सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ सर्वार्थसिद्धि
'न्यासं जैनेन्द्रसंज्ञं सकलबुधनुतं पाणिनीयस्य भूयो।
न्यासं शब्दावतारं मनुजततिहितं वैद्यशास्त्रं च कृत्वा ।
यस्तत्त्वार्थस्य टीकां न्यरचदिह तां मान्यसौ पूज्यपाद-
स्वामी भूपालवन्द्यः स्वपरहितवचःपूर्णदृग्बोधवृत्तः ॥'
ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हुए हैं। इसके लिए प्राचीन शास्त्रभाण्डारोंमें विशेष अनुसन्धानकी
आवश्यकता है।
८. शान्त्यष्टक—हम पहले आचार्य पूज्यपादकी कथा दे आये हैं। उसके लेखकने इनके बनाये हुए
एक 'शान्त्यष्टक' का उल्लेख किया है। एक शान्त्यष्टक क्रियाकलापमें भी संगृहीत है। इस पर पं० प्रभा-
चन्द्रकी संस्कृत टीका है। शान्त्यष्टकके प्रारम्भमें पं० प्रभाचन्द्रजीने जो उत्थानिका दी है उसमें कथालेखक
चन्द्रय्य कविके मतका समर्थन करते हुए कहते हैं कि श्री पादपूज्य स्वामीको चक्षुतिमिरव्याधि हो गयी थी
जिसे दूर करनेके लिए वे स्तुति करते हुए कहते हैं, 'न स्नेहात्'। इसके अन्तमें जो श्लोक आता है उसमें
'दृष्टि प्रसन्नां कुरु' इत्यादि पदद्वारा भी यही भाव व्यक्त होता है। इससे विदित होता है कि सम्भव है जीवन
के अन्तमें पूज्यपाद आचार्यकी दृष्टि तिमिराच्छन्न हो गयी हो और उसे दूर करनेके लिए उन्होंने ही शान्त्यष्टक
लिखा हो। यदि यह अनुमान ठीक हो तो शान्त्यष्टक उनकी वह कृति मानो जा सकती है जो सम्भवतः सब
कृतियोंके अन्तमें लिखी गयी होगी।
९. सारसंग्रह—आचार्य पूज्यपादने एक 'सारसंग्रह' नामक ग्रन्थका भी निर्माण किया था ऐसा
धवलाके एक उल्लेखसे ज्ञात होता है। यथा—
'सारसंग्रहेऽप्युक्तं पूज्यपादैः-अनन्तपर्यायात्मकस्य वस्तुनोऽन्यतमपर्यायाधिगमे कर्तव्ये जात्यहेत्व-
पेक्षो निरवद्यप्रयोगो नय इति ।'
सर्वार्थसिद्धिमें आचार्य पूज्यपादने जो नयका लक्षण दिया है इससे इस लक्षणमें बहुत कुछ साम्य है,
इसलिए यह माननेका पर्याप्त कारण है कि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपादकी ही कृति होनी चाहिए।
१०. चिकित्साशास्त्र—इस बातको सिद्ध करनेवाले भी कई प्रमाण मिलते हैं कि आचार्य पूज्यपादने
वैद्यक विषय पर भी कोई अनुपम ग्रन्थ लिखा था। यथा—
१. आचार्य शुभचन्द्रद्वारा रचित ज्ञानार्णवके एक श्लोकका उल्लेख हम पहले कर आये हैं। उसमें
उनके वचनों को वचनमल और चित्तमलके समान कायमलको दूर करनेवाला कहा गया है।
२. आचार्य उग्रादित्यने अपने कल्याणकारक नामक ग्रन्थमें आचार्यः पूज्यपादके वैद्यक विषयक ग्रन्थका
उल्लेख 'पूज्यपादेन भाषितः, शालाक्यं पूज्यपादप्रकटितमधिकम्' इत्यादि शब्दसन्दर्भद्वारा किया है।
३. हम पहले शिमोगा जिलेके नगर ताल्लुकेके ४६ नं० के एक शिलालेखका उल्लेख कर आये हैं
उसमें भी उन्हें मनुष्य समाजका हित करनेवाला वैद्यक शास्त्रका रचयिता कहा गया है।
४. विक्रमकी पन्द्रहवीं शताब्दीके विद्वान् मंगराजने अपने कनडी भाषामें लिखे गये खगेन्द्रमणिदर्पणमें
भी आचार्यपूज्यपादके एक चिकित्साग्रन्थका उल्लेख किया है।
इन सब प्रमाणोंसे विदित होता है कि सम्भवतः आचार्यपूज्यपादने चिकित्सा सम्बन्धी कोई ग्रन्थ
लिखा था।
११. जैनाभिषेक—श्रवणवेलगोलके शक सं० १०८५ के शिलालेख नं० ४० से यह भी विदित होता
है कि इन्होंने एक जैन अभिषेक पाठ की भी रचना की थी। उद्धरण इस प्रकार है—
'जैनेन्द्रं निजशब्दमोगमतुलं सर्वार्थसिद्धिः परा
सिद्धान्ते निपुणत्वमुद्द्वकतां जैनाभिषेकः स्वकः ।
छन्दस्सूक्ष्मधियं समाधिशतकस्स्वास्थ्यं यदीयं विदाम्
आख्यातीह स पूज्यपादमुनिपः पूज्यो मुनीनां गणैः ॥'
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri