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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

रसादिशोधनमारणकल्पना

द्वादशोऽध्यायः
रसादिशोधनमारणकल्पना


पारद के गुण
पारदः सर्वरोगाणां जेता पुष्टिकरः स्मृतः।
सुज्ञेन साधितः कुर्यात् संसिद्धिं देहलोहयोः॥१॥
पारद (पारा) सम्पूर्ण रोगों को जीतता है, शरीर को पुष्ट
करता है और बुद्धिमान् कार्यकर्त्ता द्वारा सिद्ध (तैयार) किया
हुआ शरीर एवं धातुओं पर सिद्धि या सफलता को प्रदान
करता है।
वक्तव्य-पारद सुप्रसिद्ध खनिज द्रव्य है, इसे शिववीर्य
भी कहते हैं। इसकी उपासना ईश्वर का उपासना के समान है।
इटली, स्पेन तथा संयुक्तराज्य अमेरिका आदि देशों में अत्यन्त
गहरे (2450 फीट तक के) पारद कूप हैं, उनमें से,
पारद-मिश्रित खनिजों में से तथा हिंगुल (शिंगरफ) से पारद
प्राप्त किया जाता है।
पारद के नाम
रसेन्द्रः पारदः सूतो हरजः सूतको रसः।
मुकन्दश्चेति नामानि ज्ञेयानि रसकर्मसु॥२॥
रसशास्त्र के विद्वान् पारद के निम्नलिखित नाम स्वीकार
करते हैं-रसेन्द्र, पारद, सूत, हरज, सूतक एवं रस।
वक्तव्य-उक्त नामों के अतिरिक्त इसके और भी बहुत
से नाम हैं, उनको निघण्टुओं में देखें।
ग्रहानुसार धातु नाम
ताम्रतारारनागाश्च हेमवङ्गौ च तीक्ष्णकम्।
कांस्यकं कान्तलोहं च धातवो नव ये स्मृताः॥३॥
सूर्यादीनां ग्रहाणां ते कथिता नामभिः क्रमात्।

  1. ताम्र (ताँबा), 2. तार (चाँदी), 3. आर (पीतल),
  2. नाग (सीसा), 5. हेम (सोना), 6. वंग (कली), 7.
    तीक्ष्णक (तीक्ष्णलोह या फौलाद), 8. कांस्यक (काँसा)
    एवं 9. कान्तलोह (चुम्बक)-ये नौ द्रव्य 'धातु' माने जाते

हैं। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा
केतु इन नामों के क्रम से उक्त धातुओं के नाम कहे गये हैं।
पारद की शोधन-विधि
राजीरसोनमूषायां रसं क्षिप्त्वा विबन्धयेत्॥४॥
वस्त्रेण दोलिकायन्त्रे स्वेदयेत् काञ्जिकैस्त्र्यहम्।
दिनैकं मर्दयेत् सूतं कुमारीसम्भवैर्द्रवैः॥५॥
तथा चित्रकजैः क्वाथैर्मर्दयेदेकवासरम्।
काकमाचीरसैस्तद्वद् दिनमेकं च मर्दयेत्॥६॥
त्रिफलायास्तथा क्वाथै रसो मर्द्यः प्रयत्नतः।
ततस्तेभ्यः पृथक्कुर्यात् सूतं प्रक्षाल्य काञ्जिकैः॥७॥
ततः क्षिप्त्वा रसं खल्वे रसादर्धं च सैन्धवम्।
मर्दयेन्निम्बुकरसैर्दिनमेकमनारतम् ॥८॥
ततो राजी रसोनश्च मुख्यश्च नवसादरः।
एतै रससमैस्तद्वत् सूतो मर्द्यस्तुषाम्बुना॥९॥
ततः संशोष्य चक्राभं कृत्वा लिप्त्वा च हिङ्गुना।
द्विस्थालीसम्पुटे धृत्वा पूरयेल्लवणेन च॥१०॥
अधः स्थाल्यां ततो मृद्भां दद्याद् दृढतरां बुधः।
विशोष्याग्निं विधायाधो निषिञ्चेदम्बुनोपरि॥११॥
ततस्तु कुर्यात् तीव्राग्निं तदधः प्रहरत्रयम्।
एवं निपातयेदूर्ध्वं रसो दोषविवर्जितः॥१२॥
अथोर्ध्वपिठरीमध्येग्नो ग्राह्यो रसोत्तमः।
राई तथा लहसुन के कल्क का मूषायन्त्र बनायें, फिर
इसमें पारद डालकर और कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र द्वारा
काञ्जी में तीन दिन तक स्वेदन करें। तत्पश्चात् इसमें से पारद
को निकालकर घीकुआर के रस में, चीता के रस में, मकोय
के रस में और त्रिफला के रस में एक-एक दिन भली-भाँति
मर्दन करें। इसके पश्चात् उक्त द्रवों में से पारद को पृथक् कर
काञ्जी से धो दें और खरल में डालकर और पारद की अपेक्षा

