शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
250 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे
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250 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]
शिर को कुछ नीचे लटका दें। उसे कहें कि हाथ-पाँव फैला
लो, उसकी आँखों को वस्त्र से ढाँक दें, फिर उसकी नाक के
अग्रभाग को ऊपर की ओर उठाकर चिकित्सक नस्य का
प्रयोग करें। नस्योपयोगी द्रव गुनगुना हो, नाक में डालते
समय उसकी धार टूटे नहीं, सोना अथवा चाँदी की सीपी
(चम्मच), फाहा अथवा और किसी युक्ति से नाक में उसे
डालना चाहिये। रोगी को पहले से सावधान कर दें कि जब
नस्य दी जा रही हो उस समय शिर हिलाना, क्रोध करना,
बहुत बोलना, सुड़कना तथा हँसना उचित नहीं, क्योंकि ऐसा
करने से स्नेह भीतर (उचित भागों में) नहीं पहुँचता और इसी
कारण से कास, प्रतिश्याय, शिरोरोग तथा नेत्ररोग उत्पन्न हो
जाते हैं। उस द्रव को शृंगाटक (नासावंश तथा भौंहों का
मध्यभाग) तक ले जाकर ठहराने का प्रयत्न करें और उसे
निगले नहीं।
नस्य-धारण-काल
पञ्च सप्त दशैव स्युर्मात्रा नस्यस्य धारणे ।। ५३ ।।
उपविश्याथ निष्ठीवेन्नासावक्त्रगतं द्रवम् ।
वामदक्षिणपार्श्वाभ्यां निष्ठीवेत् सम्मुखे न हि ।। ५४ ।।
नीते नस्ये मनस्तापं रजः क्रोधं च सन्त्यजेत् ।
शयीत निद्रां त्यक्त्वा च प्रोत्तानो वाक्शतं नरः ।। ५५ ।।
तथा वैरेचनश्चान्ते धूमो वा कवलो हितः ।
नस्य को धारण करके रखने में पाँच, सात अथवा दश
मात्रा का समय लगना चाहिये। इसके बाद रोगी उठ बैठे और
नाक तथा मुख में आये हुये द्रव को बायीं या दाहिनी ओर
थूक दें (इस प्रकार मल शीघ्र झड़ जाता है), सामने की ओर
नहीं थूकना चाहिये, ऐसा करने से विपरीत प्रभाव पड़ता है।
नस्य लेने के बाद मानसिक सन्ताप, धूलि तथा क्रोध का
परित्याग करना चाहिये। रोगी निद्रा को त्याग कर सौ मात्रा
तक केवल चित लेटा रहे। अन्त में विरेचन धूम (क्योंकि
स्नेहन किया गया है, यदि रेचन-नस्य दी गयी हो तो बृंहण-
धूम उपयोगी होता है) अथवा कवल लाभदायक होता है।
नस्य के तीन योग
नस्ये त्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।। ५६ ।।
शुद्धिहीनातियोगानि विशेषाच्छास्त्रचिन्तकैः ।
आयुर्वेद का मनन करने वाले विद्वानों ने नस्य में विशेष
रूप से प्रयोगों के अनुसार तीन लक्षण बतलाये हैं– 1 शुद्धि
(सम्यक्) योग, 2. हीनयोग और 3. अतियोग।
[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]
**वक्तव्य—**स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन तथा वस्ति का
जहाँ विवेचन किया गया है, वहाँ उक्त तीनों योगों की विस्तृत
चर्चा भी की गयी है, इसका अवलोकन करें।
नस्य-शुद्धि का लक्षण
लाघवं मनसः शुद्धिः स्रोतसां व्याधिसङ्क्षयः ।। ५७ ।।
चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ।
शिर का हल्कापन, स्रोतों की शुद्धि, व्याधि का नाश,
मन तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता–ये शिर की सम्यक् शुद्धि के
लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि नस्य का
प्रयोग विधिपूर्वक हुआ है।
नस्य का हीनयोग
कण्डूपदेहो गुरुता स्रोतसां कफसंस्रवः ।। ५८ ।।
मूर्ध्नि हीनविशुद्धेस्तु लक्षणं परिकीर्तितम् ।
मुख तथा नासिका आदि में कण्डू (खुजलाहट), उपदेह
(चिपचिपाहट), गुरुता (भारीपन का अनुभव) और स्रोतों
(मुख, नासिका आदि) में से कफ का झरना–ये सभी शिर
की हीन शुद्धि के लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि शिर का
शोधन भली-भाँति नहीं हुआ है।
नस्य का अतियोग
मस्तुलुङ्गागमो वातवृद्धिुरिन्द्रियविभ्रमः ।। ५९ ।।
शून्यता शिरसश्चापि मूर्ध्नि गाढं विरेचिते ।
मस्तुलुंग (जिन द्रव्यों से मस्तिष्क का निर्माण हुआ है)
का आना अर्थात् निकल जाना, वायु की वृद्धि (कोप),
इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों) का विनाश या विह्वल हो जाना और
शिर का शून्य (खाली) प्रतीत होना, ये सब शिर के अत्यन्त
विरेचित हो जाने के लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि विरेचन-
नस्य का अतियोग हो गया है।
हीनातियोग में उपचार
हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातघ्नमाचरेत् ।। ६० ।।
सम्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिर्नस्ये निषेचयेत् ।
शिर की हीनशुद्धि होने पर कफनाशक तथा अतिशुद्ध
होने पर वातनाशक उपाय करने चाहिये। सम्यक् शुद्धि होने
पर नस्य में घृत का प्रयोग करना चाहिये।
अष्टमोऽध्यायः] नस्यविधिः 251
अतिस्निग्ध का लक्षण
कफप्रसेकः शिरसो गुरुतेन्द्रियविभ्रमः ।।61।।
लक्षणं तदतिस्निग्धे तत्र रूक्षं प्रदापयेत् ।
भोजयेच्चानभिष्यन्दि नस्याचारिकमादिशेत् ।।62।।
कफ का प्रसेक (झरना), शिर में भारीपन और इन्द्रियों
में विभ्रम-ये अतिस्निग्ध के लक्षण हैं। इस स्थिति में रूक्षण-
क्रिया करनी चाहिये एवं अनभिष्यन्दी (जो अभिष्यन्दकारक
न हो ऐसा) भोजन दें तथा पञ्चकर्मोपयोगी आचरण का
उपदेश दें।
पञ्चकर्म
वमनं रेचनं नस्यं निरूहश्चानुवासनम्।
एतानि पञ्च कर्माणि कथितानि मुनीश्वरैः ।।63।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे
नस्यविधिर्नामाष्टमोऽध्यायः ।।8।।
वमन, विरेचन, नस्य, निरूहण तथा अनुवासन-वस्ति
को विद्वानों ने 'पञ्चकर्म' कहा है।
चिकित्सा-विषयक विचार-'इति पञ्चविधं कर्म
विस्तरेण निदर्शितम्। येभ्यो यत्त्वहितं यद्यत्कर्म येभ्यश्च
यद्धितम्। न चैकान्तेन निर्दिष्टे तत्राभिनिविशेद् बुधः।
स्वयमप्यत्र वैद्येन तक्यै बुद्धिमता भवेत् ।। उत्पद्येत हि साऽवस्था
