शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 356 में से
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तथा पाचनशक्ति), वय (बालक, युवा तथा वृद्ध), बल
(शारीरिक तथा मानसिक), प्रकृति (स्वभाव), दोष (वात,
पित्त तथा कफ) तथा देश (आनूप, जांगल तथा साधारण)
को देखकर मात्रा की कल्पना (निर्धारण) करनी चाहिये।
वक्तव्य—मात्रा-निर्धारण करने के लिए संहिताकार ने
जिन मानकों का विचार करने का संकेत किया है, ये सब
विचार औषध मात्रा तथा आहार मात्रा के लिए ही हैं। एक
बात इस प्रसंग में और भी विचारणीय है—औषध-निर्माणकाल
में जिस द्रव्य का परिगणन एक ही योग में दो बार हो जाता है,
उस द्रव्य को दूना ले लिया जाता है किन्तु जब चिकित्सक
किसी रोगी के लिए अनेक योगों को मिलाकर एक योग की
कल्पना करता है, उस समय भी उसे यह विचार कर लेना
चाहिये कि उक्त योगों में कौन-कौन से द्रव्य समान हैं और
इन्हें परस्पर मिला देने से वे-वे द्रव्य कहीं आवश्यकता से
दूने, तिगुने तो नहीं हो गये हैं? इस ओर भी चिकित्सक को
अवश्य ध्यान देना चाहिये, क्योंकि यह भी मात्रा-निर्धारण
क्षेत्र का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
कालिंग-मान
यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ ।। ३८ ।।
अतस्तु मात्रा तद् योग्या प्रोच्यते सुज्ञसम्मता।
क्योंकि कलियुग में मनुष्य मन्दाग्नि (पाचन शक्ति की
कमी) वाले, ह्रस्व (छोटे कद वाले) और हीनसत्त्व (थोड़ी
मानसिक शक्ति) वाले होते हैं। इसलिये औषध तथा आहार
द्रव्यों की वही मात्रा उनके सेवन करने योग्य होती है, जिसे
विद्वान् चिकित्सक तत्काल बतलाते हैं।
वक्तव्य—प्राचीन आयुर्वेदीय संहिताएँ जिस समय लिखी
गयी हैं उसी समय के पुरुषों की क्षमता के अनुसार सामान्य
मात्राओं का निर्देश किया गया है। जैसे-शिलाजीत का प्रयोग
करने की मात्रा आचार्य पुनर्वसु ने बतलायी है-'पलमधर्धपलं
कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता'।- च० चि० अ० 1.3.55। इसका
विशेष व्याख्यान 'चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन' से प्रकाशित
चरक संहिता में देखें। आज सामान्य मानव के लिए पल=4
तोला, अर्धपल=2 तोला और कर्ष=1 तोला की मात्रा
व्यावहारिक नहीं है। शास्त्रज्ञ तथा कर्माभ्यास-निपुण
चिकित्सक मात्रा-निर्धारण में स्वयं चतुर होते हैं।
यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः ।। ३९ ।।
यवद्वयेन गुञ्जा स्यात् त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते।
माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत् क्वचित् ।। ४० ।।
स्याच्चतुर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च।
गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद् दशमाषकः ।। ४१ ।।
चतुष्कर्षैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः।
चतुष्पलैश्च कुडवं प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः ।। ४२ ।।
बारह गौरसर्षपों (पीली सरसों) का एक 'जौ' होता है,
ऐसा कालिंग देश के विद्वान् कहते हैं। दो 'जौ' की एक
'गुञ्जा' (रत्ती) होती है, तीन गुञ्जा (रत्ती) का एक 'वल्ल'
होता है और गुञ्जा का अथवा कहीं-कहीं सात गुञ्जा का एक
'माशा' होता है। चार 'माशा' का एक 'शाण' होता है, उसी
को 'निष्क' तथा 'टंक' भी कहते हैं। छः 'माशा' का एक
'गद्याण' होता है और दस माशा का एक 'कर्ष' होता है। चार
'कर्ष' का एक 'पल' होता है, वह दस 'शाण' के बराबर
होता है। चार 'पल' का एक 'कुडव' होता है। प्रस्थ, आढक
आदि शेष सभी मान मागधमान के समान ही होते हैं।
वक्तव्य—यह 'कालिंगमान' है। इसमें दो मानों का नाम
'मागधमान' से अधिक दिया है। वे मान हैं-वल्ल और
गद्याण। इनका परिमाण ऊपर दिया जा चुका है। इस
'कालिंगमान' के अनुसार कर्ष (तोला) 10 माशा का स्वीकार
किया गया है और यह 10 माशा 70 या 80 रत्ती का होता है,
जब कि मागधमान में 1 कर्ष=12 माशा=96 रत्ती का माना
जाता है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से मागधमान ज्येष्ठ एवं
श्रेष्ठ है, जैसा कि अगले पद्य में कहा गया है। आचार्य शार्ङ्गधर
ने अन्यत्र मागधमान को मान्यता दी है, केवल 'चन्द्रप्रभावटी'
के निर्माण में उन्होंने मागधमान को महत्त्व दिया है। देखें-शा०
सं० म० खं० अ० 7। तदनुसार 4 शाण का 1 कर्ष होता है।
शेष विवेचन 'चन्द्रप्रभावटी' के वक्तव्य में देखें।
द्विविध-मान
कालिङ्गं मागधं चैव द्विविधं मानमुच्यते।
कालिङ्गान्मागधं श्रेष्ठं मानं मानविदो विदुः ।। ४३ ।।
इति मान परिभाषा।
मान दो प्रकार के कहे जाते हैं—1. कालिंग (उड़ीसा
प्रदेश के विद्वानों द्वारा स्वीकृत) मान तथा 2. मागध
(बिहारप्रान्तीय) मान। मान-विषय-विशेषज्ञ विद्वान्
कालिंगमान की तुलना में मागधमान को श्रेष्ठ (मात्रा में बड़ा)
मानते हैं।
वक्तव्य—श्रेष्ठ शब्द का तात्पर्य यहाँ यह है कि जिस मान