सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रयोग सिद्ध किया गया है। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणमें 'विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् । २, ३, २५।' सूत्र
उपलब्ध होता है।
यशोभद्र—आचार्य यशोभद्रके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'कृवृषिमृजां यशोभद्रस्य । २,
१, ९९।' 'कृ, वृष् और मृज्' धातुसे यशोभद्र आचार्यके मतानुसार 'क्यप्' प्रत्यय होता है। तदनुसार
'कृत्यम्, वृष्यम् और मृज्यम्' ये वैकल्पिक प्रयोग सिद्ध होते हैं। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणमें 'मृजेर्वि-
भाषा । ३, १, ११३ । तथा विभाषा कृवृषोः ३, १, १२०।' ये दो सूत्र उपलब्ध होते हैं।
प्रभाचन्द्र—आचार्य प्रभाचन्द्रके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है 'रात्रेः कृति प्रभाचन्द्रस्य ।
४, ३, १८० ।' रात्रि पद उपपद रहते हुए कृदन्त पर रहते प्रभाचन्द्रके मतसे 'मुम्' का आगम होता है।
तदनुसार 'रात्रिंचरः' वैकल्पिक प्रयोग सिद्ध होता है। इसके स्थानमें पाणिनि व्याकरणका सूत्र है 'रात्रेः कृति
विभाषा । ६, ३, ७२ ।'
समन्तभद्र—आचार्य समन्तभद्रके चार मतोंका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है-चतुष्टयं समन्तभद्रस्य ।
५, ४, १४० । पिछले चार सूत्र आचार्य समन्तभद्रके मतसे कह गये हैं यह इस सूत्रमें बतलाया गया है। वे
चार सूत्र हैं—'झयो हः । ५, ४, १३६ । शश्छोऽटि । ५, ४, १३७ । हलो यमां यमि खम् । ५, ४, १३८ ।
तथा 'झरो झरि स्वे । ५, ४, १३९।' इनके स्थानमें क्रमशः पाणिनिके सूत्र हैं—'झयो होऽन्यतरस्याम् ।
८, ४, ६२ । शश्छोऽटि । ८, ४, ६३ । हलो यमां यमि लोपः । ८, ४,-६४ । तथा झरो झरि सवर्णे ।
८, ४, ६५ ।'
प्रथम सूत्रके अनुसार पदान्त झय् से पर रहते हुए 'ह' को पूर्वसवर्ण होता है। यथा—'सुवाग्धसति ।'
द्वितीय सूत्रके अनुसार पदान्त झय् से पर रहते हुए 'श' के स्थानमें 'छ' होता है। यथा—'षट्छचामाः ।'
तृतीय सूत्रके अनुसार हल् से पर यम्का यम् पर रहते लोप होता है। यथा—'शय्या' इस शब्दमें दो यकार
हैं और इनके संयोगसे एक तीसरा यकार और प्राप्त हुआ । किन्तु इस सूत्रके नियमानुसार बीचके एक
यकारका लोप होकर 'शय्या' यह प्रयोग ही शेष रहता है। चतुर्थ सूत्रके अनुसार हल्से पर झर्का सवर्ण
झर् पर रहते हुए लोप होता है। यथा—'भित्ताम्' यहाँ एक तीसरे तकारका लोप हो गया है। इस प्रकार
ये चार वैकल्पिक कार्य आचार्य समन्तभद्रके मतसे होते हैं। जब कि पाणिनि व्याकरणमें ये कार्य अन्यतरके
मतसे माने गये हैं।
सिद्धसेन—आचार्य सिद्धसेनके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है—'वेत्तेः सिद्धसेनस्य । ५, १, ७।'
विद् धातुसे पर झ् प्रत्ययके स्थानमें आदेशभूत 'अत्' को सिद्धसेनके मतानुसार 'रुद्' का आगम होता है यह
इस सूत्रका भाव है। यथा--'संविद्रते ।' संविदते प्रयोगमें दकारके बाद और अकारके पूर्व 'रुद्' का आगम
होकर यह वैकल्पिक प्रयोग बना है। इस सूत्रके स्थानमें पाणिनि व्याकरणका 'वेत्तेर्विभाषा । ७, १, ७। सूत्र
उपलब्ध होता है।
इस व्याकरणका सोमदेवसूरिकृत शब्दार्णव चन्द्रिकामें एक परिवर्तित रूप उपलब्ध होता है। किन्तु वह
उसका बादका परिष्कृत रूप है ऐसा अनेक प्रमाणोंके आधारसे प्रेमीजीने सिद्ध किया है। इसका असली पाठ तो
वही है जो आचार्य अभयदेव कृत महावृत्तित्तमें उपलब्ध होता है। इस व्याकरणकी कुछ विशेषताओंका हमने
उल्लेख किया ही है। और भी कई विशेषताएँ हैं जिनके कारण इसका अपना स्वतन्त्र स्थान है।
उल्लेखोंसे ज्ञात होता है कि आचार्य पूज्यपादने उक्त पाँच ग्रन्थोंके सिवा कई विषयों पर अन्य अनेक
ग्रन्थ लिखे थे। विवरण इस प्रकार है—
६.-७. जैनेन्द्र और शब्दावतार न्यास—शिमोगा जिले के नगर तहसीलके ४६ वें शिलालेखमें
इस बातका उल्लेख है कि आचार्य पूज्यपादने एक तो अपने व्याकरण पर 'जैनेन्द्र' नामक न्यास लिखा था
और दूसरा पाणिनि व्याकरण पर 'शब्दावतार' नामक न्यास लिखा था। यथा—
१. इस ग्रन्थकी टीका-टिप्पणी व परिवर्धन आदिका विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिए प्रेमीजी द्वारा लिखित
'जैनसाहित्य और इतिहास' नामक ग्रन्थ देखिए ।