सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ सर्वार्थसिद्धि
संज्ञी जीवोंका स्वरूप १२९ वैक्रियिक और आहारक शरीरको अप्रतीघात
समनस्क पद देनेकी सार्थकता १३० क्यों नहीं कहा १३९
विग्रहगतिमें जीवकी गतिका कारण १३० तैजस और कार्मणका अनादिसम्बन्ध १३९
विग्रह कर्म व योग शब्दका अर्थ १३० 'च' पदकी सार्थकता १३९
गतिका नियम १३१ तैजस और कार्मणके स्वामी १३९
श्रेणि शब्दका अर्थ १३१ एक जीवके एक साथ लभ्य शरीरोंकी संख्या १४०
गतिपदकी सार्थकता १३१ कार्मण शरीरकी निरुपभोगता १४०
काल और देशनियमका विधान १३१ उपभोग पदका अर्थ १४०
विग्रह शब्दका अर्थ १३२ तैजस शरीर भी निरुपभोग हैं फिर उसका
'अविग्रहा जीवस्य' सूत्रकी सार्थकता १३२ ग्रहण क्यों नहीं किया १४१
संसारी जीवकी गतिका नियम और समय १३२ औदारिक शरीर किस-किस जन्मसे होता है १४१
निष्कुटक्षेत्रसे मरकर निष्कुटक्षेत्रमें उत्पन्न वैक्रियिक शरीर किस जन्मसे होता है १४२
होनेवाले जीवकी त्रिविग्रह गति १३२ वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है १४२
अविग्रहवाली गतिका समय निर्देश १३३ तैजसशरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है १४१
अनाहारक जीवोंका समय-निर्देश १३३ आहारकशरीरकी विशेषता और स्वामी १४२
आहार शब्दका अर्थ १३३ शुभ आदि पदोंका अर्थ १४२
जन्मके भेद १३४ आहारकशरीरकी उत्पत्तिका प्रयोजन १४३
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद पदका अर्थ १३४ नारक और सम्मूर्च्छिनोंके वेद का वर्णन १४३
चौरासी लाख योनियां किसके कितनी होती हैं १३४ नारक शब्दका अर्थ १४३
योनियोंके भेद १३४ देवोंके वेदका वर्णन १४४
सचित्त आदि पदोंका अर्थ १३४ शेष जीवोंके वेदका वर्णन १४४
'तत्' पदकी सार्थकता १३५ लिंगके दो भेद व उनका अर्थ १४४
योनि और जन्ममें अन्तर १३५ स्त्री आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति १४४
किस जीवके कौन योनि होती है इसका खुलासा १३५ अनपवर्त्यायुष्क जीवोंका निरूपण १४५
गर्भ जन्मके स्वामी १३६ औपपादिक आदि पदोंका अर्थ १४५
जरायु आदि पदोंका अर्थ १३६ पाठान्तरका निर्देश १४६
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
तीसरा अध्याय
उपपाद जन्मके स्वामी १३६
सम्मूर्च्छन जन्मके स्वामी १३६ नरककी सात भूमियां व उनका आधार १४७
जन्मके भूस्वामियोंके प्रतिपादक तीनों सूत्र रत्नप्रभा आदि नामोंकी सार्थकता १४७
नियमार्थक हैं १३६ 'भूमि' पदकी सार्थता १४७
शरीरके पांच भेद १३७ भूमि, तीन वातवलय और आकाश इनमें
औदारिक आदि पदोंका अर्थ १३७ आधार-आधेयभाव १४७
शरीरोंमें उत्तरोत्तर सूक्ष्मता १३७ सप्त पदकी सार्थकता १४८
तैजससे पूर्व तीन शरीर उत्तरोत्तर प्रदेशोंकी विशेषार्थ द्वारा अधोलोकका विशेष स्पष्टीकरण १४८
अपेक्षा असंख्यातगुणे हैं १३८ भूमियोंमें नरकों ( बिलों ) की संख्या १४८
गुणकारका प्रमाण १३८ भूमियोंमें नरक प्रस्तारोंका विचार १४९
अन्तके दो शरीर अनन्तगुणे हैं १३८ नारक निरन्तर अशुभतरलेश्या आदि वाले
तैजस और कार्मण शरीरकी अप्रतीघातता १३९ होते हैं इसका विचार १४९
प्रतीघात पदका अर्थ १३९ नित्य शब्दका अर्थ १४९