सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

९८ सर्वार्थसिद्धि
ये धर्मादिक द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९७ लोक शब्दका अर्थ २०६
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति १९७ आकाशके दो भेद और उनका अर्थ २०६
ये धर्मादिक द्रव्यत्व नामक सामान्यके योगसे लोकालोक विभागका कारण २०६
द्रव्य नहीं हैं इस बातका सयुक्तिक विचार १९७ धर्म और अधर्म द्रव्य लोकव्यापी हैं २०६
'गुणसमुदायो द्रव्यम्' ऐसा माननेमें भी आपत्ति १९७ पुद्गल द्रव्य लोकके एक प्रदेश आदिमें रहते हैं २०७
द्रव्य पदकी व्युत्पत्ति और उसकी सिद्धि १९७ मूर्त पुद्गल एकत्र कैसे रहते हैं इसका विचार २०७
'द्रव्याणि' बहुवचन देनेका कारण व अन्य जीव लोकके असंख्येयभाग आदिमें रहते हैं २०७
विशेषताओंका निर्देश १९८ सशरीरी अनन्तानन्त जीव असंख्येयभाग
जीव भी द्रव्य हैं इस बातका निर्देश १९८ आदिमें कैसे रहते हैं इसका विचार २०८
नैयायिकोंके द्वारा माने गये द्रव्योंके अन्तर्भाव जीवके असंख्येयभाग आदिमें रहनेका कारण २०८
की सिद्धि १९८ धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार २०९
द्रव्योंकी विशेषता २०० गति, स्थिति और उपग्रह पदका अर्थ २०९
नित्य आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २०० उपग्रह पदकी सार्थकता २०९
पुद्गल द्रव्य रूपी है इसका विचार २०० गति और स्थितिको धर्म और अधर्म द्रव्यका
रूप पदका अर्थ २०० उपकार माननेका कारण २०९
आकाश पर्यन्त एक एक द्रव्य हैं इसका विचार २०१ गति और स्थितिके प्रतिबन्ध न होनेका कारण २०९
सूत्रमें द्रव्य पदके ग्रहण करनेकी सार्थकता २०१ धर्म और अधर्म द्रव्यकी सिद्धि २१०
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं २०२ अवकाशका उपकार २१०
निष्क्रिय शब्दका अर्थ २०२ निष्क्रिय धर्मादि द्रव्योंको आकाश कैसे
धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय होने पर भी उनमें अवगाह देता है इसका विचार २११
उत्पादादिकी सिद्धि २०२ दो स्कन्धों के परस्पर टकरानेसे आकाशके
उत्पादके दो भेद २०२ अवकाश दानकी हानि नहीं होती २११
निष्क्रिय धर्मादिक द्रव्य गति आदिके हेतु सूक्ष्म पुद्गल परस्पर अवकाश देते हैं तो भी
कैसे हैं इसका विचार २०२ आकाशके अवकाशदानकी हानि नहीं
धर्म, अधर्म और एक जीवके प्रदेश २०३ होती इस बातका समर्थन २११
असंख्येयके तीन भेद २०३ पुद्गलोंका उपकार २११
प्रदेश शब्दका अर्थ २०३ कार्मण शरीरके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१२
धर्म और अधर्म द्रव्य लोकाकाशव्यापी हैं २०३ वचनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
जीव शरीरपरिमाण होकर भी लोकपूरण समुद्घात पनेकी सिद्धि २१२
के समय लोकाकाशव्यापी होता है २०३ मनके दो भेद और उनका स्वरूप व पुद्गल-
आकाशके प्रदेशोंका विचार २०३ पनेकी सिद्धि २१३
अनन्त शब्दका अर्थ २०३ मन द्रवन्तर नहीं है इसकी सयुक्तिक सिद्धि २१३
पुद्गलोंके प्रदेशोंका विचार २०४ प्राण और अपान शब्दका अर्थ २१३
'च' पदकी सार्थकता २०४ मन, प्राण और अपानके पुद्गलपनेकी सिद्धि २१३
अनन्तके तीन भेद २०४ आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि २१४
असंख्यातप्रदेशी लोकमें अनन्तानन्त प्रदेशी पुद्गलोंके अन्य उपकार २१४
स्कन्ध कैसे समाता है इसका विचार २०४ सुख, दुःख आदि शब्दोंका अर्थ २१४
अणुके दो आदि प्रदेश नहीं होते २०४ उपग्रह पदकी सार्थकता २१४
सब द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है २०५ जीवोंका उपकार २१५
आधाराधेयविचार २०५ कालका उपकार २१६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri