सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्ज्ञानके पाँच भेदोंका स्वरूप ६६ श्रुतज्ञानका स्वरूप और उसके भेद ८३
मतिज्ञानादिक्रमसे पाठ रखनेका कारण ६६ मतिपूर्वक श्रुतज्ञानके माननेमें आनेवाली
ये पाँचों ज्ञान दो प्रमाणरूप हैं इस बातका आपत्तियोंका परिहार ८४
निर्देश ६७ श्रुत नयभेदसे कथंचित् अनादिनिधन और
सन्निकर्ष और इन्द्रियकी प्रमाणताका कथंचित् सादि है ८४
निराकरण ६७ श्रुत पूर्वक भी श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है इस
ज्ञानके फलका निरूपण ६८ आशंकाका समाधान ८४
विशेषार्थ द्वारा सन्निकर्ष और इन्द्रियको श्रुतके भेद व उनका कारण ८५
प्रमाण मानने पर उठनेवाले दोषोंका विशेषार्थ द्वारा श्रुतज्ञानका स्पष्टीकरण ८६
स्पष्टीकरण और उनका परिहार ६९ भवप्रत्यय अवधिज्ञानके स्वामी ८६
परोक्षज्ञानका प्रतिपादन ७० भवप्रत्यय कहनेका कारण ८७
परोक्षका स्वरूप ७१ क्षयोपशम निमित्तक अवधिज्ञानके स्वामी ८७
प्रत्यक्षज्ञानका प्रतिपादन ७२ अवधिज्ञानके छह भेद व उनका स्वरूप ८८
प्रत्यक्षका स्वरूप ७२ मनःपर्ययज्ञानके भेद और स्वरूप ८९
विभङ्गज्ञानकी प्रमाणताका निराकरण ७२ ऋजुमति और विपुलमतिका अर्थ ८९
इन्द्रिय-व्यापारजनित ज्ञानको प्रत्यक्ष इन दोनों ज्ञानोंका क्षेत्र और कालकी
माननेमें दोष ७२ अपेक्षा विषय ९०
मतिज्ञानके पर्यायवाची नामोंका प्रतिपादन ७४ ऋजुमति और विपुलमति मनःपर्यय
मति, स्मृति और चिन्तादि नामोंकी ज्ञानमें अन्तर ९०
निरुक्ति व तात्पर्य ७४ विशुद्धि और अप्रतिपातका अर्थ ९०
मतिज्ञानकी उत्पत्तिका निमित्त ७५ विशुद्धि और अप्रतिपातके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें
इन्द्रिय और अनिन्द्रियका स्वरूप ७५ अन्तरका विशेष कथन ९०
तत् पदकी सार्थकता ७६ अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञानमें विशेषता ९१
मतिज्ञानके भेद ७७ विशुद्धि आदिके द्वारा दोनों ज्ञानोंमें अन्तरका
अवग्रह आदिका स्वरूप ७७ विशेष स्पष्टीकरण ९२
अवग्रहादिके विषयभूत पदार्थोंके भेद ७८ मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका विषय ९२
बहुआदिका स्वरूप ७८ मतिज्ञानकी अरूपी द्रव्योंमें मनसे प्रवृत्ति
बहु और बहुविधमें अन्तर ७९ होती है ९२
उक्त और निःसृतमें अन्तर ७९ अवधिज्ञानका विषय ९३
'क्षिप्रनिःसृत' पाठान्तरकी सूचना और मनःपर्ययज्ञानका विषय ९३
उसका अर्थ ७९ केवलज्ञानका विषय ९४
ध्रुवावग्रह और धारणामें भेद ७९ एक जीवमें एक साथ संभव ज्ञानोंका निरूपण ९५
बहु आदि अर्थके अवग्रह आदि होते हैं ८० मिथ्याज्ञानोंका निरूपण ६६
अर्थ पद देनेकी सार्थकता ८० मिथ्याज्ञानके कारणोंका निरूपण ९६
व्यञ्जन का अवग्रह ही होता है ८० कारण विपर्यास भेदाभेदविपर्यास और
व्यञ्जन शब्दका अर्थ ८१ स्वरूपविपर्यासका वर्णन ९७
व्यञ्जनावग्रह और अर्थावग्रहमें भेद ८१ नयोंके भेद ९८
व्यञ्जनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता ८१ नयका स्वरूप ९८
आगम और युक्तिसे चक्षु और मनकी नैगमनयका स्वरूप ९८
अप्राप्यकारिताकी सिद्धि ८२ संग्रहनयका स्वरूप ९९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri