शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
शालिहोत्रम् । २७
अबलक की रंगत-जैसे कुम्मेत कितने ही रंग का होता है
उसी तरह अबलक के भी कितने ही भेद हैं । अबलक हिसार्द,
पीला, लाल, उजला और नीले रंगका होता है । कुम्मेत तेलिया
और लाखौरी रंगका होताहै । खंगका अर्थ सफेद है, यह खंग
घोडा कई प्रकार का होता है जैसे:-नुकरा, खंग, सब्ज रंग यूज
खंग; सुर्ख खंग ।
इन रंगोंके सिवाय और रंग के घोडे देखनेमें नहीं आतेहैं।
घोडे को लेते समय प्रथम ही उसकी चोटी और दुम की
परीक्षा करनी चाहिये ।
सर्गा आदि घोडों की परीक्षा ।
( १ ) घाकरा-इसका माथा सफेद होता है । ( २ ) खदहम
इसका रंग काला होता है । ( ३ ) मुजाहिल जिसके दाहिने
हाथ पांव सफेद होते हैं । ( ४ ) जरसम इसका ऊपर का होठ
सफेद होता है । ( ५ ) वोहताद । ( ६ ) अश्कर यह सिर से
पैर तक लाल रंग का होता है । ( ७ ) कुम्मेत यह तेलिया,
लाखौरी या छुहारे के रंग का होता है ।
जिसकी देह का रंग बादामी, किशमिशी वा छुहारे का सा
होवे और चोटी तथा दुमका रंग मैलाहो उसे कुल्ला कहते हैं ।
जिसकी देह पर सिंह की सी चित्तियां होती हैं, उसे वाघंबरी
कहते हैं ।
जिसकी देह का रंग बादामी तथा दुम घुटने और हाथ पांव
काले हों वह समन्द होता है ।
जिसकी सेली और कान कालेहों देहपर छोटी २ वा वडी २
पास पास वा अलग अलग धारियां हों उसे अवस कहते हैं
२८ शालिहोत्रम् ।
जिसके हाथ पांव, दोनों कान, माथा छाती और दुम सफेद
होते हैं यह बहुत अच्छा होता है। जिसके अण्डकोश और
गुह्येन्द्रिय पर चित्तियां होती हैं वह भी अच्छा होता है ।
लड़ाई के योग्य घोडे–जिन घोडों की हरिण की सी काली
आंखें ओष्ठ और नथने पतले महगवक की सी गर्दन, माथा नीचा,
लम्बी जिह्वा; मोर का सा सिर और गर्दन, चञ्चल गति, गर्दन
की जंड सफेद छोटा शिर, चौडी छाती, मोटे चूतड़, मोती की
लड़ी के से दांत चौड़ा मुख और नासिका, दोनों बाहु पुष्ट,
झुकी हुई पीठ; मोटे खुर पतली गठीली दुम, दोनों कान और
दुम के बाल नरम, तथा चमकीले, खड़े और घने होते हैं, ऐसा
घोडा लडाई में ले जाने के योग्य होता है ।
बुरे घोडे के लक्षण–फाख्ताई, दूधिया, काला; सौर, नीला;
किद्दह, जर्द चोटीवाला; सञ्जाव, कुरका, गर्दास ( जिसके माथे
से नाक तक एक सीधी लकीर तलवार के समान हो और सब
देह पर सफेदी का चिन्ह भी न हो ) शेर, गीदड़, भेडिये की
सी सूरतका चूहे वा हरिण की रंगत का, जिसके पेट पर सफेद
बाल हों, चल अर्थात् जिसके देह पर दो दो सफेद बाल मिल
कर फैले हों ये सब घोडे अशुभ समझे जाते हैं ।
शकील और माहरू के लक्षण–जिसके माथे पर एक सफेद
लकीर नाक तक चली गई हो और वैसी लकीर हाथ पांवों में
न हो उसे शकील कहते हैं । और जिसके माथे की चौड़ाई
पर एक लकीर हो उसे माहरू कहते हैं ये दोनों शुभ समझे
जाते हैं ।
शालिहोत्र । २९
सितारा पेशानी के लक्षण-जिसके माथेपर सफेद बाल नख के
समान अर्द्ध गोलाकार हों और जो अंगूठे से ढक जाते हों उसे
सितारा पेशानी कहते हैं, यह घोडा अशुभ होता है। चाहे ऐसे
घोडे के हाथ पांवों में सफेदी हो।
पटल के लक्षण-जिसके मस्तकपर नील कमल के समान चांद
सूरज बने हों उसे पटल कहते हैं, यह घोडा शुभ होता है।
अकवर के लक्षण-जो घोडा पटल, सितारा पेशानी वा शको-
लकी सूरतहोवे परन्तु साफ न हो और जैसे चन्द्रमा में झांई
होती है वैसेही सफेदी में कुछ रंगीन बाल लिपटे हुए, गोल वा
छिटके हुए से होते हैं। इन लक्षणों से युक्त घोडे को अकवर
कहते हैं। यह घोडा अशुभ होता है।
मुतलकुद्दीन के लक्षण-जिसके चारों हाथ पांव सफेद हों,
जिसके दोनों हाथ सफेद हो, या दोनों पांव ही सफेद हों अथ-
वां बांया हाथ सफेद हो, वा जिसके पांव के मोजे (नीचेके भाग)
सफेद हों। ये घोडे बहुत अच्छे होते हैं। इन घोडे के
नाम मुतलकुद्दोन, मुतलकुलयसार, और मुतलकुल रजलैन
कहते हैं।
गुलदस्तके लक्षण-जिसका हाथ सफेद होता हैं उसे गुलदस्त
कहते हैं यह बुरा नहीं समझा जाता है
चम्पदस्त की पहंचान-इसका दाहिना हाथ घुटने तक सफेद
होता है, यह बुरा हैं।
पद्म के लक्षण-जिनके हाथ पांवों की सफेदी में तिल होते हैं
यह घोडा पद्म कहाता है। इस देश में इसे बुरा नहीं समझते
३० शालिहोत्रम्
है परन्तु ईरानी मुग़ल इसे अशुभ समझते हैं।
अरजल के लक्षण-जिसके संपूर्ण देहका रंग एक प्रकार काहो
और एक पांव दूसरे रंगका हो वह घोडा बुरा समझा जाता
है इसे हिन्दी में यमदूत कहते हैं।
फूलका लक्षण-मुश्की, जर्दा, छल्ला, कुम्मैत कैसा हो हो उ-
सके चार जामेके तंग के बाहर सफेदी के दागहों, अथवा एक
या दोनों पुट्ठोंपर हों उसे फूल कहते हैं यह घोडा बुरा समझा
जाता है।
कृष्ण तिलके लक्षण-खंग या नुक्तरे पर फुलवारी की तरह
काले फूल हों, यूजपर सफेद या जर्द फूल हों और जर्देपर
गुलाब के सदृश फूल हों, तौ अच्छे समझे जाते हैं और
इनके सिवाय जो रङ्गत होती हो वह बुरी समझी जाती है।
शकल के लक्षण-जिसके भिन्न २ हाथ पांव सफेद हों जैसे
दाहिने हाथ और बांया पांव सफेद हों अथवा बांया हाथ और
दाहिना पांव सफेदहो वह शकल कहलाता है, यह घोडा
बहुत ही बुरा समझा जाता है।
आंख के दोषों का वर्णन-आंख में कई रङ्ग हों, कञ्जई, सुलै-
मानी, पीली वा सुनहरी कितने ही रङ्ग की हो एक आंख एक
रङ्ग की हो, दूसरे रङ्गकी दूसरी हो अथवा आंखें सुअर, बन्दर
वा कबूतर की सी हो ऐसा घोड़ा बुरा समझा जाता है।
चुगर की पहिचान-जिस घोडे की आंखें आदमी की सी
हों और कद छोटा हो वह घोडा अच्छा समझा जाता है।
ताफी की पहिचान-जिसकी एक आंख काली दूसरी सफेद
शालिहोत्रम् । ३१
हो अर्थात एक आंख आदमीकी सी हो दूसरी हरिणकी सी हो
यह घोडा बहुत ही बुरा समझा जाता हे ।
शाखदारकी पहिचान-जिसके सिर, कंधे, माथे जुल्फ या चो-
टीके नीचे आदमी की छोटी उंगली का सा चिह्न पाया जाय
उसे शाखदार कहते हैं. यह बहुत अशुभ होता है ।
गोशदारके लक्षण-जिस घोडेके कानकी जड में एक और कान
सा होता है, उसे गोशदार कहते हैं यह भी बुरा होता है।
थनीकी पहचान-जिस घोडेकी गुह्येन्द्रीकी बाहर की त्वचापर
छुहारे के समान दो थन लटकने हों उसे थनी कहते हैं । यह
भी बुरा होता है ।
अनी के लक्षण-जो थन के से चिन्हों पर लटके हुए न हों वह
अनी कहलाता हे यह घोडा अच्छा कहाता हे ।
एकांड के लक्षण-जिस घोडे के अंडकोष मुहरेदार हों अथवा
एक ही हो यह बुरा होता हे ।
अरुनाधारकी पहचान-जिस घोडेके अंडपर कुछ सीवनकासा
चिन्ह हो और थैली साफ हो उसे अरुनाधार कहते हैं, यह
घोडा अच्छा होता है ।
शुतरदंदान की पहचान-जिसके ऊंटके से बडे दांतहों, गिनती
में न्यूनाधिक हों, एकके ऊपर एक चढ गयाहो, अथवा एकही
दांत हो उसे उष्ट्रदंत कहते हैं, यह बुरा समझा जाता है ।
गजदंतकी पहचान-जिस घोडेका दांत हाथी वा सुअरकी त-
रह बाहर निकला हो वह अच्छा नहीं होता है ।
सगजुबानके लक्षण-जिसको जिह्वा सर्प वा कुत्तेकी तरह लट
की हुई हो उसे भी बुरा समझते हैं ।
३२ शालिहोत्रम् ।
कालजिह के लक्षण- जिसके तालु वा जिह्वा काले हों और
मुख पर कुछ ललाई न हो उसे कालजिह कहते हैं, सुश्की के
सिवाय ऐसे सब घोडे बुरे समझे जाते हैं ।
गावकौहानकी पहचान-जिसके कंधे अथवा गर्दनके पीछेकी
जगह बैल के समान ऊँची हो उसे गावकौहान कहते हैं, यहभी
बुरा होता हो ।
गावसुम्माके लक्षण- जिसका खुर बैलके खुरके समान बीचमें
फटा होवे उसे गावसुम्मा कहते हैं यह भी बुरा होता है ।
लखगरीके लक्षण-जिसके शरीरसे वा अगले पिछले धड़से
पत्थरके समान चिनगरी छूटती हों और नीचे खरखराहट हो
उसे लखगरी कहते हैं यह घोडा भी बुरा होता है ।
रोगोंका वर्णन-ताजी घोडेके दोनों पावोंके घुटनोंमें यह रोग
होता है कि यह दोनों घुटने ऊँचे और चौडे होजाते हैं और
भीतर से फूलकर ऊपरको उठ आते हैं इसे मोतडा कहते हैं ।
हड्डेके लक्षण- जिस जगहसे घुटना मुडता है वहां एककडी
चपटी वा नोकीली हड्डी निकलती है इससे पांव की सब ह-
ड्डियां नष्ट होजाती हैं, इसे हड्डा कहते हैं ।
वीर हड्डीकी पहचान-एक मोटी हड्डी पैरकी एडी से निकलती
है परन्तु यह शीघ्र ही अच्छी होजाती है ।
पुश्तकी पहचान-सुमके ऊपर जहां बालोंके चिन्ह होतेहैं वहां
का गोश्त गामची के ऊपर फूल जाता है उसे पुश्त कहते हैं।
चकाव की पहचान-जिसके दोनों हाथों की गामची के नीचे
मांस फूल आता है उसे चकावल कहते हैं यह पांचों प्रकार के
शालिहोत्रम् । ३३
रोग वाले घोडों के पांव सदा टूटे हुए रहते हैं।
कान्ताके लक्षण-गामचीकी चोडाईमें या ऊपर जिस घोडेके कौ
डियोंके चिन्ह दिखाई देते हों वह कान्ता कहलाता है, इसका
रोग उपाय करने पर जल्दी जाता रहता है।
कफगीरी की पहचान-जिसके तलुएका मांस खुर से बाहर
निकल जाता है उसे कफगीर कहते हैं यह रोग बुरा होता है।
बेजाकी पहँचान-जिसके पांवके मुट्ठे में आगे पीछे वा ऊपर
नीचे अंडेके बराबर मांस फूल जाता है उसे बेजा कहते है।
फ़ीलपाकी पहचान-इस रोगमें घोडेका पांव हाथीके पांव के
समान फूल जाता है, यह रोग बहुत बुरा होता है।
गज चर्मकी पहचान-इस रोगमें घोडे की खाल हाथी की
खाल के समान खुर्दरी होजाती है।
शिक्राक्रके लक्षण-जिसका सुम जगह जगहसे फट जाता है
उसे शिक्राक कहते हैं।
चेहरेके गुण दोषोंके वर्णन-जिस घोडेका माथा ऊंचा होता
है वह अशुभ तो नहीं होता परन्तु मंदपक्षा रहता है।
परेशीगोशका लक्षण-जिसके कान लंबे ढाले और दोनों
ओर को गिरे हुए होते हैं वह अच्छे नहीं होते।
तरुता गर्दनके लक्षण-जिस घोडेकी गर्दन सीधी होती है
और सिर झुकाकर नीचेको देखता चलता है, जिसके गर्दन तक
की जगह बराबर हो ऐसा घोडा तरुतागर्दन कहलाता है यह
अच्छा नहीं होता है।
जीनपुश्तकी पहचान-जिसकी पीठ नीचेको झुकी होवे उसे
३४ शालिहोत्रम्
कच्ची कहते है यह घोडा बोझ लादनेके योग्य नहीं होता ।
आहू शिकमकी पहचान-इस घोडेका पेट पीठ से लगा रहता
है कम खाता है इस लिये दुर्बल भी होता है यह घोडा शौकीन
लोगों के लिये अच्छा है ।
तवरगूंकी पहचान-जिसका पुट्ठा दुमतक झुका हुआ होता
है वह तवरगं कहलाता है ।
कुचलकी पहचान-जो घुटने टकराकर चलता है और जिसके
पिछले पांवों में घाव पड जाते हैं ।
कुशदहरूकी पहचान-दौडनेके समय चलने में जिसके पांव
चौडे पडते हैं और डामा डौलसा मालूम होता है, उसे कोई
अच्छा और कोई बुरा कहते हैं ।
घोडे के पांच अवगुणोंका वर्णन ।
जो घोडेमें नीचे लिखे हुए पांच अवगुण हों तो कभी न
लेना चाहिये और खरीदने वालेको उचित है कि बेचने वालेसे
कहदे कि जो इन पांच अवगुणों मेंसे कोई होगा तो एक सप्ताह
पीछे फेरदेंगे, ( १ ) कमरो वह कि जिसके ऊपर सवार होकर
चले और वह रुक जाय यह अडियल घोडा बुरा होता है ।
( २ ) कमखुर-यह घोडा दुबला पतला होता है इसे चाहे जि-
तना खिलाओ परन्तु यह मोटा नहीं होता और सूखी लीद
किया करता है ( ३ ) कुहनालंग उसे कहते हैं कि दो चार मं-
जिल करनेके पीछे लंगडाने लगता है ( ४ ) सबकोर वह है
जिसे रातमें कम दिखाई देता है वा किसी वस्तुको देखकर
झिफकने लगता है इसकी यह परीक्षा है कि अन्धेरी रात में
शालिहोत्रम् । ३५
एक सफेद चादर और चाँदनी रात में एक काला कम्बल उसके
सामने डाले इसे देखकर जो वह न झिझके तो अच्छा समझे ।
( ५ ) दन्दागीर वह घोडा है जो बिना छेडे ही काट खाता
है उसमें यह स्वाभाविक दोष होता है उपाय करने पर भी नहीं
मिटता ।
जब घोडा खरीदना हो तो घुडशाल में अकेला जाना उचि-
त है उसके मालिक को संग न लेजाय । क्योंकि घोडेवाला ज-
हां तक बन सकेगा उसके दोष छिपाने का उद्योग करेगा घोडे
को घुडशाल में से निकालते समय खरीदनेवाले को उचित है
कि घोडे के पीछे रहे क्योंकि घोडेवाले बहुधा पीछे से कुछ
ऐसा कर दिया करते हैं कि वह चलने में तीव्र मालूम हुआ
करता है परन्तु वास्तव में निकम्मा होताहै जिस घोडेकी गर्दन
पर बाल घने होतेहैं वह सुस्त हुआ करताहै और जिसकी गर्दन
पर कम बाल हुआ करते हैं वह अच्छा हुआ करता है ।
आख्ता करने की रीति-जिस जगह घोडे को आख्ता करना
हो वहां की पृथ्वी समान हो और मिट्टी भी नरम हो, जिससे
कङ्कर पत्थर न चुभने पावें उस भूमि में घोडेको पटककर चारों
टांगें बांधदे और पांच चार आदमी इसे दृढतासे पकडे रहें
जिससे हिलने न पावे । फिर आख्ता करनेवाला अपने दाहिने
हाथ में एक तेज उस्तरा लेकर बांये हाथ से अंडकोष को पकड़
कर बडी सावधानीसे चमडेको चीरकर अंडोंकोनिकाललेवे और
धीरे २ इस तरह खींचे कि नस सहित निकल आवे । इस समय
जिस लोहेसे दागनाहो उसे पहिले ही से कोयलोंकी आगमें सु-
६६ शालिहोत्रम् ।
रख करके तैयार रक्खे । औ नम के बाहर निकालते ही इस
लोहे से दाग देवे जिससे रुधिर न बहने पाये । इसके पीछे
कपडेको पानीमें भिगोकर उसी जगह पट्टीसे बांध देना चाहिये ।
तब घोडे को खोलकर इधर उधर टहला कर बांध दे और दो
घण्टे पीछे फिर इधर उधर टहला कर बांध दे उस दिन पानी
बिलकुल न पिलावे फिर कई दिनतक थोड़ा २ पानी पिलाता
रहे, चार पांच दिन तक कपडे की गद्दी को ( जो पट्टी बांधे
जिससे ) पानीसे तर रक्खे फिर कार्वोलिक तेल और मरहम
से घाव के सुखाने का उपाय करे । आराम होजाने पर चार
पांच महीने तक सवारी यादि किसी तरह के परिश्रम का काम
न ले, फिर धीरे धीरे उसको मिहनत पर लगावे । जो इससे
अण्डकोश के इधर उधर सूजन और कमर में दर्द मालूम हो
तो तेल की मालिश करदे ।
दवा देने की विधि- प्रथम ही घोडे को इधर उधर टहलाकर
अस्तबल में लाकर नांध दे और उसकी जिह्वा को हाथसे पकड़
कर बाहर निकाल कर मुख के एक ओर थामे रहे और दवा
को हाथ से मुख के भीतर कर तालु के पास छोड़ देवे औ-
हाथ को झटपट सावधानी से खींचकर जिन्हा को छोड़ देवे,
