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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

48 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:


[शीर्षक / Header]
48 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः ।। 90 ।।
प्रीणयन् देहमखिलं जीवयञ्जठरानलम् ।
नाभि (पक्वाशय तथा आमाशय के बीच) में रहने वाली
प्राणवायु हृदय के भीतरी भाग को स्पर्श करती हुई कण्ठ या
श्वास मार्ग से बाहर विष्णुपद (आकाश) के अमृत का पान
करने के लिए निकलती है और आकाश के अमृत (प्राणवायु)
को पीकर शीघ्र ही फिर शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। इस
प्रकार जीवन भर सम्पूर्ण शरीर को तृप्त तथा प्रसन्न कर
जठराग्नि को प्रदीप्त करती रहती है।
वक्तव्य—प्राणवायु नाभि से चलकर हृदय, फुप्फुस और
कण्ठ से होता हुआ श्वास के रूप में बाहर निकलता है और
आकाश में सदैव व्याप्त रहने वाले अमृत को पीकर फिर
प्रश्वास के रूप में शरीर में चला जाता है। यह क्रिया जीवनभर
निरन्तर होती रहती है। इस श्वास-प्रश्वास क्रिया से प्राणी
प्रसन्न रहता है और अग्नि दीप्त होती है, क्योंकि 'एषः ह वा
अग्नेर्योनिः यः प्राणः' (जाबालोपनिषद्) अर्थात् यह प्राण ही
अग्नि या जठराग्नि की योनि (कारण) है।

जीवन-मरण परिभाषा
शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते ।। 91 ।।
कालेन तद्वियोगाच्च पञ्चत्वं कथ्यते बुधैः ।
उपर्युक्त प्रकार से शरीर तथा प्राणवायु के संयोग को
आयुः या जीवन कहा जाता है। काल या समय से उन (शरीर
और प्राण) का वियोग होने से विद्वान् लोग उसे 'पञ्चत्व'
('मृत्यु') कहते हैं।
वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि जितने समय तक शरीर
और प्राण का संयोग या मेल रहता है, उतने समय का नाम
'आयु' है। जब शरीर से सदा के लिए प्राणवायु निकल जाता
है, तो 'मृत्यु' हो जाती है।

रोग-निवृत्ति का महत्त्व
न जन्तुः कश्चिदमरः पृथिव्यां जायते क्वचित् ।। 92 ।।
अतो मृत्युरवार्यः स्यात् किन्तु रोगान्निवारयेत् ।
इस संसार में कहीं भी कोई प्राणी अमर (न मरने वाला)
नहीं उत्पन्न होता। मृत्यु तो अवश्यंभावी है। इसलिये रोगों का
निवारण अवश्य करना चाहिये।
वक्तव्य—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' (गीता)। रोगों की
चिकित्सा करके अकाल मृत्यु रोकी जाती है, क्योंकि रोगों के
कारण प्राणी अकाल में ही मर जाते हैं (सं० वि० अ० 3 तथा


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

च० शा० अ० 6)। तात्पर्य यह है कि सौ वर्ष के भीतर यदि
कोई मरता है, तो अकाल में मरता है, क्योंकि 'शतायुर्वे
पुरुषः, इति श्रुतिः'।

चिकित्सा का महत्त्व
याप्यत्वं याति साध्यस्तु याप्यो गच्छत्यसाध्यताम् ।। 93 ।।
जीवितं हन्त्यसाध्यस्तु नरस्याऽप्रतिकारिणः ।
जो मनुष्य उचित समय पर अपने रोग की चिकित्सा
नहीं करवाता है, उसका साध्य (चिकित्सा से दूर हो जाने
योग्य) रोग याप्य (जो रोग चिकित्सा करते समय दवा रहता
है) हो जाता है और याप्य रोग असाध्य हो जाता है तथा
असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देता है।
वक्तव्य—जहाँ तक हो सके शीघ्र ही रोग की चिकित्सा
करा लेनी चाहिये।

रोगनिवारण-निर्देश
धर्मार्थकाममोक्षाणां शरीरं साधनं यतः ।। 94 ।।
अतो रुग्ण्यस्तनुं रक्षेन्नरः कर्मविपाकवित् ।
क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन (प्राप्ति
का उपाय) शरीर ही है। इसलिये कर्म के परिणाम को जानने
वाला मनुष्य रोगों से अपने शरीर की रक्षा करे।
वक्तव्य—जब तक मनुष्य स्वस्थ या नीरोग है, तभी तक
वह उक्त चारों पदार्थों की प्राप्ति कर सकता है। अन्यथा
कर्मण्य भी अकर्मण्य होकर पड़ा रहता है और कष्ट भोगता
रहता है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह
सर्वतोभावेन शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग बनाये रखें।

समदोष का महत्त्व
धातवस्तन्मला दोषा नाशयन्त्यसमास्तनुम् ।। 95 ।।
समाः सुखाय विज्ञेया बलायोपचयाय च ।
रस, रक्त आदि धातुओं उनके मल और वात आदि दोष
जब विषम (विकृत) हो जाते हैं, तो शरीर को रुग्ण या नष्ट
कर देते हैं। जब वे सम (प्रकृतिस्थ या अविकृत) रहते हैं, तो
सुख, बल और पुष्टि के कारण होते हैं।
वक्तव्य—'दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्'। (सु० सू० अ०
15) अर्थात् दोष (वातादि), धातु (रसादि), एवं मल ये
शरीर के कारण हैं। जब ये सभी प्रकृतिस्थ रहते हैं, तो शरीर
सुखी रहता है, अन्यथा रोगी हो जाता है अथवा मृत्यु हो जाती
है।

पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 49
स्वस्थ की परिभाषा
( समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः ।। ९६ ।।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ।
एषां समत्वं यच्चापि भिषग्भिरवधार्यते ।। ९७ ।।
न तत्स्वास्थ्यादृते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना ।
दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्षयेत् ।। ९८ ।।
अप्रसन्नेन्द्रियं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ।)
जिस प्राणी के दोष (अर्थात् पाँच प्रकार का वात, पाँच प्रकार का पित्त तथा पाँच प्रकार का कफ) सम हों, अग्नि (जठराग्नि या पाचनशक्ति) सम हो तथा धातु (रसादि सातों धातुएँ), मल (मल, मूत्र तथा स्वेद आदि) तथा क्रिया (सोना, जागना आदि) सम हों, आत्मा, सभी इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों, वह स्वस्थ कहा जाता है। चिकित्सक वर्ग इन दोष, धातु एवं मला की जिस 'समता' का निश्चय करता है, वह (समता) प्राणी की 'स्वस्थता' या नीरोगता के बिना और किसी भी कारण से नहीं कही जा सकती, अर्थात् प्राणी को स्वस्थ या प्रसन्न देखकर उसके दोष, धातु एवं मल 'सम' समझ लिये जाते हैं। कुशल चिकित्सक किसी भी पुरुष (प्राणी) को अप्रसन्नेन्द्रिय या दुःखी या रोगी देख कर के दोषादियों की असमता या विषमता का अनुमान कर ले, अर्थात् समझ ले कि अब इसके दोषादि 'सम' नहीं रह गये हैं।
वक्तव्य-उक्त श्लोकों में 'सम' शब्द का अर्थ तुल्य या बराबर नहीं है। इसका अर्थ है, प्रकृतिस्थ या जितना होना चाहिये उतना। समता को जानने की विधि उक्त 97वें पद्य में दी गयी है।
सृष्टि-क्रम
( जगद्योनेरनिच्छस्य चिदानन्दैकरूपिणः ।। ९९ ।।
पुंसोऽस्ति प्रकृतिर्नित्या प्रतिच्छायेव भास्वतः ।)
संसार की उत्पत्ति का क्रम-संसार के मूल कारण, वासना रहित, ज्ञान-स्वरूप एवं आनन्द स्वरूप पुरुष (परम पुरुष या ईश्वर) की प्रकृति वैसी नित्य (अनादि एवं अविनाशी) है, जैसे तेजःस्वरूप भगवान् सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है।
वक्तव्य-ईश्वर नित्य है और प्रकृति भी नित्य है, ईश्वर चित्स्वरूप या चेतन शक्ति है, किन्तु प्रकृति जड़ या अचेतन है और प्रकृति के संयोग से ही ईश्वर जगद्योनि या जगत्-कारण होता है। प्रकृति-रहित या शुद्ध परमात्मा इच्छा-रहित या वासना-रहित है। ज्ञान और आनन्द ही एकमात्र उसका लक्षण है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश और सूर्य के मण्डल का नित्य सम्बन्ध है, उसी प्रकार प्रकृति तथा पुरुष का भी नित्य सम्बन्ध है।
सृष्टि में प्रकृति का योगदान
अचेतनापि चैतन्ययोगेन परमात्मनः ।। १०० ।।
अकरोद् विश्वमखिलमनित्यं नाटकाकृति ।
प्रकृति यद्यपि अचेतन या जड़ है, तथापि उसने परमात्मा की चेतन शक्ति के संयोग से इस सम्पूर्ण विश्व की रचना की है, जो कि नाटक के समान अनित्य अर्थात् एक ही रूप में रहने वाली नहीं है।
वक्तव्य-जैसे नाटक के पात्र अनेक रूप बदलते रहते हैं-एक ही मनुष्य कभी स्त्री का रूप धारण करता है तो कभी पुरुष का, कभी मालिक का, तो कभी नौकर का, कभी धनी का तो कभी निर्धन का; ठीक इसी प्रकार एक ही जीव अनेक रूप धारण करता है-कभी मनुष्य का तो कभी स्त्री का, कभी कीट का तो कभी पतंग का, कभी वृक्ष का तो कभी लता का। प्रकृति और पुरुष से निर्मित संसार के सभी पदार्थ परिवर्तनशील हैं। एक पदार्थ जिस रूप में आज दिखलायी दे रहा है, कल वह दूसरे ही रूप में परिवर्तित हो जाता है। अतएव संसार नाटकों के दृश्यों की भाँति अनित्य कहा गया है।
बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति
प्रकृतिर्विश्वजननी पूर्वं बुद्धिमजीजनत् ।। १०१ ।।
इच्छामयीं महद्रूपामहङ्कारस्ततोऽभवत् ।
त्रिविधः सोऽपि सञ्जातो रजःसत्त्वतमोगुणैः ।। १०२ ।।
सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करने वाली प्रकृति ने इच्छायुक्त या वासनायुक्त एवं 'महत् तत्त्वरूप' 'बुद्धि' को सर्वप्रथम उत्पन्न किया। उस बुद्धितत्त्व से 'अहङ्कार' की उत्पत्ति हुई। वह अहंकार भी रजोगुण, सत्त्वगुण एवं तमोगुण के कारण तीन प्रकार का हो गया।
वक्तव्य-प्रकृति और पुरुष के संयोग से उत्पन्न होने वाले प्राणी में पहले अनुभवशक्ति उत्पन्न होती है, जिसमें इच्छा या वासना रहती है। इस वासनायुक्त बुद्धितन्त्र से अहंकार या अहंभाव उत्पन्न हो जाता है और वह अहंकार तीन प्रकार का होता है-1. रजोगुण युक्त या रागात्मक प्रेम या भक्ति करने वाला; 2. सत्त्वगुण युक्त रागरहित सुख-दुःख के द्वन्द्वों में समानभाव से रहने वाला; और 3. तमोगुणयुक्त द्वेष, शत्रुता आदि दुर्भावनावों से युक्त।

50 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

दस इन्द्रियाँ
तस्मात् सत्त्वरजोयुक्तादिन्द्रियाणि दशाभवन्।
मनश्च जातं तान्याहुः श्रोत्रत्वङ्नयनं तथा।। 103 ।।
जिह्वाघ्राणवचोहस्तपादौपस्थगुदानि च।
पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्याहुः प्राक्तनानीतराणि च।। 104।।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथ्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः।
सत्त्वगुण और रजोगुण से युक्त अहंकार द्वारा दस 'इंद्रियाँ'
और 'मन' उत्पन्न हुआ। वे दस इन्द्रियाँ ये हैं-1. श्रोत्र, 2.
त्वचा, 3. नयन, 4. जिह्वा (रसना), 5. घ्राण, 6. वाक्, 7.
हस्त, 8. पाद, 9. उपस्थ (लिंग) तथा 10. गुद। इनमें पहली
पाँच तो बुद्धि इन्द्रियाँ या ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और दूसरी पाँच
कर्मेन्द्रियाँ कही जाती हैं।
वक्तव्य-बुद्धितत्त्व की इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं
को प्राप्त करने के लिए अहंभाव तो उत्पन्न हो गया, किन्तु
उनकी प्राप्ति के साधनों का अभाव था, वह भी दस इन्द्रियाँ
और मन की उत्पत्ति हो जाने से पूर्ण हो गया। ये 11 पदार्थ
सत्त्व और रजोगुण से युक्त होते हैं, क्योंकि 'कारणानुरूपं
कार्यम्' (सु० शा० अ० 1) जिससे ऐश्वर्य की सामर्थ्य प्राप्त
की जाये, उसे 'इन्द्रिय' कहते हैं। मन मनन और संकल्प
आदि का साधन है, इसके संयोग से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच
प्रकार के ज्ञानों की साधन हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ पाँच प्रकार
के कर्मों के साधन हैं। यहाँ तक के बतलाये हुये सभी तत्त्वों
का समन्वित नाम सूक्ष्मशरीर है।
पञ्च तन्मात्राएँ
तमः सत्त्वगुणोत्कृष्टादहङ्कारादथाभवत् ।। 105 ।।
तन्मात्रपञ्चकं तस्य नामान्युक्तानि सूरिभिः।
शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम् ।। 106 ।।
रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रं चेति तद्विदुः।
तन्मात्रपञ्चकात्तस्मात् सञ्जातं भूतपञ्चकम् ।। 107 ।।
व्योमानिलानलजलक्षोणीरूपं च तन्मतम्।
तमोगुण तथा सत्त्वगुण से युक्त अहंकार तत्त्व से पाँच
'तन्मात्राएँ' उत्पन्न हुईं। उनके नाम विद्वानों ने ये बतलाये
हैं-1. शब्दतन्मात्र, 2. स्पर्शतन्मात्र, 3. रूपतन्मात्र, 4. रसतन्मात्र
और 5. गन्धतन्मात्र। इन पाँच तन्मात्राओं से पाँच 'महाभूत'
उत्पन्न हुये और वे ये हैं-1. आकाश, 2. वायु, 3. अग्नि, 4.
जल और 5. पृथिवी।
वक्तव्य-भोग के साधनों के रहने पर भी भोक्ता (भोगने
वाला) भोगायतन (भोगस्थान) के अभाव में भोग नहीं कर
सकता। अतः भोगायतन (भोगायतनं शरीरम्) अर्थात् स्थूल
शरीर भी उत्पन्न हो गया। आकाश आदि पाँच महाभूतों से
शरीर की उत्पत्ति होती है, जिसमें पुरुष (पुरि शेते इति पुरुषः)
शयन करता या व्याप्त रहता है। देखें-'पञ्चमहाभूत-
शरीरिसमवायः पुरुषः'। (सु० सू० अ० 1)। जिस प्रकार
सम्पूर्ण विश्व में ईश्वर व्याप्त है। महाभूत का सूक्ष्म रूप ही
'तन्मात्र' है। इसी को नैयायिक लोग 'परमाणु' कहते हैं।
तन्मात्राओं के स्थूल रूप
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसगन्धावनुक्रमात् ।। 108 ।।
तन्मात्राणां विशेषाः स्युः स्थूलभावमुपागताः।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों ही शब्दतन्मात्र
आदि पाँच तन्मात्राओं के क्रमशः स्थूलरूप को प्राप्त हुये
विशेष हैं।
वक्तव्य-पञ्चमहाभूतों के परमाणु शब्द आदि विशेषों
द्वारा जाने जाते हैं। 'विशेष्यन्ते श्रोत्रादिभिः इन्द्रियैः ज्ञायन्ते
इति विशेषाः'। अर्थात् शब्दादि शब्दतन्मात्रादि के सूचक या
बोधक हैं।
इन्द्रियों के विषय
बुद्धीन्द्रियाणां पञ्चैव शब्दाद्या विषया मताः ।। 109 ।।
कर्मेन्द्रियाणां विषया भाषादानविहारिताः।
आनन्दोत्सर्गकौ चैव कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।। 110 ।।
साङ्ख्यशास्त्र के विद्वानों का कथन है कि उक्त शब्द
आदि विशेष श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के विषय या ज्ञेय भाव हैं।
कर्मेन्द्रियों के विषय (कर्म) ये हैं, यथा-1. भाषण (बोलना),
2. आदान (ग्रहण करना), 3. विहरण (विचरना या चलना),
4. आनन्द (रतिसुख की प्राप्ति करना) एवं 5. उत्सर्ग
(त्यागना)।
वक्तव्य-आचार्य शार्ङ्गधर ने सुश्रुत का अनुसरण करते
हुये उपस्थेन्द्रिय (लिंग और योनि) का विषय आनन्द माना
है-'आनन्द्यते अनेन इति आनन्दः'। किन्तु महर्षि चरक ने
इसका विषय विसर्ग (शुक्र मोक्षण) ही माना है। आनन्द तो
अनुभव है, कर्म नहीं। उक्त कर्म में स्त्री और पुरुष के रजस्
तथा शुक्र का विसर्ग अर्थात् त्याग होता है।
प्रकृति-परिचय
प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्या चाविकृतिस्तथा।
एतानि तस्या नामानि शिवमाश्रित्य या स्थिता ।। 111 ।।

पञ्चमोऽध्यायः ] कलादिकाख्यानम् 51
प्रधान, प्रकृति, शक्ति, नित्या एवं अविकृति ये उस प्रकृति
के नाम हैं, जो शिव (ईश्वर) के आश्रित होकर रहती है।
वक्तव्य-प्रकृति के उक्त नाम सार्थक हैं। यथा-प्रधान
सब तत्त्वों में प्रधान है अथवा इसी से वे धारण किये जाते हैं।
प्रकृति-यह स्वभाव-सिद्ध है। शक्ति-इसी से ईश्वर जगद्योनि
होने में समर्थ होता है। नित्या-ईश्वर के समान यह नित्य
अर्थात् शाश्वत है। अविकृति-वह किसी की विकृति अर्थात्
विकार या कार्य नहीं है, अर्थात् उसको किसी ने उत्पन्न नहीं
किया। 'अकारणम्'। देखें-सु० शा० अ० 1।
प्रकृति-विकृति
महानहङ्कृतिः पञ्च तन्मात्राणि पृथक् पृथक्।
प्रकृतिर्विकृतिश्चैव सप्तैतानि बुधा जगुः ॥112॥
विद्वानों का कथन है, कि महान् (बुद्धितत्त्व) अहंकार
और पृथक्-पृथक् पाँच तन्मात्रा ये सात प्रकृति (कारण) भी
हैं। और विकृति (कार्य) भी।
वक्तव्य-उक्त सातों तत्त्व प्रधान से उत्पन्न हुये हैं, इसलिये
उन्हें विकृति अर्थात् कार्य कहा जाता है और इनसे पञ्चमहाभूत
उत्पन्न हुये हैं। इसलिये उन्हें प्रकृति अर्थात् कारण भी कहा
जाता है।
सोलह-विकार
दशेन्द्रियाणि चित्तं च महाभूतानि पञ्च च।
विकाराः षोडश ज्ञेयाः सर्वं व्याप्य जगत्स्थिताः ।। 113 ।।
दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच महाभूत ये सोलह
'विकार' कहे जाते हैं और ये सम्पूर्ण संसार में व्याप्त होकर
रहते हैं।
वक्तव्य-ये सोलह तत्त्व 'विकार' या कार्य ही कहे
जाते हैं, क्योंकि ये उक्त तन्मात्राओं से उत्पन्न होते हैं।
प्रश्न-इनको केवल विकार ही क्यों कहते हैं? प्रकृति भी क्यों
नहीं कहते? कारण यह है कि इनसे कोई नवीन तत्त्व उत्पन्न
नहीं होता। अतः इन्हें केवल विकार ही कहते हैं प्रकृति नहीं।
जीवात्मा का निवास-स्थान
एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वैः सिद्धे वपुर्गृहे।
जीवात्मा नियतो नित्यो वसति स्वान्तदूतवान् ।।114 ।।
उक्त चौबीस तत्त्वों द्वारा बने हुये शरीर रूपी घर में
अविनाशी जीवात्मा मन को अपना दूत बनाकर कर्म-बन्धन
से बँधा हुआ निवास करता है।
जीवात्मा का स्वरूप
स देही कथ्यते पापपुण्यदुःखसुखादिभिः ।
व्याप्तो बद्धश्च मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ।। 115 ।।
पाप, पुण्य, सुख और दुःख द्वन्द्वों से युक्त तथा मन द्वारा
किये गये कर्मों के बन्धनों से बँधा हुआ वह जीवात्मा देही
(देह वाला) या शरीर (शरीर वाला) कहा जाता है।
वक्तव्य-वासनाओं से रहित जीवात्मा मन के फेर में
पड़कर अनेक प्रकार के सुख दुःखों में पड़ जाता है। जैसे एक
भला आदमी अपने नौकर या मित्र के फेर में पड़कर अनेक
झंझटों में फँस जाता है, ठीक वही दशा शुद्ध सच्चिदानन्द
पूर्ण ब्रह्म जीवात्मा की भी होती है।
जीवात्मा के प्रतिबन्धक
कामक्रोधौ लोभमोहावहङ्कारश्च पञ्चमः ।
दशेन्द्रियाणि बुद्धिश्च तस्य बन्धाय देहिनः ।। 116 ।।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और पाँचवाँ अहङ्कार, दस इन्द्रियाँ
तथा बुद्धि-ये सभी उस जीवात्मा को बन्धन में डालने वाले हैं।
वक्तव्य-बुद्धि इच्छामयी है और इच्छाएँ ही सबको
फँसाती हैं। काम (सुखभोग की वासना), क्रोध (गुस्सा),
लोभ (धनादि के सञ्चय की अभिलाषा), मोह (मिथ्याज्ञान)
और अहङ्कार (अभिमान)-ये सब मानसिक दोष हैं। इनके
आवेश से सद्-असद् विवेक का नाश या ह्रास हो जाता है
और अनेक प्रकार के संकट उठाने पड़ते हैं।
मोह का लक्षण
( अश्रेयः श्रेयसोर्मध्ये भ्रमणं संशयो भवेत् ।
मिथ्याज्ञानं तु तं प्राहुरहिते हितदर्शनम् ।। 117 ।।)
शुभ एवं अशुभ में जो भ्रान्ति एवं सन्देह होता है और जो
अहित (दुःखदायी) में हित (सुखदायी) दिखलायी पड़ता
है, उसे मिथ्याज्ञान या 'मोह' कहते हैं।
अहङ्कार का लक्षण
(अहमित्यभिमानेन यः क्रियासु प्रवर्त्तते ।
कार्यकारणयुक्तस्तु तदहङ्कारलक्षणम् ।। 118 ।।)
कार्य एवं कारण से युक्त जो पुरुष 'अहम्' (मैं भी कुछ
हूँ) इस प्रकार के अभिमान के साथ कार्यों में प्रवृत्त होता है,
उसका नाम 'अहंकार' है।
काम का लक्षण
( स्त्रीषु जातो मनुष्याणां स्त्रीणां च पुरुषेषु वा।
परस्परकृतः स्नेहः काम इत्यभिधीयते ।। 119 ।।)

52 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
स्त्रियों में पुरुषों का एवं पुरुषों में स्त्रियों का जो परस्पर
स्नेह होता है, उसे 'काम' कहते हैं।
क्रोध का लक्षण
(यदूष्मा हृदयाज्जन्तोः समुत्तिष्ठति वै सकृत्।
परहिंसात्मकः क्लेशः क्रोध इत्यभिधीयते।।120।।)
दूसरे को आघात पहुँचाने के लिए एकाएक प्राणी के
हृदय से जो ऊष्मा (गर्मी) उठती है, जिससे क्लेश होता है,
उसे 'क्रोध' कहते हैं।
लोभ का लक्षण
(परार्थं परभोगांश्च परसामर्थ्यमेव च।
दृष्ट्वा श्रुत्वा च या तृष्णा जायते लोभ एव सः।।121।।)
परायी सम्पत्ति, उपभोग सामग्री एवं शक्ति को देखकर
अथवा सुनकर जो लालसा उत्पन्न होती है, उसे 'लोभ' कहते
हैं।
रोग-आरोग्य के लक्षण
आप्नोति बन्धमज्ञानादात्मज्ञानाच्च मुच्यते।
तद्दुःखयोगकृद्व्याधिरारोग्यं तत् सुखावहम्।।122।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे कलादिकाख्यानं नाम
पञ्चमोऽध्यायः।।5।।

उक्त देहधारी प्राणी अज्ञान के कारण बन्धन को प्राप्त
होता है और आत्मज्ञान (तत्त्वज्ञान या सद् विवेक) होने से
मुक्त (दुःखों और संकटों से पार) हो जाता है। उस देहधारी
को जो दुःख या कष्ट देने वाले भाव हैं, उनको व्याधि या रोग
कहते हैं तथा उसको सुख देने वाला आरोग्य है।
वक्तव्य-यहाँ विश्व की उत्पत्ति का जो क्रम बतलाया
गया है, ठीक यही क्रम मनुष्य की उत्पत्ति का भी है। जिस
प्रकार इस विशाल विश्व में ईश्वर व्याप्त है, ठीक उसी प्रकार
मनुष्य के शरीर में आत्मा व्याप्त है। इस प्रकार मनुष्य का
शरीर एक छोटा-सा विश्व है और उसमें आत्मा छोटा ईश्वर है।
'पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवानात्रेयः। यावन्तो हि
लोके भावविशेषाः तावन्तः पुरुषे यावन्तः पुरुषे तावन्तो
लोके'।। (च० शा० अ० 5)। अर्थात् जितने तत्त्व संसार में
हैं, उतने ही पुरुष में भी हैं। इसी प्रकार पञ्चमहाभूत तथा
अव्यक्त ब्रह्म का मिश्रण यह संसार है और उक्त छः तत्त्वों का
ही मिश्रण यह प्राणी भी है। 'षड् धातवः समुदिताः 'पुरुष'
इति संज्ञां लभन्ते' (च० शा० अ० 5)।
'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' (सु० सू० अ० 1)। इस
विषय को पूर्णरूप से समझने के लिए आप च० शा० अ० 5
की चन्द्रिका टीका देखें।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का पांचवा अध्याय समाप्त।।5।।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

षष्ठोऽध्यायः
आहारादिगतिकथनम्


[वाम स्तम्भ / Left Column]

आहार-परिचय
(आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृद् देहधारकः।
आयुस्तेजः समुत्साहः स्मृत्योर्जोऽग्निविवर्द्धनः ।। 1 ।।)
आहार या भोजन तृप्तिकारक, तत्काल बलकारक, शरीर
का धारक एवं पोषक है। यह आयुः, तेजस्, उत्साह,
स्मरणशक्ति, ओजस् एवं अग्नि को बढ़ाता है।
आहार के भेद
(आहारः षड्विधो भोज्यो भक्ष्यश्चर्व्यस्तथैव च।
लेह्यश्चोष्यस्तथा पेयस्तदुदाहरणानि च ।। 2 ।।
भोज्य ओदनसूपादिर्भक्ष्यो मोदकमण्डकः।
चर्व्यश्चिपिटधान्यादी रसालादिस्तु लेह्यते ।। 3 ।।
चोष्य आम्रफलेक्ष्वादिः पेयस्तु पानकं पयः।)
आहार छः प्रकार का होता है—1. भोज्य, 2. भक्ष्य, 3.
चर्व्य, 4. लेह्य, 5. चोष्य तथा 6. पेय। इनके उदाहरण हैं—भात
तथा दाल आदि 'भोज्य' कहलाते हैं। लड्डू तथा रोटी आदि
'भक्ष्य' कहे जाते हैं। चिउड़ा एवं भुने चने आदि 'चर्व्य'
(चबाने योग्य) कहे जाते हैं। सिखरन, चटनी, च्यवनप्राश
आदि 'लेह्य' (चाटने योग्य) कहे जाते हैं। आम के फल एवं
ईख आदि 'चोष्य' (चूसने योग्य) तथा पानक (शर्बत) एवं
दूध आदि 'पेय' (पीने योग्य) कहे जाते हैं। इन सबका एक
नाम 'आहार' भी है।
पाचन-प्रकार
यात्यामाशयमाहारः पूर्वं प्राणानिलेरितः ।। 4 ।।
माधुर्यं फेनभावं च षड्रसोऽपि लभेत सः।
अथ पाचकपित्तेन विदग्धश्चाम्लतां व्रजेत् ।। 5 ।।
ततः समानमरुता ग्रहणीमभिनीयते।
आहार प्राणवायु से प्रेरित होकर पहले मुख एवं
आहार-मार्ग द्वारा 'आमाशय' में जाता है और वहाँ छहों रसों


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

युक्त आहार मधुरता (मीठेपन) और फेन-भाव (झाग जैसी
अवस्था) को प्राप्त होता है। इसके पश्चात् वह मधुर एवं
फेनरूप आहार पाचक पित्त द्वारा पकने लगता है और खट्टा
हो जाता है। फिर समान वायु के प्रभाव से वह ग्रहणी में पहुँच
जाता है।
वक्तव्य—प्राणवायु के प्रकृतिस्थ रहने पर प्राणी आहार
का आहरण या ग्रहण कर सकता है अन्यथा नहीं। आमाशय
में क्लेदक नामक कफ रहता है। उसके प्रभाव से आहार
मधुर हो जाता है और आमाशय में आहार पहुँचने पर आलोडन-
विलोडन होने से यह झाग-सा बन जाता है। पाचक पित्त
स्वयं विदग्ध होकर खट्टा हो जाता है, अतः उसके मिश्रण से
आहार भी खट्टा हो जाता है। पाचक पित्त (जठराग्नि) के
साथ ही समान वायु रहता है और वह आहार को 'ग्रहणी' में
पहुँचा देता है।
ग्रहणी-परिचय
(षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता ।। 6 ।।
पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणीत्यभिधीयते।)
पाचक पित्त का धारण और पोषण करने वाली जो छठी
कला कही जाती है और जो पक्वाशय तथा आमाशय के
मध्यभाग में अवस्थित है, वह 'ग्रहणी' कही जाती है।
वक्तव्य—आमाशय से प्रारम्भ होकर पक्वाशय-पर्यन्त
जो साढ़े तीन 'व्याम' पुरुषों तथा तीन व्याम (एक व्याम = 4
हाथ) स्त्रियों के उदर में जो अवयव है, उसका नाम 'अन्त्र'
है। इसी में से होकर आहार आमाशय से मलाशय तक पहुँचता
है और इसी में आहार का पाक होता है। अतएव इसे सुश्रुत में
'पित्तधरा', शार्ङ्गधर में 'अग्निधरा' और चरक में
'अग्न्याधिष्ठान' तथा अन्न के पाक के लिए ग्रहण करने के
कारण इसे 'ग्रहणी' कहा है।

