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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका ९७
भवनवासियोंके दस भेद १७८ ग्रैवेयकके पूर्व तक कल्प संज्ञा १८७
भवनवासी शब्दका अर्थ १७८ लौकान्तिक देवोंका निवास स्थान १८८
असुरकुमार आदि नामोंमें कुमार पदकी लौकान्तिक शब्दकी सार्थकता १८८
सार्थकता १७८ लौकान्तिकोंके आठ भेदोंके नाम १८८
भवनवासियोंका निवासस्थान १७८ किस दिशामें किस नामवाले लौकान्तिक रहते
व्यन्तरोंके आठ भेद १७९ हैं इसका विचार १८८
व्यन्तर शब्दका अर्थ १७९ 'च' शब्दसे समुच्चित अन्य लौकान्तिकोंका
व्यन्तरोंका निवासस्थान १७९ निर्देश १८८
ज्योतिषियोंके पाँच भेद १७९ विजयादिकमे द्विचरम देव होते हैं १८९
ज्योतिष्क पदकी सार्थकता १७९ आदि पदसे सर्वार्थसिद्धिके ग्रहण न होनेका कारण १८९
'सूर्याचन्द्रमसौ' पदके पृथक् देनेका कारण १७९ द्विचरम शब्दका अर्थ १८९
ज्योतिषियोंका पूरे विवरणके साथ निवासस्थान १७९ तिर्यग्योनिसे किनका ग्रहण होता है इसका
मनुष्य लोकमें ज्योतिषियोंकी निरन्तर मेरु विचार १९०
प्रदक्षिणा १८० तिर्यञ्च सब लोकमें रहते हैं अतः उनका क्षेत्र
ज्योतिष्क विमानोंके गमन करनेका कारण १८० नहीं कहा १९०
ज्योतिष्कदेव मेरु पर्वतसे कितनी दूर रहकर भवनवासियोंके अवान्तर भेदोंकी उत्कृष्ट आयु १९०
प्रदक्षिणा करते हैं १८० सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
गतिमान् ज्योतिषियोंके निमित्तसे कालका विभाग 'अधिके' यह अधिकार वचन है इस बातका
होता है १८० निर्देश , १९१
कालके दो भेद व व्यवहार कालका स्वरूप १८१ सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें उत्कृष्ट आयु १९१
मनुष्य लोकके बाहर ज्योतिष्क विमान शेष बारह कल्पोंमें उत्कृष्ट आयु १९१
अवस्थित हैं १८१ 'तु' पदकी सार्थकता १९१
वैमानिकोंके वर्णनके प्रसंगसे अधिकार सूत्र १८२ कल्पातीत विमानोंमें उत्कृष्ट आयु १९२
विमान शब्दका अर्थ व उसके भेदोंका विचार १८२ 'सर्वार्थसिद्धौ' पदको पृथक् ग्रहण करनेका
वैमानिकोंके दो भेद १८२ कारण १९२
वैमानिक देव ऊपर ऊपर निवास करते हैं १८३ सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य आयु १९३
कितने कल्प विमानोंमें वे देव रहते हैं इसका शेष सबमें जघन्य आयुका विचार १९३
विचार १८३ द्वितीयादि नरकोंमें जघन्य आयु १९३
सौधर्म आदि शब्दके व्यवहारका कारण १८३ प्रथम नरकमें जघन्य आयु १९४
मेरु पर्वतकी ऊँचाई व अवगाहका परिमाण १८४ भवनवासियोंमें जघन्य आयु १९४
अधोलोक आदि शब्दोंकी सार्थकता १८४ व्यन्तरोंमें जघन्य आयु १९४
सौधर्म कल्पका ऋजु विमान कहाँ पर है इसका व्यन्तरोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
निर्देश १८४ ज्योतिषियोंमें उत्कृष्ट आयु १९५
'नवसु' पदके पृथक् देनेका कारण १८४ ज्योतिषियोंमें जघन्य आयु १९५
देवोंमें उत्तरोत्तर स्थिति प्रभावादिकृत विशेषता १८५ लौकान्तिक देवोंमें आयुका विचार १९५
गति आदि शब्दों का अर्थ १८५
कहांके देवके शरीरकी कितनी ऊँचाई है आदि पाँचवाँ अध्याय
का विचार १८५ अजीवकाय द्रव्योंका निर्देश १९६
वैमानिक देवोंमें लेश्याका विचार १८६ काय शब्द देनेकी सार्थकता १९६
सूत्रार्थकी आगमसे संगति बिठानेका उपक्रम १८७ अजीव यह धर्मादिक द्रव्योंकी सामान्य संज्ञा है १९६
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri