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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 558 में से

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पृष्ठ 91

प्रस्तावना ८७
इसमें कहा गया है कि विद्वानोंके समक्ष जिनका जैनेन्द्र व्याकरण अतुल निज शब्द सम्पत्तिको,
सर्वार्थसिद्धि सिद्धान्तमें निपुणताको, जैन अभिषेक कविताकी श्रेष्ठताको और आत्मस्वास्थ्यकर समाधिशतक
छन्दःशास्त्रकी सूक्ष्मताको सूचित करता है वे आचार्य पूज्यपाद मुनिगणोंसे सतत पूजनीय हैं।
पहले हम चन्द्रय्य कविके 'पूज्यपादचरिते' के आधारसे आचार्य पूज्यपादकी संक्षिप्त जीवनी दे आये
हैं। उसमें आचार्यपूज्यपादको जैनेन्द्र व्याकरण और वैद्यकके समान अर्हत्प्रतिष्ठालक्षण और ज्योतिषका भी
लेखक बतलाया गया है। कह नहीं सकते कि यह उल्लेख कहाँ तक ठीक है। यदि यह साधारण हो तो
कहना होगा कि आचार्य पूज्यपादने अर्हत्प्रतिष्ठा और ज्योतिष विषय पर भी रचना की थी।
३. समय विचार — आचार्य पूज्यपाद कब हुए यह प्रश्न विशेष विवादास्पद नहीं है। छठवीं शताब्दीके
मध्यकाल से लेकर अधिकतर जितने साहित्यकार हुए हैं उन्होंने किसी न किसी रूपमें या तो उनका या उनके
साहित्यका उल्लेख किया है या उनके साहित्यका अनुवर्तन किया है। इस दृष्टिसे हमारे सामने मुख्य रूपसे
जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणका विशेषावश्यकभाष्य और अकलंकदेवका तत्त्वार्थवार्तिक उपस्थित हैं। भट्ट
अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थवार्तिक लिखते समय सर्वार्थसिद्धि और जैनेन्द्रव्याकरण उपस्थित था यह उसके
देखनेसे स्पष्टतः परिलक्षित होता है। भट्ट अकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिकमें सर्वार्थसिद्धिके अधिकतर वाक्योंको
वार्तिकोंका रूप देते हुए दिखाई देते हैं¹। तथा जहाँ उन्हें व्याकरणके नियमोंके उल्लेखकी आवश्यकता प्रतीत
हुई वहाँ वे प्रायः जैनेन्द्रके सूत्रोंका ही उल्लेख करते हैं²। इसलिए आचार्य पूज्यपाद भट्ट अकलंकदेवके पहले
हुए हैं यह तो सुनिश्चित है। किन्तु सर्वार्थसिद्धि और विशेषावश्यकभाष्यके तुलनात्मक अध्ययनसे यह भी
ज्ञात होता है कि विशेषावश्यकभाष्य लिखते समय जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके सामने सर्वार्थसिद्धि अवश्य ही
उपस्थित होनी चाहिए। तुलनाके लिए देखिए—
सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १५ में धारणा मतिज्ञान का लक्षण इन शब्दोंमें दिया है—
'अवेस्त्य कालान्तरेऽविस्मरणकारणम् ।'
विशेषावश्यकभाष्यमें इन्हीं शब्दोंको दुहराते हुए कहा गया है—
'कालंतरे य जं पुणरणुसरणं धारणा सा उ ।। गां० २९१ ।।'
चक्षु इन्द्रिय अप्राप्यकारी है यह बतलाते हुए सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १९ में कहा गया है—
'मनोवदप्राप्यकारीति ।'
यही बात विशेषावश्यकभाष्यमें इन शब्दोंमें व्यक्त की गयी है—
'लोयणमपत्तविसयं मणोव्व ।। गा० २०९ ।।'
सर्वार्थसिद्धि अ० १. सू० २० में यह शंका की गयी है कि प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके समय दोनों
ज्ञानोंकी उत्पत्ति एक साथ होती है इसलिए श्रुतज्ञान मतिज्ञानपूर्वक होता है यह नहीं कहा जा सकता ।
यथा—
'आह, प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तौ युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकत्वं श्रुतस्य नोत्पद्यत इति ।'
अब इसके प्रकाशमें विशेषावश्यकभाष्यकी इस गाथाको देखिए—
'णाणाण्णाणाणि य समकालाइं जओ मइसुयाइं ।
तो न सुयं मइपुव्वं मइणाणे वा सुयन्नाणं ॥ गा० १०७ ॥'
इस प्रकार यद्यपि इस तुलनासे यह तो ज्ञात होता है कि जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण (वि० सं० ६६६)
के सामने आचार्य पूज्यपादकी सर्वार्थसिद्धि उपस्थित रही होगी पर इससे इनके वास्तव्य काल पर विशेष
प्रकाश नहीं पड़ता। इसके लिए आगेके प्रमाण देखिए—
१. शक संवत् ३८८ ( वि० सं० ५२३) में लिखे गये मर्करा (कुर्ग) के ताम्रपत्र में गंगवंशीय
राजा अविनीतके उल्लेखके साथ कुन्दकुन्दान्वय और देशीय गणके मुनियोंकी परम्परा दी गयी है। दूसरे
१. देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० १, सू० १, वा० ३ आदि । २. देखो तत्त्वार्थवार्तिक अ० ४, सू० २१ ।