54 शाङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
--- [स्तम्भ १ / Column 1] ---
जठराग्नि के कार्य
ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठवह्निना जायते कटुः ।। 7 ।।
रसो भवति सम्यक्त्वादपक्वादासम्भवः ।
उक्त ग्रहणी में आहार जठराग्नि से पचता है, तदनन्तर उसका स्वाद कटु या चरपरा हो जाता है। भली-भाँति पाक होने से रस आहार में से पृथक् हो जाता है, अन्यथा आम (कच्चा) रह जाता है।
**वक्तव्य—**जठराग्नि अर्थात् पाचक पित्त स्वयं कटु है, अतः उसके प्रभाव से आहार भी कटु हो जाता है। रस आहार में पृथक् हो गया तो वह रसवाहिनियों द्वारा शरीर-पोषणार्थ हृदय की ओर चला जाता है, अन्यथा आम के रूप में गुदमार्ग से निकल जाता है।
रस-परिपाक
वह्नेर्बलेन माधुर्यं स्निग्धतां याति तद्रसः ।। 8 ।।
पुष्णाति धातूनखिलान् सम्यक् पक्वोऽमृतोपमः ।
आहार का वह रस जठराग्नि की शक्ति से भली-भाँति परिपक्व होकर मधुरता और स्निग्धता को प्राप्त हो जाता है और शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करता है, अतएव वह अमृत के समान होता है।
**वक्तव्य—**इस आहार रस में सब धातुओं के पोषकतत्त्व रहते हैं और यही जीवन की रक्षा भी करता है।
अपक्वरस से हानि
मन्दवह्निविदग्धश्च कटुश्चाम्लो भवेद् रसः ।। 9 ।।
विषभावं व्रजेद् वापि कुर्याद् वा रोगसङ्करम् ।
वह रस जठराग्नि की मन्दता के कारण यदि भली-भाँति परिपक्व नहीं होता तो कडुवा एवं खट्टा हो जाता है और विषभाव को प्राप्त हो जाता है, अथवा अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है।
**वक्तव्य—**मन्दाग्नि के कारण रस का सम्यक् परिपाक न होने से 'दण्डालसक' नामक रोग हो जाता है। इसके लक्षण विष के लक्षणों के समान होते हैं। यह आशुकारी या शीघ्रमारक होता है। यदि सौभाग्य से उक्त रोग न हुआ तो विसूची, अलसक एवं आमवातादि रोग हो जाते हैं। देखें- च० वि० अ० 2 तथा वाग्भट सू० अ० 8 ।
रस, मल, मूत्र तथा वली परिचय
आहारस्य रसः सारः सारहीनो मलद्रवः ।। 10 ।।
शिराभिस्तज्जलं नीतं बस्ती मूत्रत्वमाप्नुयात् ।
--- [स्तम्भ २ / Column 2] ---
तत् किट्टं च मलं ज्ञेयं तिष्ठेत् पक्वाशये च तत् ।। 11 ।।
वलित्रितयमार्गेण यात्यपानेन नोदितम् ।
प्रवाहिणी सर्जनी च ग्राहिकेति वलित्रयम् ।। 12 ।।
आहार का सारभाग 'रस' बन जाता है और साररहित भाग 'मलद्रव' (पतला मल) होता है। और उस 'मलद्रव' का जलभाग सिराओं द्वार वस्ति (मूत्राशय) में पहुँचाया हुआ 'मूत्र' बन जाता है। उस मलद्रव का किट्ट भाग अर्थात् गाढ़ा हिस्सा मल (पुरीष) बन जाता है। वह मलाशय में अवस्थित रहता है। वह समय-समय पर अपानवायु द्वारा प्रेरित किया हुआ तीन वलियों से निर्मित मार्ग (गुद) में से होकर बाहर निकल जाता है। इन वलियों के ये नाम हैं- 1. प्रवाहिणी (मल को प्रवाहित करने वाली), 2. सर्जनी (मल को त्यागने वाली) और 3. ग्राहिका या ग्राहिणी (निकलते हुये मल को यथावश्यक रोकने वाली)।
रक्तनिर्माण-प्रक्रिया
रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः ।
रञ्जितः पाचितो यः स पित्तेनायाति रक्तताम् ।। 13 ।।
वह रस समान वायु द्वारा प्रेरित होकर हृदय में चला जाता है और जो रंजक पित्त द्वारा रंजित तथा पाचित होता है, वही 'रक्त' बन जाता है।
वक्तव्य— 'रस गतौ' धातु से 'रस' शब्द का निर्माण होता है। इसका अर्थ है कि वह सदा चलता रहता है- 'रसति अहरहः गच्छति इत्यतो रसः'। इस रस का स्थान हृदय है और यह वहाँ से चलकर प्रतिदिन सम्पूर्ण शरीर का तर्पण, पोषण एवं सञ्चालन करता है और यह पोषक रस यकृत एवं प्लीहा में जाकर राग को प्राप्त कर रक्त बन जाता है। देखें- सु० सू० अ० 14 ।
रक्त का महत्त्व
रक्तं सर्वशरीरस्थं जीवस्याधारमुत्तमम् ।
स्निग्धं गुरु चलं स्वादु विदग्धं पित्तवद् भवेत् ।। 14 ।।
वह रक्त (रंगा हुआ रस) सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है और वह जीवात्मा का सर्वश्रेष्ठ आधार है। वह स्नेहयुक्त है, जल की अपेक्षा गुरु है, सदा चलता रहता है और स्वादु (कुछ नमकीन स्वाद वाला) है। जब कभी वह विकृत हो जाता है, तो पित्त के समान अर्थात् खट्टा हो जाता है।
**वक्तव्य—**जो रस रक्तरूप में शरीर के सम्पूर्ण अवयवों, दोषों, धातुओं एवं मलों में अनुसरण करता रहता है, वह

