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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 356 में से

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पृष्ठ 63

तृतीयोऽध्यायः
नाडीपरीक्षादिविधिः
नाड़ी-परीक्षा का स्थान
करस्याङ्गुष्ठमूले या धमनी जीवसाक्षिणी।
तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञेयं कायस्य पण्डितैः ॥ 1 ॥
हाथ के अँगूठे के मूल में जो धमनी (स्पर्श द्वारा देखी
जाती) है, वह जीव (जीवात्मा) की साक्षिणी (गवाही देने
वाली) है, अर्थात् इसके माध्यम से जीव की सत्ता का ज्ञान
किया जा सकता है। इसकी चेष्टा (गति-विशेष) से नाड़ी-
विशेषज्ञ शरीर के सुख तथा दुःख का ज्ञान कर सकता है।
वक्तव्य-आयुर्वेदीय चिकित्सा में नाड़ी-परीक्षा का बहुत
बड़ा महत्त्व है, जिसे चिरकाल से विद्वत्समाज स्वीकार करता
चला आ रहा है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन संहिताओं में
नाड़ी-परीक्षा का कोई स्वतन्त्र प्रकरण उपलब्ध नहीं होता है।
किन्तु दूतनाड़ी-विशेषज्ञ 108 श्री सत्यदेव वासिष्ठ (भिवानी-
निवासी) उक्त संहिताओं में नाड़ीज्ञान समर्थक सूत्रों की सत्ता
को स्वीकार करते हैं।
करस्याङ्गुष्ठमूले-हाथ दो होते हैं। आचार्य ने किस हाथ
के अँगूठे के मूल वाली धमनी की ओर संकेत किया है,
इसका यहाँ कोई स्पष्ट निर्देश नहीं किया है। अतः इस प्रश्न
का समाधान इस प्रकार किया जा रहा है-पुरुषों के दाहिने
हाथ की और स्त्रियों के बाँयें हाथ की धमनी देखनी चाहिये।
इस प्रकार के उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी पाये जाते हैं। नाड़ी
सम्बन्धी विशेष परिचय के लिए देखें-1. नाड़ीविज्ञान-
महर्षिकणाद प्रणीत, 2. नाड़ीपरीक्षा-रावणकृत, 3. नाड़ी-
परीक्षा-अग्निवेश लिखित तथा 4. नाड़ीतत्त्वदर्शन-श्रीसत्यदेव
वासिष्ठ रचित।
नाड़ी की उपयोगिता-नाड़ीज्ञान गुरु-परम्परा के उपदेशों
तथा अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है। इसके प्राप्त हो
जाने पर वह चिकित्सक अत्यन्त यशस्वी कहा एवं माना
जाता है, क्योंकि नाड़ी द्वारा वात, पित्त, कफ, द्वन्द्व, सन्निपात,
रस, रक्त आदि का तथा साध्य-असाध्य का ज्ञान प्राप्त किया
जा सकता है। निदान का यही एक आयुर्वेदीय अनुपम साधन
है, जिससे मूक तथा बेहोश आदमी की वास्तविक शारीरिक
स्थिति को भी समझा जा सकता है।
धमनी द्वारा दोषों का ज्ञान-हृदय धमनियों द्वारा सम्पूर्ण
शरीर में रक्त को सदैव प्रवाहित करता रहता है। इन धमनियों
का फैलाव सम्पूर्ण शरीरावयवों में रहता है; केवल मांसपेशियों
से ढँकी हुई धमनियों का स्पर्शज्ञान स्पष्ट रूप से नहीं होता।
नाड़ी के अतिरिक्त ग्रीवा के दोनों ओर तथा गुल्फ के समीप
भी नाड़ी का स्पर्श करके वही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है,
जो अँगूठे के मूल में रहने वाली धमनी के स्पर्श से करने के
लिए कहा गया है। जीवित पुरुष में ही इस नाड़ी की धमन-
क्रिया को देखा जा सकता है, क्योंकि इसका एक विशेषण
है-'जीवसाक्षिणी' और यही सुख (स्वस्थता) तथा दुःख
(रुग्णता) की सूचना अपनी विशेष गति द्वारा 'नाड़ी-विशेषज्ञ'
को प्रदान करती है।
वातदोष में नाड़ी की गतियाँ
नाडी धत्ते मरुत्कोपे जलौका-सर्पयोगतिम्।
वातदोष के प्रकुपित होने पर नाड़ी जलौका (जोंक)
तथा साँप की भाँति चलती है, अर्थात् इन गति-विशेषों पर
चिकित्सक को निरन्तर ध्यान देना चाहिये, क्योंकि इन प्राणियों
की गतियाँ अनेक प्रकार की देखी जाती हैं।
पित्तदोष में नाड़ी की गतियाँ
कुलिङ्ग-काक-मण्डूकगतिं पित्तस्य कोपतः ॥ 2 ॥
पित्तदोष का प्रकोप होने पर नाड़ी की गति कलिंग
(गृहचटक, गौरैया), कौआ तथा मण्डूक (मेंढक) के समान
होती है। ये सभी प्राणी फुदक-फुदक कर चलते हैं।