देशकालबलं प्रति। यस्यां कार्यमकार्यं स्यात् कर्म कार्यं च
वर्जितम् ।। छर्दिहृद्रोगगुल्मार्ते वमनं स्वे चिकित्सते। अवस्थां
प्राप्य निर्दिष्टं कुष्ठिना वस्तिकर्म च।। तस्मात् सत्यपि निर्देशे
कुर्यादूह्य स्वयं धिया। विना तर्केण या सिद्धिर्यदृच्छासिद्धिरेव
सा।।' अर्थात्-इस प्रकार 'पञ्चकर्म' का विस्तार के साथ
निर्देश किया गया है, अर्थात् जो 'कर्म' जिनके लिए 'अहित'
होता है और जो 'कर्म' जिनके लिए 'हित' होता है। बुद्धिमान्
चिकित्सक को चाहिये कि वे इस 'निर्देश' के सम्बन्ध में
स्वयं भी विचार करें, क्योंकि देश, काल तथा रोग अथवा
रोगी के बल के कारण वह 'अवस्था' या परिस्थिति उत्पन्न
हो जाती है, जिसमें कार्य (करने योग्य) वमनादि अकार्य
कर्म भी (न करने योग्य) हो जाता है और वर्जित या निषिद्ध
कर्म (वमनादि) कार्य (करने योग्य) हो जाता है। जैसे-
छर्दरोग, हृद्रोग तथा गुल्म रोगी को। 'वमन' तथा कुष्ठ रोगी
को 'वस्तिकर्म' की अवस्था-विशेष का विचार कर अपनी-
अपनी चिकित्सा-विधि में वर्जित होने पर भी निर्देश किया
गया है। इसलिये निर्देश होने पर भी चिकित्सक अपनी बुद्धि
से विचार करें। विचार किये बिना कर्म करने पर जो सफलता
मिलती है, वह 'यदृच्छासिद्धि' अर्थात् 'आकस्मिक सफलता'
ही होती है।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का आठवाँ अध्याय समाप्त ।।8।।
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नवमोऽध्यायः
धूमपानविधिः
धूमपान-विधि
धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा।
रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः।।1।।
शमनस्य तु पर्यायौ मध्यः प्रायोगिकस्तथा।
बृंहणस्यापि पर्यायौ स्नेहिकौ मृदुरेव च।।2।।
रेचनस्यापि पर्यायौ शोधनस्तीक्ष्ण एव च।
धूम छह प्रकार का कहा गया है-1. शमन, 2. बृंहण, 3.
रेचन, 4. कासहा (कासनाशक), 5. वमन (वमन कराने
वाला) और 6. व्रणधूपन (घावों को धूप देना)। शमन धूम
के दो नाम हैं-1. मध्यम और 2. प्रायोगिक। बृंहण-धूम के
भी दो नाम हैं-1. स्नैहिक और 2 मृदु तथा रेचन के भी दो
नाम हैं-1. शोधन और 2. तीक्ष्ण।
धूमपान के अयोग्य व्यक्ति
अधूमार्हाश्च खल्वेते श्रान्तो भीतश्च दुःखितः।।3।।
दत्तवस्तिर्विरिक्तश्च रात्रौ जागरितस्तथा।
पिपासितश्च दाहार्तस्तालुशोषी तथोदरी।।4।।
शिरोऽभितापी तिमिरी छर्द्याध्मानप्रपीडितः।
क्षतोरस्कः प्रमेहार्तः पाण्डुरोगी च गर्भिणी।।5।।
रूक्षः क्षीणोऽभ्यवहृतक्षीरक्षौद्रघृतासवः।
भुक्तानन्दधिमत्स्यश्च बालो वृद्धः कृशस्तथा।।6।।
निम्नलिखित लोगों को 'धूम' का प्रयोग नहीं करना
चाहिये-श्रान्त (थका हुआ), भीत (डरा हुआ), दुःखी
(धनाशादि से दुः खित), दत्तवस्ति (जिसको वस्ति दी गयी
