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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका ९३
व्यवहारनयका स्वरूप ९९ उपयोगके भेदोंका स्वरूप व प्रवृत्तिक्रमका
ऋजुसूत्रनयका स्वरूप १०० निर्देश ११५
शब्दनयका स्वरूप १०० जीवोंके भेद ११६
समभिरूढ़नयका स्वरूप १०१ संसार शब्दका अर्थ ११६
एवम्भूतनयका स्वरूप १०१ द्रव्यपरिवर्तनका स्वरूप ११७
नयोंका पारस्परिक सम्बन्ध और उत्तरोत्तर क्षेत्र परिवर्तनका ,, ११७
विषय की सूक्ष्मता १०२ काल परिवर्तनका ,, ११८
विशेषार्थ द्वारा नयोंका स्पष्टीकरण १०३ भव परिवर्तनका ,, ११८
भाव परिवर्तनका ,, ११९
दूसरा अध्याय संसारी जीवोंके भेद १२१
जीवके असाधारण भावोंका निरूपण १०५ मनके दो भेद तथा समनस्क और अमनस्क
उपशम आदिका अर्थ १०५ शब्दका अर्थ १२१
औपशमिकादि भावोंके क्रमकी सार्थकता १०५ संसारी जीवोंके प्रकारान्तरसे भेद १२१
भावोंके भेदोंकी संख्या १०६ सूत्रमें संसारी पद देनेकी सार्थकता १२१
द्विनवाष्टादिपदका भेद शब्दके साथ दो त्रस और स्थावर शब्दका आगमिक अर्थ १२२
प्रकारका समास १०६ स्थावर जीवोंके भेद १२२
औपशमिक भावके दो भेद १०७ स्थावर शब्दका अर्थ १२२
औपशमिक सम्यक्त्व किस प्रकार उत्पन्न पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और
होता है १०७ पृथिवीजीवका स्वरूप १२२
काललब्धिका वर्णन १०७ स्थावर जीवोंके प्राण १२३
औपशमिकचारित्र किस प्रकार उत्पन्न त्रस जीवोंके भेद १२३
होता है १०८ द्वीन्द्रिय आदि शब्दोंका अर्थ १२३
क्षायिकभावके नौ भेद १०८ द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके प्राण १२३
नौ क्षायिक भावोंका स्वरूप व उनका कार्य १०९ इन्द्रियोंकी संख्या १२४
क्षायिक दानादि कृत अभयदानादि सिद्धोंके इन्द्रियोंमें कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण नहीं होता १२४
क्यों नहीं होते इसका कारण १०९ इन्द्रियोंके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेद ११० द्रव्येन्द्रियके दो भेद १२४
क्षायोपशमिक भावके अठारह भेदोंका स्वरूप १११ निर्वृत्ति और उपकरणका अर्थ व इनके भेद १२५
औदयिक भावके इक्कीस भेद ११२ भावेन्द्रियके दो भेद १२५
औदयिक भावके भेदोंका स्वरूप ११२ लब्धि और उपयोगका अर्थ १२५
उपशान्तकषाय आदिमें शुक्ललेश्या किस उपयोगको इन्द्रिय कहनेका कारण १२५
प्रकार मानी गयी है इसका निर्देश ११३ पाँच इन्द्रियोंके विषय १२६
पारिणामिक भावके तीन भेद ११३ कर्मसाधन और भावसाधन द्वारा
अस्तित्वादि अन्य भी पारिणामिक भाव हैं फिर स्पर्शादिकी सिद्धि १२७
उनका ग्रहण क्यों नहीं किया इस शंका मनका विषय १२८
का समाधान ११४ श्रुत शब्दके दो अर्थ १२८
विशेषार्थ द्वारा पारिणामिक भावोंका खुलासा ११४ वनस्पति पर्यन्त जीवोंके एक इन्द्रिय होती है १२८
जीवका लक्षण ११५ स्पर्शन इन्द्रियकी उत्पत्तिका कारण १२८
उपयोगका स्वरूप ११५ कृमि आदि जीवोंके दो आदि इन्द्रियां होती हैं १२९
उपयोगके भेद-प्रभेद ११५ किस क्रमसे इन्द्रियां बढ़ी हैं उनका नामनिर्देश १२९