सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
प्रस्तावना ८१
इतना ही नहीं समाधितन्त्र लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने आचार्य कुन्दकुन्दका समयप्राभृत
व अन्य श्रुत भी उपस्थित था यह इसके अवलोकनसे स्पष्टतः विदित होता है। आचार्य कुन्दकुन्दने अभ्यन्तर
परिणामोंके बिना केवल बाह्यलिंग मोक्षमार्गमें उपयोगी नहीं है यह बतलाते हुए समयप्राभृतमें कहा है—
पासंडीलिंगाणि व गिहिलिंगाणि व बहुप्पयाराणि ।
घित्तुं वदंति मूढा लिंगमिणं मोक्खमग्गो त्ति ॥ ४०८ ॥
ण उ होदि मोक्खमग्गो लिंगं जं देहणिम्ममा अरिहा ।
लिंगं मुइत्तु दंसणणाणचरित्ताणि सेवंति ॥ ४०९ ॥
इसी तथ्यको आचार्य पूज्यपादने समाधितन्त्रमें इन शब्दोंमें व्यक्त किया है—
लिङ्गं देहाश्रितं दृष्टं देह एव आत्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ॥
जातिर्देहाश्रिता दृष्टा देह एवात्मनो भवः ।
न मुच्यन्ते भवात्तस्मात्ते ये जातिकृताग्रहाः ॥
इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि जो साधक अपने आत्मकार्यमें उद्यत होना चाहते हैं उनके लिए यह
मोक्षमार्गके अनुसन्धानमें प्रदोपस्तम्भके समान है। इसमें आत्माके बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा ये
तीन भेद करके किस प्रकार यह जीव बहिरात्मपदके त्याग द्वारा अन्तरात्मा बनकर परमात्मपदको प्राप्त
करता है इसका सरल और हृदयग्राही कवितामें विवेचन किया गया है।
३. इष्टोपदेश—इसमें कुल मिलाकर ५१ श्लोक हैं । विषय स्वरूपसम्बोधन है। ग्रन्थका नाम इष्टो-
पदेश है यह स्वयं आचार्य पूज्यपादने इसके अन्तिम श्लोकमें व्यक्त किया है।
इसका निर्माण करते हुए आचार्य पूज्यपादके सामने एकमात्र यही दृष्टि रही है कि किसी प्रकार यह
संसारी आत्मा अपने स्वरूपको पहचाने और देह, इन्द्रिय तथा उनके कार्योंको अपना कार्य न मानकर आत्म-
कार्यमें सावधान होनेका प्रयत्न करे। समयप्राभृतका स्वाध्याय करते समय हमें इस भावके पद-पद पर दर्शन
होते हैं और इसलिए हम कह सकते हैं कि समयप्राभृत आदिके विषयको आत्मसात् करके ही इसका निर्माण
किया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
एगो मे सासदो आदा णाणदंसणलक्खणो ।
सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संजोगलक्खणा ॥ समयप्राभृत
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।
बाह्याः संयोजगाः भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥ २७ ॥ इष्टोपदेश
रत्तो बंधति कम्मं मुंचदि कम्मं विरागसंपत्तो ।
एसो जिणोवएसो तम्हा कम्मेसु मा रज्ज ॥ समयप्राभृत
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात् ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥ २६ ॥ इष्टोपदेश
रत्नकरण्डकमें एक श्लोक आता है जिसमें कहा गया है कि धर्मके प्रभावसे कूकर भी देव हो जाता
है और अधर्मके प्रभावसे देवको भी कूकर होते देर नहीं लगती । यथा—
श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्बिषात् ।
कापि नाम भवेद्दन्या संपद् धर्माच्छरीरिणाम् ॥ १, २९ ॥
इष्टोपदेशमें यही शब्द तो नहीं हैं पर इनका अनुसरण करते हुए आचार्यवर्य कहते हैं—
वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वतं नारकम् ।
छायापतस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥ ३ ॥
साधकके लिए आत्मसाधनामें इससे बड़ी सहायता मिलती है ।
११
८२
सर्वार्थसिद्धि
४. दशभक्ति—भक्तियाँ दशसे अधिक हैं। फिर भी वे मुख्यरूपसे दस मानी जाती हैं। श्रीमान् पं०
पन्नालालजी सोनीने सम्पादित कर 'क्रियाकलाप' नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया है। यह संग्रह ग्रन्थ है। इसके
प्रथम अध्यायके कुछ प्रकरणोंका संग्रह स्वयं पण्डितजीने किया है।¹ शेष संग्रह मालूम होता है प्राचीन है।
सम्भव है इसके संग्रहकार पण्डित प्रभाचन्द्र हों। इन्होंने ही इसके अनेक उपयोगी विषयों पर टीका लिखी
है। ये पण्डित थे और इनका नाम प्रभाचन्द्र था। इसकी सूचना नन्दीश्वर भक्तिके अन्तमें प्रकरण समाप्तिकी
पुष्पिका लिखते समय स्वयं इन्होंने दी है।² इसमें सब भक्तियों व दूसरे प्रकरणोंका संग्रह स्वयं इनका किया
हुआ है या क्रियाकलापको जो वर्तमान स्वरूप मिला है वह बादका काम है यह हम निश्चयपूर्वक नहीं कह
सकते³, क्योंकि एक तो न स्वयं सोनीजीने इसकी व्यवस्थित सूचना दी। सोनीजी यदि इसकी प्रस्तावनामें
यह बतलानेकी कृपा करते कि उन्होंने जितनी प्रतियोंके आधारसे इसका सम्पादन किया है, वे कहाँकी हैं
और उनका लेखन काल क्या है तो इस बातके निर्णय करनेमें बड़ी सहायता मिलती कि यह संग्रह कितना
पुराना है। दूसरे इसमें ऐसे कई उपयोगी विषयोंका संग्रह है किन्तु उन पर पण्डित प्रभाचन्द्रकी टीका न
होनेसे वे उनके सामने थे इस बातको स्वीकार करनेमें संकोच होता है। उदाहरणार्थ प्राकृतनिर्वाणभक्ति जो
लोकमें निर्वाणकाण्डके नामसे प्रसिद्ध है, इसमें संगृहीत है पर इस पर उनकी टीका नहीं है। जब कि वह
दूसरी भक्तियोंके मध्यमें स्थित है। सोनीजीने मुद्रित क्रियाकलापके सम्बन्धमें अपनी भूमिकामें स्थिति स्पष्ट तो
की है पर उससे पूरा प्रकाश नहीं पड़ता।
इसमें जितनी भक्तियां संगृहीत हैं उनमेंसे प्रथम परिच्छेदमें सिद्धभक्ति, श्रुतभक्ति, चारित्रभक्ति,
योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात भक्तियाँ संगृहीत हैं। इनमेंसे नन्दीश्वर-
भक्ति केवल संस्कृतमें है, शेष सब भक्तियाँ संस्कृत और प्राकृत दोनोंमें हैं। मात्र प्राकृत निर्वाणभक्तिकी
संस्कृत टीका नहीं है। इसके आगे दूसरे प्रकरणमें और भी अनेक भक्तियां संगृहीत हैं और इन पर भी
पण्डित प्रभाचन्द्रकी संस्कृत टीका है। इतना अवश्य है कि उनमें जो लघु भक्तियां हैं उनपर टीका नहीं है।
इन भक्तियोंके सम्बन्धमें पण्डित प्रभाचन्द्र प्राकृत सिद्धिभक्तिके अन्तमें सूचना करते हैं कि सब संस्कृत
भक्तियां पूज्यपाद स्वामीकी बनायी हुई हैं और प्राकृत भक्तियां आचार्य कुन्दकुन्दकी बनायी हुई हैं। यथा—
'संस्कृताः सर्वा भक्तयः पादपूज्यस्वामिकृताः प्राकृतास्तु कुन्दकुन्दाचार्यकृताः ।' क्रियाकलाप
पृष्ठ १६७ ।
ये सब भक्तियां एक आचार्यकी कृति हैं या अनेककी यह तो निश्चयपूर्वक कहना कठिन है। जिन
पण्डित प्रभाचन्द्रने इनकी टीका लिखी है वे सम्भवतः पण्डितप्रवर आशाधरके बाद⁴ और वि० सं० १७२४ के
पहले⁵ कभी हुए हैं, अतएव इस आधारसे इतना ही कहा जा सकता है कि ये वि० सं० १४वीं शताब्दीके
पूर्व कभी लिखी गयी हैं। किन्तु इस कथनसे यह निश्चय नहीं होता कि पण्डित प्रभाचन्द्र इनमेंसे किन संस्कृत
और प्राकृत भक्तियोंको क्रमसे पादपूज्य स्वामी और कुन्दकुन्द आचार्यकी मानते रहे। उनके मतसे ये पादपूज्य
स्वामी कौन थे यह भी ज्ञात नहीं होता।
पं० पन्नालालजी सोनीने क्रियाकलापकी प्रस्तावनामें लिखा है कि 'सिद्धभक्ति, श्रुतिभक्ति, चारित्र-
भक्ति, योगिभक्ति, आचार्यभक्ति, निर्वाणभक्ति और नन्दीश्वरभक्ति ये सात संस्कृत भक्तियां पादपूज्य स्वामी
कृत हैं और प्राकृत सिद्धभक्ति, प्राकृत श्रुतभक्ति, प्राकृत चारित्रभक्ति, प्राकृत योगिभक्ति और प्राकृत आचार्य-
भक्ति ये पाँच भक्तियां कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत हैं।' किन्तु उन्होंने ऐसा माननेका जो कारण उपस्थित किया है
१. देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० २। २. 'इति पण्डितप्रभाचन्द्रविरचितायां क्रियाकलापटीकायां भक्तिविव-
रणः प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः ।' ३. इतना अवश्य है कि इसके 'दैवसिकरात्रिकप्रतिक्रमण' नामक प्रकरणके
अन्तमें एक लेख उपलब्ध होता है जिसमें १७२४ सं० अंकित है। अतएव इससे पूर्वका यह संग्रह है यह कहा
जा सकता है। देखो क्रियाकलाप पृ० ६९। ४. पण्डित प्रभाचन्द्रने अनगारधर्मामृतके दो श्लोक अपनी
टीकामें उद्धृत किये हैं। देखो क्रियाकलाप प्रस्तावना पृ० १० । ५. देखो टिप्पणी ३ पृ० ८८ ।
प्रस्तावना ८३
वह समुचित नहीं कहा जा सकता। पण्डित प्रभाचन्द्रने तो केवल इतना ही कहा है कि सब संस्कृत भक्तियाँ
पादपूज्य स्वामी कृत हैं और सब प्राकृत भक्तियाँ कुन्दकुन्द आचार्य कृत हैं और यह भी उन्होंने प्राकृत सिद्ध-
भक्तिकी व्याख्या करते हुए उसके अन्तमें कहा है। परन्तु क्रियाकलापमें जिस क्रमसे इन भक्तियोंका संग्रह है
उसे देखते हुए प्राकृत सिद्धभक्तिका क्रमांक दूसरा है। सम्भव है कि सोनीजीने नन्दीश्वरभक्ति पर परिच्छेद-
की समाप्ति देखकर यह अनुमान किया हो। जो कुछ भी हो, पण्डित प्रभाचन्द्रके कालमें ये भक्तियां पादपूज्य
स्वामीकृत और कुन्दकुन्दाचार्यकृत मानी जाती थीं इतना स्पष्ट है। विद्वानोंका अनुमान है कि ये पादपूज्य
