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सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 130 में से

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पृष्ठ 60

शालिहोत्र । १९
मङ्गा दवाई कहते हैं और मस्र्फ़ेन इन तीनों को घिसकर गवा-
रपाठे के रस में घोंट कर दो सप्ताह तक लगावे ।
तीसरी दवा-कालीमिर्च बीजबन्द, भांग, सुहागा, सेंधानमक
फिटकरी फूली हुई, और गूगल इनको बराबर लेकर कड़वे तेल
में मिलाकर तजान लगावे ।
सूजा और लकलककी दवा-यह रोग आंख, अंडकोश वा
लोट में हुआ करता है, इसमें सूत का सा तार निकला करता
है, फिर आंख भी जाती रहती है, इसका काट डालना भी
अच्छा होता है ।
दवा-मेंढक को कुल्हडे में बन्द कर बहुत प्रचंड आगमें देदे
जब जल कर राख होजाय तब उसमें तेल मिलाकर दोनों
समय लगावे ।
नखोली की दवा-रेशमी कपड़े को पानी में आठवार भिगो-
भिगोकर सुखावे फिर शराब में भिगो बत्ती बना पावभर तेल
के दीपक में जलावे ऊपर से तांबे का बर्तन ढाक दे जब तेल
जल जाय तब काजल निकाल शहदमें मिला आंखोंमें लगावे ।
दूसरी दवा-सफेद मूसली को सिरके में घिसकर लगावे ।
नाक से रुधिर बन्द करनेका उपाय ।
जिस घोडे की नाक से रुधिर बहता हो उसकी नाक में हिरन
या भैंस के सींग की राख नली में भर कर फूंक देवे ।
दूसरी दवा-आदमी का मूत्र छः ड्राम और इतना ही तिल
का तेल दोनों को मिलाकर नली में भरकर फूंके ।
तीसरी दवा-गौ का ताजी घी सिर पर मलै और सीने के
किनारे फस्द भी खोले ।