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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 558 में से

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पृष्ठ 93

विषयानुक्रमणिका
प्रथम अध्याय
मंगलाचरण · १
तत्त्वार्थसूत्रकी उत्थानिका १
आत्माका हित मोक्ष है यह बतलाते हुए
मोक्षका स्वरूप निर्देश १
विभिन्न प्रवादियोंके द्वारा माने गये मोक्षके
स्वरूपका उद्भावन और निराकरण १
मोक्ष प्राप्तिके उपायमें विभिन्न प्रवादियोंका
विसंवाद और विशेषार्थ द्वारा इस सबका
स्पष्टीकरण २
मोक्षमार्गका स्वरूपनिर्देश ४
सम्यक् शब्दकी निरुक्ति, सम्यग्ज्ञान और
सम्यक्चारित्रका स्वरूप और 'सम्यक्'
विशेषणकी सार्थकता ४
दर्शन, ज्ञान और चारित्रकी निरुक्ति ४
कर्त्ता और करणके एक होने की आपत्तिका
परिहार ५
सूत्रमें सर्वप्रथम दर्शन, अनन्तर ज्ञान और
सबके अन्तमें चारित्र शब्द रखनेका समर्थन ५
'मार्गः' इस प्रकार एकवचन निर्देशका सार्थकता ५
सम्यग्दर्शनका लक्षण-निर्देश ६
तत्त्व शब्दकी निरुक्ति ६
अर्थ शब्दकी निरुक्ति ६
तत्त्वार्थकी निरुक्ति पूर्वक सम्यग्दर्शनका स्वरूप ६
'दृश्' धातुका अर्थ आलोक है फिर श्रद्धान
अर्थ कैसे संभव है, इस शंकाका समाधान ७
अर्थ-श्रद्धान या तत्त्व-श्रद्धानको सम्यग्दर्शनका
लक्षण मानने पर प्राप्त होनेवाली आपत्तियों-
के परिहारार्थ तत्त्व और अर्थ दोनों पदोंकी
उपयोगिता ७
सम्यग्दर्शनके सराग और वीतराग इन दो
भेदोंका स्वरूप ७
विशेषार्थ द्वारा प्रकृत विषयका स्पष्टीकरण ८
सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके दो प्रकार ९
निसर्ग और अधिगम शब्दका अर्थ ९
निसर्गज सम्यग्दर्शनमें अर्थाधिगम होता है
या नहीं, इस शंकाका समाधान ९
'तन्निसर्गादधिगमाद्वा' इस सूत्रमें आये हुए
'तत्' पदकी सार्थकता १०
सात तत्त्वोंका नाम निर्देश ११
सातों तत्त्वोंके स्वरूपका प्रतिपादन कर उनके
क्रमिक पाठकी सार्थकताका निरूपण पुण्य
और पापको ग्रहणकर नव पदार्थ क्यों नहीं
बतलाये इस शंकाका समाधान ११
भाववाची तत्त्व शब्दका द्रव्यवाचक जीवादि
पदोंके साथ सामानाधिकरणका विचार,
विशेष्यके लिंग और संख्याके अनुसार
प्रकृतमें विशेषणका भी वही लिंग और
संख्या होनी चाहिए, इस आक्षेपका परिहार १२
नामादि चार निक्षेपोंका प्रतिपादन १३
नामादि चारों निक्षेपोंका स्वरूप १३
चारों निक्षेपोंके द्वारा जीवतत्त्वका निरूपण १३
नामादि निक्षेपविधिकी उपयोगिता १४
'नामस्थापना' सूत्रमें प्रयुक्त हुए 'तत्'
पदकी सार्थकता १४
विशेषार्थ-द्वारा निक्षेप-विषयक स्पष्टीकरण १४
प्रमाण और नयका निर्देश १४
प्रमाणके स्वार्थ और परार्थ ये दो भेद तथा
उनका स्वरूप १५
सूत्रमें नयपदके पूर्व प्रमाण पद रखनेका
कारण १५
नयका स्वरूप सकलादेश और विकला-
देशका निर्देश १६
नयके मूल भेदोंका स्वरूपनिरूपण व उनका
विषय १६
१२