इस तरह घोडा अपने आप दवा खालेगा जो दवा सूखी हो
तो उसे बेसन व गेहूंके चून या सत्तू में गुड़के साथ मिलाकर
गोले से बना बना कर खिला देवे । जो दवा पतली हो तो उसे
नाल में भर कर पिलादे ।
रोगों के लच्छन-जैसे मनुष्यके देहमें कफ, बात, पित्त इन तीनों
शालिहोत्रम् । ३७
दोषोंके बिगडनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है वैसेही इन्हीं तीन
दोषोंमें गडबड होने से घोडों के रोग की उत्पत्ति होती है इन
दोषों को फारसी में क्रमसे वलगम, वादी और सफरा कहते
हैं। इन्हीं दोषों के अनुसार वादी वलगमी और सफरावी इन
तीन प्रकृतियों के घोडे होते हैं।
वातप्रकृति घोडोंके लक्षण-वादीकी प्रकृतिवाले घोडेके देहमें
खुश्की होती है, तरी नहीं रहती दाने चारे को मन मार कर
खाता है; अच्छी तरह खाने की रुचि नहीं करता, कडवी
वस्तुओं के खाने को उसको इच्छा रहती है, बहुत उछलता
कूदता है और देहपर रगें और नसें दिखलाई दिया करती हैं।
कफप्रकृति घोडेके लक्षण-कफकी प्रकृतिवाले घोडोंके रोम और
बाल; नरम, चिकने और मुलायम होते हैं, चलनेमें बडे तेज
और चालाक होते हैं, परन्तु चारा दाना कम खाते हैं।
पित्तप्रकृति घोडोंके लक्षण-पित्तप्रकृतिवाले घोडे बडे तेजस्वी,
शक्तिमान्, चलने में तीव्रवेगयुक्त, बिजलीके समान चंचल होते
हैं, और चारा, दाना बडी प्रसन्नता से खाता है यह घोडों में
उत्तम होता है, बीमार भी कम पडता है और देहमें तरी भी
अधिक होती है।
नाडीपरीक्षा-रुधिर की गति से भी घोडों के रोगी निरोगी
होनेके लक्षण जाने जाते हैं। घोडेकी नाडी प्रायः नीचेके जा-
बडे में देखी जाती है, यह नाडी उस जगह मिलती है जहां
नीचेके जाबडाकी दो हड्डियां नीचे ऊपरसे आकर एक कोणसा
बनाती हैं और वहां एक मोटी बत्ती के समान नाडी दिखाई
३८ शालिहोत्रम् ।
देती है, स्वस्थावस्था में इसकी गति एक मिनट में ४० वार
होती है, इससे न्यूनाधिक के होने पर इसकी स्वस्थता में अंतर
समझा जाता है।
मूत्रपरीक्षा-मूत्रकी रंगत सफेद हो तो सर्दी, पीली और गाढ़ी
हो तो वात कफकी अधिकता और लालहो तो गर्मीकी अधि-
कता जानी जाती है।
नेत्रपरीक्षा-आंखका रंग देखने से भी घोडे की बीमारी की
परीक्षा होती है। घोडेकी आंखका पलक उंगलीसे उठाकर देखे
जो उसकी रंगत गुलाबी हो तो निरोगी समझना चाहिये सफेद
हो तौ कफकी अधिकता पीली हो तौ वादीकी अधिकता और
ललाई होवै तौ गरमी की अधिकता समझनी चाहिये। जो
ललाई में कालापन भी हो तौ घोडे के बचने की आशा नहीं
रहती है।
मलपरीक्षा-जो घोडेके पतले दस्त आते हैं और दुर्गन्ध भी
उठती हो तौ पशुको अजीर्ण रोग समझना चाहिये और जो
उपाय करने पर भी दस्त जारी रहे तौ दस्तों की बीमारी
समझी जाती है।
आंखके रोग उनकी पहचान और दवा।
जिस घोडेकी आंखमें कोई झटका लग गयाहो जिससे पानी
बहता हो और आंखकी रंगत नारंगीके समान होगई हो तौ
पहिले दिन सायंकालके समय मिट्टी के एक पात्र में त्रिफला को
कूट करके भिगो देवे, दूसरे दिन प्रातःकाल उसे छानकर घोडे
की आंखमें छींटा मारे इस तरह दो तीन दिन करने से आराम
हो जायगा।
शालिहोत्रम् । ३६
जो चोट लगने से आंखमें ललाई आगई हो तो दो तीन
दिन तक नमक और फिटकरीके पानीसे धो डाले ।
अन्य दवा-समंदरफेन, पके हुए चावलों का माढ और शहद
तीनोंको मिलाकर आंखमें अंजन की तरह लगावै ।
आंखकी फूलीका इलाज-आंखकी फूलीके विषय में वे उपाय
काममें लाने चाहिये जो गौके आंखके रोगमें लिखे गएहैं उनके
सिवाय नीचे लिखे उपाय भी करे ।
पहिली दवा-साठी चावलको आकके दूधमें भिगोकर छायामें
सुखाके फिर इन्हें मिट्टीके पात्रमें भर आगपर जलाले, जबराख
होजाय तबनीचे लिखीदवा और मिलाले । सिरसके बीज दोतोले
हरे कांचकी चूड़ी दस माशे, लाहौरी नमक दो तोला इन सब
को बारीक पीस कपड़छन कर फूली पर लगावे ।
दूसरी दवा-फूली हुई फिटकरी और उसके बराबर ही सिंदूर
मिलाकर पीसले । इसमें से पांच वा छः रत्ती प्रतिदिन दो चार
आंख में फूली पर लगाता रहे ।
तीसरी दवा-मनुष्यकामूत्र लेकर घोडेकी आंखपर छींटा मारे
चौथी दवा-सांभर नमक और वंगलापन पीसकर पानी में
घोलकर मुँहमें भर २ कर घोडे की आंख पर दोतीन दिन तक
कुल्ले करे ।
पांचवीं दवा-सिंदूर और चीनी सुर्मे की तरह महीन पीसकर
आंखों में लगावै ।
छटी दवा-पत्थर का नमक शहद में मिलाकर आंखमें अंजन
लगावै ।
४० शालिहोत्रम् ।
सातवीं दवा-पुरानी ईंट को सुरमे के समान बारीक पीसकर
पानी में घोल बार २ छींटे देता रहे ।
आठवीं दवा-एक रोठेको पत्थर पर पीसकर आंख में आंजे ।
नवीं दवा-गेरू और तिगुना शोरा इन दोनोंको बारीक पीस
कर नलीमें भर फूली पर फूंके ।
दसवीं दवा-आदमी की खोपडी का सुर्मा बनाकर तीन दिन
लगावे ।
ग्यारहवीं दवा-घोंघाका चूना, पोली फिटकिरी और कांचकी
चूडी इन तीनों को समान भाग लेकर महीन पीस कर बुकनी
बनावे और नलीमें भरकर आंख में फूंके ।
बारहवीं दवा-गेहूं की मैदा, सांभरनमक और कांच की चूडी
इन तीनोंको पीसकर गोली बांधले और फिर पानी में रिगड
कर आंख में लगावै ।
तेरहवीं दवा-मुर्गी वा कबूतरकी ताजी बीट आंखमें आंजे ।
चौदहवीं दवा-हाथी का नख महीन पीसकर सुर्मे की तरह
आंख में आंजे ।
नाखून या जाले की दवा
यह रोग आंखके कोने में तीन फांक का पतला नोंकदार नि-
कship?कलता है, इसका मांस बढा कडा होता है ।
पहिली दवा-मुर्गीके अंडेके छिलके की राख, उसी के समान
गंधक और नीलाथोथा इन तीनोंको पीसकर आदमी के मूत्र में
गोली बांधे और आदमी के पेशाबमें ही घिसकर लगावै ।
दूसरी दवा-आदमीके बालकी राख, संगबसरेका पत्थर जिसे
शालिहोत्र । १९
मङ्गा दवाई कहते हैं और मस्र्फ़ेन इन तीनों को घिसकर गवा-
रपाठे के रस में घोंट कर दो सप्ताह तक लगावे ।
तीसरी दवा-कालीमिर्च बीजबन्द, भांग, सुहागा, सेंधानमक
फिटकरी फूली हुई, और गूगल इनको बराबर लेकर कड़वे तेल
में मिलाकर तजान लगावे ।
सूजा और लकलककी दवा-यह रोग आंख, अंडकोश वा
लोट में हुआ करता है, इसमें सूत का सा तार निकला करता
है, फिर आंख भी जाती रहती है, इसका काट डालना भी
अच्छा होता है ।
दवा-मेंढक को कुल्हडे में बन्द कर बहुत प्रचंड आगमें देदे
जब जल कर राख होजाय तब उसमें तेल मिलाकर दोनों
समय लगावे ।
नखोली की दवा-रेशमी कपड़े को पानी में आठवार भिगो-
भिगोकर सुखावे फिर शराब में भिगो बत्ती बना पावभर तेल
के दीपक में जलावे ऊपर से तांबे का बर्तन ढाक दे जब तेल
जल जाय तब काजल निकाल शहदमें मिला आंखोंमें लगावे ।
दूसरी दवा-सफेद मूसली को सिरके में घिसकर लगावे ।
नाक से रुधिर बन्द करनेका उपाय ।
जिस घोडे की नाक से रुधिर बहता हो उसकी नाक में हिरन
या भैंस के सींग की राख नली में भर कर फूंक देवे ।
दूसरी दवा-आदमी का मूत्र छः ड्राम और इतना ही तिल
का तेल दोनों को मिलाकर नली में भरकर फूंके ।
तीसरी दवा-गौ का ताजी घी सिर पर मलै और सीने के
किनारे फस्द भी खोले ।
द्वितीय अध्याय: दन्त-परीक्षा द्वारा आयु-निर्णय एवं गति-विज्ञान
४२ शालिहोत्रम् ।
चौथी दवा-काले गधे की लीद और केले की जड़ इन दोनों
का अर्क निकाल घोडे को लिटाकर पैसे पैसे भर दोनों नथनों
में डाल दे ।
दांतों की खटाई और जीभके सूखेपन का उपाय ।
जो घोड़ा दाना घास खाने को चाहे पर खा न सके तौ उस-
के दांतों में खटाई अथवा सूखापन होता है इसमें कनेर की
छाल पीस कर शहद में मिलाकर नीबू के बराबर गोली बना
चार दिन तक खिलावे ।
नासिका के कीड़ों का उपाय-कभी नाक से कीड़े झड़ते हैं
और दुर्गन्धित रुधिर निकला करता है । इसमें वच, त्रिकुटा,
त्रिफला इनको पीस कर इतने ही गुड़ में मिला घी में सानकर
खिलाना चाहिये ।
पानी में फिनाल मिलाकर पिचकारी द्वारा नाक भीतर से
धुलवानी चाहिये ।
रुधिरका वमन का उपाय-जो घोड़ा रुधिरको वमन करताहो
उसके लिये जामनकी छाल छाया में सुखा तीन अंडेकी सफेदी
मिला एक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल सात दिनतक खानेको दे ।
दूसरी दवा-शातरा, हरड, आंवला इन तीनों को बराबर ले
पाव पावभर दोनों समय दाना देनेसे घण्टेभर पहिले दिया करे,
पानी ठीक समय पर पिलावे इस रोगको सरसंबूताभी कहतेहैं ।
सिर के रोग का लक्षण-जब घोडे के सिर में वात पित्त वा
कफ से दर्द होता है तौ उसकी कान्ति मन्द पड जाती हैं, चारा
दाना खाना छोड़ देता है, आँखों से पानी और मुख से लार
बहने लगती है ।
शालिहोत्रम् । ५३
सिरके रोगका उपाय-शातरा, सोंठ काली मिरच, पीपल इन
सबको समान भागले पीसकर शराब में मिला सवेरे के समय
खिलावै ।
दूसरी दवा-नौसादर एक भाग, केशर चार भाग इन दोनों
को मिला माजूम बना सात दिन तक खिलावै ।
मुख रोगका लक्षण और दवा-इस रोगमें कफके साथ दुर्गन्ध
निकलती है, मुखकी रंगतकाली पड जाती है, दाने दाने से
निकल आते हैं और लगाम को नहीं चबा सकता है ।
इस रोग में तालूकी फस्द खोलना अच्छा है ।
दूसरा उपाय-सोंठ और पीपलको कूटकर चार सेर पानी में
औटावै जब आध सेर रह जाय तब पिलादे ।
मुखमें कांटोंका इलाज-इस रोगमें मुखके भीतर ऊपर नीचे
कांटे पड जाते हैं ।
पहिली दवा-कलमी शोरा, सैंधानमक, समंदर फेन, रसौत
इन चारोको समान भागले धायके फूलके रसमें मिला घोडे के
मुख में तीन दिन तक मलै ।
दूसरी दवा-धायके फूल, जड, पत्ती और छाल सब दो सेर
पानी में उबालकर घोडेके मुखमें गरम छिडके ।
तीसरा उपाय-किसी चमारसे उसके कांटे कटवा डालै फिर
आंबाहल्दी, कालाजीरा, और काली मिरच बराबर पीसकर
दिनमें दस बार मले ।
लवकामकी दवा-यह रोग दांतकी जडसे मिलकर होठ में
होता है । इसको नश्तरसे चीरकर मवाद निकाल डालै फिर
इसमें हल्दी और नमक पीसकर भरदे ।
४४ शालिहोत्र ।
दूसरा दवा-अदरख, पान, काली मिरच, ये तीनों चारा दाना
खाने से पहिले प्रातःकाल तीन दिन तक देवें ।
बास या तालूका इलाज ।
यह सूजन दांतसे मिलकर तालू तक होती है । इसको दाग
कर हल्दी और नमक मले और लबकामकी दवा पिलावे ।
खांसी जुकाम-इस रोगमें घोडेको बडा कष्ट होता है, जब यह
रोग बढ़ जाता है तो घोडे का मृत्युका कारण भी होजाता है,
जब घोडा परिश्रम करके आता हो और पसीने निकल रहे हों;
अथवा कुसमय पानी पिलाने से अथवा सर्दी लग जाने से यह
रोग उत्पन्न होजाया करता है । इसमें घोडे खांसने लगते हैं,
परन्तु इसमें पहिले उसकी नाक टपकने लगती है। खांसी
उत्पन्न होते ही इलाज करना उचित है क्योंकि जुकाम के बिग-
डने से बडे बडे उपद्रव खडे होजाते हैं ।
पहिली दवा अदरख के एक छोटे से टुकडे में एक वा दो
चनेके बराबर हींग भरकर उसे अग्निमें भूनना चाहिये फिर उसे
मलकर रखले और जौके आटेको माडकर छोटी गेंदके बरा-
बर उसकी गोलीसी बनाकर उसके बीचमें उस अदरखको रखदे,
यह गोली सायंकाल के समय दाना देनेके पीछे चार दिन तक
देनी चाहिये ।
दूसरी दवा-चनेके बराबर हींग लेकर पानी में गाढी गाढी
घोलले उसे कागजपर लपेटले उस कागजको एक टाटके टुकडे
में लपेटकर बत्तीसी बनाकर एक ओर उसमें आग लगादे
और दूसरा सिरा नाकमें लगादे जिससे उसका धुंआ जल्दी
शालिहोत्रम् । ४५
जल्दी नाक में घुमे ऐसा करने से दूसरे नथने में होकर कफ
निकल जायगा तीन चार दिन तक ऐसा करने से घोडा को
आराम होजाता है।
तीसरा उपाय-संभालू के पत्तों का रस निचोड कर तीन तीन
चार चार बूंद दोनों नथनों में टपकाकर उन छिद्रोंको रुईसे बंद
कर देवे फिर चार पांच मिनट पीछे रुई को निकाल लेवे तौ
कफ गिरना आरम्भ होजायगा, इसी तरह पांच चार दिन तक
दिन में दो दो तीन तीन बार करने से पशु को आराम हो-
जाता है।
चौथा उपाय-बडे घोडे को एक बादाम की मिंगी और छोटे
को आधी मिंगी दो तीन दिन तक दिनमें दोतीन बार देवै।
पांचवा उपाय-प्याज आध सेर, घृत पावभर और बकरे का
सिर इन तीनोंको कूटकर ढाई सेर पानी के साथ आगपर चढादे
नीचे मंदी मंदी आग देता रहे, जब बारह घंटे होजाय और
अधसेर जल रह जाय तब इसमें थोडासा नमक अंदाजसे डाल
देवे, और दाना खिलाने के पीछे इस जलसे बेसन के आटे को
मांडकर रोटी बना खिला देवै परन्तु उस दिन पानी न पिलावै
फिर दूसरे दिन घास और दाना खिलाकर पानी पिलाना चाहिए
यह औषधि अत्यन्त बलहीन घोडेको बहुत लाभकारी है ।
छठा उपाय-रोग की दशा में घोडे को पानी पिलाने के पीछे
एक प्याज खिला देनी चाहिए, पीछे बांस की थोडी सी हरी
पत्तियां खाने को देवै।
४६ शालिहोत्रम् ।
सातवां उपाय-अकड़टैया जड, फल, फूल, पत्ते समेत आग
जलावे उसमें से दो छटांक लेकर जौं के आटे में मिला गोली
बना दोनों समय चार पांच दिन तक देवे ।
आठवां उपाय-सेर भर अजवायन को आदमी के मूत्र में तीन
दिनतक भिगोवे फिर सायंकालके समय दाना देनेके पीछे इसमें
से जौंके आटेमें एक पैसे भर मिला गोला सा बना चार पांच
दिन तक खिलाना चाहिये ।
जुखाममें नाक टपकनेकी दवा-रोगी घोडेको दाना देनेके पी-
छे दो दिन तक भुनी हुई अदरक जौंके आटेमें मिलाकर देवे फिर
दो दिन तक दाना देने के पीछे एक छुहारा देवै ।
दूसरा उपाय-जो जुखाम के कारण आंख पीली पड गई हो तो
दस बारह दिनतक पावभर मेथी दाना और पैसे भर कालीमिरच
को पीसकर दोनों को मिला कर देता रहे ।
तीसरा उपाय-हींग छः रत्ती, सोंठ ४ माशे इन दोनों को
पीस जौं के आटे में मिला दाना देने के पीछे चार पांच दिन
तक देता रहे ।
कुरकुरी का वर्णन-यूनानी शालहोत्र वालों ने इस रोग को
सात प्रकार का लिखा है और डाक्टर लोग इसे केवल दो ही
प्रकार का बताते हैं [ १ ] मूत्र बन्द होने से [ २ ] दस्त बन्द
होनेसे यह रोग बहुधा खाने पीने की समता विषमता से हुआ
करता है। इसमें घोडेके मुखसे पानी टपका करता है, और प-
सीना अधिक निकलता है, न वह लेट सकता है न बैठता है
और कभी २ चारों पैरों को फैलाकर लेटता है, उसके पेट में
बहुत पीडा मालूम होती है ।