स्वामी आचार्य पूज्यपाद ही होने चाहिए, क्योंकि एक तो इस नामके अन्य कोई आचार्य नहीं हुए हैं। दूसरे
इन भक्तियोंका अप्रतिहत प्रवाह और गम्भीर शैली इस बातको सूचित करती है।१
इन सब भक्तियोंमें उनके नामानुसार विषयका विवेचन किया गया है। मुनिजन तथा व्रती गृहस्थ
दैवसिक आदि प्रतिक्रमणके समय निश्चित क्रमसे इनका प्रयोग करते आ रहे हैं जो आंशिकरूपसे वर्तमान
कालमें भी चालू है।
५. जैनेन्द्र व्याकरण—आचार्य पूज्यपादकी अन्यतम मौलिक कृति उनका जैनेन्द्र व्याकरण है। इसका
जैनेन्द्र यह नाम क्यों पड़ा ? क्या स्वयं आचार्य पूज्यपादको यह नाम इष्ट था इसका निर्णय करना तो कठिन
है। परन्तु प्राचीन कालसे यह इसी नामसे सम्बोधित होता आ रहा है यह मुग्धबोधके कर्ता पं० बोपदेवके
इस उल्लेखसे स्पष्ट है—
'इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशलीशाकटायनाः ।
पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः ॥' धातुपाठ
यह पांच अध्यायोंमें विभक्त है और सूत्र संख्या लगभग ३००० है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता संज्ञा-
लाघव है। पाणिनीय व्याकरणमें जिन संज्ञाओंके लिए कई अक्षरोंके संकेत कल्पित किये गये हैं उनके लिए
इसमें लाघवसे काम लिया गया है। तुलनाके लिए देखिए—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत प्र, दी, प
सवर्ण स्व
अनुनासिक ङ
गुण एप्
वृद्धि ऐप्
निष्ठा त
प्रातिपदिक मृतृ
लोप ख
संज्ञालाघव और रचना विशेषके कारण इसमें सूत्रलाघवके भी दर्शन पद-पद पर होते हैं। यथा—
पाणिनीय व्याकरण जैनेन्द्र व्याकरण
झरो झरि सवर्णे झरो झरि स्वे
हलो यमां यमि लोपः हलो यमां यमि खम्
तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् सस्थानक्रियं स्वम्
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः आकालोऽच् प्रदीपः
इसका प्रथम सूत्र है 'सिद्धिरनेकान्तात ।' इसकी व्याख्या करते हुए सोमदेवसूरिने शब्दार्णवचन्द्रिकामें
जो कुछ कहा है उसका भाव यह है—'शब्दोंकी सिद्धि और ज्ञप्ति अनेकान्तका आश्रय लेनेसे होती है, क्योंकि
शब्द अस्तित्व-नास्तित्व, नित्यत्व-अनित्यत्व और विशेषण-विशेष्यधर्मको लिये हुए होते हैं। इस सूत्रका अधि-
१. देखो जैन साहित्य और इतिहास पृ० १२१ ।
८४ सर्वार्थसिद्धि
कार इस शास्त्रकी परिसमाप्ति तक जानना चाहिए। यदि अनेकान्तका अधिकार अन्ततक न माना जाय तो
कौन आदि है और कौन अन्त है, किस अपेक्षासे साधर्म्य है और किस अपेक्षासे वैधर्म्य है यह सब कुछ न बने ।
वैयाकरणोंका स्फोटवाद प्रसिद्ध है। वे शब्दको नित्य मानकर तालु आदिके संयोगसे मात्र उसका
स्फोट मानते हैं, उसकी उत्पत्ति नहीं, जब कि स्थिति ऐसी नहीं है, क्योंकि अकार आदि वर्ण और घट, पट
आदि शब्द कुछ आकाशमें भरे हुए नहीं हैं और न वे आकाशके गुण ही हैं। वे तो तालु आदिके निमित्तसे
शब्द वर्गणाओंके विविध संयोगरूप उत्पन्न होते हैं और कालान्तरमें विघटित हो जाते हैं। अतः वैयाकरणोंके
मन्तव्यानुसार वे सर्वथा नित्य नहीं माने जा सकते। पुद्गल'द्रव्यकी अपेक्षा जहाँ वे नित्य सिद्ध होते हैं वहीं
वे पर्यायकी अपेक्षा अनित्य भी सिद्ध होते हैं। स्पष्ट है कि इस भावको व्यक्त करनेके लिए आचार्य पूज्यपादने
'सिद्धिरनेकान्तात्' यह प्रथम सूत्र लिखा है। व्याकरणमें शब्दोंकी जिस प्रकार सिद्धि की गयी है या जो संज्ञाएँ
व प्रत्यय आदि कल्पित किये गये हैं वे सर्वथा वैसे ही नहीं हैं किन्तु भाषाकी स्थितिको स्पष्ट करनेके लिए
माना गया वह एक प्रकार है और यही कारण है कि अनेक वैयाकरणोंने रूपसिद्धिके लिए अलग-अलग संज्ञाएँ
व प्रक्रिया स्वीकार की है। ऐसी स्थितिके होते हुए भी अनेक विद्वानोंमें अमुक प्रत्यय और अमुक प्रकारसे
रूपसिद्धिके प्रति आग्रह देखा जाता है। सम्भव है इस ऐकान्तिक आग्रहका निषेध करनेके लिए भी आचार्य
पूज्यपादने 'सिद्धिरनेकान्तात्' सूत्रकी रचना की हो ।
आचार्य पूज्यपादने अपने जैनेन्द्र व्याकरणमें भूतबलि, श्रीदत्त, यशोभद्र, प्रभाचन्द्र, समन्तभद्र और
सिद्धसेन इन छह आचार्योंके मतोंका उल्लेख किया है। अभी तककी जानकारीके आधार पर यह तो निःसंकोच
कहा जा सकता है कि इनका कोई व्याकरण नहीं है। साथ ही इन आचार्योंके जिन वैकल्पिक मतोंका उल्लेख
करके रूपसिद्धि की गयी है वे मत भी कोई नये नहीं हैं। क्योंकि, जैसा कि हम आगे चलकर बतलानेवाले हैं
पाणिनि व्याकरणमें भी विकल्पसे उनकी सिद्धि दृष्टिगोचर होती है। इसलिए प्रश्न होता है कि जब कि
आचार्य पूज्यपादके सामने पाणिनि व्याकरण था और उसमें वे प्रयोग उपलब्ध होते थे ऐसी अवस्थामें उन्होंने
अलगसे इन आचार्योंके मतके रूपमें इनका उल्लेख क्यों किया । प्रश्न गम्भीर है और सम्भव है कि कालान्तर
में इससे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रकाश पड़े । तत्काल हमारी समझमें इसका यह कारण प्रतीत होता है
कि जिस प्रकार पाणिनि ऋषिाने अपने व्याकरणमें उनके काल तक रचे गये साहित्यमें उपलब्ध होनेवाले मतों
का उनके रचयिताके नामके साथ या 'अन्यतर' आदि पद द्वारा उल्लेख किया है उसी प्रकार आचार्य पूज्य-
पादने अपने जैनेन्द्र व्याकरणमें उनके काल तक रचे गये जैन साहित्यमें उपलब्ध होनेवाले मतोंका उनके रच-
यिताके नामके साथ उल्लेख किया है । मतोंका विवरण इस प्रकार है-
भूतबलि-आचार्य भूतबलिके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है- 'राद्रूभूतबलेः' । ३, ४, ८३ ।
भूतबलिके मतानुसार समा शब्दान्त द्विगु समाससे 'ख' प्रत्यय होता है यह इस सूत्रका आशय है। इससे
'द्वैसम्रिकः' प्रयोगके स्थानमें 'द्वैसमीनः' प्रयोग विकल्पसे सिद्ध किया गया है। इसी प्रकार 'रात्र्यह्नः
संवत्सरात्' । ३, ४, ८४ । और 'वर्षाड्लूप् च' ३, ४, ८५ । ये दो अन्य सूत्र हैं जो भूतबलि आचार्यके
वैकल्पिक मतका प्रतिपादन करते हैं। इनमें से प्रथम सूत्र द्वारा 'द्विरात्रीणः, द्वयह्नीनः और द्विसंवत्सरीणः'
आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं तथा दूसरे सूत्र द्वारा 'द्विवर्षः' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं। जैनेन्द्रव्याकरणमें ये
वैकल्पिक कार्य भूतबलि आचार्यके मतसे माने गये हैं।
इन वैकल्पिक कार्योंका निर्देश पाणिनिने भी किया है किन्तु वहाँ किस आचार्यके मतसे ये कार्य होते हैं
यह नहीं बतलाया है। इन तीन सूत्रोंके स्थानमें क्रमसे पाणिनिके 'द्विगोर्वा ५, १, ८६,' रात्र्यह्नः संवत्सराच्च
५, १, ८७ और वर्षालुक् च ५, १, ८८ । ये तीन सूत्र आते हैं।
श्रीदत्त - आचार्य श्रीदत्तके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'गुणे श्रीदत्तस्यास्त्रियाम् । १, ४,
३४ ।' श्रीदत्त आचार्यके मतसे गुणहेतुक पञ्चमी विभक्ति होती है। परन्तु यह कार्य स्त्रीलिंगमें नहीं होता।
यह इस सूत्रका भाव है। इसके अनुसार 'ज्ञानेन मुक्तः' के स्थानमें श्रीदत्त आचार्यके मतसे 'ज्ञानान्मुक्तः'
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
प्रयोग सिद्ध किया गया है। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणमें 'विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् । २, ३, २५।' सूत्र
उपलब्ध होता है।
यशोभद्र—आचार्य यशोभद्रके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'कृवृषिमृजां यशोभद्रस्य । २,
१, ९९।' 'कृ, वृष् और मृज्' धातुसे यशोभद्र आचार्यके मतानुसार 'क्यप्' प्रत्यय होता है। तदनुसार
'कृत्यम्, वृष्यम् और मृज्यम्' ये वैकल्पिक प्रयोग सिद्ध होते हैं। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणमें 'मृजेर्वि-
भाषा । ३, १, ११३ । तथा विभाषा कृवृषोः ३, १, १२०।' ये दो सूत्र उपलब्ध होते हैं।
प्रभाचन्द्र—आचार्य प्रभाचन्द्रके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'रात्रेः कृति प्रभाचन्द्रस्य ।
४, ३, १८० ।' रात्रि पद उपपद रहते हुए कृदन्त पर रहते प्रभाचन्द्रके मतसे 'मुम्' का आगम होता है।
तदनुसार 'रात्रिंचरः' वैकल्पिक प्रयोग सिद्ध होता है। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणका सूत्र है 'रात्रेः कृति
विभाषा । ६, ३, ७२ ।'
समन्तभद्र—आचार्य समन्तभद्रके चार मतोंका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है-चतुष्टयं समन्तभद्रस्य ।
५, ४, १४० । पिछले चार सूत्र आचार्य समन्तभद्रके मतसे कह गये हैं यह इस सूत्रमें बतलाया गया है। वे
चार सूत्र हैं—'झयो हः । ५, ४, १३६ । शश्छोऽटि । ५, ४, १३७ । हलो यमां यमि खम् । ५, ४, १३८ ।
तथा 'झरो झरि स्वे । ५, ४, १३९।' इनके स्थानमें क्रमशः पाणिनिके सूत्र हैं—'झयो होऽन्यतरस्याम् ।
८, ४, ६२ । शश्छोऽटि । ८, ४, ६३ । हलो यमां यमि लोपः । ८, ४,-६४ । तथा झरो झरि सवर्णे ।
८, ४, ६५ ।'
प्रथम सूत्रके अनुसार पदान्त झय् से पर रहते हुए 'ह' को पूर्वसवर्ण होता है। यथा—'सुवाग्धसति ।'
