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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

स्तम्भ १ (बायाँ स्तम्भ)

३९४
§. ९८
४३. १ एकजीवस्य मिथ्यात्वयुक्तस्त्रीवेदकालो जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । ततो गुणान्तरसंक्रमः । उत्कर्षेण-
पल्योपमशतपृथक्त्वम् । तथाहि--स्त्रीवेद्युक्तो
मिथ्यादृष्टिर्देवेषु आयुर्बध्नाति । ततस्तिर्यग्मनुष्येषु
नारकसम्मूर्च्छनवजं तावद्यावत्पल्योपमशतपृथक्त्वं ततो
वेदपरित्यागः । स्त्रीवेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रति
उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशतपल्योपमानि, गृहीतसम्यक्त्वस्य
स्त्रीवेदेनोत्पादाभावात् पर्याप्तः सम्यक्त्वं ग्रहीष्यतीति
पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्तहीनत्वाद्देशोनानि । नपुंसक-
वेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण सप्तमपृथिव्यां
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि तत्र च पर्याप्तः कियत्कालं
विश्रम्य विशुद्धो भूत्वा सम्यक्त्वं गृह्णात्यन्ते त्यजति
चेति देशोनानि ।
[ एक जीवके मिथ्यात्वयुक्त स्त्रीवेदका काल जघन्य-
से अन्तर्मुहूर्त है । उसके बाद गुणस्थान बदल जाता
है । उत्कर्षसे सौ पल्योपमपृथक्त्व है जो इस प्रकार
है—स्त्रीवेदसे युक्त मिथ्यादृष्टि देवगतिकी आयुका
बन्ध करता है । वहाँसे तिर्यंच और मनुष्योंमें उत्पन्न
होता है। इस तरह नारक और सम्मूर्छनको छोड़कर
सौ पल्योपमपृथक्त्व तक स्त्रीवेद सहित रहता है फिर
वेद बदल जाता है। स्त्रीवेद सहित असंयत सम्यग्दृष्टि
एक जीवका उत्कर्षसे पचपन पल्य काल है। सम्यग्दृष्टि
तो स्त्रीवेदके साथ उत्पन्न नहीं होता अतः स्त्रीवेदी
जीव पर्याप्त अवस्थामें सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
इसलिए पर्याप्तिकी पूर्ति में लगनेवाला अन्तर्मुहूर्त
कम कर देनेसे देशोन (कुछ कम पचपन पल्य) होता
है। नपुंसकवेदी असंयत सम्यग्दृष्टि एक जीवका
उत्कर्षसे सातवें नरकमें तेतीस सागर काल है।
क्योंकि वहाँ पर्याप्त होकर कुछ काल विश्राम करके
विशुद्ध होकर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है और अन्त-
में छोड़ देता है इसलिए देशोन (कुछ कम) तेतीस-
सागर होता है । ]
§. ९९
४३. ११ चतुःकषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
कषायगुणपरावर्तपेक्षया एकजीवं प्रति मनोयोगिवज्ज-
घन्येनेकः समयः, उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।


स्तम्भ २ (दायाँ स्तम्भ)

सर्वार्थसिद्धि
[ चारों कषायोंका मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तगुण-
स्थान पर्यन्त कषाय और गुणस्थानके बदल जानेकी
अपेक्षासे एक जीवके मनोयोगीकी तरह जघन्यसे एक
समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १००
४३. १४ विभङ्गज्ञानिमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण
नारकापेक्षया त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । पर्याप्तश्च
विभङ्गज्ञानं प्रतिपद्यत इति पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्त-
हीनत्वाद्देशोनानि ।
[ विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि एक जीवके उत्कर्षसे नारकों
की अपेक्षासे तेतीस सागर काल है । पर्याप्त जीव ही
विभंगज्ञानको प्राप्त होता है इसलिए पर्याप्तिके समापक
अन्तर्मुहूर्तके कम कर देनेसे देशोन लेना चाहिए । ]
§. १०३
४४. ७ कृष्णनीलकापोतलेश्यमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः, तिर्यग्मनुष्यापेक्षया तेषामेव लेश्या-
परावर्तसंभवात् । सर्वत्र च लेश्यायुक्तस्यान्तर्मुहूर्तः
तिर्यग्मनुष्यापेक्षया द्रष्टव्यः । उत्कर्षेण नारकापेक्षया
यथासंख्यं सप्तमपञ्चम-तृतीयपृथिव्यां त्रयस्त्रिंशत्
सप्तदशसप्तसागरोपमाणि देवनारकाणामवस्थितलेश्य-
त्वात् । व्रजन्नियमैन तल्लेश्योक्तो व्रजति आग-
च्छतो नियमो नास्तीति सातिरेकाणि । उक्तलेश्या-
युक्तासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नारका-
पेक्षया उक्तान्येव सागरोपमाणि । पर्याप्तिसमापकान्त-
र्मुहूर्ते सप्तम्यां मारणान्तिके च सम्यक्तवाभावाद्देशो-
नानि । तेजःपद्मलेश्यमिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्यैक-
जीवं प्रत्युत्कर्षेण यथासंख्यं प्रथमद्वादशस्वर्गापेक्षया
द्वे सागरोपमे अष्टादश च । तद्युक्तानां मारणान्ति-
कोत्पादः संभवतीति सातिरेकाणि । शुक्ललेश्यमिथ्या-
दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण एकत्रिंशत्सागरोपमाणि
अग्रग्रैवेयकदेवापेक्षया तेषां मारणान्तिकोत्पादावस्थाया-
मपि शुक्ललेश्यासंभवात् सातिरेकाणि । संयतासंयत-
शुक्ललेश्यैकजीवं प्रति गुणलेश्यापरावर्तपेक्षेतराभ्यां
जघन्येनेकः समयः उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।
[कृष्ण नील या कापोतलेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति जघन्यसे अन्तर्मुहूर्तकाल है क्योंकि तिर्यंच
और मनुष्यकी अपेक्षासे उनकी लेश्यामें परिवर्तन

परिशिष्ट २ | ३९५

सम्भव है। सर्वत्र लेश्यायुक्त जीवका अन्तर्मुहूर्तकाल
तिर्यंच और मनुष्यकी अपेक्षासे देखना चाहिए । उत्कर्ष-
से नारकोंकी अपेक्षा सातवीं, पाँचवीं और तीसरी
पृथिवीमें क्रमसे तेतीस सागर, सत्रह सागर और
सात सागर काल होता है क्योंकि देवों और नारकोंकी
लेश्या अवस्थित होती है। जब वे अपनी गतिमें जाते
हैं तो नियमसे उसी लेश्याके साथ जाते हैं किन्तु
वहाँसे आते हुए नियम नहीं हैं इसलिए कुछ अधिक
उक्त काल होता है। उक्त लेश्याओंसे युक्त असंयत
सम्यग्दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे नारकोंकी
अपेक्षासे उक्त तेतीस आदि सागर ही काल है। किन्तु
पर्याप्ति समापक अन्तर्मुहूर्तमें और सातवीं पृथिवीमें
मारणान्तिक समुद्घातमें सम्यक्त्व नहीं होता इसलिए
कुछ कम उक्त काल होता है। तेजोलेश्या और पद्म-
लेश्यावाले मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि एक
जीवके प्रति उत्कर्षसे क्रमानुसार प्रथम और बारहवें
स्वर्गकी अपेक्षा दो सागरोपम और अठारह सागरोपम-
काल है । उक्त अवस्थाविशिष्ट उन जीवोंके मारणान्तिक
और उत्पाद सम्भव है इसलिए कुछ अधिक उक्त काल
लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक जीवके
प्रति उत्कर्षसे सबसे ऊपरवाले ग्रैवेयकके देवोंकी अपेक्षा
इकतीस सागर काल है । उनके मारणान्तिक और
उत्पाद अवस्थामें भी शुक्ललेश्या होती है अतः कुछ
अधिक इकतीस सागर लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले
संयतासंयत-गुणस्थानवर्ती एक जीवके प्रति गुणस्थान
और लेश्यापरिवर्तनकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय
और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १०७
४६.४ आहारकेषु मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रति जघन्येना-
न्तर्मुहूर्तः । वक्रेण गतः क्षुद्रभवेनोत्पन्नः पुनरपि वक्रेण
गतः । उत्कर्षेणासंख्यातासंख्यातमानावच्छिन्नोत्सर्पिण्य-
वसर्पिणीलक्षणोऽङ्गुल्यसंख्येयभागः शश्वदन्तऋजुगति-
मत्त्वात् । अनाहारकसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्-
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षयोत्कर्षेणावलिकाया असंख्येय-
भागः । नन्वालिकाया असंख्यातसमयमानलक्षणत्वा-
त्तदसंख्येयभाग एकसमय एव स्यात् । तदयुक्तं,
बृहदसंख्यातसमयमानलक्षणत्वात् । आवलिकासंख्येय-
भागस्य चाल्पासख्यातसमयमानलक्षणत्वादिति ।
सयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया जघन्येन त्रयः
समयाः समसमये दण्डादिप्रारम्भकत्वात् । उत्कर्षेण
संख्येयाः समयाः अजघन्योत्कृष्टसंख्यातमाना-
वच्छिन्नाः निरन्तरं विषमसमये दण्डादिप्रारम्भ-
कत्वात्। एकजीवं प्रति जघन्य उत्कृष्टाश्च त्रयः समयाः
प्रतरद्वयलोकपूरणलक्षणाः ।
[ आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति जघन्यसे
अन्तर्मुहूर्त काल है, वक्रगतिसे जाकर क्षुद्रभवसे उत्पन्न
हुआ और पुनः मरकर वक्रगतिसे गया (वक्रगतिमें
अनाहारक रहा और मध्यमें आहारक) । उत्कर्षसे
अंगुलके असंख्यातवें भाग है जो असंख्यातासंख्यात
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालप्रमाण है ।
शंका—आवलीका प्रमाण असंख्यात समय है अतः
उसका असंख्यातवां भाग एक समय ही होगा ?
उत्तर—ऐसा कहना युक्त नहीं है क्योंकि आवलीके
समयोंका प्रमाण बृहत् असंख्यात है और आवलीके
असंख्यातवें भागके समयोंका प्रमाण अल्प असं-
ख्यात है ।
सयोगकेवलियोंका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य-
से तीन समय है क्योंकि समान समयमें दण्डादि
समुद्घातका प्रारम्भ करते हैं । उत्कर्षसे संख्यात-
समय है जो मध्यमसंख्यात प्रमाण है क्योंकि लगा-
तार विभिन्न समयोंमें दण्डादिसमुद्घातका प्रारम्भ
करते हैं । एक जीवकी अपेक्षा अनाहारकका जघन्य
और उत्कृष्ट काल तीन समय है विस्तार और
संकोच रूप दो प्रतर और एक लोकपूरणसमुद्घात
के समय । ]
§. १०८
४६. १२ अन्तरम् । मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रत्यन्तरमु-
त्कर्षेण द्वे षट्षष्ठी सागरोपमानाम् । तथाहि—वेदक-
सम्यक्त्वेन युक्त एको षट्षष्ठीं तिष्ठति तत्सम्यक्त्व-
स्योत्कर्षेणैतावन्मात्रस्थितिकत्वात् । पुनरवान्तरेऽन्त-
१. आदावन्ते च वक्रगतिकालयोरनाहारकः । मध्येऽन्तर्मुहूर्तं यावदाहारक इत्यर्थः ।

३९६ सर्वार्थसिद्धि
र्मुहूर्तं यावत् सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते । पुनरपरां
षट्षष्ठीं वेदकसम्यक्त्वेन तिष्ठति । अन्त्यसागरोपमाव-
सानशेषे मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति देशोने । सासा-
दनैकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः ।
अन्तर्मुहूर्तः कस्मान्नेति च न चोद्यम्, अन्तर्मुहूर्तमध्ये
पुनः सासादनगुणग्रहणे योग्यतासंभवात् । परित्यक्तौप-
शमिकसम्यक्त्वो हि मिथ्यात्वप्राप्त्यन्तराले वर्तमानः
सासादनोऽभिधीयते । तस्य च मिथ्यात्वं गतस्य
पुनरौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणे योग्यता पल्योपमासंख्येय-
भागे सत्येव नावान्तरे तत्र वेदकग्रहणयोग्यताया
एव संभवात् ।
[ आगे अन्तरका कथन करते हैं । मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति अन्तरकाल उत्कर्षसे दो छियासठ सागर
है । जो इस प्रकार है—वेदकसम्यक्त्वसे युक्त जीव
एक छियासठसागर तक रहता है क्योंकि वेदक-
सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थिति इतनी ही है । उसके
पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तके लिए सम्यग्मिथ्यात्व गुण-
स्थानको प्राप्त करता है । पुनः दूसरे छियासठ सागर
तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहता है। अन्तिम सागर-
के अन्तमें कुछ काल शेष रहनेपर मिथ्यात्वमें चला
जाता है इस प्रकार देशोन दो छियासठ सागर
अन्तरकाल होता है । सासादन एक जीवके प्रति
अन्तरकाल जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग है ।
शंका — अन्तर्मुहूर्त अन्तरकाल क्यों नहीं है ।
उत्तर — ऐसा तर्क नहीं करना चाहिए क्योंकि अन्त-
र्मुहूर्तकालके अन्दर पुनः सासादनगुणस्थानको ग्रहण
करनेकी योग्यता सम्भव नहीं है । इसका कारण
यह है कि जो जीव औपशमिक सम्यक्त्वको छोड़कर
मिथ्यात्व गुणस्थान प्राप्तिके बीचके समयमें रहता है
उसे सासादन कहते हैं । उसके मिथ्यात्वमें चले
जानेपर पुनः औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी
योग्यता पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल बीतनेपर
ही मानी है उससे पहले नहीं । उससे पहले वेदक
सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता ही सम्भव
है । ]
§. ११०
४८. ४ तिर्यङ्मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमान्यन्तरम् । अधिकमपि कस्मान्नेति चेत्,
वेदकयुक्तस्य तिर्यक्त्व्यादाभावात् तद्युक्तो हि देवेष्वेवो-
त्पद्यते । अतो मिथ्यात्वयुक्तस्त्रिपत्योपमायुष्को भोग-
भूमिषूत्पद्यते । तत्र चोत्पन्नानां तिर्यङ्मनुष्याणां
किंचिदधिकाष्टचत्वारिशद्दिनेषु सम्यक्त्वग्रहण-
योग्यता भवतीति नियमादेतावद्दिनेषु गतेषु मिथ्यात्व-
परित्यागेन सम्यक्त्वं गृह्णातीति त्रिपल्योपमायुः-
शेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति गर्भकालेन किंचिद-
धिकाष्टचत्वारिंशद्दिनैरवसानकालशेषेण च हीनत्वा-
द्देशोनानि ।
[ तिर्यंचमिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे तीन
पल्योपम अन्तरकाल है ।
शंका — अधिक क्यों नहीं है ?
उत्तर — क्योंकि वेदक सम्यक्त्वसे युक्त जीव तिर्यंचों-
में उत्पन्न नहीं होता, देवोंमें ही उत्पन्न होता है ।
अतः तीन पल्यकी आयुका बन्ध करनेवाला मिथ्या-
दृष्टि भोगभूमिमें उत्पन्न होता है। भोगभूमिमें उत्पन्न
हुए तिर्यंच और मनुष्योंमें कुछ अधिक अड़तालीस
दिन बीतने पर सम्यक्त्वग्रहणकी योग्यता आती है
ऐसा नियम है । अतः इतने दिन बीतने पर वह
मिथ्यात्वको त्याग कर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
और तीन पल्यकी आयुमें कुछ शेष रहने पर पुनः
मिथ्यात्वको ग्रहण कर लेता है। इस तरह गर्भ-
कालसे किंचित् अधिक अड़तालीस दिनों और अन्तिम-
कालसे हीन होनेसे देशोन² तीन पल्य अन्तरकाल
होता है । ]
§. १११
४८. ७ मनुष्यगतौ सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टयः पूर्वकोटिपृथक्त्वकाले सति
स्वस्वगुणं परित्यज्य भोगभूमावुत्पद्यन्ते । पश्चात् स्व-
गुणं गृह्णन्ति । एकमेव जीवं प्रति उत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्ववाधिकानि भवन्ति ।
१. धवला पु० ५, पृ० ७ में प्रथम छियासठ सागरमें अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर ही सम्यक् मिथ्यात्व-
को प्राप्त कराया है —सं० । २. धवला पु० ५, पृ० ३२ में आदिके मुहूर्तपृथक्त्वसे अधिक दो मास
और आयुके अवसानमें उपलब्ध दो अन्तर्मुहूर्तोंसे हीन तीन पल्योपम अन्तरकाल कहा है—सं० ।

परिशिष्ट २ [३९७]
[ मनुष्यगतिमें सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि,
असंयतसम्यग्दृष्टि जीव अपने-अपने गुणस्थानको छोड़-
कर पूर्वकोटिपृथक्त्वकाल होनेपर भोगभूमिमें उत्पन्न
होते हैं । पीछे अपने गुणस्थानको ग्रहण करते हैं
इस तरह एक जीवके प्रति उत्कर्षसे पूर्वकोटि पृथक्त्व
अधिक तीन पल्योपम अन्तरकाल होता है । ]
§. ११२
४९. ५ देवगतौ मिथ्यादृष्टेरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेणैक-
त्रिंशत्सागरोपमाणि । तथाहि—मिथ्यात्वयुक्तोऽग्रग्रैवे-
यकेषूत्पद्यते पश्चात् सम्यक्त्वमादायैकत्रिंशत्सागरोप-
माणि तिष्ठति । अवसानकालशेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रति-
पद्यतेऽन्यथा गत्यतिक्रमः स्यादिति देशोनानि । एवम-
संयतसम्यग्दृष्टेरपि योजनीयम् ।
[ देवगतिमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
इकतीस सागर अन्तरकाल है जो इस प्रकार है—
एक द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि उपरिमग्रैवेयकमें उत्पन्न
हुआ । पीछे सम्यक्त्वको ग्रहण करके इकतीस सागर
तक रहा । अन्त समयमें पुनः मिथ्यादृष्टि हो गया ।
यदि ऐसा न हो तो गति बदल जायेगी । अतः
देशोन इकतीससागर होता है । इसी तरह असंयत
सम्यग्दृष्टिका भी अन्तरकाल लगा लेना चाहिए । ]
§. ११३
४१. ९ एकेन्द्रियैकजीवस्योत्कर्षेण द्वे सागरोपम-
सहस्रे पूर्वकोटिपृथक्त्वैः षण्णवतिपूर्वकोटिभिरभ्य-
धिकेऽन्तरम् । अग्रे हीत्थं सर्वत्र सागरोपमसहस्र-
द्वयस्य पूर्वकोटिपृथक्त्वैरभ्यधिकत्वं द्रष्टव्यम् । एके-
न्द्रियविकलेन्द्रियाणां च गुणस्थानान्तरासंभवादि-
न्द्रियेणान्तरम् । पञ्चेन्द्रियाणां तु तत्संभवान्मिथ्यात्वादेः
सम्यक्त्वादिनान्तरं द्रष्टव्यम् ।
[ एकेन्द्रिय एक जीवका अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व
छियानबे पूर्वकोटियोंसे अधिक दो हजार सागर है ।
आगे इस प्रकार सर्वत्र पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक
दो हजार सागर जानना चाहिए । एकेन्द्रिय और
विकलेन्द्रियोंके मिथ्यात्व गुणस्थानके अतिरिक्त अन्य
गुणस्थान नहीं होता इसलिए इन्द्रियोंकी अपेक्षा
अन्तर लगा लेना अर्थात् विकलेन्द्रिय जीव एके-
न्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो
और एकेन्द्रियजीव विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः
एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो तो अन्तरकाल आता है ।
किन्तु पंचेन्द्रियोंमें तो गुणस्थान बदलना सम्भव है
अतः मिथ्यात्व आदिका अन्तर सम्यक्त्व आदिके द्वारा
लगा लेना चाहिए । ]
§. ११४
५०. ५ पृथिव्यादिकायिकानां वनस्पतिकायिकैरन्तर-
मुत्कर्षेणासंख्येयाः पुद्गलपरावर्ताः । तेषां तु नैर-
न्तरमुत्कर्षेणासंख्येया लोकाः वनस्पतिकायिकेभ्योऽ-
न्येषामल्पकालत्वात् ।
[ पृथिवीकायिकोंका वनस्पतिकायिक जीवोंके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरावर्त है और
वनस्पतिकायिकोंका पृथिवीकायिक आदिके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यातलोक है क्योंकि वनस्पति-
कायिकोंसे पृथिवीकायिक आदिका काल थोड़ा है । ]
§. ११५
५१. ३ कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादि-
षड्गुणस्थानानां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवापेक्षया कथं नास्तीति चेत् कायादियोगा-
नामन्तर्मुहूर्तकालत्वात् कायादियोगे स्थितस्यात्मनो
मिथ्यात्वादिगुणस्य गुणान्तरेणान्तरं पुनस्तत्प्राप्तिश्च
संभवतीति । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामप्येकजीवा-
पेक्षया तत एव नास्त्यन्तरम् ।
[ काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत,
अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलिका नानाजीवों और
एकजीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
शंका—एक जीवकी अपेक्षा अन्तर क्यों नहीं है ?
उत्तर—क्योंकि कायादियोगोंका अन्तर्मुहूर्त काल है
इसलिए कायादि योगमें स्थित जीवके मिथ्यात्व आदि
गुणस्थानका अन्य गुणस्थानसे अन्तर करके पुनः उसी
गुणस्थानमें आना सम्भव नहीं है । सासादन
सम्यग्दृष्टि आदिका भी एक जीवकी अपेक्षा इसीलिए
अन्तर नहीं है । ]
§. ११७
५२. ६ पुंवेदे द्वयोः क्षपकयोरिति पृथग्वचनमुत्तरत्र

वेदभावात् । नानाजीवापेक्षया उत्कर्षेण संवत्सरः
सातिरेकः अष्टादशमासा इत्यर्थः ।
[ पुरुषवेदमें 'दो क्षपकोंका' पृथक् कथन इसलिए
किया है कि आगे वेदका अभाव हो जाता है । नाना
जीवोंकी अपेक्षा उत्कर्षसे कुछ अधिक एक वर्ष
अन्तर है । कुछ अधिक एक वर्षसे १८ मास लेना
चाहिए । ]
§. ११८
५२. १२ अवेदेषूपशान्तकषायकैकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरं सवेदत्वात् ।
[ अपगत वेदियोंमें उपशान्तकषाय एक जीवके प्रति
अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे नीचेके
गुणस्थान नौवें आदिमें वेद पाया जाता है अर्थात्
नीचे गिरनेपर अवेदरूपसे उपशान्तकषाय गुणस्थान-
को प्राप्त करना सम्भव नहीं है । ]
§. १२०
५३. ४ अज्ञानत्रययुक्तैकजीवेऽपि मिथ्यात्वस्यान्तरं
नास्ति गुणान्तरेऽज्ञानत्रयव्यभिचारात् । सासादनेऽस्ती
ति चेन्न, तस्य सम्यक्त्वग्रहणपूर्वकत्वात् सम्यग्दृष्टेश्च
मिथ्याज्ञानविरोधात् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानि-
ष्वसंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी
देशविरतादिगुणस्थानेनान्तरमवसानकाले शेषे पुनर-
संयतत्वं प्रतिपद्यत इति देशोना । संयतासंयतैकजीवं
प्रत्युत्कर्षेण षट्षष्ट्सागरोपमाणि, असंयतप्रमत्ता-
दिगुणस्थानेनान्तरं पूर्वकोटिचतुष्टयाष्टवर्षैः सातिरे-
काणि मनुजेषूत्पन्नो हि अष्टवर्षाणन्तरं संयतासंयतत्वं
प्रतिपद्यत इति । मनःपर्ययज्ञानिष्वेकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । अधिकमपि कस्मान्नेति
चेत् अधोगुणस्थानेषु वर्तमानानां मनःपर्ययासंभवात् ।
तेषु वर्तमानानां चाधिकमन्तरं संभवतीति । चतुर्णा-
मुपशमकानामुत्कर्षेण पूर्वकोटी । उपशमश्रेणितो हि
पतितास्ते मनःपर्ययज्ञानमपरित्यजन्तः प्रमत्ताप्रमत्त-
गुणस्थाने वर्तन्ते यावत्पूर्वकोटिकालशेषः पुनस्तदा-
रोहणं कुर्वन्तीति देशोना ।
[ कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और विभङ्गज्ञानसे युक्त एक
जीवके प्रति मिथ्यात्वका अन्तर नहीं है क्योंकि
अन्य गुणस्थानमें कुमति, आदि तीनों ज्ञान
नहीं होते ।
शंका—सासादन में जानेपर अन्तर पड़ सकता है ?
उत्तर—नहीं, क्योंकि सासादन गुणस्थान सम्यक्त्व
ग्रहण करनेके बाद होता है और सम्यग्दृष्टिके मिथ्या-
ज्ञान नहीं होता । मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी अवधि-
ज्ञानियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टी एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
देशविरत आदि गुणस्थानके द्वारा पूर्वकोटि अन्तर
काल है । अर्थात् एक असंयतसम्यग्दृष्टी जीव संयमा-
संयमको प्राप्त हुआ । कुछ कम पूर्वकोटिकाल तक
संयमासंयमका पालन करके अन्तमें असंयमी हो गया
तो कुछ कम पूर्वकोटी अन्तर होता १ है । संयतासंयत
एक जीवके प्रति उत्कर्षसे छियासठ सागर अन्तरकाल
है । असंयत प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानके द्वारा
अन्तर होने पर चार पूर्वकोटी और आठ वर्ष अधिक
छियासठ सागर होता है क्योंकि मनुष्योंमें उत्पन्न
हुआ जीव आठ वर्षके अनन्तर संयतासंयतपनेको
प्राप्त करता है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें एक जीवके प्रति
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है ।
शंका—अधिक अन्तर क्यों नहीं होता ?
उत्तर—नीचे के गुणस्थानोंमें आनेपर ही अधिक अन्तर
संभव है किन्तु उनमें मनःपर्ययज्ञान संभव नहीं है ।
मनःपर्ययज्ञानी चारों उपशमकोंका उत्कृष्ट अन्तर
पूर्वकोटी है क्योंकि उपशमश्रेणीसे गिरकर मनःपर्यय-
ज्ञानको अपनाये हुए प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें
१. धवलामें लिखा है—पूर्वकोटिकाल प्रमाण संयमासंयमको पालकर मरा और देव हुआ । पु० ५, पृ० ११३ ।
२. धवलामें लिखा है—एक जीव मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ । आठ वर्षका होकर एक साथ संयमासंयम और
वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । पुनः अन्तर्मुहूर्तमें संयमको प्राप्त करके अन्तरको प्राप्त हुआ । संयमके
साथ पूर्वकोटि काल बिताकर तेतीस सागरकी आयुके साथ देव हुआ । वहाँसे च्युत होकर पूर्वकोटि आयुके
साथ मनुष्य हुआ । पुनः मरकर तेतीस सागरकी आयु लेकर देव हुआ । वहाँसे च्युत हो पुनः पूर्वकोटि
आयु लेकर मनुष्य हुआ वहाँ दीर्घकाल तक रहकर संयमासंयमको प्राप्त

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परिशिष्ट २ ३९९
(कुछ कम) पूर्वकोटिकाल तक रहता है पुनः उपशम- जाती है (और लेश्याके कालसे गुणस्थानका काल
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन पूर्वकोटि- बहुत है।]
अन्तर होता है ।]
§. १२५
§. १२१
५६. ३ शुक्ललेश्येष्वप्रमत्तादीनामुपशमश्रेण्यारोह-
५४. १ सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु द्वयोरुप- णाभिमुख्यारोहणसद्भावाभ्यां लेश्यान्तरपरावर्ताभावा-
शमकयोरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी अष्टवर्षानन्तरं देकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्त-
तपो गृहीत्वोपशमश्रेणिमारुह्य पतितः प्रमत्ताप्रमत्तयोः कषायस्य पतितस्य प्रमत्ते लेश्यान्तरं संस्पृश्य श्रेण्या-
पूर्वकोटिकालशेषं यावद् वर्तित्वा पुनस्तदारोहणं करो- रोहणादेकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
तीति देशोना । सूक्ष्मसांपरायसंयमे उपशमकस्यक- [शुक्ललेश्यामें अप्रमत्तसंयत आदिका एक जीवके
जीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणान्तरे तत्संयमाभावात् । प्रति जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि
असंयमेषु मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नरके सप्तम- शुक्ललेश्यावाला कोई एक अप्रमत्तसंयत उपशम श्रेणि-
पृथिव्यामुत्पद्यतेऽन्तर्मुहूर्ते गते सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते पर चढ़कर अन्तरको प्राप्त हुआ और सर्वजघन्यकाल-
मुहूर्त्तशेषे त्यजतीति देशोनानि । में लौटकर अप्रमत्त संयत हुआ। इसी प्रकार उत्कृष्ट
अन्तर भी होता है, इस कालमें लेश्या परिवर्तन नहीं
[ सामायिक छेदोपस्थापना संयमियोंमें दो उपशमकों-
होता। शुक्ललेश्यावाले उपशान्त कषायका एक जीव-
का एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम पूर्वकोटि के प्रति अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे गिर-
अन्तर है क्योंकि पूर्वकोटिकी आयुवाला मनुष्य आठ- कर छठे गुणस्थानमें लेश्या परिवर्तन होकर ही श्रेणि-
वर्षके पश्चात् संयमको ग्रहण करके उपशम श्रेणिपर पर आरोहण होता है । ]
आरोहण करके गिरा और प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानोंमें
पूर्वकोटिकालके शेष होने तक रहकर पुनः उपशम- §. १२९
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन होता
५७. ७ औपशामिकासंयतसम्यग्दृष्टीनां सान्तरत्वा-
है । सूक्ष्मसाम्पराय संयममें एक जीवके प्रति उप- न्नानाजीवापेक्षया सप्तरात्रिंदिनानि । औपशमिक-
शमकका अन्तर नहीं है क्योंकि सूक्ष्मसाम्पराय संयम
सम्यक्त्वं हि यदि कश्चिदपि न गृह्णाति तदा सप्तरात्रिं-
दसवें गुणस्थानमें ही होता है। असंयमियोंमें मिथ्या- दिनान्येव । संयतासंयतस्य चतुर्दश, प्रमत्ताप्रमत्तयोः
दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम तेतीससागर
पञ्चदश एकजीवं प्रति जघन्येन जघन्य उत्कर्षेण
अन्तर है क्योंकि एक मिथ्यादृष्टि जीव सातवीं पृथिवी- चोत्कृष्टोऽन्तर्मुहूर्तः । तदुक्तम्-
में उत्पन्न होता है । अन्तर्मुहूर्त बीतनेपर सम्यक्त्वको
ग्रहण करता है। अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयु शेष रहनेपर सम्मत्ते सत्तदिणा विरदाविरदेसु चोद्दसा होंति ।
सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वमें आ जाता है इस विरदेसु य पण्णरसा विरहणकालो य बोधव्वो ॥
प्रकार देशोन तेतीससागर अन्तर होता है । ] [प्रा० पं० सं० २०५]
उपशान्तकषायैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं वेदकपूर्वकोप-
§. १२४ शमिकेन हि श्रेण्यारोहणभाग् भवति, तस्याः पतितो
५५. ११ तेजःपद्मलेश्यसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयता- न तेनैव श्रेण्यारोहणं करोति, सम्यक्त्वान्तरं मिथ्यात्वं
नामेकजीवापेक्षयापि नास्त्यन्तरमन्तर्मुहूर्ते परावर्तमान- वा गत्वा पश्चात्तदादाय करोतीति । अतो नास्ति
लेश्यत्वात् । तस्यान्तरम् । सासादनसम्यग्मिथ्यात्व-मिथ्यात्व-
युक्तैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणे गुणान्तरविरोघतः
[ तेजोलेश्या और पद्मलेश्यावाले संयतासंयत, प्रमत्त- सासादनादिगुणे स्थितस्य मिथ्यात्वादिनान्तरासंभवात् ।
संयत, और अप्रमत्तसंयतोंका एक जीवकी अपेक्षासे [ औपशामिक असंयतसम्यग्दृष्टियोंके सान्तर होनेसे
भी अन्तर नहीं है क्योंकि अन्तर्मुहूर्तमें लेश्या बदल नाना जीवोंकी अपेक्षा सात रातदिन अन्तरकाल है।