हो), विरिक्त (जिसको विरेचन कराया गया हो), रात्रि में
जागा हुआ, पिपासित (जिसको प्यास लगी हो), दाह से
पीड़ित, जिसका तालु सूख रहा हो, उदररोगी, शिरोरोगी,
तिमिररोगी, कै तथा अफरा से पीड़ित, जिसको उरःक्षत हो,
प्रमेहरोगी, पाण्डुरोगी, गर्भवती, रूक्ष शरीर वाला, क्षीण, जिसने
दूध, मधु, घी अथवा आसव (मद्य) का पान किया हो,
जिसने अन्न (भात, रोटी) दही तथा मछली का भोजन किया
हो, बालक, वृद्ध तथा कृश।
वक्तव्य-इन लोगों को शास्त्रीय धूमों के अतिरिक्त हुक्का,
सिगरेट तथा बीड़ी आदि का भी सेवन नही करने देना चाहिये।
धूमपान-निषेध का कारण
अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान्।
(बाधिर्यमान्ध्यमूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम्।।7।।)
तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम्।
सर्पिरिक्षुरसं द्राक्षां पयो वा शर्कराम्बु वा।।8।।
मधुराम्लौ रसौ वापि शमनाय प्रदापयेत्।
अकाल में अथवा अधिक मात्रा में किया हुआ धूमपान-
बधिरता, अन्धापन, मूकता, रक्तपित्त तथा शिरोभ्रम-इन उपद्रवों
को पैदा कर देता है। इस स्थिति में (उपद्रव उत्पन्न हो जाने
पर) घृतपान, स्नेहन, नस्य, अञ्जन तथा तर्पण का प्रयोग
लाभदायक होता है। घृत, ईख का रस, मुनक्का, दूध, शर्कराम्बु
(चीनी का शर्बत), मधुर अथवा अम्ल रस उपद्रवों की
शान्ति के लिये देने चाहिये।
वक्तव्य-उक्त सातवाँ श्लोक चरकसंहिता का है, किसी
कारण से इसका आधा अंश छूट गया है, उसे यहाँ स्मरण कर
लेना चाहिये, अन्यथा 'उपद्रवान्' का अर्थ नहीं लगाया जा
सकेगा। अतः उक्त श्लोकांश के ब्रेकेट के भीतर ऊपर यथास्थान
दे दिया गया है। देखें-च०सू०अ० 5.35।
धूमपान की अवधि
धूमस्तु द्वादशाद् वर्षाद् गृह्येताशीतिकान्न च।।9।।
धूमपान बारह वर्ष के पूर्व तथा अस्सी वर्ष की वय के
पश्चात् नहीं करना चाहिये।
नवमोऽध्यायः ] धूमपानविधिः 253
वक्तव्य-वह सामान्य नियम है, आवश्यकता पड़ने पर
चिकित्सक के परामर्श से इसको आगे-पीछे भी लिया जा
सकता है।
सुप्रयुक्त धूम-प्रशंसा
कासश्वासप्रतिश्यायान् मन्याहनुशिरोरुजः।
वातश्लेष्मविकारांश्च हन्याद् धूमः सुयोजितः ।। 10 ।।
धूमप्रयोगात् पुरुषः प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः।
दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिवदनो भवेत् ।। 11 ।।
धूमपान का विधिपूर्वक प्रयोग करने से कास, श्वास,
प्रतिश्याय, मन्याग्रह, हनुग्रह, शिर का पीड़ा, वात तथा कफ
के विकारों को नष्ट करता है। धूम के प्रयोग से मनुष्य की
इन्द्रियाँ, वाणी तथा मन प्रसन्न हो जाते है। केश, दाँत तथा
श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) दृढ़ हो जाते हैं एवं मुख सुगन्धित हो
जाता है।
धूमयन्त्र-परिचय
धूमनाडी भवेत् तत्र त्रिखण्डा च त्रिपर्विका।
कनिष्ठिकापरीणाहा राजमाषागमान्तरा ।। 12 ।।
धूमनाडी भवेद् दीर्घा शमने रोगिणोऽङ्गुलैः।
चत्वारिंशन्मितैस्तद्वद् द्वात्रिंशद्भिर्मृदौ मता ।। 13 ।।
तीक्ष्णे चतुर्विंशतिभिः कासघ्नी षोडशोन्मितैः।
दशाङ्गुलैर्वामनीये तथा स्याद् व्रणनाडिका ।। 14 ।।
कलायमण्डलस्थूला कुलित्थागामरन्ध्रका।
धूमपान के लिए नाड़ी (नेचा) तीन खण्डों (टुकड़ों में
विभक्त, जिससे छोटी-बड़ी बनायी जा सके) तथा तीन पर्वों
(पोरों) वाली होनी चाहिये। उसकी मोटाई कनिष्ठिका अंगुली
के समान हो और उसका छिद्र राजमाष के आने-जाने योग्य
हो। उसकी लम्बाई 'शमन धूमपान' के लिए रोगी के चालीस
अंगुल, 'मृदु' में बत्तीस अंगुल, 'तीक्ष्ण' में चौबीस अंगुल,
कासनाशक धूम के लिए सोलह अंगुल और वामनीय धूम में
दस अंगुल होनी चाहिये तथा व्रण को धूप देने के लिए भी
दस अंगुल की ही नाड़ी होनी चाहिये, किन्तु इसकी मोटाई
कलाय (मटर) जैसी और इसका रन्ध्र (छेद) कुलथी के
आने-जाने योग्य होना चाहिये।
प्रकार-भेद से धूमपान
अथेषिकां प्रलिम्पेच्च सुश्लक्ष्णां द्वादशाङ्गुलाम् ।। 15 ।।
धूमद्रव्यस्य कल्केन लेपश्चाष्टाङ्गुलः स्मृतः।
कल्कं कर्षमितं लिप्त्वा छायांशुष्कं च कारयेत् ।। 16 ।।
ईषिकामपनीयाथ स्नेहाक्तां वर्तिमादरात्।
अङ्गारैर्दीपितां कृत्वा धृत्वा नेत्रस्य रन्ध्रके ।। 17 ।।
वदनेन पिबेद् धूमं वदनेनैव सन्त्यजेत्।
नासिकाभ्यां ततः पीत्वा मुखेनैव वमेत् सुधीः ।। 18 ।।
बारह अंगुल लम्बी तथा साफ चिकनी एक सलाई लें
और उस पर धूमोपयोगी द्रव्यों के कल्क का लेप करें। यह
लेप आठ अंगुल लम्बा (दोनों ओर दो-दो अंगुल सलाई
रखनी चाहिये) तथा कल्क का परिमाण एक कर्ष (1 तोला)
हो। इसे छाया में सुखा लें और सूख जाने पर सावधानी के
साथ सलाई को निकाल कर बत्ती को स्नेह में भिगा लें, फिर
इसे अंगारों से क्व ओर अग्नि लगाकर और दूसरी ओर के
नेत्र अर्थात् नलिका के रन्ध्र में फँसाकर मुख से धूमपान करें
और मुख से ही धूम (धुँआ) का परित्याग करें। इसके पश्चात्
नाक से धूमपान करके मुख से निकाल दें।
वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि नाक से धुवाँ निकालना
उचित नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर नाक से धूमपान किया
जा सकता है।
व्रणधूपन-विधि
शरावसम्पुटे क्षिप्त्वा कल्कम्ङ्गारदीपितम्।
छिद्रे नेत्रं निवेश्याथ व्रणं तेनैव धूपयेत् ।। 19 ।।
उपयोगी द्रव्यों का कल्क सम्पुट में रखकर उस सम्पुट
को अग्नि पर रख दें। उसके छिद्र (यह छिद्र पहले ही कर
लेना चाहिये) में नलिका लगा दें। इस प्रकार व्रण का धूपन
करें।
विविध धूपन-प्रयोग
एलादिकल्कं शमने स्निग्धं सर्जरसं मृदौ।
रेचने तीक्ष्णकल्कं च कासघ्नं क्षुद्रिकोषणम् ।। 20 ।।
वामने स्नायुचर्माद्यं दद्याद् धूमस्य पानकम्।
व्रणे निम्बवचाद्यं च धूपनं सम्प्रशस्यते ।। 21 ।।
शमनधूप में एलादिगण का (कुष्ठ और तगर को
छोड़कर) कल्क, मृदु में स्नेह युक्त फल (बिभीतक, बादाम
आदि) तथा राल (मोम, गूगल आदि) का कल्क, रेचनधूम
में तीक्ष्ण द्रव्यों का कल्क, कासघ्न में कण्टकारी, काली
मिरच आदि द्रव्यों का कल्क, वामनधूप में में स्नायु तथा चर्म
(चमड़ा) आदि प्रयुक्त किये जा सकते हैं और व्रण में नीम
तथा वचा आदि की धूप देन' प्रशस्त है।
वक्तव्य-उक्त पाठ सु० चि० अ० 40.4 का पद्यानुवाद
मात्र है। एलादिगण के द्रव्यों सु० सू० अ० 38 में देखें।
254 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
बालग्रहनाशक-धूपन
अन्येऽपि धूमा गेहेषु कर्तव्या रोगशान्तये।
मयूरपिच्छं निम्बस्य पत्राणि बृहतीफलम् ॥ २२ ॥
मरिचं हिङ्गु मांसी च बीज कार्पाससम्भवम्।
छागरोमाहिनिर्मोकं विष्ठा बैडालिकी तथा ॥ २३ ॥
गजदन्तश्च तच्चूर्णं किञ्चिद् घृतविमिश्रितम् ।
गेहेषु धूपनं दत्तं सर्वान् बालग्रहाञ्जयेत् ॥ २४ ॥
पिशाचान् राक्षसाञ्जित्वा सर्वज्वरहरं भवेत्।
रोगों की शान्ति के लिए और भी धूपों के प्रयोग घरों में
किये जाते हैं, जिनका वर्णन यहाँ प्रस्तुत-मोर के पंख, नीम
के पत्र वनभण्टा के फल, मरिच, हींग, जटामांसी, कपास के
बीज (बिनौले), बकरे के रोम, साँप की केंचुली, बिल्ली की
विष्ठा और हाथी के दाँत-इन सबका चूर्ण बनाकर, उसमें
थोड़ा घी मिलाकर घरों में धूप दें। यह धूप सभी प्रकार के
बालग्रहों को जीत लेता है। यह पिशाच और राक्षसों को
जीतकर सभी प्रकार के ज्वरों को भी हरता है।
वक्तव्य-हवन करना भी धूप या धूम-प्रयोग ही है।
मुख द्वारा पीने योग्य धुँये को धूम तथा दूसरे को धूप कहा
जाता है। यह वायु-शुद्धि का सर्वोत्तम उपाय है। भूतविद्या में
भूतबाधा की शान्ति के लिए इसका पर्याप्त प्रयोग किया
जाता है।
पथ्य-अपथ्य आदि निर्देश
परिहारस्तु धूमेषु कार्यो रेचननस्यवत् ॥ २५ ॥
नेत्राणि धातुजान्याहुर्नलवंशादिजान्यपि ।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे धूमपानविधिर्नाम
नवमोऽध्यायः ॥ १ ॥
धूमों के सेवन में रेचन-नस्य के समान ही परिहार
(पथ्यापथ्य) किया जाता है और धूमपान के लिये जो नेत्र या
नलिकायें बनायी जाती हैं, वे धातुओं की अथवा नरसल एवं
बाँस आदि की बनानी चाहिये।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का नवाँ अध्याय समाप्त ॥ ९॥
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दशमोऽध्यायः
गण्डूषादिविधिः
गण्डूष-कवल-विधि
चतुर्विधः स्याद् गण्डूषः स्नैहिकः शमनस्तथा।
शोधनो रोपणश्चैव कवलश्चापि तद्विधः ।। 1 ।।
स्निग्धैस्तु स्नेहिको वाते स्वादुशीतैः प्रसादनः।
पित्ते कट्वम्ललवणैरुष्णैः संशोधनः कफे ।। 2 ।।
कषायतिक्तमधुरैः कदुष्णो रोपणो व्रणे।
चतुष्प्रकारो गण्डूषः कवलश्चापि कीर्तितः ।। 3 ।।
गण्डूष चार प्रकार का होता है- 1. स्नैहिक, 2. शमन,
3. शोधन और 4. रोपण। इसी प्रकार कवल भी चार प्रकार
का होता है। स्निग्ध द्रव्यों का स्नैहिक गण्डूष होता है, वात
रोगों में स्वादु (मधुर) तथा शीतल द्रव्यों का प्रसादन अर्थात्
शमन गण्डूष होता है। पित्तज रोगों में कटु, अम्ल, लवण तथा
उष्ण द्रव्यों का शोधन गण्डूष होता है। कफज रोगों में कषाय,
तिक्त, मधुर, कुछ उष्ण द्रव्यों का रोपणगण्डूष होता है, अर्थात्
जो व्रणों के घावों को भरता है। इसी प्रकार कवल भी कहा
गया है।
वक्तव्य-केवल द्रव्यों तथा मात्रा के भेद से गण्डूष
(कुल्ला) तथा कवल (कौर या ग्रास) के चार भेद माने गये
हैं। मुख के भीतरी अवयवों की चिकित्सा के ये उत्तम माध्यम
हैं।
गण्डूष तथा कवल में भेद
असञ्चारी मुखे पूर्णे गण्डूषः कवलश्चरः।
तत्र द्रवेण गण्डूषः कल्केन कवलः स्मृतः ।। 4 ।।
दद्याद् द्रवेषु चूर्णं च गण्डूषे कोलमात्रकम्।
कर्षप्रमाणः कल्कश्च दीयते कवले बुधैः ।। 5 ।।
गण्डूष का द्रव मुख में इतना भर लिया जाता है कि वह
पूर्ण रूप से घुमाया नहीं जा सकता और कवल का द्रव इतना
ही डाला जाता है, जो मुख में इधर-उधर घुमाया जा सकता
है। गण्डूष द्रव पदार्थों का होता है और कवल कल्क किये
हुये द्रव्यों का। गण्डूष के द्रवों में यदि चूर्ण डालना हो तो एक
कोल (आधा कर्ष या आधा तोला) डाला जाता है और
कवल में कल्क एक तोला भर दिया जाता है।
गण्डूषादि सेवन में वय का विचार
धार्यन्ते पञ्चमाद् वर्षाद् गण्डूपकवलादयः।
गण्डूषान् सुस्थितः कुर्यात् स्विन्नभालगलादिकः ।। 6 ।।
मनुष्यस्त्रींस्तथा पञ्च सप्त वा दोषनाशनात्।
कफपूर्णास्यता यावच्छेदो दोषस्य वा भवेत् ।। 7 ।।
नेत्रघ्राणस्रुतिर्यावत् तावद् गण्डूषधारणम्।
पाँच वर्ष की आयु के पश्चात् तथा कवल का प्रयोग
करना उचित है। शिर तथा गले आदि का स्वेदन करने के
पश्चात् स्वस्थ होकर गण्डूष करने चाहिये। मनुष्य तीन, पाँच,
सात बार अथवा दोष का नाश होने तक गण्डूष करें। एक
गण्डूष को मुख में तब तक रखना चाहिये, जब तक मुख में
कफ न भर जाये अर्थात् गण्डूष के द्रव की लार बन जाये,
अथवा दोष का विनाश हो जाये और आँख तथा नाक में से
स्राव होने लगे, तब तक गण्डूष धारण करना चाहिये।
वक्तव्य-इस श्लोक के पहले और तीसरे पाद द्वारा एक
गण्डूष के धारण का काल बतलाया गया है और दूसरे पाद
द्वारा गण्डूषों के प्रयोग का काल बतलाया गया है।
स्नैहिक गण्डूष
तिलकल्कोदकं क्षीरं स्नेहो वा स्नैहिके हितः ।। 8 ।।
तिला नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च।
सक्षौद्रो हनुवक्त्रस्थो गण्डूषो दाहनाशनः ।। 9 ।।
तिलों का कल्क, जल, दूध, स्नेह, 'स्नैहिक' गण्डूष में
प्रयुक्त होते हैं। इसका एक उदाहरण-तिल, नीलकमल, घृत,