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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका ९९
वर्तना शब्दका अर्थ २१६ गुणवैषम्यमें सदृशोंका भी बन्ध होता है यह
काल द्रव्य क्रियावान् नहीं है इसका समर्थन २१६ बतलानेके लिए सूत्रमें सदृश पदका
कालके अस्तित्वकी सिद्धि २१६ ग्रहण किया २२८
परिणाम पदका अर्थ २१६ दो अधिक गुणवालोंका बन्ध होता है २२८
क्रिया पदका अर्थ २१७ बन्धके प्रकारोंका विशेष विवेचन २२८
परत्व और अपरत्वका विचार २१७ बन्ध होने पर अधिक गुणवाले पारिणामिक
वर्तनासे पृथक् परिणामादिके ग्रहण करनेका होते हैं २२९
प्रयोजन २१७ द्रव्यका लक्षण २३१
पुद्गलका लक्षण २१८ एक द्रव्यके दूसरे द्रव्यसे भिन्न होनेके कारणकी
स्पर्श आदि पदोंका अर्थ व उनके भेद २१८ सयुक्तिक सिद्धि २३१
'रूपिणः पुद्गलाः' सूत्रके रहते हुए भी इस काल भी द्रव्य है २३२
सूत्रके कहनेका कारण २१८ कालमें द्रव्यपने की सिद्धि २३३
पुद्गलकी व्यञ्जन पर्यायोंका निर्देश २१९ कालद्रव्यको अलग कहनेका कारण २३३
शब्दके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ विशेषार्थ द्वारा कालका विचार २३४
बन्धके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ कालकी पर्याय अनन्त समय रूप हैं इसकी
सौक्ष्म्यके दो भेद व उनका विचार २१९ सिद्धि २३५
स्थौल्यके दो भेद व उनका विचार २१९ गुणका लक्षण २३६
संस्थानका अपने भेदोंके साथ विचार २१९ गुणका लक्षण पर्यायोंमें न जाय इसकी
भेदके छह भेद व उनका विचार २२० व्यवस्था २३६
तम आदि शेषका स्वरूप निर्देश २२० परिणामका स्वरूप २३७
पुद्गलके भेद २२० परिणामके दो भेद और उनकी सिद्धि २३७
अणु शब्दका अर्थ २२०
स्कन्ध शब्दका अर्थ २२१ छठाँ अध्याय
स्कन्धोंकी उत्पत्तिका हेतु २२१
भेद और संघात पदका अर्थ २२१ योगका स्वरूप २३८
बहुवचन निर्देशकी सार्थकता २२१ कर्म शब्दका अर्थ २३८
अणुकी उत्पत्तिका हेतु २२२ योगके भेद २३८
'भेदसंघातेभ्यः' इस सूत्रमें भेद पदके ग्रहण काय, वचन और मनोयोगका स्वरूप २३८
करनेका प्रयोजन २२२ आस्रवका स्वरूप २३९
अचाक्षुष चाक्षुष कैसे होता है इसका विचार २२२ पुण्यास्रव और पापास्रव २३९
द्रव्यका लक्षण २२३ ये कायादि तीनों योग शुभ और अशुभ इन
सत्की व्याख्या २२३ दो भागोंमें विभक्त हैं २३९
उत्पाद आदि पदोंका अर्थ २२३ शुभयोगका स्वरूप २३९
युक्त पद किस अर्थमें ग्रहण किया है अशुभ योगका स्वरूप २३९
इसका विचार २२३ पुण्य और पाप पदकी व्याख्या २३९
नित्य पदकी व्याख्या २२५ साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव कितने
मुख्यता और गौणतासे अनेकान्तकी सिद्धि २२५ होते हैं २४०
पुद्गलोंके बन्धका कारण २२६ आस्रवके स्वामीके दो भेद २४०
जघन्य गुणवालोंका बन्ध नहीं होता २२७ कषाय शब्दका अर्थ २४०
गुणसाम्यमें सदृशोंका बन्ध नहीं होता २२८ संप्राय शब्दका अर्थ २४०
ईर्या शब्दका अर्थ २४०
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri