|---|
| 1. | वैशाख, ज्येष्ठ | मेष, वृष | ग्रीष्म |
| 2. | आषाढ़, श्रावण | मिथुन, कर्क | प्रावृट् |
| 3. | भाद्रपद, आश्विन | सिंह, कन्या | वर्षा |
| 4. | कार्तिक, मार्गशीर्ष | तुला, वृश्चिक | शरत् |
| 5. | पौष, माघ | धनुः, मकर | हेमन्त |
| 6. | फाल्गुन, चैत्र | कुम्भ, मीन | वसन्त |
| व्यवहारार्थ ऋतुक्रम | |||
| क्रम | मास | राशि | ऋतु |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| 1. | चैत्र, वैशाख | मीन, मेष | वसन्त |
| 2. | ज्येष्ठ, आषाढ़ | वृष, मिथुन | ग्रीष्म |
| 3. | श्रावण, भाद्रपद | कर्क, सिंह | वर्षा |
| 4. | आश्विन, कार्तिक | कन्या, तुला | शरत् |
| 5. | मार्गशीर्ष, पौष | वृश्चिक, धनु | हेमन्त |
| 6. | माघ, फाल्गुन | मकर, कुम्भ | शिशिर |
| दोषों का चय, कोप, शम काल | |||
| ग्रीष्मे सञ्चीयते वायुः प्रावृट्काले प्रकुप्यति॥४१॥ | |||
| वर्षासु चीयते पित्तं शरत्काले प्रकुप्यति। | |||
| हेमन्ते चीयते श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति॥४२॥ | |||
| प्रायेण प्रशमं याति च्चयमेव समीरणः। | |||
| शरत्काले वसन्ते च पित्तं प्रावृड् ऋतौ कफः॥४३॥ | |||
| ग्रीष्म ऋतु (वैशाख, ज्येष्ठ) में वायु (वातदोष) का | |||
| संचय होता है और प्रावृट् ऋतु (आषाढ़, सावन) में उस | |||
| (वातदोष) का प्रकोप होता है, अर्थात् वह रोगकारक होता | |||
| है। वर्षा ऋतु (भाद्रपद, आश्विन) में पित्तदोष का संचय होता | |||
| है और शरद् ऋतु (कार्तिक, मार्गशीर्ष) में उस पित्तदोष का | |||
| प्रकोप होता है। हेमन्त ऋतु (पौष, माघ) में कफदोष का | |||
| संचय होता है और वह कफदोष वसन्त ऋतु (फाल्गुन, चैत्र) | |||
| में प्रकुपित होता है। प्रायः शरद् ऋतु में किसी प्रकार की | |||
| चिकित्सा किये बिना ही वातदोष की शान्ति हो जाती है। इसी | |||
| प्रकार वसन्त ऋतु में पित्तदोष और प्रावृड् ऋतु में कफदोष | |||
| भी शान्त हो जाते हैं। |