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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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९६ सर्वार्थसिद्धि
अनुभव आदि शब्दोंका अर्थ १६२ मनुष्योंके भेद १६७
कालके दो भेद और इनमेंसे प्रत्येकके छह आर्यशब्दका अर्थ और आर्योंके भेद १६७
छह भेद १६२ म्लेच्छोंके भेद व उनके विशेष वर्णनके
कालके दोनों भेदोंकी कल्प संज्ञा १६३ प्रसंगसे अन्तर्दीपोंका वर्णन १६८
सुषमासुषमा आदि कालोंका प्रमाण आदि १६३ शक, यवन आदि कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं इस
शेष भूमियाँ अवस्थित हैं १६३ बातका निर्देश १६९
हैमवतक आदि मनुष्योंकी आयु १६३ कर्मभूमि कहाँ कहाँ है १६९
हैमवत आदि क्षेत्रोंमें कौनसा काल प्रवर्त्तता भोगभूमियाँ कहाँ कहाँ हैं १६९
है व वहाँके मनुष्योंका रंग व आहार आदि कर्म शब्दका अर्थ १६९
किस प्रकारका है १६४ कर्मभूमि और भोगभूमि बननेका कारण १६९
दक्षिणके क्षेत्रोंके समान उत्तरके क्षेत्रोंका मनुष्योंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७०
वर्णन है १६४ पल्यके तीन भेद और उनका प्रमाण लाने
विदेहमें कालका प्रमाण १६४ की विधि १७०
विदेहमें काल, मनुष्योंकी ऊँचाई, आहार उद्धारसागरका प्रमाण १७०
और आयुका विचार १६४ द्वीप-समुद्रोंकी गणना १७१
पूर्वका प्रमाण १६५ अद्धासागरका प्रमाण १७१
भरतक्षेत्रके विष्कम्भका सोपपत्ति विचार १६५ अद्धासागरसे किन किनकी गिनती होती है
जम्बूद्वीपके बाद कौन सा समुद्र है और इसका विचार १७१
तदनन्तर कौन सा द्वीप है इसका निर्देश १६५ तिर्यञ्चोंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति १७१
धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्रादिका विचार १६५ तिर्यग्योनिज शब्दका अर्थ १७१
धातकीखण्डको दक्षिण और उत्तर इन
दो भागोंमें विभाजित करनेवाले दो चौथा अध्याय
इष्वाकार पर्वत १६५ देवोंके चार भेद १७३
धातकीखण्ड-द्वीपमें दो मेरु १६५ देव शब्दका अर्थ १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें दो-दो भरतादि क्षेत्र निकाय शब्दका अर्थ १७३
और दो-दो हिमवान् आदि १६६ आदिके तीन निकायोंमें लेश्या विचार १७३
धातकीखण्ड द्वीपमें क्षेत्रों व पर्वतोंका देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका निर्देश १७४
संस्थान व विष्कम्भ १६६ कल्पोपपन्न पद देनेकी सार्थकता १७४
धातकीखण्ड द्वीपमें सपरिवार धातकीवृक्ष १६६ देवनिकायोंमें अन्तर्भेदोंका नामनिर्देश १७५
धातकीखण्ड द्वीपके बाद कालोद समुद्र व इन्द्र आदि शब्दोंका अर्थ १७५
उसका विस्तार १६६ व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें कितने अन्तर्भेद
पुष्करार्धमें क्षेत्रादिका विचार १६६ हैं इसका विचार १७६
पुष्करार्धमें इष्वाकार पर्वत व पुष्कर वृक्ष प्रथम दो निकायोंमें इन्द्रोंका विचार १७६
आदिका निर्देश १६६ प्रत्येक निकायके अवान्तर भेदोंके इन्द्रोंके नाम १७६
पुष्करार्ध संज्ञाका करण १६७ ऐशान कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतके पहले मनुष्य हैं १६७ शेष कल्पोंमें प्रवीचारका विचार १७७
मानुषोत्तर पर्वतका विशेष वर्णन १६७ प्रवीचार पद देनेकी सार्थकता १७७
मानुषोत्तर पर्वतको लांघकर ऋद्धिधारी कल्पातीत देवोंमें प्रवीचार नहीं है इस
मनुष्य भी नहीं जा सकते १६७ बातका निर्देश १७८
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri