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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 356 में से

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पृष्ठ 49

प्रथमोऽध्यायः] परिभाषा 13
भागोऽनुक्ते तु साम्यं स्यात् पात्रेऽनुक्ते च मृन्मयम्।
द्रवेऽनुक्ते जलं ग्राह्यं तैलेऽनुक्ते तिलोद्भवम् ।। ५० ।।
(दुग्धे सर्पिषि मूत्रे च ग्राह्यं गोसम्भवं बुधैः।)
यदि ग्रन्थकार द्वारा औषध सेवन करने का समय-निर्देश
न किया गया हो, तो प्रातःकाल समझ लेना चाहिये। यदि
औषधद्रव्य के पत्र, पुष्प, मूल, त्वचा, निर्यास (गोंद) आदि
का संकेत न किया गया हो, तो उसकी जड़ का ग्रहण करना
चाहिये। यदि किसी औषधयोग के द्रव्यों का अलग-अलग
मान=परिमाण न कहा गया हो, तो सभी द्रव्यों को समभाग में
लेना चाहिये। यदि क्वाथ, अवलेह आदि का निर्माण करने
के लिए किसी पात्र-विशेष का उल्लेख न किया गया हो, तो
मिट्टी के पात्र का ग्रहण करना चाहिये। औषध-निर्माण के
लिए अथवा औषध सेवन करने के लिए जहाँ किसी द्रव
(तरल पदार्थ) का उल्लेख न किया गया हो, वहाँ जल का
ग्रहण करना चाहिये। यदि तिल, सरसों, तीसी (अलसी),
बादाम आदि का नाम-निर्देश न किया गया हो तो वहाँ तिलों
के तेल का प्रयोग करना चाहिये। जहाँ किसी विशेष प्राणी के
दूध, घी, मल, मूत्र का निर्देश न किया गया हो, वहाँ ये सभी
द्रव्य गाय से ही लेने चाहिये।
वक्तव्य-प्रायः ग्रन्थकार इस प्रकार की सामान्य बातों
को चर्चा नहीं किया करते, ऐसी परिस्थिति में ऐसे वचनों का
बड़ा महत्त्व होता है। निघण्टु-ग्रन्थों में प्रायः यह देखा जाता
है कि किसी औषधद्रव्य के कौन-से अंग (अवयव) के क्या
गुण हैं, लिखा रहता है, कहीं नहीं भी मिलता। ऐसे अवसरों
पर इस परिभाषा का प्रयोग होता है। मृन्मय-इसे अनेक
सम्पादकों टीकाकारों ने 'मृण्मय' लिखा है जो व्याकरण की
दृष्टि से अशुद्ध है। द्रवेऽनुक्ते-द्रव पदार्थों का प्रयोग किसी न
किसी प्रकार से चिकित्सा-क्षेत्र में होता ही है। अनुपान,
सहपान आदि में तो विशेष रूप से देखा ही जाता है। ऐसे
संदिग्ध अवसरों पर जल का प्रयोग शास्त्र द्वारा अनुमोदित है।
तिलोद्भवम्-तिलों से उत्पन्न तेल वास्तविक तेल है, शेष
तो आकार की साम्यता होने के कारण तेल कहे जाते हैं।
जितने 'तिलहन' द्रव्य हैं, उन सबसे तेल निकाला जाता है।
ध्यान दें-'तिलहन' नाम में भी तिल शब्द की ही प्रधानता है।
प्राणिज द्रव्यग्रहण-विधि
(जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम्।। ५१।।
क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारे च संहरेत्।)
रक्त (खून), रोम (लोम तथा केश), नख (नाखून) आदि
(अस्थि, माँस, वसा तथा शुक्र) द्रव्य युवा पशुओं के शरीर
से ही ग्रहण करने चाहिये। यदि दूध, मूत्र, मल इनका ग्रहण
करना हो तो उन पशुओं का जब आहार पच जाये तभी ग्रहण
करना चाहिये।
वक्तव्य-उक्त पद्य सु० सू० अ० 36.16 से लेकर यहाँ
ग्रन्थ की क्षति-पूर्ति की गयी है। आज भी वैज्ञानिक पद्धति
वाले रक्त का ग्रहण 18 वर्ष से 40 वर्ष तक की अवस्था वाले
स्त्री-पुरुषों से ही करते हैं। दूध आदि का ग्रहण आहार के पच
जाने पर करना चाहिये, किन्तु देखा जाता है कि गो-पालनकर्ता
चारा सामने रखकर गाय को दुहते हैं, ऐसा दूध उक्त सिद्धान्त
के विरुद्ध है। संहरण (संग्रह) भी दो प्रकार का होता है-एक
तो द्रव्य को लेकर तत्काल प्रयोग कर लेना और दूसरा लेकर
रख देना।
पुनरुक्त द्रव्य का मान
एकम्प्यौषधं योगे यस्मिन् यत् पुनरुच्यते ।। ५२ ।।
मानतो द्विगुणं प्रोक्तं तद् द्रव्यं तत्त्वदर्शिभिः ।
यदि एक द्रव्य किसी योग में दो बार कहा गया हो, तो
औषध-निर्माण में कुशल विद्वान् उस द्रव्य को दुगुना कर
लेते हैं।
वक्तव्य-यहाँ किसी योग के द्रव्यों को समभाग में लेने
की आज्ञा ग्रन्थकार ने दी हो, वहाँ तो आप उस पुनरुक्त द्रव्यों
को दूना ले लेंगे और जहाँ पहली बार वह द्रव्य दूसरे द्रव्यों के
साथ दूसरे परिमाण में परिगणित हो और दूसरी बार दूसरे
परिमाण वाले द्रव्यों के बीच में परिगणित हो तो वहाँ उसका
वही-वही परिमाण होगा। इसका सावधानीपूर्वक विचार
कर लें।
लाल एवं सफेद चन्दन का विचार
चूर्णस्नेहासवा लेहाः प्रायशश्चन्दनान्विताः ।। ५३ ।।
कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम्।
चूर्ण, स्नेह (घी, तेल, वसा तथा मज्जा), आसव तथा
अवलेह इनके निर्माण में प्रायः सफेद चन्दन का और कषाय
(क्वाथ) एवं लेप आदि में लाल चन्दन का प्रयोग करना
चाहिये।
वक्तव्य-लाल तथा सफेद चन्दन के गुण-धर्मों का
विचार कर युक्ति-विशेषज्ञ चिकित्सक इन उपर्युक्त नियमों में
परिवर्तन भी कर सकता है। यह अनुमति 'प्रायः' शब्द का
प्रयोग करके ग्रन्थकार ने दी है।
पाठ भेद—यद्यपि शार्ङ्गधरसंहिता अधिकांश संस्करणों