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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 130 में से

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पृष्ठ 52

शालिहोत्रम् । ३३
रोग वाले घोडों के पांव सदा टूटे हुए रहते हैं।
कान्ताके लक्षण-गामचीकी चोडाईमें या ऊपर जिस घोडेके कौ
डियोंके चिन्ह दिखाई देते हों वह कान्ता कहलाता है, इसका
रोग उपाय करने पर जल्दी जाता रहता है।
कफगीरी की पहचान-जिसके तलुएका मांस खुर से बाहर
निकल जाता है उसे कफगीर कहते हैं यह रोग बुरा होता है।
बेजाकी पहँचान-जिसके पांवके मुट्ठे में आगे पीछे वा ऊपर
नीचे अंडेके बराबर मांस फूल जाता है उसे बेजा कहते है।
फ़ीलपाकी पहचान-इस रोगमें घोडेका पांव हाथीके पांव के
समान फूल जाता है, यह रोग बहुत बुरा होता है।
गज चर्मकी पहचान-इस रोगमें घोडे की खाल हाथी की
खाल के समान खुर्दरी होजाती है।
शिक्राक्रके लक्षण-जिसका सुम जगह जगहसे फट जाता है
उसे शिक्राक कहते हैं।
चेहरेके गुण दोषोंके वर्णन-जिस घोडेका माथा ऊंचा होता
है वह अशुभ तो नहीं होता परन्तु मंदपक्षा रहता है।
परेशीगोशका लक्षण-जिसके कान लंबे ढाले और दोनों
ओर को गिरे हुए होते हैं वह अच्छे नहीं होते।
तरुता गर्दनके लक्षण-जिस घोडेकी गर्दन सीधी होती है
और सिर झुकाकर नीचेको देखता चलता है, जिसके गर्दन तक
की जगह बराबर हो ऐसा घोडा तरुतागर्दन कहलाता है यह
अच्छा नहीं होता है।
जीनपुश्तकी पहचान-जिसकी पीठ नीचेको झुकी होवे उसे