सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ सर्वार्थसिद्धि
कार इस शास्त्रकी परिसमाप्ति तक जानना चाहिए। यदि अनेकान्तका अधिकार अन्ततक न माना जाय तो
कौन आदि है और कौन अन्त है, किस अपेक्षासे साधर्म्य है और किस अपेक्षासे वैधर्म्य है यह सब कुछ न बने ।
वैयाकरणोंका स्फोटवाद प्रसिद्ध है। वे शब्दको नित्य मानकर तालु आदिके संयोगसे मात्र उसका
स्फोट मानते हैं, उसकी उत्पत्ति नहीं, जब कि स्थिति ऐसी नहीं है, क्योंकि अकार आदि वर्ण और घट, पट
आदि शब्द कुछ आकाशमें भरे हुए नहीं हैं और न वे आकाशके गुण ही हैं। वे तो तालु आदिके निमित्तसे
शब्द वर्गणाओंके विविध संयोगरूप उत्पन्न होते हैं और कालान्तरमें विघटित हो जाते हैं। अतः वैयाकरणोंके
मन्तव्यानुसार वे सर्वथा नित्य नहीं माने जा सकते। पुद्गल'द्रव्यकी अपेक्षा जहाँ वे नित्य सिद्ध होते हैं वहीं
वे पर्यायकी अपेक्षा अनित्य भी सिद्ध होते हैं। स्पष्ट है कि इस भावको व्यक्त करनेके लिए आचार्य पूज्यपादने
'सिद्धिरनेकान्तात्' यह प्रथम सूत्र लिखा है। व्याकरणमें शब्दोंकी जिस प्रकार सिद्धि की गयी है या जो संज्ञाएँ
व प्रत्यय आदि कल्पित किये गये हैं वे सर्वथा वैसे ही नहीं हैं किन्तु भाषाकी स्थितिको स्पष्ट करनेके लिए
माना गया वह एक प्रकार है और यही कारण है कि अनेक वैयाकरणोंने रूपसिद्धिके लिए अलग-अलग संज्ञाएँ
व प्रक्रिया स्वीकार की है। ऐसी स्थितिके होते हुए भी अनेक विद्वानोंमें अमुक प्रत्यय और अमुक प्रकारसे
रूपसिद्धिके प्रति आग्रह देखा जाता है। सम्भव है इस ऐकान्तिक आग्रहका निषेध करनेके लिए भी आचार्य
पूज्यपादने 'सिद्धिरनेकान्तात्' सूत्रकी रचना की हो ।
आचार्य पूज्यपादने अपने जैनेन्द्र व्याकरणमें भूतबलि, श्रीदत्त, यशोभद्र, प्रभाचन्द्र, समन्तभद्र और
सिद्धसेन इन छह आचार्योंके मतोंका उल्लेख किया है। अभी तककी जानकारीके आधार पर यह तो निःसंकोच
कहा जा सकता है कि इनका कोई व्याकरण नहीं है। साथ ही इन आचार्योंके जिन वैकल्पिक मतोंका उल्लेख
करके रूपसिद्धि की गयी है वे मत भी कोई नये नहीं हैं। क्योंकि, जैसा कि हम आगे चलकर बतलानेवाले हैं
पाणिनि व्याकरणमें भी विकल्पसे उनकी सिद्धि दृष्टिगोचर होती है। इसलिए प्रश्न होता है कि जब कि
आचार्य पूज्यपादके सामने पाणिनि व्याकरण था और उसमें वे प्रयोग उपलब्ध होते थे ऐसी अवस्थामें उन्होंने
अलगसे इन आचार्योंके मतके रूपमें इनका उल्लेख क्यों किया । प्रश्न गम्भीर है और सम्भव है कि कालान्तर
में इससे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रकाश पड़े । तत्काल हमारी समझमें इसका यह कारण प्रतीत होता है
कि जिस प्रकार पाणिनि ऋषिाने अपने व्याकरणमें उनके काल तक रचे गये साहित्यमें उपलब्ध होनेवाले मतों
का उनके रचयिताके नामके साथ या 'अन्यतर' आदि पद द्वारा उल्लेख किया है उसी प्रकार आचार्य पूज्य-
पादने अपने जैनेन्द्र व्याकरणमें उनके काल तक रचे गये जैन साहित्यमें उपलब्ध होनेवाले मतोंका उनके रच-
यिताके नामके साथ उल्लेख किया है । मतोंका विवरण इस प्रकार है-
भूतबलि-आचार्य भूतबलिके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है- 'राद्रूभूतबलेः' । ३, ४, ८३ ।
भूतबलिके मतानुसार समा शब्दान्त द्विगु समाससे 'ख' प्रत्यय होता है यह इस सूत्रका आशय है। इससे
'द्वैसम्रिकः' प्रयोगके स्थानमें 'द्वैसमीनः' प्रयोग विकल्पसे सिद्ध किया गया है। इसी प्रकार 'रात्र्यह्नः
संवत्सरात्' । ३, ४, ८४ । और 'वर्षाड्लूप् च' ३, ४, ८५ । ये दो अन्य सूत्र हैं जो भूतबलि आचार्यके
वैकल्पिक मतका प्रतिपादन करते हैं। इनमें से प्रथम सूत्र द्वारा 'द्विरात्रीणः, द्वयह्नीनः और द्विसंवत्सरीणः'
आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं तथा दूसरे सूत्र द्वारा 'द्विवर्षः' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं। जैनेन्द्रव्याकरणमें ये
वैकल्पिक कार्य भूतबलि आचार्यके मतसे माने गये हैं।
इन वैकल्पिक कार्योंका निर्देश पाणिनिने भी किया है किन्तु वहाँ किस आचार्यके मतसे ये कार्य होते हैं
यह नहीं बतलाया है। इन तीन सूत्रोंके स्थानमें क्रमसे पाणिनिके 'द्विगोर्वा ५, १, ८६,' रात्र्यह्नः संवत्सराच्च
५, १, ८७ और वर्षालुक् च ५, १, ८८ । ये तीन सूत्र आते हैं।
श्रीदत्त - आचार्य श्रीदत्तके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'गुणे श्रीदत्तस्यास्त्रियाम् । १, ४,
३४ ।' श्रीदत्त आचार्यके मतसे गुणहेतुक पञ्चमी विभक्ति होती है। परन्तु यह कार्य स्त्रीलिंगमें नहीं होता।
यह इस सूत्रका भाव है। इसके अनुसार 'ज्ञानेन मुक्तः' के स्थानमें श्रीदत्त आचार्यके मतसे 'ज्ञानान्मुक्तः'
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