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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

द्वितीयोऽध्यायः] क्वथादिकल्पना 97

द्वितीयोऽध्यायः] क्वथादिकल्पना 97
शहद और मिश्री मिलाकर पीने से भीषण रक्तपित्त रोग, श्वास
तथा कास को नष्ट करता है। केवल अडूसा की पत्ती का
काढ़ा शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, क्षय, खाँसी और
कफपित्तज्वर को नष्ट करता है।
वासादि तथा क्षुद्रा क्वाथ
वासाक्षुद्रामृताक्वाथः क्षौद्रेण ज्वरकासहा।
कासघ्नः पिप्पलीचूर्णयुक्तः क्षुद्राशृतस्तथा।।80।।
अडूसा की पत्ती, भटकटैया तथा गिलोय का काढ़ा शहद
मिलाकर पीने से ज्वर और कास को हरता है। केवल भटकटैया
का काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीने से कास को नष्ट
करता है।
क्षुद्रादि क्वाथ
क्षुद्राकुलित्थवासाभिर्नागरेण च साधितः।
क्वाथः पुष्करचूर्णाढ्यः श्वासकासौ निवारयेत् ।। 81।।
भटकटैया, कुलथी, अडूसा की पत्ती तथा सोंठ का काढ़ा
पोहकरमूल के चूर्ण से युक्त पीने से श्वास तथा कास को
रोकता है।
रेणुकादि क्वाथ
रेणुकापिप्पलीक्वाथो हिङ्गुकल्केन संयुतः ।
पानादेव हि पञ्चापि हिक्का नाशयति क्षणात् ।। 82 ।।
सम्भालू के बीज तथा छोटी पीपल का काढ़ा हींग के
कल्क के साथ पीने से पाँच प्रकार की हिचकी को क्षण भर
में नष्ट करता है।
बिल्वत्वक् क्वाथ
बिल्वत्वचो गुडूच्या वा क्वाथः क्षौद्रेण संयुतः ।
जयेत् त्रिदोषजां छर्दिं पर्पटः पित्तजां तथा।। 83 ।।
बेल वृक्ष की छाल अथवा गिलोय का क्वाथ शहद
मिलाकर पीने से तीनों दोषों से उत्पन्न हुई कै को जीतता है
और पित्तपापड़ा का क्वाथ पित्त की कै को हरता है। ये
भिन्न-भिन्न द्रव्यों के तीन योग हैं।
गृध्रसीनाशक क्वाथ
हिङ्गुपुष्करचूर्णाढ्यं दशमूलशृतं जयेत्।
गृध्रसीं केवलः क्वाथः शेफालीपत्रजस्तथा।। 84।।
दशमूल का काढ़ा, हींग (घी में भुनी हुई) तथा पोहकरमूल
का चूर्ण डालकर पीने से अथवा सम्भालू के पत्तों का काढ़ा
हींग और पोहकरमूल का चूर्ण डालकर पीने से 'गृध्रसी'
(रिंगण) नामक वातरोग को जीतता है।
रास्नापञ्चक क्वाथ
रास्नामृतामहादारुनागरैरण्डजैः शृतम्।
सप्तधातुगते वाते सामे सर्वाङ्गजे पिबेत् ।।85।।
रास्ना, गिलोय, देवदारु, सोंठ और एरण्ड की जड़ का
काढ़ा रस, रक्त आदि सातों धातुओं में प्रविष्ट हुये वात तथा
आम से युक्त वायु (आमवात या गठिया) में पीना चाहिये।
रास्नासप्तक क्वाथ
रास्ना गोक्षुरकैरण्डदेवदारु पुनर्नवा।
गुडूच्यारग्वधैश्चैव क्वाथमेषां विपाचयेत् ।।86 ।।
शुण्ठीचूर्णेन संयुक्तं पिबेज्जङ्घाकटिग्रहे।
पार्श्वपृष्ठोरुपीडायामामवाते सुदुस्तरे ।। 87 ।।
रास्ना, गोखरू, एरण्ड की जड़, देवदारु, पुनर्नवा
(गदहपुन्ना), गिलोय और अमलतास की गुद्दी का यथाविधि
काढ़ा पकाये और सोंठ का चूर्ण मिलाकर निम्नलिखित रोगों
में सेवन करायें-जंघा (टाँग) और कमर की जकड़न में,
पसली, पीठ तथा ऊरु (रान) की पीड़ा में तथा कष्टसाध्य
आमवात (गठिया) में।
महारास्नादि क्वाथ
रास्ना द्विगुणभागा स्यादेकभागास्ततः परे।
धन्वयासबलैरण्डदेवदारुशठीवचाः ।। 88 ।।
वासको नागरं पथ्या चव्या मुस्ता पुनर्नवा।
गुडूची वृद्धदारुश्च शतपुष्पा च गोक्षुरः ।। 89 ।।
अश्वगन्धा प्रतिविषा कृतमालः शतावरी।
कृष्णा सहचरश्चैव धान्यकं बृहतीद्वयम् ।। 90 ।।
एभिः कृतं पिबेत् क्वाथं शुण्ठीचूर्णेन संयुतम्।
कृष्णाचूर्णेन वा योगराजगुग्गुलुनाथ वा ।। 91 ।।
अजमोदादिना वापि तैलेनैरण्डजेन वा।
सर्वाङ्गकम्पे कुब्जत्वे पक्षाघातेऽपबाहुके ।। 92 ।।
गृध्रस्यामामवाते च श्लीपदे चापतानके।
अन्त्रवृद्धौ तथाध्माने जङ्घाजानुगतेऽर्दिते ।। 93 ।।
शुक्लामये मेढ्ररोगे वन्ध्यायोनामयेषु च।
महारास्नादिराख्यातो ब्रह्मणा गर्भकारणम् ।। 94 ।।
रास्ना दो भाग और निम्नलिखित प्रत्येक द्रव्य एक
भाग-धमासा, वरियारा, एरण्ड की जड़, देवदारु, कचूर, वच,
अडूसा की पत्ती, सोंठ, बड़ी हरड़, चव्य, नागरमोथा, पुनर्नवा,
गिलोय, विधारा, सौंफ (सोया भी डाला जाता है), गोखरू,
असगन्ध, अतीस, अमलतास की गुद्दी, शतावर, पीपल,
कटसरैया (पीयावांसा), धनियाँ, बनभण्टा तथा
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

98 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
कण्टकारी-इनका क्वाथ सोंठ अथवा पीपल का चूर्ण मिलाकर
'योगराजगुगुल' (शा० म० खं० अ० 7) अथवा 'अजमोदादि
चूर्ण' (शा० म० खं० अ० 6) के साथ अथवा एरण्ड का
तैल (2 से 4 तोला तक) मिलाकर निम्नलिखित रोगों में
पीना चाहिये-सम्पूर्ण शरीर की कम्पवायु में, कुब्जवात
(कुबड़ापन) में, पक्षाघात (अर्द्धांग) में, अपबाहुक (बाँह
की जकड़न) में, गृध्रसी (रिंगण वात) में, आमवात (गठिया)
में, श्लीपद (फीलपाँव) में, अपतानक (हिस्टीरिया) में,
अन्त्रवृद्धि (आँत उतरने) तथा अण्डवृद्धि में, आध्मान
(अफरा) में, जंघा (टाँग) और जानु (घुटना) की पीड़ा में,
लकवा में, शुक्र के विकारों में, लिंग-रोगों (उपदंश आदि
तथा नपुंसकता या नस की दुर्बलता) में, बन्ध्या आदि योनि
या गर्भाशय के रोगों में। यह क्वाथ 'महारास्नादि' नाम से
प्रसिद्ध है। इसे ब्रह्मा ने गर्भ का कारण बतलाया है।
वक्तव्य-उक्त महारास्नादि क्वाथ की औषधियों के मान
के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत देखे जाते हैं-1. रास्ना दो
भाग (दो तोला) और सब द्रव्य मिलाकर एक भाग (एक
तोला) तथा 2. रास्ना दो भाग (दो तोला) और सब द्रव्य
