शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
150 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे
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150 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे
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कोशातकी देवदाली नीलिनी गिरिकार्णिका ।। 61 ।।
सातला पिप्पलीमूलं विडङ्गं कटुकी तथा।
हेमक्षीरी च विपचेत् कल्कैरेभिः पिचून्मितैः ।। 62 ।।
घृतप्रस्थं स्नुहीक्षीरं षट्पले तु पलद्वयम्।
अर्कक्षीरस्य मतिमांस्तत्सिद्धं गुल्मकुष्ठहृत् ।। 63 ।।
हन्ति शूलमुदावर्त्त शोथाध्मानं भगन्दरम्।
शमयत्युदराण्राष्टौ निपीतं बिन्दुसङ्ख्यया ।। 64 ।।
गोदुग्धेनोष्ट्रदुग्धेन कौलत्थेन शृतेन वा।
उष्णोदकेन वा पीत्वा बिन्दुवेगैर्विरेचयेत् ।। 65 ।।
एतद् बिन्दुघृतं नाम नाभिलेपाद् विरेचयेत्।
चीता की जड़, शंखपुष्पी (शंखाहुली), हरड़, कबीला,
सफेद निसोत, कालीनासोत, विधारा, अमलतास, दन्ती,
जमालगोटा, कड़वी तोरई, वन्दाल, नील के पत्ते, गिरिकर्णिका
(इसपन्द), सतवन, पीपलामूल, वायविडंग, कुटकी एवं चोक
(सत्यानाशी की जड़)-इन सब द्रव्यों को एक-एक कर्ष
(1-1 तोला) लेकर कल्क बनायें। घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4
तोला), सेहुण्ड (थूहर) का दूध छः पल (24 तोला) और
मदार (आक) का दूध दो पल (8 तोला), इन सबको एक
साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। जब पाक सिद्ध हो जाये
तो छानकर रख लें। यह घृत वायुगोला एवं कुष्ठ को हरता है,
शूल, उदावर्त्त, शोथ, अफरा, भगन्दर एवं आठ प्रकार के
उदररोगों को शान्त करता है। इसकी मात्रा बूँदों को गिनकर
निर्धारित की जाती है। गाय का दूध, ऊँटनी का दूध, कुलथी
का क्वाथ एवं उष्ण जल में डालकर पीने से बिन्दुओं की
संख्या (गिनती) के अनुसार विरेचन (दस्त) होते हैं, अतएव
इसका नाम 'बिन्दुघृत' है और यह उदर पर लेप करने से भी
विरेचन करता है।
वक्तव्य-इस 'षड्बिन्दु घृत' में सभी द्रव्य दस्तावर हैं।
अतः यह घृत उच्चकोटि का विरेचक है। इसकी मात्रा बिन्दु
या बूँद के परिमाण में दी जाती है। यद्यपि कहा गया है कि
जितने बिन्दु पीयें जायें उतने दस्त होते हैं, किन्तु दस्तों
की-संख्या कोष्ठ की मृदुता तथा क्रूरता पर निर्भर करती है।
एरण्ड के तेल की भाँति यह भी उदर पर लगाने से विरेचन
कराता है। एक बात का भली-भाँति स्मरण रखना चाहिये
कि औषधियाँ शरीर में किसी भी मार्ग से प्रविष्ट होकर उसी
अवयव पर अपना प्रभाव डालती हैं, जहाँ पर आवश्यकता
होती है। देखने में आता है कि सेर दो सेर जमालगोट को
शुद्ध करते समय निरन्तर दो-तीन दिन तक छीलने वाले
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व्यक्ति को दस्त लग जाते हैं, मूत्रल पदार्थों का पेट पर लेप
करने से मूत्रबन्ध खुल जाता है, इत्यादि। तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का जहाँ पर औषधि का प्रयोग किया जाता है, उस
स्थान से जहाँ पर रोग है भले ही सीधा सम्बन्ध न हो, तथापि
औषधि का प्रभाव उसी स्थान पर होता है, जहाँ पर रोग
होता है।
त्रिफला घृत
त्रिफलाया रसप्रस्थं प्रस्थं वासारसोद्भवम् ।। 66 ।।
भृङ्गराजरसप्रस्थं प्रस्थमाजं पयः स्मृतम्।
दत्त्वा तत्र घृतप्रस्थं कल्कैः कर्षमितैः पृथक् ।। 67 ।।
त्रिफला पिप्पली द्राक्षा चन्दनं सैन्धवं बला।
काकोली क्षीरकाकोली मेदा मरिचनागरम् ।। 68 ।।
शर्करा पुण्डरीकं च कमलं च पुनर्नवा।
निशायुग्मं च मधुकं सर्वैरेभिर्विपाचयेत् ।। 69 ।।
नक्तान्ध्यं नकुलान्ध्यं च कण्डूं पिल्लं तथैव च।
नेत्रस्त्रावं च पटलं तिमिरं काचकं जयेत् ।। 70 ।।
अन्येऽपि प्रशमं यान्ति नेत्ररोगाः सुदारुणाः।
त्रैफलं घृतमेतद्धि पाने नस्यादिषूचितम् ।। 71 ।।
त्रिफला का रस या क्वाथ एक प्रस्थ (64 तोला), अडूसा
का रस एक प्रस्थ, भाँगरा का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध
एक प्रस्थ, इन सब द्रवों में एक प्रस्थ घृत डालकर निम्नलिखित
द्रव्यों का कल्क डालकर परिपाक करना चाहिये। वे द्रव्य
हैं-हरड़, बहेड़ा, आँवला, पिप्पली, मुनक्का, सफेद चन्दन,
सेंधा नमक, बरियारा, काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में
अश्वगन्धा दो कर्ष), मेदा (शतावरी), मरिच, सोंठ, खाँड,
नीलकमल, पुनर्नवा, दारुहल्दी एवं हल्दी प्रत्येक द्रव्य 1-1
तोला। इस घृत का सेवन करने से नक्तान्ध्य (रतौन्धी),
नकुलान्ध्य (नेवला के समान आँखें चमकती हैं और दिखलायी
नहीं पड़ता), आँख की खुजली, पिल्ल (नामक नेत्ररोग
देखें-वा० उ० अ० 16), नेत्रस्राव (उलका), पटलगत रोग,
तिमिर (धुन्ध) एवं काच (मोतिया) नामक रोग को जीतता
है। इसके सेवन से और भी भयानक नेत्ररोग शान्त हो जाते
हैं। इसका नाम 'त्रिफला घृत' है। इसका प्रयोग पीने, नस्य,
नेत्र-तर्पण आदि में किया जाता है।
गौराद्य घृत
द्वे हरिद्रे स्थिरा मूर्वा सारिवा चन्दनद्वयम्।
मधुपर्णी च मधुकं पद्मकेशरपद्मकैः ।। 72 ।।
नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 151
उत्पलोशीरमेदाभिस्त्रिफलापञ्चवल्कलैः ।
कल्कैः कर्षमितैरेतैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७३ ॥
विसर्पलूताविस्फोटविषकीटव्रणापहम् ।
गौराद्यमिति विख्यातं सर्पिर्विषहरं परम् ॥ ७४ ॥
हल्दी, दारुहल्दी, शालपर्णी, सारिवा, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, गिलोय, मुलेठी, कमलकेसर, पद्माकाठ, रक्तकमल, खस, मेदा (अभाव में शतावरी), हरड़, बहेड़ा, आँवला, पञ्चवल्कल (वट, गूलर, पाकर, पीपल एवं वेतस की छाल) प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष लेकर एवं कल्क बनाकर एक प्रस्थ घृत (64 तोला) तथा घृत से चौगुना जल डालकर परिपाक करना चाहिये। यह घृत विसर्प, लूता, विस्फोट (बड़ी माता), कीट विष (कीड़ों के काटने पर) एवं व्रणों को नष्ट करता है। इसका नाम 'गौराद्य घृत' है। यह उत्तम विषनाशक है।
वक्तव्य-गौराद्य घृत का पाठ चक्रदत्त के व्रणशोथाधिकार में भी है, किन्तु द्रव्यों में कुछ हेर-फेर है। इस घृत का प्रायः बाहरी प्रयोग किया जाता है।
मयूर घृत
बलामधूकरास्नाभिर्दशमूलफलत्रिकैः ।
पृथग्द्विपलिकैरेभिर्द्रोणनीरेण पाचयेत् ॥ ७५ ॥
मयूरं पक्षपित्तान्त्रयकृत्पादास्यवर्जितम्।
पादशेषं शृतं नीत्वा क्षीरं दत्त्वा च तत्समम् ॥ ७६ ॥
घृतप्रस्थं पचेत् सम्यग्जीवनीयैः पिचून्मितैः ।
तत्सिद्धं शिरसः पीडां मन्यापृष्ठग्रहं तथा ॥ ७७ ॥
अर्दितं कर्णनासाक्षिजिह्वागलरुजो जयेत्।
पाने नस्ये तथाभ्यङ्गे कर्णपूरेषु युज्यते ॥ ७८ ॥
हेमन्तकालशिशिरवसन्तेषु च शस्यते।
बरियारा, मुलेठी, रास्ना, दशमूल एवं त्रिफला प्रत्येक द्रव्य (8-8 तोला) लेकर जौकुट करके एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में डालकर रख दें। प्रातःकाल इसमें पंख, पित्ताशय, आँतड़ी, यकृत, पाँव एवं मुखरहित मोर (अर्थात् मोर के मांस) को डालकर क्वाथ करे। जब चतुर्थांश अवशिष्ट रह जाये तो छान लें, तत्पश्चात् इस क्वाथ के समान भाग अर्थात् एक आढक (3 सेर 16 तोला) दूध डालकर और जीवनीयगण के प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर और कल्क बनाकर तथा एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) घृत लेकर सबको एक साथ मिलाकर परिपाक करना चाहिये। जब सिद्ध हो जाये तो छानकर रख लेना चाहिये। यह घृत शिर की पीड़ा को, मन्याग्रह (वातव्याधि), पृष्ठग्रह (पीठ की जकड़न), अर्दित (लकवा) तथा कान, नाक, आँख, जीभ एवं केश सम्बन्धी रोगों को जीतता है। पीने में, नस्य में, अभ्यंग (मालिश) में एवं कर्णपूरण (कान में डालने) में इस घृत का प्रयोग किया जाता है। हेमन्त (मार्गशिर एवं पौष), शिशिर (माघ एवं फाल्गुन) तथा वसन्त (चैत्र एवं वैशाख) ऋतु में इस घृत का सेवन करना उत्तम है।
फल घृत
त्रिफला मधुकं कुष्ठं द्वे निशे कटुरोहिणी ॥ ७९ ॥
विडङ्गं पिप्पली मुस्ता विशाला कट्फलं वचा।
द्वे मेदे द्वे च काकोल्यौ सारिवे द्वे प्रियङ्गुका ॥ ८० ॥
शतपुष्पा हिङ्गु रास्ना चन्दनं रक्तचन्दनम्।
जातीपुष्पं तुगाक्षीरी कमलं शर्करा तथा ॥ ८१ ॥
अजमोदा च दन्ती च कल्कैरेतैश्च कार्षिकैः ।
जीवद्वत्सैकवर्णाया घृतप्रस्थं च गोः क्षिपेत् ॥ ८२ ॥
चतुर्गुणेन पयसा पचेदारण्यगोमयैः ।
सुतिथौ पुष्यनक्षत्रे मृद्भाण्डे ताम्रजे तथा ॥ ८३ ॥
ततः पिबेच्छुभदिने नारी वा पुरुषोऽथवा।
एतत्सर्पिर्नरः पीत्वा स्त्रीषु नित्यं वृषायते ॥ ८४ ॥
पुत्राननुत्पादयेद्धीमान् वन्ध्यापि लभते सुतम् ।
अनायुषं या जनयेद् या च सूता पुनः स्थिता ॥ ८५ ॥
पुत्रं प्राप्नोति सा नारी बुद्धिमन्तं शतायुषम् ।
एतत्फलघृतं नाम भारद्वाजेन भाषितम् ॥ ८६ ॥
अनुक्तं लक्ष्मणामूलं क्षिपेत् तत्र चिकित्सकः ।
हरड़, बहेड़ा, आँवला, मुलेठी, कूठ-मीठा, दारुहल्दी, हल्दी, कुटकी, वायविडंग, पीपल, नागरमोथा, इन्द्रायण की जड़, कायफल, वच, मेदा, महामेदा (अभाव में शतावरी दूनी), काकोली, क्षीरकाकोली (अभाव में दूनी अश्वगन्धा), सारिवा, कृष्णसारिवा, फूलप्रियंगु, सौंफ, हींग, रास्ना, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, चमेली के फूल, वंशलोचन, कमल, चीनी, अजमोदा तथा दन्ती (जमालगोटा) प्रत्येक द्रव्य को एक-एक कर्ष लेकर कल्क बना लें। जीवित बछड़े वाली एक वर्ण की गाय का घृत एक प्रस्थ (3 पाव 4 तोला) तथा घृत से चौगुना दूध लेकर इन सब वस्तुओं को एक साथ मिलाकर जंगली उपलों (कण्डों या गोहरों) की अग्नि द्वारा उत्तम तिथियों (नन्दा, भद्रा, जया तथा पूर्णा तिथियाँ) में पुष्यनक्षत्र के दिन मिट्टी अथवा ताम्र के पात्र में परिपाक करना आरम्भ करें। जब तैयार हो जाये तो किसी शुभ दिन में