188 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
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अर्द्धभाग सेंधा नमक मिलाकर नींबू के रस के साथ एक दिन
निरन्तर (लगातार) घोटते रहें, इसके पश्चात् पारद के समान
भाग राई, लहसुन तथा नौसादर के साथ मिलाकर तुषाम्बु
(जौ की काँजी, देखें-शा० सं० म० खं० अ० 10) से मर्दन
करें। तत्पश्चात् उक्त सब (राई, लहसुन, नौसादर तथा पारद)
द्रव्यों की टिकिया बनाकर और उस पर हींग का लेप करके
सुखा लें। इस टिकिया को हँडिया के तलभाग में रख दें और
ऊपर से पिसा हुआ सैन्धव लवण भर दें। इस हँडिया के मुख
पर दूसरी हँडिया का मुख जोड़कर कपड़मिट्टी द्वारा अत्यन्त
दृढ़ कर दें। इसे सुखाकर चूल्हे पर रखकर नीचे मन्द-मन्द
अग्नि दें। ऊपर वाली हँडिया को शीतल जल से सींचते रहें
(सूखने न दें) और अग्नि को तीक्ष्ण करते जायें। इस प्रकार
तीन प्रहर की आँच देने से पारद का ऊर्ध्वपातन हो जाता है,
अर्थात् पारद उड़कर ऊपर की हँडिया में लग जाता है और
दोष-रहित हो जाता है। स्वांगशीतल होने पर ऊपर की हँडिया
में लगा हुआ उत्तम पारद ग्रहण कर लें।
**वक्तव्य-**प्रायः इसी विधि से पारद का शोधन किया
जाता है। ऊर्ध्वपातन के समान ही अधःपातन तथा
तिर्यक्पातन का भी विधान है। पारद के विविध संस्कारों को
रसत्नसमुच्चय आदि रस-ग्रन्थों में देखें।
गन्धक शोधन-विधि
लोहपात्रे विनिक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत् ।। 13 ।।
तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद् गन्धकजं रजः।
विद्रुतं गन्धकं ज्ञात्वा दुग्धमध्ये विनिःक्षिपेत् ।। 14 ।।
एवं गन्धकशुद्धिः स्यात् सर्वकार्येषु योजयेत्।
लोहे के पात्र (बड़ा कड़छुल) में डालकर घी को तपायें।
जब घी तप जाये या पिघल जाये तो समान भाग गन्धक का
चूर्ण डाल दें और जब गन्धक पिघल जाये तो दूध में डाल दें।
इस प्रकार गन्धक शुद्ध हो जाता है। इस (शुद्ध गन्धक) को
सब कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये।
**वक्तव्य-**गन्धक को अत्यन्त मन्द अग्नि पर पिघलाना
चाहिये, अन्यथा गन्धक विवर्ण हो ही जाती है। दूध को चौड़े
मुख वाले पात्र में डालना चाहिये और उसके मुख पर कपड़ा
बाँध देना चाहिये, ताकि इसमें से छनकर गन्धक दूध में जाये
और कंकड़-पत्थर आदि पदार्थ अलग हो जायें। गन्धक को
दूध में से निकालकर तथा उष्ण जल में अनेक बार धोकर
सुखाकर रख लें।
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शिंगरफ शोधन-विधि
मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् ।। 15 ।।
सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम्।
दरद (शिंगरफ) को भेड़ के दूध की एवं नींबू के रस
की सात-सात भावनायें देनी चाहिये और भली-भाँति उसे ये
पीसना चाहिये। इस प्रकार वह अवश्य शुद्ध हो जाता है।
**वक्तव्य-**शिंगरफ पारद तथा गन्धक का यौगिक द्रव्य
है। यह दो प्रकार का होता है-1. खनिज (जो खानों में से
प्राप्त होता है) और 2. कृत्रिम, जो पारद तथा गन्धक के
संयोग से बनाया जाता है। आजकल रूमी या नरमा नाम की
जो शिंगरफ आती है, वे सब कृत्रिम ही हैं। इनमें से एक सेर
में 12-13 छटाँक पारद निकल जाता है।
शिंगरफ से पारा निर्माण-विधि
निम्बूरसैर्निम्बपत्ररसैर्वा याममात्रकम् ।। 16 ।।
पिष्ट्वा दरदमूर्ध्वं च पातयेत् सूतयुक्तिवत्।
ततः शुद्धरसं तस्माद्गृह्णीत्वा कार्येषु योजयेत् ।। 17 ।।
दरद (शिंगरफ) को नींबू के रस से अथवा नीम के पत्तों
के रस से पीसकर और सुखाकर डमरू-यन्त्र द्वारा ऊर्ध्वपातन
की विधि से पारद को उड़ा लें और स्वांग शीतल होने पर
ऊपर के पात्र में से पारद को लेकर सभी कार्यों में प्रयुक्त करें।
**वक्तव्य-**यह पारद सर्वथा शुद्ध होता है। इसके अन्यान्य
संस्कार करने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। यदि संस्कार
किये भी जायें तो अच्छा ही है।
**डमरू यन्त्र निर्माण विधि-**एक हँडिया में द्रव्य डाल
दिया जाता है और उसके मुख पर दूसरी हँडिया का मुख
मिलाकर कपड़मिट्टी करके जोड़ दिया जाता है, बस यही
'डमरूयन्त्र' है।
पारद को बुभुक्षित करने की विधि
कालकूतो वत्सनाभः शृङ्गकश्च प्रदीपकः।
हालाहलो ब्रह्मपुत्रो हारिद्रः सक्तुकस्तथा ।। 18 ।।
सौराष्ट्रिक इति प्रोक्ता विषभेदा अमी नव।
अर्कस्नेहुण्डधत्तूरलाङ्गलीकरवीरकम् ।। 19 ।।
गुञ्जाऽहिफेनाविट्येताः सप्तोपविषजातयः।
एतैर्विमर्दितः सूतश्छिन्नपक्षः प्रजायते ।। 20 ।।
मुखं च जायते तस्य धातूंश्च ग्रसते क्षणात्।

  1. कालकूट, 2. वत्सनाभ (मीठा विष), 3. शृंगिक
    (सिंगिया), 4. प्रदीपक, 5. हालाहल, 6. ब्रह्मपुत्र, 7. हारिद्र,
  2. सक्तुक तथा 9. सौराष्ट्रिक-ये नौ पदार्थ विष कहे जाते हैं।