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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 558 में से

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पृष्ठ 104

१०० सर्वार्थसिद्धि
साम्परायिक आस्रवके भेद २४० तिर्यंचायुके आस्रव २५०
पचीस क्रियाओंका विशेष विवेचन २४० तिर्यंचायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५०
किन कारणोंसे आस्रवमें विशेषता होती है मनुष्यायुके आस्रव २५१
इसका निर्देश २४२ मनुष्यायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५१
तीव्र, मन्द आदि पदोंकी व्याख्या २४२ मनुष्यायुके अन्य आस्रव २५१
अधिकरणके दो भेद २४३ चारों आयुओंके आस्रव २५१
‘जीवाजीवाः’ ऐसा बहुवचन रखनेका कारण २४३ ‘च’ पदकी सार्थकता २५१
जीवाधिकरणके भेद २४३ देवायुके आस्रव २५२
संरम्भ आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५२
जीवाधिकरणके १०८ भेदोंका नामोल्लेख २४४ देवायुका अन्य आस्रव २५२
‘च’ पदकी सार्थकता २४४ ‘सम्यक्त्वं च’ पृथक् सूत्र बनानेका प्रयोजन २५२
अजीवाधिकरणके भेद २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रव २५३
निसर्ग आदि पदोंका अर्थ २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५३
‘पर’ पदकी सार्थकता २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
निर्वर्तना आदिके उत्तर भेदोंकी व्याख्या २४४ शुभनामकर्मके आस्रव २५३
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव २४५ ‘च’ पदकी सार्थकता २५३
प्रदोष आदि प्रत्येक पदका अर्थ २४५ शुभनामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
आसादन और उपघातमें अन्तर २४५ तीर्थंकर प्रकृतिके आस्रव २५४
‘तत्’ पदसे ज्ञान और दर्शनका ग्रहण कैसे होता सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५४
है इसका विचार २४५ नीचगोत्रके आस्रव २५५
प्रदोषादि ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंके सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्यां २५५
आस्रवके हेतु कैसे हैं इसका विचार २४६ उच्चगोत्रके आस्रव २५५
असातावेदनीयके आस्रव २४६ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५५
दुःख आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४६ अन्तराय कर्मके आस्रव २५६
शोकादिक दुःखके प्रकार होकर भी उनके अलग तत्प्रदोष आदि प्रतिनियत कर्मोंके आस्रवोंका
से ग्रहण करनेका कारण २४६ कथन करनेसे आनेवाले दोषका परिहार २५६
यदि दुःखादिक असाता वेदनीयके आस्रव हैं तो
केशोत्पाटन आदि क्यों करते हैं इसका सातवाँ अध्याय
सयुक्तिक विचार २४७ व्रतकी व्याख्या २५७
सातावेदनीयके आस्रव २४७ हिंसादि परिणामविशेष अध्रुव हैं उनसे दूर
सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २४७ होना कैसे सम्भव है इस शंकाका परिहार २५७
‘इति’ पदकी सार्थकता २४८ हिंसा आदि पदोंको क्रमसे रखनेका प्रयोजन २५८
दर्शनमोहके आस्रव २४८ रात्रिभोजन विरमण व्रत अलगसे नहीं कहने
केवली आदि पदोंकी व्याख्या २४८ का कारण २५८
सोदाहरण अवर्णवादका निरूपण २४८ व्रतके दो भेद २५८
चारित्रमोहके आस्रव २४९ प्रत्येक पदकी व्याख्या २५८
कषाय आदि पदोंकी व्याख्या २४९ व्रतकी स्थिरताके लिए पाँच-पाँच भावनाओंका
चारित्रमोहके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २४९ अधिकार सूत्र २५९
नरकायुके आस्रव २५० अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
नरकायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५० सत्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri