शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
214 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
214 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
(पाचनसंस्थान की गति में रुकावट) को उत्पन्न करके पचे,
उसे उष्ण जल द्वारा वमन (कै) करवा देनी चाहिये।
स्नेहानीर्ण का उपचार
स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः ।। २३ ।।
तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिरतथा ।
यदि स्नेह के अजीर्ण की शंका हो तो उष्ण (गर्म) जल
पीना चाहिये। इससे अजीर्ण शान्त होकर उद्गार (डकार)
शुद्ध निकलता है तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाती है।
स्नेहपान-जनित तृष्णा-चिकित्सा
स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः ।। २४ ।।
तदास्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य वामयेत् ।
शीतं जलं पाययेच्च पिपासा तेन शाम्यति ।। २५ ।।
पित्त प्रधान मनुष्य की अग्नि जब स्नेहपान के कारण
तीक्ष्ण हो जाती है, तो वह (अग्नि) तृष्णा (प्यास) को बढ़ा
देती है, जो अत्यन्त भीषण होती है। ऐसे रोगी को वमन
कराना चाहिये और शीतल जल पिलाना चाहिये, इससे पिपासा
(तृष्णा) शान्त हो जाता है।
वक्तव्य-महर्षि सुश्रुत के अनुसार इस स्थिति में भी
उष्णजल पिलाकर वमन कराना चाहिये। देखें-सु० चि० अ०
21 श्लोक 24।
स्नेहपान से हानि
(स्नेहपानाद् भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः।
गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिद्ध्यन्त्यथवा पुनः ।। २६ ।।)
जिन लोगों को स्नेहपान करने से नाना प्रकार के रोग
उत्पन्न हो जाते हैं, उनके साध्य रोग भी कष्टसाध्य अथवा
असाध्य हो जाते हैं।
स्नेहपान के अयोग्य रोगी
अजीर्णी वर्जयेत् स्नेहमुदरी तरुणज्वरी।
दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः ।। २७ ।।
दत्तवस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः।
अकालप्रस्रवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।। २८ ।।
अजीर्ण (अपच) का रोगी, उदररोग से पीड़ित, तरुणज्वर
(आमज्वर) से पीड़ित, दुर्बल, अरुचि से युक्त, स्थूल
(मेदस्वी), मूर्च्छा से पीड़ित, मदात्यय (मद्य-विकारों) से
पीड़ित, जिसे वस्ति दी गयी हो, जिसे विरेचन कराया गया
हो, जिसे वमन कराया गया हो, प्यास तथा परिश्रम से युक्त
और अकालप्रस्रवा (जिसे अकाल में गर्भस्राव अथवा गर्भपात
हो गया हो), ऐसी स्त्री भी स्नेहपान न करें और दुर्दिन (जिस
दिन बादल छाये हों), में भी स्नेहपान करना उचित नहीं है।
वक्तव्य-थके हुये मनुष्य के लिए स्नेह का निषेध
विचारणीय है, जबकि स्थान-स्थान पर मनुष्य को स्नेहपान
का विधान किया गया है। उक्त पाठ सुश्रुत का है, किन्तु चरक
सू० अ० 13 में थके हुये मनुष्य को स्नेहपान का निषेध नहीं
किया है और स्नेहपान के अयोग्य मनुष्यों में-वे मनुष्य गिनाये
गये हैं, जिनकी द्रव धातु अत्यन्त क्षीण हो गयी हो। देखें-
'अतिप्रतान्तोऽतिक्षीणद्रवधातुः'-इति चक्रपाणिः।
स्नेहपान के योग्य रोगी
स्वेद्यसंशोध्यमद्यस्त्रीव्यायाम्यासक्तमानसाः ।
वृद्धा बालाः कृशा रूक्षाः क्षीणास्राः क्षीणरेतसः ।। २९ ।।
वातार्तास्तिमिरार्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम्।
जिनको स्वेदन तथा संशोधन कराने की आवश्यकता
हो, मादक द्रव्यों, स्त्री-सहवास तथा व्यायाम में जिनका मन
आसक्त हो, बूढ़े, बालक, कृश, रूक्ष तथा जिनका रक्त क्षीण
हो गया हो, जिनका शुक्रक्षीण हो गया हो, जो वातव्याधि तथा
तिमिर (रतौंधी) रोग से पीड़ित हों, उनको स्नेहन कराना
उत्तम होता है।
स्निग्ध तथा रूक्ष के लक्षण
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ।। ३० ।।
मृदुस्निग्धाङ्गता ग्लानिः स्नेहोद्वेगोऽथ लाघवम्।
विमलेन्द्रियता सम्यक् स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।। ३१ ।।
वायु का अनुलोम हो जाना, जठराग्नि का प्रदीप्त हो
जाना, पुरीष (मल) का चिकना तथा गाँठरहित हो जाना,
शरीर का कोमल तथा चिकना हो जाना, ग्लानि, स्नेह के प्रति
अरुचि, शरीर में लघुता (हल्का या फुर्तीलापन) और इन्द्रियों
की निर्मलता, ये 'सम्यक्-स्निग्ध' (जिसको उचित स्नेहन
हो गया हो) के लक्षण हैं और रूक्ष मनुष्य में इनके विपरीत
लक्षण होते हैं।
अतिस्निग्ध के लक्षण
भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुदे दाहः प्रवाहिका।
तन्द्रातिसारः पाण्डुत्वं भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।। ३२ ।।
भोजन में अरुचि, मुखस्राव, गुद में दाह, प्रवाहिका
(पेचिश), तन्द्रा, अतिसार तथा पाण्डु-रोग ये 'अत्यन्त स्निग्ध'
के लक्षण हैं।
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प्रथमोऽध्यायः ] स्नेहपानविधिः 215
वक्तव्य-ये लक्षण प्रायः स्नेह-प्रयोग की अधिकता से
उत्पन्न हो जाते हैं।
रूक्ष तथा अतिस्निग्ध का उपचार
रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम्।
रूक्ष मनुष्य को स्नेहों द्वारा स्नेहन अतिस्निग्ध को द्रव्यों
द्वारा रूक्षण कराना चाहिये।
रूक्षण द्रव्य
श्यामाकचणकाद्यैश्च तक्रपिण्याकसक्तुभिः ।। ३३ ।।
अतिस्निग्ध मनुष्य को श्यामाक (सवाँ) के चावल तथा
चना आदि (चना भुना हुआ होना चाहिये) से अथवा मट्ठा या
लस्सी, खली तथा सत्तुओं को आहार-काल में खिलाकर
रूक्षण करना चाहिये।
स्नेह-सेवन का फल
दीप्ताग्निः शुद्धकोष्ठश्च पुष्टधातुर्दृढेन्द्रियः।
निर्जरो बलवर्णाढ्यः स्नेहसेवी भवेन्नरः ।। ३४ ।।
स्नेह का सेवन करने वाले मनुष्य का अग्नि दीप्त हो
जाती है, कोष्ठ शुद्ध हो जाता है, धातुयें पुष्ट हो जाती हैं इन्द्रियाँ
दृढ़ या बलवान् हो जाती हैं, बुढ़ापा शीघ्र नहीं आता और वह
पुरुष सदैव बल तथा वर्ण से युक्त रहता है।
स्नेह-सेवन में त्याज्य
स्नेहे व्यायामसंशीतवेगाघातप्रजागरणम्।
दिवास्वप्नमभिष्यन्दि रूक्षान्नं च विवर्जयेत् ।। ३५ ।।
इति श्रीदामोदारसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे स्नेहपानविधिः नाम
प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
स्नेहपान करते समय तथा उसके कुछ दिन बाद तक
व्यायाम, शीतल स्थान, पान, भोजन, तथा मलमूत्रादि के वेगों
का निरोध रात्रि में जागना, दिन में सोना और अभिष्यन्दि
पदार्थ तथा रूक्ष अन्न को त्याग देना चाहिये।
वक्तव्य-स्नेहपान के सम्बन्ध में विशेष जानकारी के
लिए चरक सू० अ० 13 तथा सु० चि० अ० 31 का अवलोकन
करें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।
यहाँ पृष्ठ पर दी गई सामग्री का अक्षरशः लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:
द्वितीयोऽध्यायः
स्वेदविधिः
[बायाँ स्तम्भ]
स्वेद की संख्या और गुण
स्वेदश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तापोष्मस्वेदसञ्ज्ञकौ।
उपनाहो द्रवः स्वेदः सर्वे वातार्तिहारिणः।। 1 ।।
स्वेदौ तापोष्मजौ प्रायः श्लेष्मघ्नौ समुदीरितौ।
उपनाहस्तु वातघ्नः पित्तसङ्गे द्रवो हितः ।। 2 ।।
स्वेद चार प्रकार का कहा गया है-1. ताप, 2. ऊष्म, 3.
उपनाह तथा 4. द्रव। ये सभी स्वेद वातजनित व्याधियों को
नष्ट करते हैं। ताप तथा ऊष्म नामक स्वेद प्रायः कफरोगनाशक
माने जाते हैं, उपनाह स्वेद वातनाशक होता है और यदि
वातकफ के साथ पित्त का संयोग हो तो द्रवस्वेद लाभदायक
होता है।
वक्तव्य-प्रथम अध्याय में स्नेहविधि का वर्णन किया
जा चुका है उसके बाद अब यहाँ से स्वेदविधि का निरूपण
किया जा रहा है। उक्त स्वेदों का विशेष विवरण इसी अध्याय
में आगे दिया गया है। वात-कफ के रोगों में ही स्वेदन
उपयुक्त होता है, पित्त-विकारों में तो स्वेदन किया ही नहीं
जाता।
स्वेद के भेद तथा प्रयोग
महाबले महाव्याधौ शीते स्वेदो महान् स्मृतः।
दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्ये मध्यतमो मतः ।। 3 ।।
यदि बलवान् मनुष्य को बलवान् रोग शीतकाल में हो
जाये तो अधिक से अधिक स्वेद किया जा सकता है। दुर्बल
मनुष्य को दुर्बल रोग हो तो थोड़ा स्वेद कराना चाहिये और
मध्यम श्रेणी तथा मध्यम बल वाले पुरुष को मध्यम (न
बहुत थोड़ा न बहुत अधिक) स्वेद कराना उचित है।
दोष भेद से स्वेद के भेद
बलासे रूक्षणस्वेदो रूक्षस्निग्धः कफानिले।
कफमेदोवृते वाते कीष्णं प्रावरणाह्वयः।। 4 ।।
[दायाँ स्तम्भ]
नियुद्धं मार्गगमनं गुरुप्रावरणं क्षुधः।
चिन्ताव्यायामभारांश्च सेवेतामयनुक्तये ।। 5 ।।
कफ के रोगों में रूक्षता करने वाले द्रव्यों द्वारा स्वेद
कराना चाहिये, कफ-वात के रोगों में रूक्ष तथा स्निग्ध द्रव्यों
द्वारा स्वेदन कराना चाहिये। कफ तथा मेदा से आवृत वायु में
कुछ उष्ण घर, सूर्य की किरणें, नियुद्ध (कुश्ती), मार्ग में
चलना, भारी वस्त्र ओढ़ना, भूख, चिन्ता, व्यायाम तथा भार
उठाना-रोग से मुक्ति पाने के लिए इनका सेवन करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त विधियों से स्वेदन होता है। फलतः
स्वेदसाध्य रोगों से छुटकारा मिल जाता है। मेदस्वी मनुष्य
उक्त चतुर्विध स्वेद को सहन नहीं कर सकता। अतः उसे
साधारण स्वेदन का विधान किया गया है।
पूर्व स्वेदनीय रोगी
येषां नस्य विधातव्यं वस्तिश्चापि हि देहिनाम्।
शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्वं स्वेद्याश्च ते मताः ।। 6 ।।
जिन मनुष्यों को नस्य का विधान करना हो, वस्तिकर्म
करना हो अथवा जो शोधन (वमन-विरेचन) के योग्य हों,
उनको पहले स्वेदन कराना उचित होता है।
वक्तव्य-स्वेदन कराने के पश्चात् ही नस्य, वस्ति तथा
शोधन का प्रयोग कराया जाता है।
पश्चात् स्वेदनीय रोगी
पश्चात्स्वेद्या गते शल्ये मूढगर्भंगदे तथा।
काले प्रजाताऽकाले वा पश्चात्स्वेद्या नितम्बिनी ।। 7 ।।
निम्नलिखित रोगियों को बाद में स्वेदन कराना
चाहिये-शल्य को निकाल देने के बाद उस स्थान पर, मूढगर्भ
रोग में गर्भशल्य को निकाल लेने पर और समय पर प्रसव
होने के बाद अथवा असमय पर प्रसव होने के बाद केवल
प्रसूता स्त्री को...
द्वितीयोऽध्यायः] स्वेदविधिः 217
वक्तव्य-काँटा निकल जाने पर वहाँ कपड़े द्वारा मुख
की भाप का स्वेद दिया जाता है। प्रसव होने के बाद प्रसूता
को उष्णजल से स्नान कराया जाता है तथा उसकी कमर के
पास खटिया के नीचे आग रखी जाती है ये सब स्वेदन के ही
प्रकार हैं। काले-अकाले-काल में अर्थात् नवें, दसवें मास
में और अकाल में नवें मास के पहले जिसे गर्भस्राव या
गर्भपात कहते हैं, उसमें।
उभयविध स्वेदनीय रोगी
स्वेद्याः पूर्वं च पश्चात् च भगन्दर्यर्शसस्तथा।
अश्मर्य्यश्रातुरो जन्तुः शेषान् शास्त्रे प्रचक्ष्महे ।। 8 ।।
भगन्दर, बवासीर तथा अश्मरी (पथरी) के रोगियों को
चिकित्सा कर्म के पूर्व और पश्चात् भी स्वेदन कराना चाहिये।
अवशिष्ट रोगियों के लिए हम शास्त्र में यथास्थान कहेंगे।
वक्तव्य-उक्त 6-7-8 श्लोक सु० चि० अ० 32 से
लिये गये हैं।
स्वेद की व्यवस्था
सर्वान् स्वेदान्निवाते च जीर्णाहारे च कारयेत्।
सभी प्रकार के स्वेदों का प्रयोग निर्वात (जहाँ सीधे हवा
प्रवेश न कर सकती हो ऐसे) स्थान में भोजन के पच जाने
पर करना चाहिये।
स्वेद का फल
स्वेदाद् धातुस्थिता दोषाः स्नेहक्लिन्नस्य देहिनः ।। 9 ।।
द्रवत्वं प्राप्य कोष्ठान्तर्गत्वा यान्ति विरेकताम्।
स्नेहन-क्रिया द्वारा स्निग्ध शरीर वाले मनुष्यों को स्वेदन
क्रिया कराने से उनकी धातुओं में रहने वाले आम आदि दोष
पतले होकर तथा कोष्ठ में आकर विरेचन द्वारा बाहर निकल
जाते हैं।
वक्तव्य-पहले स्नेहन, फिर स्वेदन, तत्पश्चात् विरेचन
कराने से आम (आँव) निकल जाता है।
स्वेदन-काल में रोगी की रक्षा
स्विद्यमानशरीरस्य हृदयं शीतलैः स्पृशे ।। 10 ।।
स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी।
जिस समय रोगी के सम्पूर्ण शरीर को स्वेदन किया जा
रहा हो, उस समय उसके हृदय को शीतल द्रव्यों (वट तथा
पीपल आदि के पत्तों) का स्पर्श कराना चाहिये और इस रोगी
के शरीर पर स्वेदन के पूर्व) स्नेह (नारायण तैल आदि) की
मालिश करा देनी चाहिये और स्वेदन के समय रोगी के नेत्रों
को शीतल द्रव्यों से ढाँक देना चाहिये।
वक्तव्य-विशेष विवेचन के लिए देखें-च० सू० अ०
14 श्लोक 12।
स्वेद के अयोग्य रोगी
अजीर्णी दुर्बलो मेही क्षतक्षीणः पिपासितः ।। 11 ।।
अतिसारी रक्तपित्ती पाण्डुरोगी तथोदरी।
मदार्तो गर्भिणी चैव नहि स्वेद्या विजानता ।। 12 ।।
एतानपि मृदुस्वेदैः स्वेदसाध्यानुपाचरेत्।
अजीर्ण (अनपच) का रोगी, दुर्बल, प्रमेह से पीड़ित,
उरःक्षत से पीड़ित, क्षीण (जिसके धातुओं का क्षय हो गया
हो), तृष्णा का रोगी (प्यासा), अतिसार से पीड़ित, रक्तपित्त,
पाण्डु रोग तथा उदररोग के रोगी मद्य के विकारों से पीड़ित
तथा गर्भवती स्त्री-इन सबकी विद्वान् चिकित्सक स्वेदन क्रिया
न करें। इन रोगियों को भी यदि स्वेदसाध्य रोग हों तो मृदु
(साधारण) स्वेदों द्वारा उपचार करें।
वक्तव्य-यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता आदि ग्रन्थों के साहित्य
का संग्रह अथवा सम्पादन प्राचीन संहिताग्रन्थों के सहारे ही
किया गया है, तथापि सैद्धान्तिक विषयों के निर्णय के लिए
आप भी उन आधारभूत ग्रन्थों का अवलोकन अवश्य कर लें,
क्योंकि आपके वचनों पर समाज श्रद्धा करता है और आप पर
विश्वास करता है। अतः आप कोई बात ऐसी न कह बैठें, जो
शास्त्र विरुद्ध हो। इसी दृष्टि से जिन्हें अस्वेदनीय कहा गया है,
उन पर भी विचार करें, क्या उक्त श्लोकों में परिगणित सभी
रोगी उस योग्य हैं?
मृदुस्वेद के स्थान
मृदुस्वेदं प्रयुञ्जीत तथा हृन्मुष्कदृष्टिषु ।। 13 ।।
हृदय, मुष्क (अण्डकोश) तथा नेत्रों पर मृदु स्वेद का
प्रयोग करना चाहिये।
अतिस्वेद के उपद्रव
अतिस्वेदात् सन्धिपीडा दाहस्तृष्णा क्लमो भ्रमः।
पित्तासृक्पिडकाकोपस्तत्र शीतैरूपाचरेत् ।। 14 ।।
अधिक स्वेदन हो जाने से सन्धियों में पीड़ा, दाह, तृष्णा,
सुस्ती, भ्रम (घुमटा), पित्त, रक्त का प्रकोप तथा पिड़काओं
(फुन्सियों) की उत्पत्ति हो जाती है। ऐसी दशा में शीतल
द्रव्यों से उपचार करना चाहिये।