षष्ठोऽध्यायः] आहारदिगतिकथनम् 55
द्रवरूप है तथा स्नेहन, जीवन, तर्पण एवं धारण आदि सद्गुणों
के कारण सौम्य अर्थात् सोम के आह्लादक आदि गुणों से
युक्त समझा जाता है। यही शुद्ध पोषक रस जब शुद्ध रंजक
पित्त द्वारा रंग दिया जाता है, तो वह 'रक्त' कहा जाता है। यहाँ
उसी रक्त का ग्रहण किया गया है। देखें-सु० सू० अ० 14।
रसादि धातुओं का परिणाम-क्रम
पाचिताः पित्ततापेन रसाद्या धातवः क्रमात्।
शुक्रत्वं यान्ति मासेन तथा स्त्रीणां रजो भवेत् ।। 15 ।।
सम्पूर्ण शरीरव्यापी पित्त के ताप से पकायी हुई रस
आदि धातुएँ क्रमशः एक मास में शुक्र भाव को प्राप्त हो
जाती हैं। उसी प्रकार स्त्रियों का 'रजस्' बन जाता है।
वक्तव्य- शरीर के रस, रक्त आदि धातु तथा उपधातु
आदि पदार्थों का निर्माण तीन प्रकार से होता है-1. रस से
रक्त, रक्त से मांस एवं मांस से मेदस् आदि। 2. 'तत्रैषां
(धातूनां) अन्नपानरसः प्रीणयिता' तथा 3. 'तेषां (धातूनाम्)
क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते' अर्थात् अन्नपान का रस ही सभी
धातुओं का पोषण करता है और धातुओं का क्षय एवं वृद्धि
रस से ही होती है।
गर्भावतरण-क्रम
कामान्मिथुनसंयोगे शुद्धशोणित-शुक्रजः।
गर्भः सञ्जायते नार्याः स जातो बाल उच्यते ।। 16 ।।
सन्तानोत्पत्ति अथवा आनन्द या रतिसुख की कामना से
नारी एवं नर का उपस्थेन्द्रिय-विषयक संयोग होने पर शुद्ध
शोणित एवं शुक्र के सम्मिलन से उत्पन्न होने वाला गर्भ नारी
के गर्भाशय में प्रादुर्भूत होता है। वह जब जन्म लेता है तो
'बाल' कहा जाता है।
वक्तव्य-नर और नारी के जोड़े का नाम 'मिथुन' है।
इसकी उपस्थ = लिंग एवं योनि सम्बन्धी एक विशिष्ट क्रिया
का नाम 'मैथुन' है। इस क्रिया से कभी-कभी अर्थात् जब
कभी शुक्र और शोणित शुद्ध होते हैं, तो गर्भाधान हो जाता
है। यह जब तक गर्भाशय में रहता है तब तक भ्रूण या गर्भ
और जन्म होने पर 'शिशु' कहलाता है।
पुत्र-कन्या की उत्पत्ति में कारण
आधिक्ये रजसः कन्या पुत्रः शुक्राधिके भवेत्।
नपुंसकं समत्वेन यथेच्छा पारमेश्वरी ।। 17 ।।
गर्भाधान के समय प्रायः रजस् अर्थात् शोणित की
अधिकता से कन्या शुक्र की अधिकता से पुत्र और रजस् एवं
शुक्र की समता से नपुंसक की उत्पत्ति होती है, अथवा जैसी
परमेश्वर की इच्छा हो।
वक्तव्य- 'यथेच्छा पारमेश्वरी' कहने का तात्पर्य यह है
कि कभी-कभी उक्त प्रकार के विपरीत साँप, बिच्छू आदि
भी उत्पन्न हो जाते हैं। देखें-सु० शा० अ० 2।
कुछ जिज्ञासु आधुनिक पाश्चात्य पद्धति के ग्रन्थों में
शुक्रगत कीटाणुओं की चर्चा एवं चित्रों को देखकर पूछा
करते हैं कि भारतीय अथवा आयुर्वेद साहित्य में शुक्र के
कीटाणुओं की चर्चा है कि नहीं? इसका संक्षिप्त समाधान
इस प्रकार है-पुराणों में लोक की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार
कहा गया है-विष्णु भगवान् क्षीरसागर में सहस्रों फणों वाले
शेषनाग पर शयन करते हैं और उनके पास लक्ष्मी एवं गरुड़
आदि भी विराजमान रहते हैं, उनकी नाभि से नाल निकलती
है, उस पर कमल और कमल पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, उस
समय सब ओर जल ही जल होता है इत्यादि और आयुर्वेद में
'एवमयं लोकसम्मितः पुरुषः' (च० शा० अ० 2.4)। अर्थात्
इस प्रकार लोक के समान ही पुरुष भी है। तो अब विचार
कीजिये, कि यह समानता किस प्रकार है-सातवीं धातु शुक्र
क्षीरसागर है, उसमें सर्पाकार कीटाणु शेषनाग है, उसमें
चेतनाधातु रूप (जीवात्मा) विष्णु हैं, बुद्धितत्त्व लक्ष्मी एवं
मन गरुड़ है, अहंकार नारद है, जो वीणा बजाता हुआ उसकी
स्तुति किया करता है। ये सभी सदैव भगवान् विष्णु के साथ
ही रहते हैं- 'अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैः आत्मा कदाचित् न
वियुक्तरूपः। न कर्मणा नैव मनो मतिभ्यां न
चाप्यहङ्कारविकारदोषैः।।' (च० शा० अ० 2)। कर्मानुसार
आत्मा अर्थात् भगवान् विष्णु गर्भाशय में प्रविष्ट हो जाता है
अर्थात् गर्भाशय के किसी भाग में चिपक जाता है। उसकी
नाभि से नाल अर्थात् गर्भनाल निकलती है, उस पर भ्रूण का
शरीर बन जाता है, यह ब्रह्मा है। उस समय सब ओर गर्भोदक
अर्थात् गर्भाशय में समुद्र-जल के समान खारा जल ही जल
होता है। 'यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानम्'
(च० शा० अ० 5)। अर्थात् जैसे लोक की सृष्टि होती है,
वैसे ही पुरुष का गर्भाधान होता है। आशा है इस चर्चा से
आपके प्रश्न का कुछ समाधान हो जायेगा।
जातकर्म-संस्कार
(जातमात्रस्य ताल्वोष्ठकण्ठनासाप्रमार्जनम्।
कुर्यात् सतुलयाऽङ्गुल्या सर्पिःसैन्धवलिप्तया ।। 18 ।।)