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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

४० शालिहोत्रम् ।
सातवीं दवा-पुरानी ईंट को सुरमे के समान बारीक पीसकर
पानी में घोल बार २ छींटे देता रहे ।
आठवीं दवा-एक रोठेको पत्थर पर पीसकर आंख में आंजे ।
नवीं दवा-गेरू और तिगुना शोरा इन दोनोंको बारीक पीस
कर नलीमें भर फूली पर फूंके ।
दसवीं दवा-आदमी की खोपडी का सुर्मा बनाकर तीन दिन
लगावे ।
ग्यारहवीं दवा-घोंघाका चूना, पोली फिटकिरी और कांचकी
चूडी इन तीनों को समान भाग लेकर महीन पीस कर बुकनी
बनावे और नलीमें भरकर आंख में फूंके ।
बारहवीं दवा-गेहूं की मैदा, सांभरनमक और कांच की चूडी
इन तीनोंको पीसकर गोली बांधले और फिर पानी में रिगड
कर आंख में लगावै ।
तेरहवीं दवा-मुर्गी वा कबूतरकी ताजी बीट आंखमें आंजे ।
चौदहवीं दवा-हाथी का नख महीन पीसकर सुर्मे की तरह
आंख में आंजे ।
नाखून या जाले की दवा
यह रोग आंखके कोने में तीन फांक का पतला नोंकदार नि-
कship?कलता है, इसका मांस बढा कडा होता है ।
पहिली दवा-मुर्गीके अंडेके छिलके की राख, उसी के समान
गंधक और नीलाथोथा इन तीनोंको पीसकर आदमी के मूत्र में
गोली बांधे और आदमी के पेशाबमें ही घिसकर लगावै ।
दूसरी दवा-आदमीके बालकी राख, संगबसरेका पत्थर जिसे