द्वितीय सूत्रके अनुसार पदान्त झय् से पर रहते हुए 'श' के स्थानमें 'छ' होता है। यथा—'षट्छचामाः ।'
तृतीय सूत्रके अनुसार हल् से पर यम्का यम् पर रहते लोप होता है। यथा—'शय्या' इस शब्दमें दो यकार
हैं और इनके संयोगसे एक तीसरा यकार और प्राप्त हुआ । किन्तु इस सूत्रके नियमानुसार बीचके एक
यकारका लोप होकर 'शय्या' यह प्रयोग ही शेष रहता है। चतुर्थ सूत्रके अनुसार हल्से पर झर्का सवर्ण
झर् पर रहते हुए लोप होता है। यथा—'भित्ताम्' यहाँ एक तीसरे तकारका लोप हो गया है। इस प्रकार
ये चार वैकल्पिक कार्य आचार्य समन्तभद्रके मतसे होते हैं। जब कि पाणिनि व्याकरणमें ये कार्य अन्यतरके
मतसे माने गये हैं।
सिद्धसेन—आचार्य सिद्धसेनके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है—'वेत्तेः सिद्धसेनस्य । ५, १, ७।'
विद् धातुसे पर झ् प्रत्ययके स्थानमें आदेशभूत 'अत्' को सिद्धसेनके मतानुसार 'रुद्' का आगम होता है यह
इस सूत्रका भाव है। यथा--'संविद्रते ।' संविदते प्रयोगमें दकारके बाद और अकारके पूर्व 'रुद्' का आगम
होकर यह वैकल्पिक प्रयोग बना है। इस सूत्रके स्थानमें पाणिनि व्याकरणका 'वेत्तेर्विभाषा । ७, १, ७। सूत्र
उपलब्ध होता है।
इस व्याकरणका सोमदेवसूरिकृत शब्दार्णव चन्द्रिकामें एक परिवर्तित रूप उपलब्ध होता है। किन्तु वह
उसका बादका परिष्कृत रूप है ऐसा अनेक प्रमाणोंके आधारसे प्रेमीजीने सिद्ध किया है। इसका असली पाठ तो
वही है जो आचार्य अभयदेव कृत महावृत्तित्तमें उपलब्ध होता है। इस व्याकरणकी कुछ विशेषताओंका हमने
उल्लेख किया ही है। और भी कई विशेषताएँ हैं जिनके कारण इसका अपना स्वतन्त्र स्थान है।
उल्लेखोंसे ज्ञात होता है कि आचार्य पूज्यपादने उक्त पाँच ग्रन्थोंके सिवा कई विषयों पर अन्य अनेक
ग्रन्थ लिखे थे। विवरण इस प्रकार है—
६.-७. जैनेन्द्र और शब्दावतार न्यास—शिमोगा जिले के नगर तहसीलके ४६ वें शिलालेखमें
इस बातका उल्लेख है कि आचार्य पूज्यपादने एक तो अपने व्याकरण पर 'जैनेन्द्र' नामक न्यास लिखा था
और दूसरा पाणिनि व्याकरण पर 'शब्दावतार' नामक न्यास लिखा था। यथा—
१. इस ग्रन्थकी टीका-टिप्पणी व परिवर्धन आदिका विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिए प्रेमीजी द्वारा लिखित
'जैनसाहित्य और इतिहास' नामक ग्रन्थ देखिए ।
८६ सर्वार्थसिद्धि
'न्यासं जैनेन्द्रसंज्ञं सकलबुधनुतं पाणिनीयस्य भूयो।
न्यासं शब्दावतारं मनुजततिहितं वैद्यशास्त्रं च कृत्वा ।
यस्तत्त्वार्थस्य टीकां न्यरचदिह तां मान्यसौ पूज्यपाद-
स्वामी भूपालवन्द्यः स्वपरहितवचःपूर्णदृग्बोधवृत्तः ॥'
ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हुए हैं। इसके लिए प्राचीन शास्त्रभाण्डारोंमें विशेष अनुसन्धानकी
आवश्यकता है।
८. शान्त्यष्टक—हम पहले आचार्य पूज्यपादकी कथा दे आये हैं। उसके लेखकने इनके बनाये हुए
एक 'शान्त्यष्टक' का उल्लेख किया है। एक शान्त्यष्टक क्रियाकलापमें भी संगृहीत है। इस पर पं० प्रभा-
चन्द्रकी संस्कृत टीका है। शान्त्यष्टकके प्रारम्भमें पं० प्रभाचन्द्रजीने जो उत्थानिका दी है उसमें कथालेखक
चन्द्रय्य कविके मतका समर्थन करते हुए कहते हैं कि श्री पादपूज्य स्वामीको चक्षुतिमिरव्याधि हो गयी थी
जिसे दूर करनेके लिए वे स्तुति करते हुए कहते हैं, 'न स्नेहात्'। इसके अन्तमें जो श्लोक आता है उसमें
'दृष्टि प्रसन्नां कुरु' इत्यादि पदद्वारा भी यही भाव व्यक्त होता है। इससे विदित होता है कि सम्भव है जीवन
के अन्तमें पूज्यपाद आचार्यकी दृष्टि तिमिराच्छन्न हो गयी हो और उसे दूर करनेके लिए उन्होंने ही शान्त्यष्टक
लिखा हो। यदि यह अनुमान ठीक हो तो शान्त्यष्टक उनकी वह कृति मानो जा सकती है जो सम्भवतः सब
कृतियोंके अन्तमें लिखी गयी होगी।
९. सारसंग्रह—आचार्य पूज्यपादने एक 'सारसंग्रह' नामक ग्रन्थका भी निर्माण किया था ऐसा
धवलाके एक उल्लेखसे ज्ञात होता है। यथा—
'सारसंग्रहेऽप्युक्तं पूज्यपादैः-अनन्तपर्यायात्मकस्य वस्तुनोऽन्यतमपर्यायाधिगमे कर्तव्ये जात्यहेत्व-
पेक्षो निरवद्यप्रयोगो नय इति ।'
सर्वार्थसिद्धिमें आचार्य पूज्यपादने जो नयका लक्षण दिया है इससे इस लक्षणमें बहुत कुछ साम्य है,
इसलिए यह माननेका पर्याप्त कारण है कि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपादकी ही कृति होनी चाहिए।
१०. चिकित्साशास्त्र—इस बातको सिद्ध करनेवाले भी कई प्रमाण मिलते हैं कि आचार्य पूज्यपादने
वैद्यक विषय पर भी कोई अनुपम ग्रन्थ लिखा था। यथा—
१. आचार्य शुभचन्द्रद्वारा रचित ज्ञानार्णवके एक श्लोकका उल्लेख हम पहले कर आये हैं। उसमें
उनके वचनों को वचनमल और चित्तमलके समान कायमलको दूर करनेवाला कहा गया है।
२. आचार्य उग्रादित्यने अपने कल्याणकारक नामक ग्रन्थमें आचार्यः पूज्यपादके वैद्यक विषयक ग्रन्थका
उल्लेख 'पूज्यपादेन भाषितः, शालाक्यं पूज्यपादप्रकटितमधिकम्' इत्यादि शब्दसन्दर्भद्वारा किया है।
३. हम पहले शिमोगा जिलेके नगर ताल्लुकेके ४६ नं० के एक शिलालेखका उल्लेख कर आये हैं
उसमें भी उन्हें मनुष्य समाजका हित करनेवाला वैद्यक शास्त्रका रचयिता कहा गया है।
४. विक्रमकी पन्द्रहवीं शताब्दीके विद्वान् मंगराजने अपने कनडी भाषामें लिखे गये खगेन्द्रमणिदर्पणमें
भी आचार्यपूज्यपादके एक चिकित्साग्रन्थका उल्लेख किया है।
इन सब प्रमाणोंसे विदित होता है कि सम्भवतः आचार्यपूज्यपादने चिकित्सा सम्बन्धी कोई ग्रन्थ
लिखा था।
११. जैनाभिषेक—श्रवणवेलगोलके शक सं० १०८५ के शिलालेख नं० ४० से यह भी विदित होता
है कि इन्होंने एक जैन अभिषेक पाठ की भी रचना की थी। उद्धरण इस प्रकार है—
'जैनेन्द्रं निजशब्दमोगमतुलं सर्वार्थसिद्धिः परा
सिद्धान्ते निपुणत्वमुद्द्वकतां जैनाभिषेकः स्वकः ।
छन्दस्सूक्ष्मधियं समाधिशतकस्स्वास्थ्यं यदीयं विदाम्
आख्यातीह स पूज्यपादमुनिपः पूज्यो मुनीनां गणैः ॥'
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
प्रस्तावना ८७
इसमें कहा गया है कि विद्वानोंके समक्ष जिनका जैनेन्द्र व्याकरण अतुल निज शब्द सम्पत्तिको,
सर्वार्थसिद्धि सिद्धान्तमें निपुणताको, जैन अभिषेक कविताकी श्रेष्ठताको और आत्मस्वास्थ्यकर समाधिशतक
छन्दःशास्त्रकी सूक्ष्मताको सूचित करता है वे आचार्य पूज्यपाद मुनिगणोंसे सतत पूजनीय हैं।
पहले हम चन्द्रय्य कविके 'पूज्यपादचरिते' के आधारसे आचार्य पूज्यपादकी संक्षिप्त जीवनी दे आये
हैं। उसमें आचार्यपूज्यपादको जैनेन्द्र व्याकरण और वैद्यकके समान अर्हत्प्रतिष्ठालक्षण और ज्योतिषका भी
लेखक बतलाया गया है। कह नहीं सकते कि यह उल्लेख कहाँ तक ठीक है। यदि यह साधारण हो तो
कहना होगा कि आचार्य पूज्यपादने अर्हत्प्रतिष्ठा और ज्योतिष विषय पर भी रचना की थी।
३. समय विचार — आचार्य पूज्यपाद कब हुए यह प्रश्न विशेष विवादास्पद नहीं है। छठवीं शताब्दीके
मध्यकाल से लेकर अधिकतर जितने साहित्यकार हुए हैं उन्होंने किसी न किसी रूपमें या तो उनका या उनके
साहित्यका उल्लेख किया है या उनके साहित्यका अनुवर्तन किया है। इस दृष्टिसे हमारे सामने मुख्य रूपसे
जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणका विशेषावश्यकभाष्य और अकलंकदेवका तत्त्वार्थवार्तिक उपस्थित हैं। भट्ट
अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थवार्तिक लिखते समय सर्वार्थसिद्धि और जैनेन्द्रव्याकरण उपस्थित था यह उसके
देखनेसे स्पष्टतः परिलक्षित होता है। भट्ट अकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिकमें सर्वार्थसिद्धिके अधिकतर वाक्योंको
वार्तिकोंका रूप देते हुए दिखाई देते हैं¹। तथा जहाँ उन्हें व्याकरणके नियमोंके उल्लेखकी आवश्यकता प्रतीत
हुई वहाँ वे प्रायः जैनेन्द्रके सूत्रोंका ही उल्लेख करते हैं²। इसलिए आचार्य पूज्यपाद भट्ट अकलंकदेवके पहले
हुए हैं यह तो सुनिश्चित है। किन्तु सर्वार्थसिद्धि और विशेषावश्यकभाष्यके तुलनात्मक अध्ययनसे यह भी
ज्ञात होता है कि विशेषावश्यकभाष्य लिखते समय जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके सामने सर्वार्थसिद्धि अवश्य ही
उपस्थित होनी चाहिए। तुलनाके लिए देखिए—
सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १५ में धारणा मतिज्ञान का लक्षण इन शब्दोंमें दिया है—
'अवेस्त्य कालान्तरेऽविस्मरणकारणम् ।'
विशेषावश्यकभाष्यमें इन्हीं शब्दोंको दुहराते हुए कहा गया है—
'कालंतरे य जं पुणरणुसरणं धारणा सा उ ।। गां० २९१ ।।'
चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है यह बतलाते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १९ में कहा गया है—
'मनोवदप्राप्यकारीति ।'
यही बात विशेषावश्यकभाष्यमें इन शब्दोंमें व्यक्त की गयी है—
'लोयणमपत्तविसयं मणोव्व ।। गा० २०९ ।।'
सर्वार्थसिद्धि अ० १. सू० २० में यह शंका की गयी है कि प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके समय दोनों
ज्ञानोंकी उत्पत्ति एक साथ होती है इसलिए श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है यह नहीं कहा जा सकता ।
यथा—
'आह, प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तौ युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकत्वं श्रुतस्य नोत्पद्यत इति ।'
अब इसके प्रकाशमें विशेषावश्यकभाष्यकी इस गाथाको देखिए—
'णाणाण्णाणाणि य समकालाइं जओ मइसुयाइं ।
तो न सुयं मइपुव्वं मइणाणे वा सुयन्नाणं ॥ गा० १०७ ॥'
इस प्रकार यद्यपि इस तुलनासे यह तो ज्ञात होता है कि जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण (वि० सं० ६६६)
के सामने आचार्य पूज्यपादकी सर्वार्थसिद्धि उपस्थित रही होगी पर इससे इनके वास्तव्य काल पर विशेष
प्रकाश नहीं पड़ता। इसके लिए आगेके प्रमाण देखिए—
१. शक संवत् ३८८ ( वि० सं० ५२३) में लिखे गये मर्करा (कुर्ग) के ताम्रपत्र में गंगवंशीय
राजा अविनीतके उल्लेखके साथ कुन्दकुन्दान्वय और देशीय गणके मुनियोंकी परम्परा दी गयी है। दूसरे
१. देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० १, सू० १, वा० ३ आदि । २. देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० ४, सू० २१ ।
८८ सर्वार्थसिद्धि
प्रमाणोंसे यह भी विदित होता है कि राजा अविनीतके पुत्रका नाम दुर्विनीत था और ये आचार्य पूज्यपादके
शिष्य थे ।¹ राजा दुर्विनीतका राज्यकाल वि० सं० ५३८ के लगभग माना जाता है, अतः इस आधारसे यह
कहा जा सकता है कि आचार्य पूज्यपाद ५वीं शताब्दीके उत्तरार्ध और विक्रमकी ६वीं शताब्दीके पूर्वार्धके
मध्य कालवर्ती होने चाहिए।
२. वि० सं० ९९० में बने देवसेनके दर्शनसारके एक उल्लेखसे भी इस तथ्यकी पुष्टि होती है ।
देवसेनने यह कहा है कि श्री पूज्यपादके एक शिष्य वज्रनन्दी थे, जिन्होंने विक्रम सं० ५२६ में द्रविड़ संघकी
स्थापना की थी । दर्शनसारका उल्लेख इस प्रकार है-
सिरिपूज्जपादसीसो दाविडसंघस्स कारगो दुट्ठो ।
णामेण वज्जणंदी पाहुडवेदी महासत्तो ॥
पंचसए छब्बीसे विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स ।
दक्खिणमहुरा जादो दाविडसंघो महामोहो ॥
हम पहले नन्दिसंघकी पट्टावलीका उल्लेख कर आये हैं । उसमें देवनन्दी ( पूज्यपाद ) का समय
विक्रम सं० २५८ से ३०८ तक दिया है और इनके बाद जयनन्दी तथा गुणनन्दीका नामनिर्देश करनेके बाद
वज्रनन्दीका नामोल्लेख किया है। साथ ही हम पहले पाण्डवपुराणके रचयिता शुभचन्द्राचार्यकी गुर्वावलीका
भी उल्लेख कर आये हैं। इसमें भी नन्दिसंघके सब आचार्योंका नन्दिसंघकी पट्टावलीके अनुसार नाम निर्देश
किया है। किन्तु इसमें देवनन्दीके बाद गुणनन्दीके नामका उल्लेख करके वज्रनन्दीका नाम दिया है। यहाँ
यद्यपि हम यह मान लें कि इन दोनोंमें यह मतभेद बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि पूर्व परम्पराके
अनुसार जिन्हें जिस क्रमसे आचार्यों की परम्परा मिली उन्होंने उस क्रमसे उनका नाम निर्देश किया है और
ऐसी दशामें एकादि नाम छूट जाना या हेरफेर हो जाना स्वाभाविक है। पर सबसे बड़ा प्रश्न आचार्य
पूज्यपादके समयका है । मर्कराके ताम्रपत्रमें जिन आचार्यों का नाम निर्देश है उनमें पूज्यपादका नाम नहीं
आता तथा अविनीतके पुत्र दुर्विनीतके ये विद्यागुरु थे, इसलिए ऐसा मालूम देता है कि नन्दिसंघकी पट्टावलिमें
आचार्य पूज्यपादसे पूर्ववर्ती आचार्यों के नाम छूट गये हैं। मर्कराके ताम्रपत्रमें जिन मुनियोंका नामोल्लेख है वे
ये हैं-गुणचन्द्र, अभयनन्दि, शीलभद्र, जनानन्दि, गुणनन्दि और चन्द्रनन्दि । तथा नन्दिसंघकी पट्टावलिमें
आचार्य देवनन्दि और वज्रनन्दिके मध्यमें जयनन्दि और गुणनन्दि ये दो नाम आते हैं। गुणनन्दि यह नाम
तो मर्कराके ताम्रपत्रमें भी है और सम्भव है कि मर्कराके ताम्रपत्रमें जिनका नाम जनानन्दि दिया है वे नन्दि-
संघकी पट्टावलिमें जयनन्दि इस नामसे उल्लिखित किये गये हों । यदि यह अनुमान ठीक हो तो इससे दो
समस्याएँ सुलझ जाती हैं। एक तो इससे इस अनुमानकी पुष्टि हो जाती है कि नन्दिसंघकी पट्टावलिमें आचार्य
पूज्यपादके पूर्ववर्ती कुछ आचार्यों के नाम छूट गये हैं। दूसरे नन्दिसंघकी पट्टावलिमें आचार्य पूज्यपादके बाद
जिन दो आचार्यों का नामोल्लेख किया है उन्हें मर्कराके ताम्रपत्रमें उल्लिखित नामोंके अनुसार आचार्य पूज्य-
पादके पूर्ववर्ती मान लेनेसे दर्शनसारके उल्लेखांनुसार वज्रनन्दि आचार्य पूज्यपादके अनन्तर उत्तरकालवर्ती
ठहर जाते हैं । और इस तरह उनके समयके निर्णय करनेमें जो कठिनाई प्रतीत होती है वह हल हो जाती
है । इस प्रकार इन सब तथ्योंको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आचार्य पूज्यपाद विक्रम ५वीं
शताब्दीके उत्तरार्धसे लेकर ६वीं शताब्दीके पूर्वार्धके मध्यकालवर्ती होने चाहिए । श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी
प्रेमी प्रभृति दूसरे विद्वानोंका भी लगभग यही मत है ।²
१. रत्नकरण्डकी प्रस्तावना पृ० १४२ । २. देखो जैन साहित्य और इतिहास पृ० ११५ आदि । प्रेमीजीने
आचार्य पूज्यपादके समयका विचार करते समय स्व० डॉ० काशीनाथ वापूजी पाठकके मतका विचारकर जो
निष्कर्ष निकाला है उससे हम सहमत हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
विषयानुक्रमणिका
प्रथम अध्याय
मंगलाचरण · १
तत्त्वार्थसूत्रकी उत्थानिका १
आत्माका हित मोक्ष है यह बतलाते हुए
मोक्षका स्वरूप निर्देश १
विभिन्न प्रवादियोंके द्वारा माने गये मोक्षके
स्वरूपका उद्भावन और निराकरण १
मोक्ष प्राप्तिके उपायमें विभिन्न प्रवादियोंका
विसंवाद और विशेषार्थ द्वारा इस सबका
स्पष्टीकरण २
मोक्षमार्गका स्वरूपनिर्देश ४
सम्यक् शब्दकी निरुक्ति, सम्यग्ज्ञान और
सम्यक्चारित्रका स्वरूप और 'सम्यक्'
विशेषणकी सार्थकता ४
दर्शन, ज्ञान और चारित्रकी निरुक्ति ४
कर्त्ता और करणके एक होने की आपत्तिका
परिहार ५
सूत्रमें सर्वप्रथम दर्शन, अनन्तर ज्ञान और
सबके अन्तमें चारित्र शब्द रखनेका समर्थन ५
'मार्गः' इस प्रकार एकवचन निर्देशका सार्थकता ५
सम्यग्दर्शनका लक्षण-निर्देश ६
तत्त्व शब्दकी निरुक्ति ६
अर्थ शब्दकी निरुक्ति ६
तत्त्वार्थकी निरुक्ति पूर्वक सम्यग्दर्शनका स्वरूप ६
'दृश्' धातुका अर्थ आलोक है फिर श्रद्धान
अर्थ कैसे संभव है, इस शंकाका समाधान ७
अर्थ-श्रद्धान या तत्त्व-श्रद्धानको सम्यग्दर्शनका
लक्षण मानने पर प्राप्त होनेवाली आपत्तियों-
के परिहारार्थ तत्त्व और अर्थ दोनों पदोंकी
उपयोगिता ७
सम्यग्दर्शनके सराग और वीतराग इन दो
भेदोंका स्वरूप ७
विशेषार्थ द्वारा प्रकृत विषयका स्पष्टीकरण ८
सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके दो प्रकार ९
निसर्ग और अधिगम शब्दका अर्थ ९
निसर्गज सम्यग्दर्शनमें अर्थाधिगम होता है
या नहीं, इस शंकाका समाधान ९
'तन्निसर्गादधिगमाद्वा' इस सूत्रमें आये हुए
'तत्' पदकी सार्थकता १०
सात तत्त्वोंका नाम निर्देश ११
सातों तत्त्वोंके स्वरूपका प्रतिपादन कर उनके
क्रमिक पाठकी सार्थकताका निरूपण पुण्य
और पापको ग्रहणकर नव पदार्थ क्यों नहीं
बतलाये इस शंकाका समाधान ११
भाववाची तत्त्व शब्दका द्रव्यवाचक जीवादि
पदोंके साथ सामानाधिकरणका विचार,
विशेष्यके लिंग और संख्याके अनुसार
प्रकृतमें विशेषणका भी वही लिंग और
संख्या होनी चाहिए, इस आक्षेपका परिहार १२
नामादि चार निक्षेपोंका प्रतिपादन १३
नामादि चारों निक्षेपोंका स्वरूप १३
चारों निक्षेपोंके द्वारा जीवतत्त्वका निरूपण १३
नामादि निक्षेपविधिकी उपयोगिता १४
'नामस्थापना' सूत्रमें प्रयुक्त हुए 'तत्'
पदकी सार्थकता १४
विशेषार्थ-द्वारा निक्षेप-विषयक स्पष्टीकरण १४
प्रमाण और नयका निर्देश १४
प्रमाणके स्वार्थ और परार्थ ये दो भेद तथा
उनका स्वरूप १५
सूत्रमें नयपदके पूर्व प्रमाण पद रखनेका
कारण १५
नयका स्वरूप सकलादेश और विकला-
देशका निर्देश १६
नयके मूल भेदोंका स्वरूपनिरूपण व उनका
विषय १६
१२
९० सर्वार्थसिद्धि
जीवादि तत्त्वोंके अधिगमके उपायभूत छह
अनुयोगद्वारोंका निरूपण १६
निर्देश, स्वामित्वादि छहों अनुयोगद्वारोंका
स्वरूप १६
निर्देश अनुयोगद्वारासे सम्यग्दर्शनका निरूपण १६
सम्यग्दर्शनके स्वामित्वका सामान्यसे निरूपण १६
सम्यग्दर्शनके स्वामित्वका विशेषकी अपेक्षा
निरूपण करते हुए गतिमार्गणाके अनुवादसे
प्रतिपादन १६
इन्द्रियमार्गणाके द्वारा सम्यग्दर्शनके स्वामि-
त्वका वर्णन १७
कायादि शेष मार्गणाओंके द्वारा सम्यग्दर्शनके
स्वामित्वका निरूपण १७
सम्यग्दर्शनके अभ्यन्तर और बाह्य साधनोंका
प्रतिपादन १८
सम्यग्दर्शनके अभ्यन्तर और बाह्य अधि-
करणका निरूपण १९
सम्यग्दर्शनके औपशमिकादि भेदोंकी स्थिति
का प्ररूपण २०
विधान-अनुयोगकी अपेक्षा सम्यग्दर्शनके
भेदोंका प्रतिपादन २०
तत्त्वाधिगमके उपायभूत सत् संख्यादि
आठ अनुयोगद्वारोंका निरूपण २१
सत्, संख्यादि आठों अनुयोगोंका स्वरूप २१
निर्देश व स्वामित्वादिसें सत् संख्यादिको
पृथक् कहनेका कारण २१
१ सत्प्ररूपणा २२-२४
सत् अनुयोगद्वारकी अपेक्षा जीव तत्त्वका
निरूपण २२
जीव तत्त्वके विशेष-परिज्ञानके लिए चौदह
मार्गणाओंका प्रतिपादन २२
सत्प्ररूपणाके सामान्य और विशेष भेदोंके
द्वारा जीव तत्त्वका निरूपण २२
चौदह मार्गणाओंमें संभव गुणस्थानोंका
प्ररूपण २३
२ संख्या-प्ररूपण २४-२९
चौदह गुणस्थानोंकी अपेक्षा जीव संख्या-
का निरूपण २४
गतिमार्गणाकी अपेक्षा चारों गतियोंमें
संख्याका निरूपण २५
इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा जीवसंख्याका निरूपण २५
कायमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २६
योगमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २६
वेदमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २६
कषायमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २७
ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २७
संयम मार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २७
दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २८
लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा जीवसंख्याका निरूपण २८
भव्यमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २८
सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २८
संज्ञिमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २९
आहारमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, २९
३ क्षेत्रप्ररूपणा २९-३२
सामान्यसे जीवोंके क्षेत्रका निरूपण २९
गतिमार्गणाकी अपेक्षा जीवोंके क्षेत्रका निरूपण २९
इन्द्रिय मार्गणाकी ,, ,, ,, २९
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ३०
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ३१
विशेषार्थके द्वारा क्षेत्रप्ररूपणका स्पष्टीकरण ३२
४ स्पर्शन प्ररूपणा ३३-३९
गुणस्थानोंकी अपेक्षा जीवोंके स्पर्शनका निरूपण ३३
गतिमार्गणाकी ,, ,, ,, ३३
इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ३४
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ३५
विषयानुक्रमणिका ९१
योगमार्गणाकी अपेक्षा जीवोंके स्पर्शनका निरूपण ३५ लेश्यामार्गणाको अपेक्षा जीवोंका अन्तरप्ररूपण ५५
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ३५ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ५६
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ५६
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ५८
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ३६ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ५८
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ३७
लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ३७ ७ भावप्ररूपणा ५९-६२
भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका भाव-प्ररूपण ५९
सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ गतिमार्गणाको ,, ,, ,, ६०
संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ३८ कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
५ काल प्ररूपणा ३९-४६ वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
गुणस्थानोंकी अपेक्षा जीवोंके कालका वर्णन ३९ कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
गतिमार्गणाको ,, ,, ,, ४० ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ४१ संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ६०
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ४२ दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ४२ लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ४३ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ६१
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ४४ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ६२
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ४४
लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ४४ ८ अल्पबहुत्वप्ररूपण ६२-६५
भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ४५ चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका अल्पबहुत्व-प्ररूपण ६२
सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,, ४५ गतिमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, ६२
संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ४६ इन्द्रियमार्गणाकी ,, . ,, ६२
आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ४६ कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
६ अन्तर प्ररूपणा ४६-५९ वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
चौदह गुणस्थानोंमें जीवोंका अन्तर कथन ४६ कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
गतिमार्गणाकी अपेक्षा ,, ,, ४७ ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ६३
इन्द्रियमार्गणाकी ,, ,, ,, ४९ संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
कायमार्गणाकी ,, ,, ,, ५० दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
योगमार्गणाकी ,, ,, ,, ५१ लेश्यामार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
वेदमार्गणाकी ,, ,, ,, ५१ भव्यमार्गणाकी ,, ,, ,, ६४
कषायमार्गणाकी ,, ,, ,, ५२ सम्यक्त्वमार्गणाकी ,, ,, ,- ६५
ज्ञानमार्गणाकी ,, ,, ,, ५३ संज्ञिमार्गणाकी ,, ,, ,, ६५
संयममार्गणाकी ,, ,, ,, ५३ आहारमार्गणाकी ,, ,, ,, ६५
दर्शनमार्गणाकी ,, ,, ,, ५४ सम्यग्ज्ञानके पाँच भेद ६५
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
९२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्ज्ञानके पाँच भेदोंका स्वरूप ६६ श्रुतज्ञानका स्वरूप और उसके भेद ८३
मतिज्ञानादिक्रमसे पाठ रखनेका कारण ६६ मतिपूर्वक श्रुतज्ञानके माननेमें आनेवाली
ये पाँचों ज्ञान दो प्रमाणरूप हैं इस बातका आपत्तियोंका परिहार ८४
निर्देश ६७ श्रुत नयभेदसे कथंचित् अनादिनिधन और
सन्निकर्ष और इन्द्रियकी प्रमाणताका कथंचित् सादि है ८४
निराकरण ६७ श्रुत पूर्वक भी श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है इस
ज्ञानके फलका निरूपण ६८ आशंकाका समाधान ८४
विशेषार्थ द्वारा सन्निकर्ष और इन्द्रियको श्रुतके भेद व उनका कारण ८५
प्रमाण मानने पर उठनेवाले दोषोंका विशेषार्थ द्वारा श्रुतज्ञानका स्पष्टीकरण ८६
स्पष्टीकरण और उनका परिहार ६९ भवप्रत्यय अवधिज्ञानके स्वामी ८६
परोक्षज्ञानका प्रतिपादन ७० भवप्रत्यय कहनेका कारण ८७
परोक्षका स्वरूप ७१ क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञानके स्वामी ८७
प्रत्यक्षज्ञानका प्रतिपादन ७२ अवधिज्ञानके छह भेद व उनका स्वरूप ८८
प्रत्यक्षका स्वरूप ७२ मनःपर्ययज्ञानके भेद और स्वरूप ८९
विभङ्गज्ञानकी प्रमाणताका निराकरण ७२ ऋजुमति और विपुलमतिका अर्थ ८९
इन्द्रिय-व्यापारजनित ज्ञानको प्रत्यक्ष इन दोनों ज्ञानोंका क्षेत्र और कालकी
माननेमें दोष ७२ अपेक्षा विषय ९०
मतिज्ञानके पर्यायवाची नामोंका प्रतिपादन ७४ ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्यय
मति, स्मृति और चिन्तादि नामोंकी ज्ञानमें अन्तर ९०
निरुक्ति व तात्पर्य ७४ विशुद्धि और अप्रतिपातका अर्थ ९०
मतिज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त ७५ विशुद्धि और अप्रतिपातके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें
इन्द्रिय और अनिन्द्रियका स्वरूप ७५ अन्तरका विशेष कथन ९०
तत् पदकी सार्थकता ७६ अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें विशेषता ९१
मतिज्ञानके भेद ७७ विशुद्धि आदिके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें अन्तरका
अवग्रह आदिका स्वरूप ७७ विशेष स्पष्टीकरण ९२
अवग्रहादिके विषयभूत पदार्थोंके भेद ७८ मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका विषय ९२
बहुआदिका स्वरूप ७८ मतिज्ञानकी अरूपी द्रव्योंमें मनसे प्रवृत्ति
बहु और बहुविधमें अन्तर ७९ होती है ९२
उक्त और निःसृतमें अन्तर ७९ अवधिज्ञानका विषय ९३
'क्षिप्रनिःसृत' पाठान्तरकी सूचना और मनःपर्ययज्ञानका विषय ९३
उसका अर्थ ७९ केवलज्ञानका विषय ९४
ध्रुवावग्रह और धारणामें भेद ७९ एक जीवमें एक साथ संभव ज्ञानोंका निरूपण ९५
बहु आदि अर्थके अवग्रह आदि होते हैं ८० मिथ्याज्ञानोंका निरूपण ६६
अर्थ पद देनेकी सार्थकता ८० मिथ्याज्ञानके कारणोंका निरूपण ९६
व्यञ्जन का अवग्रह ही होता है ८० कारण विपर्यास भेदाभेदविपर्यास और
व्यञ्जन शब्दका अर्थ ८१ स्वरूपविपर्यासका वर्णन ९७
व्यञ्जनावग्रह और अर्थावग्रहमें भेद ८१ नयोंके भेद ९८
व्यञ्जनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता ८१ नयका स्वरूप ९८
आगम और युक्तिसे चक्षु और मनकी नैगमनयका स्वरूप ९८
अप्राप्यकारिताकी सिद्धि ८२ संग्रहनयका स्वरूप ९९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
विषयानुक्रमणिका ९३
व्यवहारनयका स्वरूप ९९ उपयोगके भेदोंका स्वरूप व प्रवृत्तिक्रमका
ऋजुसूत्रनयका स्वरूप १०० निर्देश ११५
शब्दनयका स्वरूप १०० जीवोंके भेद ११६
समभिरूढ़नयका स्वरूप १०१ संसार शब्दका अर्थ ११६
एवम्भूतनयका स्वरूप १०१ द्रव्यपरिवर्तनका स्वरूप ११७
नयोंका पारस्परिक सम्बन्ध और उत्तरोत्तर क्षेत्र परिवर्तनका ,, ११७
विषय की सूक्ष्मता १०२ काल परिवर्तनका ,, ११८
विशेषार्थ द्वारा नयोंका स्पष्टीकरण १०३ भव परिवर्तनका ,, ११८
भाव परिवर्तनका ,, ११९
दूसरा अध्याय संसारी जीवोंके भेद १२१
जीवके असाधारण भावोंका निरूपण १०५ मनके दो भेद तथा समनस्क और अमनस्क
उपशम आदिका अर्थ १०५ शब्दका अर्थ १२१
औपशमिकादि भावोंके क्रमकी सार्थकता १०५ संसारी जीवोंके प्रकारान्तरसे भेद १२१
भावोंके भेदोंकी संख्या १०६ सूत्रमें संसारी पद देनेकी सार्थकता १२१
द्विनवाष्टादिपदका भेद शब्दके साथ दो त्रस और स्थावर शब्दका आगमिक अर्थ १२२
प्रकारका समास १०६ स्थावर जीवोंके भेद १२२
औपशमिक भावके दो भेद १०७ स्थावर शब्दका अर्थ १२२
औपशमिक सम्यक्त्व किस प्रकार उत्पन्न पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और
होता है १०७ पृथिवीजीवका स्वरूप १२२
काललब्धिका वर्णन १०७ स्थावर जीवोंके प्राण १२३
औपशमिकचारित्र किस प्रकार उत्पन्न त्रस जीवोंके भेद १२३
होता है १०८ द्वीन्द्रिय आदि शब्दोंका अर्थ १२३
क्षायिकभावके नौ भेद १०८ द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके प्राण १२३
नौ क्षायिक भावोंका स्वरूप व उनका कार्य १०९ इन्द्रियोंकी संख्या १२४
क्षायिक दानादि कृत अभयदानादि सिद्धोंके इन्द्रियोंमें कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण नहीं होता १२४
क्यों नहीं होते इसका कारण १०९ इन्द्रियोंके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद ११० द्रव्येन्द्रियके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेदोंका स्वरूप १११ निर्वृत्ति और उपकरणका अर्थ व इनके भेद १२५
औदयिक भावके इक्कीस भेद ११२ भावेन्द्रियके दो भेद १२५
औदयिक भावके भेदोंका स्वरूप ११२ लब्धि और उपयोगका अर्थ १२५
उपशान्तकषाय आदिमें शुक्ललेश्या किस उपयोगको इन्द्रिय कहनेका कारण १२५
प्रकार मानी गयी है इसका निर्देश ११३ पाँच इन्द्रियोंके विषय १२६
पारिणामिक भावके तीन भेद ११३ कर्मसाधन और भावसाधन द्वारा
अस्तित्वादि अन्य भी पारिणामिक भाव हैं फिर स्पर्शादिकी सिद्धि १२७
उनका ग्रहण क्यों नहीं किया इस शंका मनका विषय १२८
का समाधान ११४ श्रुत शब्दके दो अर्थ १२८
विशेषार्थ द्वारा पारिणामिक भावोंका खुलासा ११४ वनस्पति पर्यन्त जीवोंके एक इन्द्रिय होती है १२८
जीवका लक्षण ११५ स्पर्शन इन्द्रियकी उत्पत्तिका कारण १२८
उपयोगका स्वरूप ११५ कृमि आदि जीवोंके दो आदि इन्द्रियां होती हैं १२९
उपयोगके भेद-प्रभेद ११५ किस क्रमसे इन्द्रियां बढ़ी हैं उनका नामनिर्देश १२९
९४ सर्वार्थसिद्धि
संज्ञी जीवोंका स्वरूप १२९ वैक्रियिक और आहारक शरीरको अप्रतीघात
समनस्क पद देनेकी सार्थकता १३० क्यों नहीं कहा १३९
विग्रहगतिमें जीवकी गतिका कारण १३० तैजस और कार्मणका अनादिसम्बन्ध १३९
विग्रह कर्म व योग शब्दका अर्थ १३० 'च' पदकी सार्थकता १३९
गतिका नियम १३१ तैजस और कार्मणके स्वामी १३९
श्रेणि शब्दका अर्थ १३१ एक जीवके एक साथ लभ्य शरीरोंकी संख्या १४०
गतिपदकी सार्थकता १३१ कार्मण शरीरकी निरुपभोगता १४०
काल और देशनियमका विधान १३१ उपभोग पदका अर्थ १४०
विग्रह शब्दका अर्थ १३२ तैजस शरीर भी निरुपभोग हैं फिर उसका
'अविग्रहा जीवस्य' सूत्रकी सार्थकता १३२ ग्रहण क्यों नहीं किया १४१
संसारी जीवकी गतिका नियम और समय १३२ औदारिक शरीर किस-किस जन्मसे होता है १४१
निष्कुटक्षेत्रसे मरकर निष्कुटक्षेत्रमें उत्पन्न वैक्रियिक शरीर किस जन्मसे होता है १४२
होनेवाले जीवकी त्रिविग्रह गति १३२ वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है १४२
अविग्रहवाली गतिका समय निर्देश १३३ तैजसशरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है १४१
अनाहारक जीवोंका समय-निर्देश १३३ आहारकशरीरकी विशेषता और स्वामी १४२
आहार शब्दका अर्थ १३३ शुभ आदि पदोंका अर्थ १४२
जन्मके भेद १३४ आहारकशरीरकी उत्पत्तिका प्रयोजन १४३
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद पदका अर्थ १३४ नारक और सम्मूर्च्छिनोंके वेद का वर्णन १४३
चौरासी लाख योनियां किसके कितनी होती हैं १३४ नारक शब्दका अर्थ १४३
योनियोंके भेद १३४ देवोंके वेदका वर्णन १४४
सचित्त आदि पदोंका अर्थ १३४ शेष जीवोंके वेदका वर्णन १४४
'तत्' पदकी सार्थकता १३५ लिंगके दो भेद व उनका अर्थ १४४
योनि और जन्ममें अन्तर १३५ स्त्री आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति १४४
किस जीवके कौन योनि होती है इसका खुलासा १३५ अनपवर्त्यायुष्क जीवोंका निरूपण १४५
गर्भ जन्मके स्वामी १३६ औपपादिक आदि पदोंका अर्थ १४५
जरायु आदि पदोंका अर्थ १३६ पाठान्तरका निर्देश १४६
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
तीसरा अध्याय
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
सम्मूर्च्छन जन्मके स्वामी १३६ नरककी सात भूमियां व उनका आधार १४७
जन्मके भूस्वामियोंके प्रतिपादक तीनों सूत्र रत्नप्रभा आदि नामोंकी सार्थकता १४७
नियमार्थक हैं १३६ 'भूमि' पदकी सार्थता १४७
शरीरके पांच भेद १३७ भूमि, तीन वातवलय और आकाश इनमें
औदारिक आदि पदोंका अर्थ १३७ आधार-आधेयभाव १४७
शरीरोंमें उत्तरोत्तर सूक्ष्मता १३७ सप्त पदकी सार्थकता १४८
तैजससे पूर्व तीन शरीर उत्तरोत्तर प्रदेशोंकी विशेषार्थ द्वारा अधोलोकका विशेष स्पष्टीकरण १४८
अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं १३८ भूमियोंमें नरकों ( बिलों ) की संख्या १४८
गुणकारका प्रमाण १३८ भूमियोंमें नरक प्रस्तारोंका विचार १४९
अन्तके दो शरीर अनन्तगुणे हैं १३८ नारक निरन्तर अशुभतरलेश्या आदि वाले
तैजस और कार्मण शरीरकी अप्रतीघातता १३९ होते हैं इसका विचार १४९
प्रतीघात पदका अर्थ १३९ नित्य शब्दका अर्थ १४९
विषयानुक्रमणिका ९५
किस भूमिमें कौन लेश्या है इसका विचार १५० हिमवान् आदि नाम अनिमित्तक और
द्रव्यलेश्या और भावलेश्याका काल १५० अनादि हैं १५६
नारकियोंके देहका विचार व देहकी ऊँचाई १५० हिमवान् आदिको वर्षधर पर्वत कहनेका
नारकियोंके तीव्र वेदनाका कारण १५० कारण १५६
नारकोंमें उष्णता व शीतताका विचार १५० कौन पर्वत कहाँसे कहाँ तक अवस्थित है व उनकी
नारकी स्वभावसे अशुभ विक्रिया करते हैं ऊँचाई और अवगाह क्या है इसका विचार १५६
और अशुभ निमित्त जोड़ते हैं १५० पर्वतोंका रंग १५६
नारकी आपसमें दुःखके कारण होते हैं १५१ पर्वतोंकी विशेषता व विस्तार १५७
परस्पर दुःख उत्पन्न करनेके कारणोंका निर्देश १५१ 'च' पदकी सार्थकता १५७
नारकियोंकी विक्रियासे ही तलवार, बरछो पर्वतोंपर तालाब १५७
आदि बनते हैं १५१ प्रथम तालाबका आयाम व विस्तार १५७
तीसरी भूमि तक असुरोंके निमित्तसे दुःख- प्रथम तालाबका अवगाह १५७
की उत्पत्ति १५१ प्रथम तालाबमें कमलका प्रमाण १५८
असुर शब्दका अर्थ १५१ प्रथम तालाबके कमलके अवयवोंका प्रमाण
असुरोंके संक्लिष्ट विशेषणकी सार्थकता १५१ व जलतलसे कमलकी ऊँचाईका प्रमाण १५८
कुछ अम्बाबरीष आदि देव ही दुःखमें अन्य तालाब व कमलोंका प्रमाण १५८
निमित्त होते हैं इसका निर्देश १५१ कमलोंमें निवास करनेवालो छह देवियों व
सूत्रमें आये हुए 'च' पदकी सार्थकता १५२ उनका परिवार और आयु १५८
नारकियोंके अकालमरण न होनेका कारण १५२ कमलोंकी कर्णिकाके बीचमें बने हुए प्रासादों
नारकियोंकी उत्कृष्ट आयु १५२ का प्रमाण व रंग १५९
'सत्त्वानाम्' पदकी सार्थकता १५३ मुख्य कमलोंके परिवार, कमलोंमें रहनेवाले
तिर्यग्लोक पदका अर्थ १५३ अन्य देव १५९
द्वीपों और समुद्रोंके मुख्य-मुख्य नामोंका निर्देश १५३ पूर्वोक्त क्षेत्रोंमें बहनेवाली चौदह नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंके अनेक नामोंका निर्देश १५३ पूर्व समुद्रको जानेवाली नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंका विष्कम्भ और आकृति १५३ पश्चिम समुद्रको जानेवालो नदियाँ १६०
सूत्रमें आये हुए प्रत्येक पदकी सार्थकता १५३ कौन नदी किस तालाबके किस ओरके द्वारसे
जम्बूद्वीपका सन्निवेश और व्यास १५४ निकली है इसका विचार- १६०
जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण १५४ गंगा और सिन्धु आदि नदियों की परिवार
जम्बूवृक्षकी अवस्थिति कहाँ है और वह नदियाँ १६०
किस रूप है इसका विचार १५४ सूत्रमें गंगा और सिन्धु दोनों पदोंके रखने
विशेषार्थ द्वारा मध्यलोक और सुमेरु पर्वत- की सार्थकता १६०
का वर्णन १५४ भरत क्षेत्रका विस्तार १६१
सात क्षेत्रोंकी संज्ञा १५५ विदेह पर्यन्त आगेके पर्वतों व क्षेत्रोंका
भरत आदि संज्ञाएँ अनिमित्तक और विस्तार १६१
अनादि हैं १५५ उत्तरके क्षेत्र व पर्वतोंके विस्तारका प्रमाण १६२
कौन क्षेत्र कहाँ पर है इसका विचार १५५ भरत और ऐरावत क्षेत्रमें कालकृत परिवर्तन १६२
सात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह यह परिवर्तन क्षेत्रका न होकर वहाँके जीवों-
कुलाचल पर्वत १५६ का होता है १६२
ये पर्वत कहाँ से कहाँ तक फैले हुए हैं १५६ यह परिवर्तन अनुभव, आयु और प्रमाणादि
कृत होता है १६२
९६ सर्वार्थसिद्धि
अनुभव आदि शब्दोंका अर्थ १६२ मनुष्योंके भेद १६७
कालके दो भेद और इनमेंसे प्रत्येकके छह आर्यशब्दका अर्थ और आर्योंके भेद १६७
छह भेद १६२ म्लेच्छोंके भेद व उनके विशेष वर्णनके
कालके दोनों भेदोंकी कल्प संज्ञा १६३ प्रसंगसे अन्तर्दीपोंका वर्णन १६८
सुषमासुषमा आदि कालोंका प्रमाण आदि १६३ शक, यवन आदि कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं इस
शेष भूमियाँ अवस्थित हैं १६३ बातका निर्देश १६९
हैमवतक आदि मनुष्योंकी आयु १६३ कर्मभूमि कहाँ कहाँ है १६९
हैमवत आदि क्षेत्रोंमें कौनसा काल प्रवर्त्तता भोगभूमियाँ कहाँ कहाँ हैं १६९
है व वहाँके मनुष्योंका रंग व आहार आदि कर्म शब्दका अर्थ १६९
किस प्रकारका है १६४ कर्मभूमि और भोगभूमि बननेका कारण १६९
दक्षिणके क्षेत्रोंके समान उत्तरके क्षेत्रोंका मनुष्योंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७०
वर्णन है १६४ पल्यके तीन भेद और उनका प्रमाण लाने
विदेहमें कालका प्रमाण १६४ की विधि १७०
विदेहमें काल, मनुष्योंकी ऊँचाई, आहार उद्धारसागरका प्रमाण १७०
और आयुका विचार १६४ द्वीप-समुद्रोंकी गणना १७१
पूर्वका प्रमाण १६५ अद्धासागरका प्रमाण १७१
भरतक्षेत्रके विष्कम्भका सोपपत्ति विचार १६५ अद्धासागरसे किन किनकी गिनती होती है
जम्बूद्वीपके बाद कौन सा समुद्र है और इसका विचार १७१
तदनन्तर कौन सा द्वीप है इसका निर्देश १६५ तिर्यञ्चोंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७१
धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्रादिका विचार १६५ तिर्यग्योनिज शब्दका अर्थ १७१
धातकीखण्डको दक्षिण और उत्तर इन
दो भागोंमें विभाजित करनेवाले दो चौथा अध्याय
इष्वाकार पर्वत १६५ देवोंके चार भेद १७३
धातकीखण्ड-द्वीपमें दो मेरु १६५ देव शब्दका अर्थ १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें दो-दो भरतादि क्षेत्र निकाय शब्दका अर्थ १७३
और दो-दो हिमवान् आदि १६६ आदिके तीन निकायोंमें लेश्या विचार १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें क्षेत्रों व पर्वतोंका देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका निर्देश १७४
संस्थान व विष्कम्भ १६६ कल्पोपपन्न पद देनेकी सार्थकता १७४
धातकीखण्ड द्वीपमें सपरिवार धातकीवृक्ष १६६ देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका नामनिर्देश १७५
धातकीखण्ड द्वीपके बाद कालोद समुद्र व इन्द्र आदि शब्दोंका अर्थ १७५
उसका विस्तार १६६ व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें कितने अन्तर्भेद
पुष्करार्धमें क्षेत्रादिका विचार १६६ हैं इसका विचार १७६
पुष्करार्धमें इष्वाकार पर्वत व पुष्कर वृक्ष प्रथम दो निकायोंमें इन्द्रोंका विचार १७६
आदिका निर्देश १६६ प्रत्येक निकायके अवान्तर भेदोंके इन्द्रोंके नाम १७६
पुष्करार्ध संज्ञाका करण १६७ ऐशान कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतके पहले मनुष्य हैं १६७ शेष कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतका विशेष वर्णन १६७ प्रवीचार पद देनेकी सार्थकता १७७
मानुषोत्तर पर्वतको लांघकर ऋद्धिधारी कल्पातीत देवोंमें प्रवीचार नहीं है इस
मनुष्य भी नहीं जा सकते १६७ बातका निर्देश १७८
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
विषयानुक्रमणिका ९७
भवनवासियोंके दस भेद १७८ ग्रैवेयकके पूर्व तक कल्प संज्ञा १८७
भवनवासी शब्दका अर्थ १७८ लौकान्तिक देवोंका निवास स्थान १८८
असुरकुमार आदि नामोंमें कुमार पदकी लौकान्तिक शब्दकी सार्थकता १८८
सार्थकता १७८ लौकान्तिकोंके आठ भेदोंके नाम १८८
भवनवासियोंका निवासस्थान १७८ किस दिशामें किस नामवाले लौकान्तिक रहते
व्यन्तरोंके आठ भेद १७९ हैं इसका विचार १८८
व्यन्तर शब्दका अर्थ १७९ 'च' शब्दसे समुच्चित अन्य लौकान्तिकोंका
व्यन्तरोंका निवासस्थान १७९ निर्देश १८८
ज्योतिषियोंके पाँच भेद १७९ विजयादिकमे द्विचरम देव होते हैं १८९
ज्योतिष्क पदकी सार्थकता १७९ आदि पदसे सर्वार्थसिद्धिके ग्रहण न होनेका कारण १८९
'सूर्याचन्द्रमसौ' पदके पृथक् देनेका कारण १७९ द्विचरम शब्दका अर्थ १८९
ज्योतिषियोंका पूरे विवरणके साथ निवासस्थान १७९ तिर्यग्योनिसे किनका ग्रहण होता है इसका
मनुष्य लोकमें ज्योतिषियोंकी निरन्तर मेरु विचार १९०
प्रदक्षिणा १८० तिर्यञ्च सब लोकमें रहते हैं अतः उनका क्षेत्र
ज्योतिष्क विमानोंके गमन करनेका कारण १८० नहीं कहा १९०
ज्योतिष्कदेव मेरु पर्वतसे कितनी दूर रहकर भवनवासियोंके अवान्तर भेदोंकी उत्कृष्ट आयु १९०
प्रदक्षिणा करते हैं १८० सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
गतिमान् ज्योतिषियोंके निमित्तसे कालका विभाग 'अधिके' यह अधिकार वचन है इस बातका
होता है १८० निर्देश , १९१
कालके दो भेद व व्यवहार कालका स्वरूप १८१ सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
मनुष्य लोकके बाहर ज्योतिष्क विमान शेष बारह कल्पोंमें उत्कृष्ट आयु १९१
अवस्थित हैं १८१ 'तु' पदकी सार्थकता १९१
वैमानिकोंके वर्णनके प्रसंगसे अधिकार सूत्र १८२ कल्पातीत विमानोंमें उत्कृष्ट आयु १९२
विमान शब्दका अर्थ व उसके भेदोंका विचार १८२ 'सर्वार्थसिद्धौ' पदको पृथक् ग्रहण करनेका
वैमानिकोंके दो भेद १८२ कारण १९२
वैमानिक देव ऊपर ऊपर निवास करते हैं १८३ सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य आयु १९३
कितने कल्प विमानोंमें वे देव रहते हैं इसका शेष सबमें जघन्य आयुका विचार १९३
विचार १८३ द्वितीयादि नरकोंमें जघन्य आयु १९३
सौधर्म आदि शब्दके व्यवहारका कारण १८३ प्रथम नरकमें जघन्य आयु १९४
मेरु पर्वतकी ऊँचाई व अवगाहका परिमाण १८४ भवनवासियोंमें जघन्य आयु १९४
अधोलोक आदि शब्दोंकी सार्थकता १८४ व्यन्तरोंमें जघन्य आयु १९४
सौधर्म कल्पका ऋजु विमान कहाँ पर है इसका व्यन्तरोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
निर्देश १८४ ज्योतिषियोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
'नवसु' पदके पृथक् देनेका कारण १८४ ज्योतिषियोंमें जघन्य आयु १९५
देवोंमें उत्तरोत्तर स्थिति प्रभावादिकृत विशेषता १८५ लौकान्तिक देवोंमें आयुका विचार १९५
गति आदि शब्दों का अर्थ १८५
कहांके देवके शरीरकी कितनी ऊँचाई है आदि पाँचवाँ अध्याय
का विचार १८५ अजीवकाय द्रव्योंका निर्देश १९६
वैमानिक देवोंमें लेश्याका विचार १८६ काय शब्द देनेकी सार्थकता १९६
सूत्रार्थकी आगमसे संगति बिठानेका उपक्रम १८७ अजीव यह धर्मादिक द्रव्योंकी सामान्य संज्ञा है १९६
१३
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
९८ सर्वार्थसिद्धि
ये धर्मादिक द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९७ लोक शब्दका अर्थ २०६
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति १९७ आकाशके दो भेद और उनका अर्थ २०६
ये धर्मादिक द्रव्यत्व नामक सामान्यके योगसे लोकालोक विभागका कारण २०६
द्रव्य नहीं हैं इस बातका सयुक्तिक विचार १९७ धर्म और अधर्म द्रव्य लोकव्यापी हैं २०६
'गुणसमुदायो द्रव्यम्' ऐसा माननेमें भी आपत्ति १९७ पुद्गल द्रव्य लोकके एक प्रदेश आदिमें रहते हैं २०७
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति और उसकी सिद्धि १९७ मूर्त पुद्गल एकत्र कैसे रहते हैं इसका विचार २०७
'द्रव्याणि' बहुवचन देनेका कारण व अन्य जीव लोकके असंख्येयभाग आदिमें रहते हैं २०७
विशेषताओंका निर्देश १९८ सशरीरी अनन्तानन्त जीव असंख्येयभाग
जीव भी द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९८ आदिमें कैसे रहते हैं इसका विचार २०८
नैयायिकोंके द्वारा माने गये द्रव्योंके अन्तर्भाव जीवके असंख्येयभाग आदिमें रहनेका कारण २०८
की सिद्धि १९८ धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार २०९
द्रव्योंकी विशेषता २०० गति, स्थिति और उपग्रह पदका अर्थ २०९
नित्य आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २०० उपग्रह पदकी सार्थकता २०९
पुद्गल द्रव्य रूपी है इसका विचार २०० गति और स्थितिको धर्म और अधर्म द्रव्यका
रूप पदका अर्थ २०० उपकार माननेका कारण २०९
आकाश पर्यन्त एक एक द्रव्य हैं इसका विचार २०१ गति और स्थितिके प्रतिबन्ध न होनेका कारण २०९
सूत्रमें द्रव्य पदके ग्रहण करनेकी सार्थकता २०१ धर्म और अधर्म द्रव्यकी सिद्धि २१०
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं २०२ अवकाशका उपकार २१०
निष्क्रिय शब्दका अर्थ २०२ निष्क्रिय धर्मादि द्रव्योंको आकाश कैसे
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय होने पर भी उनमें अवगाह देता है इसका विचार २११
उत्पादादिकी सिद्धि २०२ दो स्कन्धों के परस्पर टकरानेसे आकाशके
उत्पादके दो भेद २०२ अवकाश दानकी हानि नहीं होती २११
निष्क्रिय धर्मादिक द्रव्य गति आदिके हेतु सूक्ष्म पुद्गल परस्पर अवकाश देते हैं तो भी
कैसे हैं इसका विचार २०२ आकाशके अवकाशदानकी हानि नहीं
धर्म, अधर्म और एक जीवके प्रदेश २०३ होती इस बातका समर्थन २११
असंख्येयके तीन भेद २०३ पुद्गलोंका उपकार २११
प्रदेश शब्दका अर्थ २०३ कार्मण शरीरके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१२
धर्म और अधर्म द्रव्य लोकाकाशव्यापी हैं २०३ वचनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
जीव शरीरपरिमाण होकर भी लोकपूरण समुद्घात पनेकी सिद्धि २१२
के समय लोकाकाशव्यापी होता है २०३ मनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
आकाशके प्रदेशोंका विचार २०३ पनेकी सिद्धि २१३
अनन्त शब्दका अर्थ २०३ मन द्रवन्तर नहीं है इसकी सयुक्तिक सिद्धि २१३
पुद्गलोंके प्रदेशोंका विचार २०४ प्राण और अपान शब्दका अर्थ २१३
'च' पदकी सार्थकता २०४ मन, प्राण और अपानके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१३
अनन्तके तीन भेद २०४ आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि २१४
असंख्यातप्रदेशी लोकमें अनन्तानन्त प्रदेशी पुद्गलोंके अन्य उपकार २१४
स्कन्ध कैसे समाता है इसका विचार २०४ सुख, दुःख आदि शब्दोंका अर्थ २१४
अणुके दो आदि प्रदेश नहीं होते २०४ उपग्रह पदकी सार्थकता २१४
सब द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है २०५ जीवोंका उपकार २१५
आधाराधेयविचार २०५ कालका उपकार २१६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
विषयानुक्रमणिका ९९
वर्तना शब्दका अर्थ २१६ गुणवैषम्यमें सदृशोंका भी बन्ध होता है यह
काल द्रव्य क्रियावान् नहीं है इसका समर्थन २१६ बतलानेके लिए सूत्रमें सदृश पदका
कालके अस्तित्वकी सिद्धि २१६ ग्रहण किया २२८
परिणाम पदका अर्थ २१६ दो अधिक गुणवालोंका बन्ध होता है २२८
क्रिया पदका अर्थ २१७ बन्धके प्रकारोंका विशेष विवेचन २२८
परत्व और अपरत्वका विचार २१७ बन्ध होने पर अधिक गुणवाले पारिणामिक
वर्तनासे पृथक् परिणामादिके ग्रहण करनेका होते हैं २२९
प्रयोजन २१७ द्रव्यका लक्षण २३१
पुद्गलका लक्षण २१८ एक द्रव्यके दूसरे द्रव्यसे भिन्न होनेके कारणकी
स्पर्श आदि पदोंका अर्थ व उनके भेद २१८ सयुक्तिक सिद्धि २३१
'रूपिणः पुद्गलाः' सूत्रके रहते हुए भी इस काल भी द्रव्य है २३२
सूत्रके कहनेका कारण २१८ कालमें द्रव्यपने की सिद्धि २३३
पुद्गलकी व्यञ्जन पर्यायोंका निर्देश २१९ कालद्रव्यको अलग कहनेका कारण २३३
शब्दके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ विशेषार्थ द्वारा कालका विचार २३४
बन्धके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ कालकी पर्याय अनन्त समय रूप हैं इसकी
सौक्ष्म्यके दो भेद व उनका विचार २१९ सिद्धि २३५
स्थौल्यके दो भेद व उनका विचार २१९ गुणका लक्षण २३६
संस्थानका अपने भेदोंके साथ विचार २१९ गुणका लक्षण पर्यायोंमें न जाय इसकी
भेदके छह भेद व उनका विचार २२० व्यवस्था २३६
तम आदि शेषका स्वरूप निर्देश २२० परिणामका स्वरूप २३७
पुद्गलके भेद २२० परिणामके दो भेद और उनकी सिद्धि २३७
अणु शब्दका अर्थ २२०
स्कन्ध शब्दका अर्थ २२१ छठाँ अध्याय
स्कन्धोंकी उत्पत्तिका हेतु २२१
भेद और संघात पदका अर्थ २२१ योगका स्वरूप २३८
बहुवचन निर्देशकी सार्थकता २२१ कर्म शब्दका अर्थ २३८
अणुकी उत्पत्तिका हेतु २२२ योगके भेद २३८
'भेदसंघातेभ्यः' इस सूत्रमें भेद पदके ग्रहण काय, वचन और मनोयोगका स्वरूप २३८
करनेका प्रयोजन २२२ आस्रवका स्वरूप २३९
अचाक्षुष चाक्षुष कैसे होता है इसका विचार २२२ पुण्यास्रव और पापास्रव २३९
द्रव्यका लक्षण २२३ ये कायादि तीनों योग शुभ और अशुभ इन
सत्की व्याख्या २२३ दो भागोंमें विभक्त हैं २३९
उत्पाद आदि पदोंका अर्थ २२३ शुभयोगका स्वरूप २३९
युक्त पद किस अर्थमें ग्रहण किया है अशुभ योगका स्वरूप २३९
इसका विचार २२३ पुण्य और पाप पदकी व्याख्या २३९
नित्य पदकी व्याख्या २२५ साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव कितने
मुख्यता और गौणतासे अनेकान्तकी सिद्धि २२५ होते हैं २४०
पुद्गलोंके बन्धका कारण २२६ आस्रवके स्वामीके दो भेद २४०
जघन्य गुणवालोंका बन्ध नहीं होता २२७ कषाय शब्दका अर्थ २४०
गुणसाम्यमें सदृशोंका बन्ध नहीं होता २२८ संप्राय शब्दका अर्थ २४०
ईर्या शब्दका अर्थ २४०
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१०० सर्वार्थसिद्धि
साम्परायिक आस्रवके भेद २४० तिर्यंचायुके आस्रव २५०
पचीस क्रियाओंका विशेष विवेचन २४० तिर्यंचायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५०
किन कारणोंसे आस्रवमें विशेषता होती है मनुष्यायुके आस्रव २५१
इसका निर्देश २४२ मनुष्यायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५१
तीव्र, मन्द आदि पदोंकी व्याख्या २४२ मनुष्यायुके अन्य आस्रव २५१
अधिकरणके दो भेद २४३ चारों आयुओंके आस्रव २५१
‘जीवाजीवाः’ ऐसा बहुवचन रखनेका कारण २४३ ‘च’ पदकी सार्थकता २५१
जीवाधिकरणके भेद २४३ देवायुके आस्रव २५२
संरम्भ आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५२
जीवाधिकरणके १०८ भेदोंका नामोल्लेख २४४ देवायुका अन्य आस्रव २५२
‘च’ पदकी सार्थकता २४४ ‘सम्यक्त्वं च’ पृथक् सूत्र बनानेका प्रयोजन २५२
अजीवाधिकरणके भेद २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रव २५३
निसर्ग आदि पदोंका अर्थ २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५३
‘पर’ पदकी सार्थकता २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
निर्वर्तना आदिके उत्तर भेदोंकी व्याख्या २४४ शुभनामकर्मके आस्रव २५३
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव २४५ ‘च’ पदकी सार्थकता २५३
प्रदोष आदि प्रत्येक पदका अर्थ २४५ शुभनामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
आसादन और उपघातमें अन्तर २४५ तीर्थंकर प्रकृतिके आस्रव २५४
‘तत्’ पदसे ज्ञान और दर्शनका ग्रहण कैसे होता सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५४
है इसका विचार २४५ नीचगोत्रके आस्रव २५५
प्रदोषादि ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंके सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्यां २५५
आस्रवके हेतु कैसे हैं इसका विचार २४६ उच्चगोत्रके आस्रव २५५
असातावेदनीयके आस्रव २४६ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५५
दुःख आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४६ अन्तराय कर्मके आस्रव २५६
शोकादिक दुःखके प्रकार होकर भी उनके अलग तत्प्रदोष आदि प्रतिनियत कर्मोंके आस्रवोंका
से ग्रहण करनेका कारण २४६ कथन करनेसे आनेवाले दोषका परिहार २५६
यदि दुःखादिक असाता वेदनीयके आस्रव हैं तो
केशोत्पाटन आदि क्यों करते हैं इसका सातवाँ अध्याय
सयुक्तिक विचार २४७ व्रतकी व्याख्या २५७
सातावेदनीयके आस्रव २४७ हिंसादि परिणामविशेष अध्रुव हैं उनसे दूर
सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २४७ होना कैसे सम्भव है इस शंकाका परिहार २५७
‘इति’ पदकी सार्थकता २४८ हिंसा आदि पदोंको क्रमसे रखनेका प्रयोजन २५८
दर्शनमोहके आस्रव २४८ रात्रिभोजन विरमण व्रत अलगसे नहीं कहने
केवली आदि पदोंकी व्याख्या २४८ का कारण २५८
सोदाहरण अवर्णवादका निरूपण २४८ व्रतके दो भेद २५८
चारित्रमोहके आस्रव २४९ प्रत्येक पदकी व्याख्या २५८
कषाय आदि पदोंकी व्याख्या २४९ व्रतकी स्थिरताके लिए पाँच-पाँच भावनाओंका
चारित्रमोहके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २४९ अधिकार सूत्र २५९
नरकायुके आस्रव २५० अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
नरकायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५० सत्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri