सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

८८ सर्वार्थसिद्धि
प्रमाणोंसे यह भी विदित होता है कि राजा अविनीतके पुत्रका नाम दुर्विनीत था और ये आचार्य पूज्यपादके
शिष्य थे ।¹ राजा दुर्विनीतका राज्यकाल वि० सं० ५३८ के लगभग माना जाता है, अतः इस आधारसे यह
कहा जा सकता है कि आचार्य पूज्यपाद ५वीं शताब्दीके उत्तरार्ध और विक्रमकी ६वीं शताब्दीके पूर्वार्धके
मध्य कालवर्ती होने चाहिए।
२. वि० सं० ९९० में बने देवसेनके दर्शनसारके एक उल्लेखसे भी इस तथ्यकी पुष्टि होती है ।
देवसेनने यह कहा है कि श्री पूज्यपादके एक शिष्य वज्रनन्दी थे, जिन्होंने विक्रम सं० ५२६ में द्रविड़ संघकी
स्थापना की थी । दर्शनसारका उल्लेख इस प्रकार है-
सिरिपूज्जपादसीसो दाविडसंघस्स कारगो दुट्ठो ।
णामेण वज्जणंदी पाहुडवेदी महासत्तो ॥
पंचसए छब्बीसे विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स ।
दक्खिणमहुरा जादो दाविडसंघो महामोहो ॥
हम पहले नन्दिसंघकी पट्टावलीका उल्लेख कर आये हैं । उसमें देवनन्दी ( पूज्यपाद ) का समय
विक्रम सं० २५८ से ३०८ तक दिया है और इनके बाद जयनन्दी तथा गुणनन्दीका नामनिर्देश करनेके बाद
वज्रनन्दीका नामोल्लेख किया है। साथ ही हम पहले पाण्डवपुराणके रचयिता शुभचन्द्राचार्यकी गुर्वावलीका
भी उल्लेख कर आये हैं। इसमें भी नन्दिसंघके सब आचार्योंका नन्दिसंघकी पट्टावलीके अनुसार नाम निर्देश
किया है। किन्तु इसमें देवनन्दीके बाद गुणनन्दीके नामका उल्लेख करके वज्रनन्दीका नाम दिया है। यहाँ
यद्यपि हम यह मान लें कि इन दोनोंमें यह मतभेद बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि पूर्व परम्पराके
अनुसार जिन्हें जिस क्रमसे आचार्यों की परम्परा मिली उन्होंने उस क्रमसे उनका नाम निर्देश किया है और
ऐसी दशामें एकादि नाम छूट जाना या हेरफेर हो जाना स्वाभाविक है। पर सबसे बड़ा प्रश्न आचार्य
पूज्यपादके समयका है । मर्कराके ताम्रपत्रमें जिन आचार्यों का नाम निर्देश है उनमें पूज्यपादका नाम नहीं
आता तथा अविनीतके पुत्र दुर्विनीतके ये विद्यागुरु थे, इसलिए ऐसा मालूम देता है कि नन्दिसंघकी पट्टावलिमें
आचार्य पूज्यपादसे पूर्ववर्ती आचार्यों के नाम छूट गये हैं। मर्कराके ताम्रपत्रमें जिन मुनियोंका नामोल्लेख है वे
ये हैं-गुणचन्द्र, अभयनन्दि, शीलभद्र, जनानन्दि, गुणनन्दि और चन्द्रनन्दि । तथा नन्दिसंघकी पट्टावलिमें
आचार्य देवनन्दि और वज्रनन्दिके मध्यमें जयनन्दि और गुणनन्दि ये दो नाम आते हैं। गुणनन्दि यह नाम
तो मर्कराके ताम्रपत्रमें भी है और सम्भव है कि मर्कराके ताम्रपत्रमें जिनका नाम जनानन्दि दिया है वे नन्दि-
संघकी पट्टावलिमें जयनन्दि इस नामसे उल्लिखित किये गये हों । यदि यह अनुमान ठीक हो तो इससे दो
समस्याएँ सुलझ जाती हैं। एक तो इससे इस अनुमानकी पुष्टि हो जाती है कि नन्दिसंघकी पट्टावलिमें आचार्य
पूज्यपादके पूर्ववर्ती कुछ आचार्यों के नाम छूट गये हैं। दूसरे नन्दिसंघकी पट्टावलिमें आचार्य पूज्यपादके बाद
जिन दो आचार्यों का नामोल्लेख किया है उन्हें मर्कराके ताम्रपत्रमें उल्लिखित नामोंके अनुसार आचार्य पूज्य-
पादके पूर्ववर्ती मान लेनेसे दर्शनसारके उल्लेखांनुसार वज्रनन्दि आचार्य पूज्यपादके अनन्तर उत्तरकालवर्ती
ठहर जाते हैं । और इस तरह उनके समयके निर्णय करनेमें जो कठिनाई प्रतीत होती है वह हल हो जाती
है । इस प्रकार इन सब तथ्योंको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आचार्य पूज्यपाद विक्रम ५वीं
शताब्दीके उत्तरार्धसे लेकर ६वीं शताब्दीके पूर्वार्धके मध्यकालवर्ती होने चाहिए । श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी
प्रेमी प्रभृति दूसरे विद्वानोंका भी लगभग यही मत है ।²
१. रत्नकरण्डकी प्रस्तावना पृ० १४२ । २. देखो जैन साहित्य और इतिहास पृ० ११५ आदि । प्रेमीजीने
आचार्य पूज्यपादके समयका विचार करते समय स्व० डॉ० काशीनाथ वापूजी पाठकके मतका विचारकर जो
निष्कर्ष निकाला है उससे हम सहमत हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri