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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 356 में से

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पृष्ठ 50

14 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे


में 'प्रायशश्चन्दनान्विताः' पाठ प्राप्त होता है, परन्तु इसका
एक पाठभेद है-'साध्या धवलचन्दनैः'। इस पाठ से
'सफेदचन्दन' की कामना तो पूर्ण हो जाती है, किन्तु 'प्रायः'
शब्द का गौरवपूर्ण भाव समाप्त हो जाता है ऐसा कुछ टीकाकारों
का मत है। इसके लिए उन्हें श्लोक के उत्तरार्ध में पठित प्रायः
शब्द का प्रयोग कर ही लेना चाहिये।

चूर्णादि में गुणहीनता का विचार
गुणहीनं भवेद् वर्षादूर्ध्वं तद्रूपमौषधम् ।। ५४ ।।
मासद्वयात् तथा चूर्णं हीनवीर्यत्वमाप्नुयात्।
हीनत्वं गुटिकालेहौ लभेते वत्सरात् परम् ।। ५५ ।।
हीनाः स्युर्घृततैलाद्याश्चतुर्मासाधिकात् तथा।
ओषध्यो लघुपाकाः स्युर्निर्वीर्या वत्सरात् परम् ।। ५६ ।।
पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः।

एक वर्ष के बाद प्रत्येक वानस्पतिक औषधद्रव्य जैसे
लाये थे, वैसे ही यदि पड़ा हो, तो वह गुणहीन हो जाता है,
अर्थात् वह अपने रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव से
रहित हो जाता है। तद्रूप का एक अर्थ यह भी है यदि उन काष्ठ
औषध द्रव्यों का वास्तविक रूप बदलकर किसी रासायनिक
योग के साथ प्रयोग कर लिया जाता है, तो उनके गुणों में
चिरस्थायिता आ जाती है। दो मास के बाद चूर्ण (पीसे हुये
काष्ठ द्रव्य) शक्तिहीन हो जाते हैं। एक वर्ष के पश्चात् गोली
तथा अवलेह के रूप में बनाकर रखे गये काष्ठ औषधद्रव्य
तथा एक वर्ष चार मास (अर्थात् 16 मास) के बाद काष्ठ
औषधों के योग से तैयार किये गये घी, तेल, तथा वसा आदि
हीनवीर्य हो जाते हैं। लघुपाकी (शीघ्र पक जाने वाले
औषधद्रव्य जैसे-बरसाती घास, आदि) औषधियाँ भी एक
वर्ष के बाद शक्ति रहित हो जाती हैं, किन्तु आसव, अरिष्ट,
तथा लोह आदि धातुओं की भस्में तथा रस (पारद-गन्धक
के योग से निर्मित) औषधयोग जितने अधिक पुराने होते हैं,
उतने अधिक गुणवान् होते जाते हैं।

वक्तव्य-जहाँ जिन द्रव्यों की गुणहीनता की जो अवधि
कहीं गयी है, वह प्रयोगात्मक दृष्टि से क्रमशः अपने गुण,
वीर्य आदि से हीन होती देखी जाती है। 'चतुर्मासाधिकात्
तथा'
-यद्यपि प्रसंगानुसार इसका अर्थ सोलह मास से अधिक
होता है, किन्तु कुछ विद्वान् इसका अर्थ 'वर्षाऋतु के चार
मास बीतने पर' ऐसा अर्थ करते हैं। व्याकरण की दृष्टि से यह
अर्थ प्राप्त नहीं होता है, परन्तु चूर्ण आदि बनाने के बाद बीच
में जब भी वर्षा ऋतु आ जाती है, उसका दुष्प्रभाव तो पड़ता
ही है। घी, तेल के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत प्राप्त होते हैं।
तो भी ताजा घी का प्रयोग करने का जहाँ निर्देश है, वहाँ
सालभर के भीतर का ही लेना चाहिये। पुराने घी की जहाँ
प्रशंसा है, उसका वर्णन हम यथास्थान करेंगे। तेल पुराने
अच्छे माने जाते हैं। जौ, गेहूँ, तिल, तथा माष आदि अन्न नये
ही लिये जाते हैं। कहीं-कहीं इनको पुराना ग्रहण करने की भी
चर्चा है। आसव-अरिष्ट पुराने होने पर उनकी मादकता क्रमशः
कम हो जाती है और लाभ की दृष्टि से उनमें कमी नहीं आती
है। अतएव उन्हें अच्छा कहा गया है। विशेष-देखें-सु० सू०
अ० ३६ सम्पूर्ण।

गुणहीनता का निर्णय
(विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः ।। ५७ ।।
नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेव विनिर्दिशेत्।)

जिस औषधद्रव्य में दुर्गन्ध (द्रव्य की स्वाभाविक गन्ध
से विपरीत गन्ध) उत्पन्न न हुई हो, जिसके अपने स्वाभाविक
रस, गुण आदि नष्ट न हो गये हों, वह द्रव्य यदि नया हो
अथवा पुराना ही हो, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये।

वक्तव्य-उक्त पद्य (सु० सू० अ० 36.15) में नये तथा
पुराने द्रव्यों के ग्रहण के सम्बन्ध में यह तो बतलाया गया है
कि वे द्रव्य कैसे होने चाहिये, किन्तु यह नहीं कहा गया है,
कि किन द्रव्यों को नया लें और किन द्रव्यों को पुराना।
इसका विचार महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार किया है-'चिकित्सा
के लिए सभी नये द्रव्यों का ही प्रयोग करना चाहिये। केवल
मधु, घी, गुड़, पिप्पली और वायविडंग को एक वर्ष पुराना
लेना चाहिये।' इस प्रसंग में कुछ टीकाकारों का मत है, कि
'धनियाँ' भी पुराना ही लेना चाहिये, किन्तु लोकव्यवहार में
ये सभी द्रव्य नये ही लिये जाते हैं। देखें-सु० सू० अ०
36.8-9।

भेषज-भण्डार
(प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् ।। ५८ ।।
प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते।)

प्लोत (साफ-सुथरे वस्त्रों के टुकड़े), मिट्टी के पात्र,
फलक (लकड़ी की पट्टियाँ), तथा शंकु (नुकीली कील)
आदि में औषध द्रव्यों को जहाँ सुरक्षित रखते हैं, उसे
औषध-भंडारगृह कहते हैं। इस भंडारगृह को पूर्व दिशा की
ओर पवित्र स्थान पर बनवाना चाहिये।