शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें16 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
उपवन आयुर्वेदीय शिक्षा देने की दृष्टि से महाविद्यालयों,
विश्वविद्यालयों की भूमि पर लगाये जाते हैं। औषध-ग्रहण या
संग्रहण की विधि तन्त्रशास्त्र में भी देखी जाती है। यहाँ 'प्रातः'
शब्द का अर्थ सूर्योदय के पूर्व भी लिया जा सकता है और
'आदित्यसम्मुखः' का अर्थ पूर्वाभिमुख भी देखा जाता है।
सुवासरे का अर्थ है-शुभ दिन में। ज्योतिःशास्त्र के अनुसार
तिथि, वार, चन्द्र तथा नक्षत्र जिस दिन अनुकूल हों, उसे
'सुवासर' कहा जाता है। इसके लिए मुहूर्तचिन्तामणि का
नक्षत्र-प्रकरण देखें। मौनी शब्द से औषधिग्रहण के मन्त्र का
मन ही मन जप करने का यह संकेत मिलता है। नमस्कृत्य
शिवं हृदि-शिव संसार का कल्याण करने वाले देव हैं और
इन्हीं का एक नाम 'मृत्युञ्जय' है। चिकित्सा का मूल लक्ष्य
मृत्यु को जीतना ही है। अतएव औषधिग्रहण काल में इन्हें
प्रणाम करने का निर्देश किया है।
त्रिविध देश-लक्षण
(बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान्।
जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ।। 64 ।।
संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ।)
जिस देश में जल अधिक बरसता हो; झील, नदी, नाले,
तथा कुएँ, आदि अधिक हों तथा नग अर्थात् पेड़, पहाड़
अधिक हों और कफ एवं वात दोष के कारण होने वाले रोग
जहाँ अधिक होते हों, वह 'आनूप देश' है। जिस देश में जल
तथा वृक्ष (अनूप देश की अपेक्षा) कम हों और पित्त, रक्त
तथा वात दोष सम्बन्धी रोग अधिक मात्रा में होते हों, वह
'जांगल देश' है। उक्त दोनों (आनूप तथा जांगल) देशों के
लक्षणों से युक्त लक्षण जिसमें दिखलायी दें, वह 'साधारण
देश' माना जाता है।
वक्तव्य-औषध-संग्रह, रोग-निर्णय, तथा साध्यासाध्य-
विचार आदि के अवसर पर इन देशों का भी सहारा लिया
जाता है। इस दृष्टि से समस्त भूमण्डल का विचार किया जा
सकता है। इनका विशेष विवरण देखें-च० वि० अ० 3..
47-48। च० क० अ० 1.8। अत्रिसंहिता। सु० सू० अ० 36
तथा राजनिघण्टु में।
द्रव्यग्रहण-निर्देश
साधारणधराद्रव्यं गृह्णीयादुत्तराश्रितम् ।। 65 ।।
(द्रव्याणि तत्र जायन्ते तद्गुणानि विशेषतः ।)
साधारण भूमि (देश) में उत्पन्न उस औषधद्रव्य को
ग्रहण करना चाहिये, जो उत्तर दिशां की ओर उत्पन्न हुआ हो,
क्योंकि वहाँ (उस ओर) जो द्रव्य उत्पन्न होते हैं, वे विशेष
रूप से अपने-अपने गुणों से युक्त होते हैं।
वक्तव्य-'उत्तराश्रितम्' इसका महत्त्व ऊपर 61वें पद्य
में इस प्रकार वर्णित है-'सौम्यो हिमगिरिर्मतः' अर्थात् उत्तर
दिशा सौम्यगुण से समृद्ध होती है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी
संहिता में इस पद्य को दिया है, जिसका पूर्वार्ध भिन्न है।
देखें-सु० सू० अ० 36.14।
निन्दित भेषज द्रव्य
वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः ।। 66 ।।
जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसिद्धदाः ।
वल्मीक (वामी या दीमकों से बनाया गया मिट्टी का
टीला) पर उत्पन्न या उससे घिरी हुई, कुत्सित (निन्दित,
गन्दे) स्थान में पैदा हुई, अनूपदेशज, श्मशान भूमि (जहाँ
मरे हुये पुरुषों को जलाया अथवा गाड़ दिया जाता है, उस
स्थान) पर, ऊषर (बंजर भूमि अथवा नमक या रेह के कणों
से व्याप्त) भूमि पर तथा मार्ग के बीच में या उसके
अगल-बगल में उत्पन्न हुई अर्थात् जो पथिकों के पैरों से
कुचल दी गयी हो और जो कीड़ों से खायी गयी हो, जो आग
से जल गयी हो एवं हिम (बर्फ या पाला या ओला) से
व्याप्त हो, ऐसी ओषधियाँ कार्य में सिद्धि नहीं देती हैं। अतः
ऐसी औषधियों का संग्रह नहीं करना चाहिये।
वक्तव्य-आप ध्यान दें कि ग्रन्थकार ने इस प्रकार की
औषधियों के संग्रह का निषेध क्यों किया है? वल्मीक के
भीतर जहरीले सर्प रहते हैं। उनके स्पर्श या दंश से वे दूषित
हो सकती हैं। कुत्सित शब्द स्वयं ही औषधि की अयोग्यता
का संकेत कर रहा है। अनूपदेशज औषधियाँ कफवर्धक तथा
वातकारक होती हैं। श्मशान-प्रदेश में उत्पन्न औषधियाँ भूत-प्रेत
तथा चिता-धूम से दूषित होती हैं। मार्गज औषधियाँ अपने
स्वरूप में प्राप्त नहीं हो पाती हैं। शेष स्पष्ट है। तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण गुणसम्पन्न औषधद्रव ही कार्य (चिकित्सा) में
सिद्धि प्रदान कर सकते हैं।
ऋतुभेद से औषधद्रव्य-संग्रह
शरद्यखिलकार्यार्थ ग्राह्यं सरसमौषधम् ।। 67 ।।
विरेक-वमनार्थं च वसन्तान्ते समाहरेत् ।
सभी कार्यों (चूर्ण, गुटिका, लेप, अवलेह, आसव, तथा
अरिष्ट आदि) के लिए शरद् ऋतु (आश्विन-कार्तिक मासों) में