एक-एक भाग (एक-एक तोला)। इनमें दूसरा मत ही अधिक
प्रचलित है।
'ब्रह्मणा गर्भकारणम्' कहने से प्रतीत होता है कि यह
योग सम्प्रति अनुपलब्ध 'ब्रह्मसंहिता' का है। सौभाग्य की
बात है कि यह परमोत्तम योग आज हमें उपलब्ध है, जिसका
हम प्रयोग कराकर जनता को लाभान्वित कर रहे हैं।
एरण्डादि क्वाथ
एरण्डो बीजपूरश्च गोक्षुरो बृहतीद्वयम्।
अश्मभेदस्तथा बिल्व एतन्मूलैः कृतः शृतः॥ ९५॥
एरण्डतैलहिङ्ग्वाढ्यः सयवक्षारसैन्धवः।
स्तनस्कन्धकटीमेढ्रहृदयोत्थां व्यथां जयेत्॥ ९६॥
एरण्ड की जड़, बिजौरा नींबू की जड़, गोखरू, बनभण्टा,
पाषाणभेद और बेल, इनकी जड़ों का काढ़ा, एरण्ड का तैल,
हींग (घी में भुनी हुई) और जौखार तथा सेंधा नमक मिलाकर
पीने से यह क्वाथ स्तन, कन्धे, कमर, लिङ्ग तथा हृदय की
पीड़ा को जीतता है।
नागरादि क्वाथ
नागरैरण्डजः क्वाथः क्वाथ इन्द्रयवस्य च।
हिङ्गुसौवर्चलोपेतो वातशूलनिवारणः॥ ९७॥
सोंठ तथा एरण्ड की जड़ क्वाथ चीनी और शहद मिलाकर
पीने से रक्त-पित्त को हरता है और दाह तथा पित्तशूल
(पित्त-जनित उदरशूल) को हटाता है।
त्रिफलादि क्वाथ
त्रिफलाऽऽरग्वधक्वाथः शर्कराक्षौद्रसंयुतः।
रक्तपित्तहरो दाहपित्तशूलनिवारणः॥ ९८॥
त्रिफला एवं अमलतास के क्वाथ में चीनी और मधु
मिलाकर पीने से रक्तपित्त रोग का विनाश करता है। यह दाह
तथा पित्तजनित उदरशूल को भी दूर करता है।
एरण्ड क्वाथ
एरण्डमूलं द्विपलं जलेऽष्टगुणिते पचेत्।
तत्क्वाथो यावशूकाढ्यः पार्श्वहृत् कफशूलहा॥ ९९॥
एरण्ड की जड़ दो पल (8 तोला) लेकर (जौकुट कर)
आठ गुने पानी में पकाये (चतुर्थांश शेष रहने पर उतार ले)।
यह काढ़ा जौखार मिलाकर पीने से पसली तथा हृदय के शूल
को तथा कफजनित शूल को नष्ट करता है।
दशमूल क्वाथ
दशमूलकृतः क्वाथः सयवक्षारसैन्धवः।
हृद्रोगगुल्मशूलानि कासं श्वासं च नाशयेत्॥ १००॥
दशमूल का काढ़ा जौखार तथा सेंधा नमक मिलाकर
पीने से हृदयरोग, गुल्म (वायुगोला), शूल, कास और श्वास
को नष्ट करता है।
हरीतक्यादि क्वाथ
हरीतकीदुरालभाकृतमालकगोक्षुरैः ।
पाषाणभेदसहितैः क्वाथो माक्षिकसंयुतः॥ १०१॥
विबन्धे मूत्रकृच्छ्रे च सदाहे सरुजे हितः।
बड़ी हरड़, धमासा, अमलतास, गोखरू तथा पाषाणभेद-
इन सबका क्वाथ शहद मिलाकर विबन्ध (मल तथा मूत्र की
रुकावट), दाह तथा पीड़ा से युक्त मूत्रकृच्छ्र में पीना चाहिये।
वीरतर्वादि क्वाथ
वीरतरुर्वृक्षवन्दा काशः सहचरत्रयम्॥ १०२॥
कुशद्वयं नलो गुन्द्रा बकपुष्पोऽग्निमन्थकः।
मूर्वा पाषाणभेदश्च स्योनाको गोक्षुरस्तथा॥ १०३॥
अपामार्गश्च कमलं ब्राह्मी चेति गणो वरः।
वीरतर्वादिरित्युक्तः शर्कराश्मरिकृच्छ्रहा॥ १०४॥
मूत्राघातं रुजं तीव्रां वाधुरोगाञ्नाशयेन्निखिलानपि।