सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

विषयानुक्रमणिका ९५
किस भूमिमें कौन लेश्या है इसका विचार १५० हिमवान् आदि नाम अनिमित्तक और
द्रव्यलेश्या और भावलेश्याका काल १५० अनादि हैं १५६
नारकियोंके देहका विचार व देहकी ऊँचाई १५० हिमवान् आदिको वर्षधर पर्वत कहनेका
नारकियोंके तीव्र वेदनाका कारण १५० कारण १५६
नारकोंमें उष्णता व शीतताका विचार १५० कौन पर्वत कहाँसे कहाँ तक अवस्थित है व उनकी
नारकी स्वभावसे अशुभ विक्रिया करते हैं ऊँचाई और अवगाह क्या है इसका विचार १५६
और अशुभ निमित्त जोड़ते हैं १५० पर्वतोंका रंग १५६
नारकी आपसमें दुःखके कारण होते हैं १५१ पर्वतोंकी विशेषता व विस्तार १५७
परस्पर दुःख उत्पन्न करनेके कारणोंका निर्देश १५१ 'च' पदकी सार्थकता १५७
नारकियोंकी विक्रियासे ही तलवार, बरछो पर्वतोंपर तालाब १५७
आदि बनते हैं १५१ प्रथम तालाबका आयाम व विस्तार १५७
तीसरी भूमि तक असुरोंके निमित्तसे दुःख- प्रथम तालाबका अवगाह १५७
की उत्पत्ति १५१ प्रथम तालाबमें कमलका प्रमाण १५८
असुर शब्दका अर्थ १५१ प्रथम तालाबके कमलके अवयवोंका प्रमाण
असुरोंके संक्लिष्ट विशेषणकी सार्थकता १५१ व जलतलसे कमलकी ऊँचाईका प्रमाण १५८
कुछ अम्बाबरीष आदि देव ही दुःखमें अन्य तालाब व कमलोंका प्रमाण १५८
निमित्त होते हैं इसका निर्देश १५१ कमलोंमें निवास करनेवालो छह देवियों व
सूत्रमें आये हुए 'च' पदकी सार्थकता १५२ उनका परिवार और आयु १५८
नारकियोंके अकालमरण न होनेका कारण १५२ कमलोंकी कर्णिकाके बीचमें बने हुए प्रासादों
नारकियोंकी उत्कृष्ट आयु १५२ का प्रमाण व रंग १५९
'सत्त्वानाम्' पदकी सार्थकता १५३ मुख्य कमलोंके परिवार, कमलोंमें रहनेवाले
तिर्यग्लोक पदका अर्थ १५३ अन्य देव १५९
द्वीपों और समुद्रोंके मुख्य-मुख्य नामोंका निर्देश १५३ पूर्वोक्त क्षेत्रोंमें बहनेवाली चौदह नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंके अनेक नामोंका निर्देश १५३ पूर्व समुद्रको जानेवाली नदियाँ १५९
द्वीपों और समुद्रोंका विष्कम्भ और आकृति १५३ पश्चिम समुद्रको जानेवालो नदियाँ १६०
सूत्रमें आये हुए प्रत्येक पदकी सार्थकता १५३ कौन नदी किस तालाबके किस ओरके द्वारसे
जम्बूद्वीपका सन्निवेश और व्यास १५४ निकली है इसका विचार- १६०
जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण १५४ गंगा और सिन्धु आदि नदियों की परिवार
जम्बूवृक्षकी अवस्थिति कहाँ है और वह नदियाँ १६०
किस रूप है इसका विचार १५४ सूत्रमें गंगा और सिन्धु दोनों पदोंके रखने
विशेषार्थ द्वारा मध्यलोक और सुमेरु पर्वत- की सार्थकता १६०
का वर्णन १५४ भरत क्षेत्रका विस्तार १६१
सात क्षेत्रोंकी संज्ञा १५५ विदेह पर्यन्त आगेके पर्वतों व क्षेत्रोंका
भरत आदि संज्ञाएँ अनिमित्तक और विस्तार १६१
अनादि हैं १५५ उत्तरके क्षेत्र व पर्वतोंके विस्तारका प्रमाण १६२
कौन क्षेत्र कहाँ पर है इसका विचार १५५ भरत और ऐरावत क्षेत्रमें कालकृत परिवर्तन १६२
सात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह यह परिवर्तन क्षेत्रका न होकर वहाँके जीवों-
कुलाचल पर्वत १५६ का होता है १६२
ये पर्वत कहाँ से कहाँ तक फैले हुए हैं १५६ यह परिवर्तन अनुभव, आयु और प्रमाणादि
कृत होता है १६२