सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 130 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

शालिहोत्रम् । ३७
दोषोंके बिगडनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है वैसेही इन्हीं तीन
दोषोंमें गडबड होने से घोडों के रोग की उत्पत्ति होती है इन
दोषों को फारसी में क्रमसे वलगम, वादी और सफरा कहते
हैं। इन्हीं दोषों के अनुसार वादी वलगमी और सफरावी इन
तीन प्रकृतियों के घोडे होते हैं।
वातप्रकृति घोडोंके लक्षण-वादीकी प्रकृतिवाले घोडेके देहमें
खुश्की होती है, तरी नहीं रहती दाने चारे को मन मार कर
खाता है; अच्छी तरह खाने की रुचि नहीं करता, कडवी
वस्तुओं के खाने को उसको इच्छा रहती है, बहुत उछलता
कूदता है और देहपर रगें और नसें दिखलाई दिया करती हैं।
कफप्रकृति घोडेके लक्षण-कफकी प्रकृतिवाले घोडोंके रोम और
बाल; नरम, चिकने और मुलायम होते हैं, चलनेमें बडे तेज
और चालाक होते हैं, परन्तु चारा दाना कम खाते हैं।
पित्तप्रकृति घोडोंके लक्षण-पित्तप्रकृतिवाले घोडे बडे तेजस्वी,
शक्तिमान्, चलने में तीव्रवेगयुक्त, बिजलीके समान चंचल होते
हैं, और चारा, दाना बडी प्रसन्नता से खाता है यह घोडों में
उत्तम होता है, बीमार भी कम पडता है और देहमें तरी भी
अधिक होती है।
नाडीपरीक्षा-रुधिर की गति से भी घोडों के रोगी निरोगी
होनेके लक्षण जाने जाते हैं। घोडेकी नाडी प्रायः नीचेके जा-
बडे में देखी जाती है, यह नाडी उस जगह मिलती है जहां
नीचेके जाबडाकी दो हड्डियां नीचे ऊपरसे आकर एक कोणसा
बनाती हैं और वहां एक मोटी बत्ती के समान नाडी दिखाई