शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 130 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ शालिहोत्रम् ।
रख करके तैयार रक्खे । औ नम के बाहर निकालते ही इस
लोहे से दाग देवे जिससे रुधिर न बहने पाये । इसके पीछे
कपडेको पानीमें भिगोकर उसी जगह पट्टीसे बांध देना चाहिये ।
तब घोडे को खोलकर इधर उधर टहला कर बांध दे और दो
घण्टे पीछे फिर इधर उधर टहला कर बांध दे उस दिन पानी
बिलकुल न पिलावे फिर कई दिनतक थोड़ा २ पानी पिलाता
रहे, चार पांच दिन तक कपडे की गद्दी को ( जो पट्टी बांधे
जिससे ) पानीसे तर रक्खे फिर कार्वोलिक तेल और मरहम
से घाव के सुखाने का उपाय करे । आराम होजाने पर चार
पांच महीने तक सवारी यादि किसी तरह के परिश्रम का काम
न ले, फिर धीरे धीरे उसको मिहनत पर लगावे । जो इससे
अण्डकोश के इधर उधर सूजन और कमर में दर्द मालूम हो
तो तेल की मालिश करदे ।
दवा देने की विधि- प्रथम ही घोडे को इधर उधर टहलाकर
अस्तबल में लाकर नांध दे और उसकी जिह्वा को हाथसे पकड़
कर बाहर निकाल कर मुख के एक ओर थामे रहे और दवा
को हाथ से मुख के भीतर कर तालु के पास छोड़ देवे औ-
हाथ को झटपट सावधानी से खींचकर जिन्हा को छोड़ देवे,
इस तरह घोडा अपने आप दवा खालेगा जो दवा सूखी हो
तो उसे बेसन व गेहूंके चून या सत्तू में गुड़के साथ मिलाकर
गोले से बना बना कर खिला देवे । जो दवा पतली हो तो उसे
नाल में भर कर पिलादे ।
रोगों के लच्छन-जैसे मनुष्यके देहमें कफ, बात, पित्त इन तीनों