शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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कालजिह के लक्षण- जिसके तालु वा जिह्वा काले हों और
मुख पर कुछ ललाई न हो उसे कालजिह कहते हैं, सुश्की के
सिवाय ऐसे सब घोडे बुरे समझे जाते हैं ।
गावकौहानकी पहचान-जिसके कंधे अथवा गर्दनके पीछेकी
जगह बैल के समान ऊँची हो उसे गावकौहान कहते हैं, यहभी
बुरा होता हो ।
गावसुम्माके लक्षण- जिसका खुर बैलके खुरके समान बीचमें
फटा होवे उसे गावसुम्मा कहते हैं यह भी बुरा होता है ।
लखगरीके लक्षण-जिसके शरीरसे वा अगले पिछले धड़से
पत्थरके समान चिनगरी छूटती हों और नीचे खरखराहट हो
उसे लखगरी कहते हैं यह घोडा भी बुरा होता है ।
रोगोंका वर्णन-ताजी घोडेके दोनों पावोंके घुटनोंमें यह रोग
होता है कि यह दोनों घुटने ऊँचे और चौडे होजाते हैं और
भीतर से फूलकर ऊपरको उठ आते हैं इसे मोतडा कहते हैं ।
हड्डेके लक्षण- जिस जगहसे घुटना मुडता है वहां एककडी
चपटी वा नोकीली हड्डी निकलती है इससे पांव की सब ह-
ड्डियां नष्ट होजाती हैं, इसे हड्डा कहते हैं ।
वीर हड्डीकी पहचान-एक मोटी हड्डी पैरकी एडी से निकलती
है परन्तु यह शीघ्र ही अच्छी होजाती है ।
पुश्तकी पहचान-सुमके ऊपर जहां बालोंके चिन्ह होतेहैं वहां
का गोश्त गामची के ऊपर फूल जाता है उसे पुश्त कहते हैं।
चकाव की पहचान-जिसके दोनों हाथों की गामची के नीचे
मांस फूल आता है उसे चकावल कहते हैं यह पांचों प्रकार के