४०० सर्वार्थसिद्धि
यदि कोई भी जीव औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण तीन समय है; और मिथ्यात्व गुणस्थानका काल
नहीं करता तो सात रातदिन तक ही ग्रहण नहीं उससे बहुत है अतः वहाँ उसका अन्य गुणस्थानसे
करता । औपशमिक सम्यक्त्वके साथ संयतासंयतोंका अन्तर असम्भव है । ]
अन्तरकाल चौदह दिन है और प्रमत्तसंयत तथा
अप्रमत्तसंयतका पन्द्रह दिन है । एक जीवके प्रति §. १३३
जघन्य अन्तरकाल जघन्य अन्तर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट ५९. ९ भावः - मिथ्यादृष्टिरित्यौदयिको भावो
अन्तरकाल उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । कहा है - मिथ्यात्वप्रकृतेरुदये प्रादुर्भावात् । सासादनसम्य-
औपशमिक सम्यक्त्वका अन्तरकाल सात दिन, ग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । नन्वनन्तानुबन्धि-
औपशमिक सम्यक्त्वके साथ विरताविरतका अन्तर- क्रोधाद्युदयेऽस्य प्रादुर्भावादौदयिकत्वं कस्मान्नोच्यत
काल चौदह दिन और विरतोंका अन्तरकाल पन्द्रह इति चेत्, अविवक्षितत्वात् । दर्शनमोहापेक्षया हि
दिन जानना चाहिए । मिथ्यादृष्ट्यादिगुणस्थानचतुष्टये भावो निरूपयितुमभि-
उपशान्तकषायका एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है प्रेतोऽतः सासादने सम्यक्त्व-मिथ्यात्व-तदुभयलक्षणस्य
क्योंकि वेदकसम्यक्त्वपूर्वक होनेवाले औपशमिक- त्रिविधस्यापि दर्शनमोहस्योदय-क्षय-क्षयोपशमाभा-
सम्यक्त्वसे जीव उपशमश्रेणिपर आरोहण करता है । वात् पारिणामिकत्वम् । सम्यग्मिथ्यादृष्टिरिति क्षायो-
उससे गिरनेपर पुनः उसी सम्यक्त्वसे श्रेणिपर पशमिको भावः । ननु सर्वघातिनामुदयाभावे
आरोहण नहीं करता किन्तु अन्य सम्यक्त्वको ग्रहण देशघातीनां चोदये य उत्पद्यते भावः स क्षायोप-
करके या मिथ्यात्वमें जाकर पुनः सम्यक्त्वको ग्रहण शमिकः । न च सम्यक्मिथ्यात्वप्रकृतेर्देशघातित्वं
करके तब श्रेणिपर आरोहण करता है । अतः उसका संभवति, सर्वघातित्वेनागमे तस्याः प्रतिपादित-
अन्तर नहीं है । सासादनसम्यक्त्व, सम्यक्मिथ्यात्व त्वादिति । तदयुक्तम्, उपचारतस्तस्या देशघातित्व-
और मिथ्यात्वसे युक्त एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है स्यापि संभवात् । उपचारनिमित्तं च देशतः सम्यक्त्व-
क्योंकि एक गुणमें दूसरे गुणका विरोध होनेसे सासादन स्य घातित्वं, न हि मिथ्यात्वप्रकृतिवत् सम्यग्मिथ्यात्व-
आदि गुण स्थानमें स्थित जीवका मिथ्यात्व आदि प्रकृत्या सर्वस्य सम्यग्मिथ्यात्वस्वरूपस्य (सम्यक्त्व-
गुणस्थानसे अन्तर असम्भव है । ] स्वरूपस्य ) घातः संभवति सर्वज्ञोपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यं-
§. १३० शस्यापि संभवात् । तदुपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यरुच्यात्मको
५८. ९ असंज्ञिनां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्, हि परिणामः सम्यग्मिथ्यात्वमिति ।
एक मिथ्यात्वगुणस्थानवर्तित्वेन तेषां सासादिनान्तरा- [ अब भावका कथन करते हैं - मिथ्यादृष्टि यह
संभवात् । औदयिक भाव है क्योंकि मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयमें
[ असंज्ञियोंका नाना और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर होता है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक
नहीं है क्योंकि असंज्ञियोंके केवल एक मिथ्यात्वगुण- भाव है ।
स्थान ही होता है अतः उनका सासादन आदि शङ्का - अनन्तानुबन्धि क्रोध आदि कषायके उदयमें
गुणस्थानोंसे अन्तर सम्भव नहीं है । ] सासादन गुणस्थान प्रकट होता है तो इसे औदयिक
§. १३२ क्यों नहीं कहते ?
५९. ३ अनाहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यैकजीवं प्रति उत्तर- उसकी यहाँ विवक्षा नहीं है । दर्शनमोहकी
नास्त्यन्तरमनाहारकत्वस्यैक-द्वि-त्रिसमयत्वात् गुण- अपेक्षासे ही मिथ्यादृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमें भाव
स्थानस्य च ततो बहुकालत्वात् तत्र तस्य गुणान्तरे- बतलाना इष्ट है अतः सासादनमें सम्यक्त्व प्रकृति,
णान्तरासंभवादिति । मिथ्यात्व और सम्यमिथ्यात्वरूप दर्शनमोहकी तीनों
[ अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति अन्तर प्रकृतियोंका उदय, क्षय और क्षयोपशमका अभाव
नहीं है क्योंकि अनाहारकपनेका काल एक, दो या होनेसे पारिणामिक भाव कहा है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि
यह क्षायोपशमिक भाव है ।
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परिशिष्ट २ ४०१
शङ्का—सर्वघातिप्रकृतियोंके उदयके अभावमें और
देशघाती प्रकृतियोंके उदयमें जो भाव उत्पन्न होता है
उसे क्षायोपशमिक कहते हैं । किन्तु सम्यग्मिथ्यात्व-
प्रकृतिको देशघातिपना तो संभव नहीं है क्योंकि
आगममें उसे सर्वघाती कहा है ?
उत्तर—ऐसा कहना युक्त नहीं है, उपचारसे सम्यक्-
मिथ्यात्व प्रकृतिको देशघातिपना भी सम्भव है।
उपचारका निमित्त है एक देशसे सम्यक्त्वका घाती
होना । मिथ्यात्वप्रकृतिकी तरह सम्यग्मिथ्यात्व
प्रकृतिके द्वारा समस्त सम्यक्त्वरूप और मिथ्यात्व-
रूपका घात सम्भव नहीं है । सर्वज्ञके द्वारा उपदिष्ट
तत्त्वोंमें रुचिका भी अंश रहता है । सर्वज्ञके द्वारा
उपदिष्ट तत्त्वोंमें रुचि और अरुचिरूप परिणामको
सम्यग्मिथ्यात्व कहते हैं ।]
§. १४८
६२. २ अल्पबहुत्वम् । उपशमकानामितरगुणस्थान-
वत्तिभ्योऽल्पत्वात् प्रथमतोऽभिधानम् । तत्रापि त्रय
उपशमकाः सकषायत्वादुपशान्तकषायेभ्यो भेदेन
निर्दिष्टाः । प्रवेशेन तुल्यसंख्याः सर्वेऽप्येते षोडशादि-
संख्याः । त्रयः क्षपकाः संख्येयगुणा उपशमकेभ्यो
द्विगुणा इत्येवमादिसंख्या संख्याविचारे विचारितमिह
द्रष्टव्यम् । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयता विशेषाधिकास्त-
त्संयमयुक्तानामुपशमकानामिव क्षपकाणामपि ग्रहणात् ।
संयतासंयतानां नास्त्यल्पबहुत्वमेकगुणस्थानवर्तित्वात्
संयतानामिव गुणस्थानभेदासम्भवादिति ।
[ उपशमक उपशमश्रेणिपर आरोहण करनेवाले
अन्य गुणस्थानवर्ती जीवोंसे अल्प होते हैं इसलिए
उनका प्रथम कथन किया है । उनमें भी तीन उप-
शमकोंको कषायसहित होनेके कारण उपशान्तकषायोंसे
भिन्न निर्दिष्ट किया है । प्रवेशकी अपेक्षा इन सभीकी
संख्या सोलह आदि समान है । तीन क्षपक संख्यात-
गुने हैं, उपशमकोंसे दूने हैं इत्यादि संख्याका संख्या-
विचारमें विचार किया है उसे ही यहाँ देख लेना
चाहिए । सूक्ष्मसाम्पराय संयमवाले विशेष हैं क्योंकि
सूक्ष्मसाम्पराय संयमसे युक्त उपशमकोंकी तरह
क्षपकोंको भी ग्रहण किया है । संयतासंयतोंमें अल्प-
बहुत्व नहीं है क्योंकि उनके एक ही गुणस्थान होता
है, संयतोंकी तरह उनमें गुणस्थानभेद नहीं है । ]
५१
§. १६४
मति······॥१२॥
६६.४ अवाग्घानात् अधस्ताद् बहुतरविषयग्रहणात् ।
अवच्छिन्नविषयत्वाद्वा । रूपिलक्षणविविक्तविषय-
त्वाद्वा ।
६६.७ स्वपरमनोभिर्व्यपदिश्यते यथा परमनस्थि-
तमर्थं मनसा परिविद्यत (परिच्छिद्यत) इति ।
६६.८ यदर्थं केवन्ते सेवां कुर्वन्ति । कस्येति चेत्,
केवलस्यैव संपन्नतत्प्राप्तिपरिज्ञाततदुपायस्यार्हदादेर्वा ।
६७.१ सुगमत्वात् सुखप्राप्यत्वात् ।
६७.२ मतिश्रुतपद्धतिः-मतिश्रुतानुपरिपाटी । तस्या
वचनेन श्रुतायाः सकृत्स्वरूपसंवेदनमात्रत्वं परिचि-
तत्त्वम् । अशेषविशेषतः पुनश्चेतसि तत्स्वरूपपरि-
भावनमनुभूतत्वम् ।
बहुबहुविध····॥१६॥
§ १९५
७९.५ अपरेषां निस्स्रुत इति पाठः । तत्र द्विः
सकारनिर्देशस्यायमर्थो मयूरस्य कुररस्य वेति स्वतः
परोपदेशमन्तरेणैव कश्चित् प्रतिपद्यते । येषां तु
निस्रुत इति पाठस्तेषां 'अपरः' प्रतिपत्तौ स्वरूपमेव
शब्दमेवाश्रित्य विशेषरूपतयानावधार्य प्रतिपद्यत इति
व्याख्या ।
§ २००
व्यञ्जनस्य ······॥१८॥
८१.१ व्यञ्जनं शब्दादिजातं शब्दादिसंघातः ।
८१. ३ अन्तरेणैवकारं—एवकारं विना ।
§ २०२
न चक्षु········॥१९॥
८२.२ अविदिकं—यन्मुखदिशम् ।

४०२ सर्वार्थसिद्धिः
§ २०६ § २१३
श्रुतं मतिपूर्वं·······॥२०॥ भवप्रत्यय·······॥२२॥
८३.४ उपादाय — आश्रित्य । ८७. ८ प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिरागमंतः । तथाहि, देवानां
८३.५ पर्यवदाते क्षेमे । तावत्—
§ २०७ सक्कीसाणा पढमं दोव्वं² च सणक्कुमारमाहिंदा ।
८४.२ द्रव्यादिसामान्यार्पणात् — द्रव्यक्षेत्रकाल- बम्हालांतव तइयं सुक्कसहस्सारया चउत्थीओ ॥
भावार्पणात् । पंचम माणदपाणद छट्ठीओ आरणाच्चुदाय पस्संति ।
८४.३ उत्प्रेक्षितं — कृतम् । तेषामेव — द्रव्यादी- णवगेवेज्जा सत्तंम³ माणुत्तरा सव्वलोयं तु ॥
नामेव । तथा नारकाणां—
§ २०८ रयणप्पहाए जोयणमेगं आहिबिसओ सुणेयव्वो ।
८४.८ सम्यक्त्वस्य — समीचीनत्वस्य । ज्ञाने तद- पुढवीदो पुढवीदो गाउदयद्धं⁴ परिहरंज्ञा ॥
पेक्षत्वात्-सम्यक्त्वसापेक्षत्वात् । तदुक्तम्— [ अवधिज्ञानकी हीनाधिकता आगमसे जाननी चाहिए ।
¹कारणकज्जविहाणं दीवपयासाम जुगवजम्मे वि । जो इस प्रकार है—देवोंमें सौधर्म ऐशान स्वर्गके देव
जुगवुप्पण्णं पि तहा हेऊ णाणस्स सम्मत्तं ॥ पहली पृथिवीपर्यन्त, सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके देव
§ २०९ दूसरी पृथिवीपर्यन्त, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर लान्तव कापिष्ठ
८४.१० आहितो धृतः स्थापितो वा । कृतसंगीतिः स्वर्गके देव तीसरी पृथिवीपर्यन्त, शुक्र-महाशुक्र, शतार,
—कृतसंकेतः । घट इत्युक्ते घकार-टकार-विसर्ज- सहस्रार स्वर्गके देव चतुर्थ पृथिवीपर्यन्त, आनत, प्राणत
नीयात्मकं शब्दं मतिज्ञानेन प्रतिपद्यते । ततो घट- स्वर्गके देव पाँचवीं पृथिवीपर्यन्त, आरण-अच्युत स्वर्गके
शब्दात् घटार्थं श्रुतज्ञानेन, तस्मादपि घटार्था- देव छठी पृथिवीपर्यन्त, नवग्रैवेयकोंके देव सातवीं
ज्जलधारणादिकार्यम् । तथा चक्षुरादिविषयाद्भू- पृथिवीपर्यन्त और अनुदिश अनुत्तरवासी सर्वलोकको
मादेः । तत्रापि धूमदर्शनं मतिज्ञानं तस्मादग्निविषयं जानते हैं । तथा नारकोंमें रत्नप्रभा पृथिवीमें एक
ज्ञानं श्रुतज्ञानम् । तस्मादपि दाहादिकार्यज्ञानं योजन क्षेत्र अवधिज्ञानका विषय है । आगे प्रत्येक
श्रुतमिति । पृथिवीमें आधा-आधा कोस कम करते जाना चाहिए ।
§ २११ § २१५
८५.१० आरातीयाऽवान्तरः । क्षयोपशमनिमित्तः·······॥२३॥
§ २१२ ८८. २ देशघातिस्पर्धकानां किं पुनः स्पर्धकम्
८६. ३ व्याक्रियेतां — व्युत्पाद्यताम् । इति चेत्, कर्मपुद्गल शक्तीनां क्रमवृद्धिः क्रमहानिश्च
स्पर्धकम् । शान्तः — उपशान्तः । उन्मुग्धैत्यादि,
उन्मुग्धस्य विवेकपराङ्मुखस्य, प्रश्ने सति आदिेशि-
पुरुषवचनं यथा तत्रैवातिपतति नाभिहितेऽर्थे तेनाग्रे
प्रवर्त्यते । लिङ्गवत्—लाञ्छनवत् ।
रूपि·······॥२७॥
१. कारणकार्यविधानं समकालं जायमानयोरपि हि । दीपप्रकाशयोरिव सम्यक्त्वज्ञानयोः सुघटम् ॥
—पुरुषार्थ०, ३४ । २. विदियं ०००।—मूलाचार १।४८ । ३. ०००सत्तम अणुदिस अणुत्तराय लोगं तु ॥
—मूलाचार १।४९ । ४. ०००गाऊ अद्धद्ध परिहाणी ॥—मूलाचार, १।५२ ।

परिशिष्ट २ ४०३
न च पुद्गलद्रव्यसंबन्धजीवानां रूपित्वाभिधाने §. २७५
प्रवचनविरोधः । तत्रापि तेषां तथाभिधानात् । ११३. १८ नोकर्मपरिवर्तनम् - औदारिकवैक्रियिका-
उक्तञ्च- हारकलक्षणानां त्रयाणां शरीराणामाहारशरीरेन्द्रियान-
'बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवदि तस्स णाणत्तं । प्राणभाषामनोलक्षणषट्पर्याप्तीनां च योग्या ये
तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो हवदि जीवाणं ॥' पुद्गला एकजीवेन एकस्मिन् समये गृहीताः
स्निग्धादिस्वरूपैस्तीव्रमन्दं मध्यभावेन चेति । तेषां
नैगम............॥३३॥ फलदानसामर्थ्यस्वरूपनिरूपणम् । तेषामल्पकालत्वात् ।
वस्तुनि - जीवाद्यौ । अनेकात्मन्यनेकरूपे। अविरोधेन- द्वितीयादिसमयेषु यथावस्थितास्तीव्रादिभावेन स्थिता
प्रतीत्यनतिक्रमेण हेत्वर्पणात् - द्रव्यपर्यायार्पणात् । निर्जीर्णाः फलमनुभूय त्यक्ताः । पश्चाच्चे कदाचनापि
साध्यविशेषस्य-नित्यत्वादेः । याथात्म्यप्रापणप्रवण- शरीरत्रयादिरूपतया न गृहीतास्तानेवागृहीतान् गृहीत्वा
प्रयोगो यथावस्थितस्वरूपेण प्रदर्शनसमर्थव्यापारो नयो त्यजत्यवान्तरे स पूर्वान् मिश्रकांश्च गृहीतानपरिगणय्य
वस्त्वेक-देशग्राही ज्ञातुरभिप्रायः । उक्तं च - यावत्तेषामेवानन्तवारत्वरत्वं पश्चादेकवारं मध्ये
मिश्रकान् स्वगृहीतानादाय त्यजति । पुनरप्यगृहीताने
'अर्थस्यानेकरूपस्य धीः प्रमाणं तदंशधीः । वानन्तवारानादाय त्यजति। पुनरप्येकवारं मिश्रकानेव
स्यान्नयोऽर्थान्तरापेक्षी दुर्नयस्तन्निराकृतेः ॥' तावद्यावन्मिश्रकाणामप्यनन्तवारत्वं पश्चाद् गृहीताने-
अनभिनिवृत्तार्थः - अनिष्पन्नार्थः । वकवारमादाय त्यजति । अनेनोक्तविधिनाऽरगर्त-
भ्रमणन्यायेन मिश्रकाननन्तवारान् गृहीत्वा गृहीता-
उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वात् । नैगमात् खलु संग्रहोऽ- नेवादाय त्यजति । यावत्तेषामप्यनन्तवारत्वं पश्चात्
ल्पविषयः, सन्मात्रग्राहित्वात्, नैगमस्तु भावाभाव- एव ये प्रथमतौ गृहीतास्तेनैव स्निग्धादितीव्रादि-
विषयत्वाद् बहुविषयः । यथैव हि भावे संकल्पस्तथा- प्रकारेण तस्यैव नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्
भावेऽपि । एवमुत्तरत्रापि योज्यम् । अर्थमात्रः- समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते । तदेवाद्धित-
प्रयोजनलेशः । मर्धपुद्गलावर्त इति । कर्मद्रव्यपरिवर्तनं संसारयोग्यं
बहुस्थितिकं कर्म बध्नाति । तस्यापक्वपाचनलक्षणो-
इति प्रथमोऽध्यायः समाप्तः । दीरणापेक्षया समयाधिकामवालिकामतीत्येत्युक्तम् ।
पूर्ववत् प्रक्रिया द्रष्टव्या ।
§. २७६
औपशमिक क्षायिकौ........॥१॥
११७. ११ क्षेत्रपरिवर्तनम् । अनन्तमानावच्छिन्नवन-
स्पतिकायः साधारणशरीराहारोच्छ्वासनिःश्वास-
§. २५३ मरणोत्पादा निगोताः । जघन्यावगाहप्रतिपादनार्थं
सूक्ष्म-अपर्याप्तकविशेषणम् । तेषामपि परस्परतः
१०५. ११ औपशमिकमादौ लभ्यते । तदुक्तम्--
तरतमभावसद्भावात् सर्वजघन्यप्रदेशशरीरत्वविशे-
'पढमप्पढमं णियदं पढमं विदियं च सव्वकालेसु । षणम् । स इत्थंभूतो जीवो मेरोरधोभागे गोस्त-
खाइयसम्मत्तं पुण जत्थ जिणा केवलीकाले ॥' नाकाराष्टलोकमध्यप्रदेशान् स्वशरीरमध्यप्रदेशान्
द्रव्यतः जीवतः । संसारिक्षायिकसम्यग्दृष्टिजीवानां कृत्वाऽपन्नः । सर्वजघन्यप्रदेशशरीरस्याष्टप्रदेशव्यापित्वं
तत औपशमिकसम्यग्दृष्टिजीवेभ्योऽसंख्येयगुणत्वात् । विरुद्धमिति चेत् न, तच्छरीरस्यासंख्याताकाश-
प्रदेशावगाहित्वात् । क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्वा मृतःस
संसारिणः.........॥१०॥
१. सर्वार्थसिद्धिमैं उद्धृत । २. अकलंकदेवकृत अष्टशतीमें उद्धृत, अष्टस०, पृ० २९० ।
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एवं पुनस्तेनैव सर्वजघन्यशरीराल्लोकमध्यप्रदेशा-
वगाहेन द्विरुत्पन्नो निरन्तरम् । अन्यत्रोत्पद्य वा तत्रै-
वाधिकामवगाहेन वा उत्पद्यमानं न गणयित्वा तथा
त्रिस्तथा चतुरिति एवं यावतो विस्तारोत्सेधावगाहतः
समचतुरस्रोत्सेधाङ्गुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाश -
प्रदेशास्तावतो वारान् तत्रैवोत्पद्य पुनर्व्याप्तिक्षेत्रापरि-
त्यागेनाभिनवैकेकप्रदेशादिकावगाहेनैव सर्वलोक-
व्याप्तिः । नन्वेवं लोकपरिमाणं तत् शरीरं स्यादिति
चेत् न, पूर्वपूर्वव्याप्ताकाशप्रदेशपरित्यागेन तद् व्याप्त्य-
भ्युपगमात् ।
§ २७७
११८. ३ कालपरिवर्तनम् । प्रथमद्वितीयाद्युत्सर्पि-
णीनां क्रमेण प्रथमद्वितीयादिसमयेषूत्पद्यते यावद्दश-
सागरोपमकोटीकोटिपरिमाणोत्सर्पिणी परिसमाप्ता

परिशिष्ट २ ४०५
§ २९०
पञ्चेन्द्रियाणि.........॥१९॥
१२४. ४ कर्मेन्द्रियाणां वाक्पाद-पाणि-पायूपस्थान-
लक्षणानाम् ।
§ २९४
निर्वृत्ति.........॥२६॥
१२५. २ उत्सेधाङ्गुलपरिभाषानिष्पन्नं यस्यैकस्मिन्
प्रमाणाङ्गुले पञ्चशतानि भवन्ति ।
§ ३१६
विग्रहवती.........॥२८॥
१३२. १२ सर्वोत्कृष्टविग्रहनिमित्तनिष्कुटक्षेत्रे सर्वो-
त्कृष्टविग्रहस्त्रिवक्रता, तस्य निमित्तं यन्निष्कुटक्षेत्रं
वक्रक्षेत्रम् ।
§ ३२०
एकं द्वौ.........॥३०॥
१३३. १० यथेच्छातिसर्गः यथेष्टप्रवृत्तिः ।
§ ३२२
संमूर्च्छ.........॥३१॥
१३४. ४ उपेत्य-गत्वा पद्यते-उत्पद्यते ।
§ ३२४
सचित्त.........॥३२॥
१३५. १३ तद्भेदाश्चतुरशीतिसहस्रसंख्याः । तथाहि
—नित्येतरनिगोतस्य पृथिव्यप्तेजोवायुकायिकानां च
प्रत्येकं सप्त सप्त योनिलक्षाणि। वनस्पतिकायिकानां दश।
द्वित्रिचतुरिन्द्रियाणां प्रत्येकं द्वे द्वे। सुरनारकतियंश्चां
प्रत्येकं चत्वारि चत्वारि । मनुष्याणां चतुर्दशेति ॥
तदुक्तम्—
'णिच्चिदरधादु सत्तय तरु दस वियलिंदिएसु छच्चेव ।
सुर-णिरय-तिरिय चउरो चोद्दस मणुए सदसहस्सा ॥'
[वारसअणु० गा० ३५]
औदारिक.........॥३६॥
§ ३३१
१३७. ८ अष्टगुणैश्वर्ययोगात् अणिमा-महिमा-लघिमा-
प्राकाम्य-प्राप्ती शित्व-वशित्व-कामरूपित्वलक्षणात् ।
प्रदेशतो.........॥३८॥
§ ३३५
१३८. ८ को गुणाकारः । पल्योपमासंख्येयभागः ।
तथाहि-औदारिकात् पल्योपमासंख्येयभागाधिकं
वैक्रियिकं तस्मादप्याहारकम् ।
अनन्तगुणे.........॥३९॥
§ ३३७
१३८. १३ को गुणाकारोऽभव्यानन्तगुणः सिद्धानन्त-
भागः । अत्रोभयोरेकार्थत्वं यदेव ह्यभव्यानामनन्त-
गुणत्वं तदेव सिद्धानामनन्तभागत्वमिति । अनेना-
जघन्योत्कृष्टं चानन्तमानमत्र द्रष्टव्यम् ।
निरुपभोगः.........॥४४॥
§ ३४७
१४०. १२ इन्द्रियप्रणालिकया इन्द्रियद्वारेण ।
इन्द्रियलब्धौ-इन्द्रियशक्तौ ।
शुभं.........॥४९॥
§ ३५७
१४३. ४ प्रत्याम्नायः पुरभिधानम् ।
§ ३६५
१४५.६ चरमदेहस्योत्तमविशेषणात्तीर्थंकरदेहो गृह्यते ।
ततोऽन्येषां चरमदेहानामपि गुरुदत्तपाण्डवा-
दीनामग्न्यादिना मरणदर्शनात् । उक्तेभ्योऽन्येषां
विषादिनापवर्त्यमायुः उक्तं च —
'विसवेयणरत्तक्खय-भय सत्थगहणसंकिलेसेहिं ।
आहारुस्सासाण णिरोहओ छिज्जए आउ ।'
—[ गो० कर्म० गा० ५७ ]
[ चरम शरीरके साथ उत्तम विशेषण लगाने से
तीर्थंकरका शरीर ग्रहण किया जाता है क्योंकि
चरमशरीरी भी गुरुदत्त, पाण्डवों आदिका अग्नि
आदिसे मरण देखा गया है। इनसे जो अतिरिक्त

४०६ सर्वार्थसिद्धि
होते हैं उनकी आयुका विषादिके द्वारा घात होता
है। कहा है—विष, वेदना, रक्तक्षय, भय, शस्त्रघात,
संक्लेश, तथा आहार और श्वासोच्छ्वासके रुकनेसे
आयु छिद जाती है ] ।
इति द्वितीयोऽध्यायः ।
तासु त्रिंश.........॥२॥
§ ३६१
१४९. ५ इतरे विशेषा नरकप्रस्ताराणां रचना-
प्रमाणादिलक्षणो लोकानुयोगतः लोकानुयोगनाम्न
आगमविशेषात् ।
परस्परो........॥४॥
§ ३७२
१५१. ६ भिण्डिवालों—गोफणा ।
संक्लिष्टा........॥५॥
§ ३७५
१५२. २ कूटशाल्मलिः कृत्रिमशाल्मलिः । अम्बरीषो
भ्राष्ट्रः ।
तद्विभाजिन्नः........॥११॥
§ ३८७
१५६. ६ क्षुद्रहिमवान् लघुहिमवान् । हरिवर्षस्य
हरिक्षेत्रस्य ।
हेमार्जुन...... ॥१२॥
§ ३८९
१५६. १३ चीनपट्टं—शुभ्रपट्टोलकम् ।
पद्म........॥१४॥
§ ३९५
१५७. १२ प्राक् पूर्वः । प्रत्यक् पश्चिमः । उदक्
उत्तरः । अवाक् दक्षिणः ।
§ ३९९
१५८. ५ जलतलाज्जललोपरितनभागात् । तावद्बहु-
लपत्रप्रचयं क्रोशद्वयस्थौल्योपेतपत्रप्रचयम् ।
द्विर्धातकी.........॥३३॥
§ ४३०
१६६. ५ टंकच्छिन्नतीर्थः टंकच्छिन्नतटः ।
भरतै........॥३७॥
§ ४३७
१६९. १० नन्वशुभकर्मणः सप्तमनरकप्रापणस्य
भरतादिष्वेवार्जनं । मिथ्याद्ययुक्तं स्वयंभूरमण-
जलधिज्मत्स्यानां सप्तमनरकप्रापकाशुभकर्भारम्भ-
कत्वाभावप्रसंगात् । तदयुक्तं तत्परभागस्य कर्म-
भूमित्वात् । तथाहि—स्वयंभूरमणद्वीपमध्ये तद्दीपार्ध-
कारी मानुषोत्तराकारः स्वयंप्रभनगवरो नाम नगो
व्यवस्थितस्तस्यार्वाग्भाग आमानुषोत्तराद् भोगभूमि-
भागः । तत्र चतुर्गुणस्थानवर्तिनस्तिर्यञ्चः सन्ति । ततः
परतः आलोकान्तात् कर्मभूमिभागः । तत्र पञ्चगुण-
स्थानवर्तिनः प्रकृष्टशुभाशुभकर्भारम्भकास्ते सन्तीति
कर्मभूमित्वम् । कथमम्यथा तत्र पूर्वकोट्यायुरर्वाग्भागे
चासंख्येयवर्षायुरिति । मनुष्यक्षेत्रप्रधानतयाभिधा-
नाद्वा न दोषः ।
[ शंका—सातवें नरकमें ले जानेवाले अशुभकर्मका
उपार्जन भरत आदिमें ही होता है यह कथन मिथ्या
होनेसे अयुक्त है। क्योंकि ऐसा कहनेसे स्वयंभूरमण
समुद्रमें वर्तमान महामत्स्यके सातवें नरकमें ले जाने-
वाले अशुभ कर्मके उपार्जनके अभावका प्रसंग
आता है ।
उत्तर—ऐसा कहना अनुचित है, क्योंकि स्वयंभू-
रमणका पर भाग कर्मभूमि है। इसका खुलासा इस
प्रकार है—स्वयंभूरमण द्वीपके मध्यमें उस द्वीपको
दो भागोंमें विभाजित करनेवाला, मानुषोत्तर पर्वतके
आकार स्वयंप्रभ नामक पर्वत स्थित है। उसके
पूर्वभागमें मानुषोत्तर पर्यन्त भोगभूमि है। वहाँ
चारगुणस्थानवाले तिर्यंच रहते हैं। स्वयंप्रभ
पर्वतसे आगेवाले भागमें लोकान्त तक कर्मभूमि है ।
वहाँ पाँच गुणस्थानवाले प्रकृष्ट शुभ और अशुभ

परिशिष्ट २ [Page 407] ४०७
कर्मोंका उपार्जन करनेवाले तिर्यंच रहते हैं अतः सौधर्म.........।।१९।।
वहाँ कर्मभूमि है । यदि ऐसा न होता तो वहाँ §. ४७९
पूर्वकोटिकी आयु और उससे पूर्वके भागमें असंख्यात १८४. १२ सर्वमन्यद् विमानरचना प्रमाणादिकं
वर्षकी आयु कैसे होती । अथवा उक्त कथन मनुष्य- लोकानुवेदाद्वेदितव्यम् ।
क्षेत्रकी प्रधानतासे किया है इसलिए कोई दोष स्थिति.........।।२०।।
नहीं है । ] वसनं वस्त्रं ।
नृस्थिती.........।।३८।। गति.........।।२१।।
§ ४३९ ‘दो दो चउ चउ दो दो तिय तिय चोद्दस य अंग
१७०. ९ उत्सर्पिण्या अन्त्यचक्रवर्तिनः अवसर्पिण्याश्च उस्सेहो ।
प्रथमचक्रवर्तिनः अङ्गुलप्रमाणं प्रमाणाङ्गुलम् । सत्त छप्पं च चउरो हत्यादो अद्धद्ध हीणादो ॥’
अविकवालाः—मेषकेशाः । पीत.........।।२२।।
इति तृतीयोऽध्यायः । औत्तरपदिकं ह्रस्वत्वं यथो द्रुतायाः तपरकरणे मध्य-
मविलम्बितयोरुपसंख्यानमिति । भरते हि द्रुतरीतिः
लक्षणसूत्रं ‘द्रुतौ वैस्त’ इति । तत्र द्रुतौवै रिति सिद्धे
तपरकरणं व्यर्थमतस्तस्यां लक्षणसूत्रे तपरकरणे
मध्यविलम्बितयोरुपसंख्यानसंग्रहो भवति । अत्र च
इन्द्र...॥४॥ यथोत्तरपदिकं ह्रस्वत्वमेवं पीतपक्षादावपि द्रष्टव्यम् ।
§. ४४९ इति चतुर्थोऽध्यायः ।
१७५. ९ अर्थचरो अर्थचिन्तकः । आरक्षिकः कोट्ट-
पालः । पदात्यादीनि सप्तानीकानि हस्त्यश्वरथपदा-
तिवृषभगन्धर्व-नर्तकीलक्षणानि । उत्सर्गेण सामान्येन ।
पूर्व.........॥६॥ अजीव.........॥१॥
§. ४६३ §. ५२७
१७६. ८ सप्तपर्णः—पर्वणि पर्वणि सप्त पर्णानि १९७.२ जीवलक्षणाभावमुखेन जीवलक्षणाभाव-
यस्यासौ सप्तपर्णो वृक्षविशेषः। तथा अष्टापदः— द्वारेण ।
पङ्क्तौ पङ्क्तौ अष्टौ पदानि यस्यासौ अष्टापदो द्यूत- द्रव्याणि......।।२।।
फलकः । §. ५२९
तत्कृतः.........।।१४।। १९७.१० गुणसंद्रावो गुणसंघातः ।
§. ४६९ §. ५३०
१८१. ३ क्रियाविशेषपरिच्छिन्नः—आदित्यगमनेन १९८. ४ अद्यावापार्थं (अध्यारोपणार्थं) समुच्चयार्थम्
परिच्छिन्नः । अन्यस्य जात्यादेः अपरिच्छिन्नस्य जीवाश्च .........।।३।।
कालनैयत्यैनानवधारितस्य परिच्छेदहेतुः ।

१. पा० महाभा०, १।१।१।६९ ।

"?
Is it "पुद्गलानाम्,"?
Yes, comma right after 'म्'.
Line 4:
"पपत्तेः रूपादिमत्कार्योपपत्तेः ।"
Line 5:
"रूपिणः........॥५॥"
(Dots: count approx 8 dots, "........॥५॥")

Line 6:
"§. ५३५"
Line 7:
"२०१. २ तद्विकल्पः स्कन्धपरमाणुरूपपुद्गलभेदः ।"
Line 8:
"उपरिष्टात् अग्रे ।"
Line 9:
"आकाशस्य........॥९॥"

Line 10:
"§. ५४३"
Line 11:
"२०४. १ पूर्ववद् धर्मादीनामजघन्योत्कृष्टासंख्येय-"
Line 12:
"प्रदेशवत्, अस्याप्याकाशस्यापि अजघन्योत्कृष्टानन्त-"
Line 13:
"प्रदेशकल्पना अवसेया ।"
Line 14:
"लोकाकाशे........॥१२॥"
Line 15:
"एवंभूतनयापेक्षया निश्चयनयापेक्षया ।"
Line 16:
"एक प्रदेश........॥१४॥"
Wait, is there a space between एक and प्रदेश?
Yes: "एक प्रदेश........॥१४॥"

Line 17:
"§.

परिशिष्ट २ ४०९
§ ६०२
२३३. ९ पूर्वोत्तरभावप्रज्ञापननयो व्यवहारनयः ।
सोऽनन्तं.........॥४०॥
§ ६०४
२३५. ६ परमनिरुद्धो बुद्ध्या अविभागभेदेन
भेदितः ।
इति पञ्चमोऽध्यायः ।
काय.......॥२॥
§ ६१०
२३८. ८ औदारिकादिसप्तविधः कायः औदारिकौ-
दारिकमिश्रवैक्रियिकवैक्रियिकमिश्राहारकाहारकमिश्र -
कार्मणलक्षणो । मिश्रत्वं च कायस्यापरिपूर्णत्वम् ।
शुभ.........॥३॥
§ ६१४
२३९. १२ शुभयोगस्यापि ज्ञानावरणादिबन्धहेतु-
त्वाभ्युपगमात् । यथा उपोषितादेः पठतो विश्रम्य-
तामिति वागादियोगस्य ।
सकषाय.........॥४॥
§ ६१६
२४०. ८ ईरणमीर्या यमाह योग इति कायादि-
व्यापार इत्यर्थः । अस्यापि तात्पर्यमाह गतिरित्यर्थः ।
कायादिवर्गणालम्बी आत्मप्रदेशपरिस्पन्द इत्यर्थः ।
सैव न कषायादिद्वारमास्रवः मार्गो यस्य तत्तद्द्वारकं
कर्म ।
इन्द्रिय.........॥५॥
§ ६१८
२४१. १५ विशसनं मारणम् ।
निवर्तना.........॥९॥
५२
§ ६२६
२४५. ४ अनाभोगनिक्षेपः पुनरनालोकितरूपतयोप-
करणादिस्थापनम् ।
तत्प्रदोष.......॥१०॥
§ ६२८
२४५. ९ अनभिव्याहरतः । वचनमनुच्चारयतः ।
दुःखशोक........॥१२॥
§ ६३०
२४६. ७ वैक्लव्यविशेषो दीनत्वविशेषः । आवि-
लान्तःकरणस्य कलुषितान्तःकरणस्य । तीव्रानु-
शयो अतिशयेन पश्चात्तापः ।
§ ६३०
२४७. ३ आस्थीयते ( आस्तीर्यते ) प्रतिज्ञायते ।
§ ६३०
२४७. ८. न दुःखं न सुखमित्यादि । चिकित्सिते
हेतुः—शस्त्रादिः, स न दुःखं सुखं वा-दुःखरूपः
सुखरूपो वा स्वरूपेण न भवति जडत्वात् । चिकि-
त्सायां तु युक्तस्य वैद्यादेर्यदि क्रोधादिरस्ति तदा दुःखं
स्यात् दुःखेहेत्वधर्मोपार्जनत्वात् । एवं मोक्षसाधने हेतुः
उपवासलोचादिः, स स्वरूपेण दुःखरूपः सुखरूपो वा
न भवति । यस्तु तेन युक्तो गुरुशिष्यादिः स पूर्ववत्
सुखदुःखरूपो वेदितव्यः क्रोधादिसद्भावासद्भावाभ्याम् ।
भूत.........॥१२॥
§ ६३२
२४८. ३ अक्षीणाशयः—गृहादावनिवृत्ताभिप्रायः ।
अवरोधः ( अनुरोधः )—स्वीकारः ।
कषायोदय.........॥१४॥
§ ६३६
२४९. १३ अतिसन्धानं-वञ्चनम् ।
§ २३६
२५०. १ व्यपरोपणं विनाशनम् । पराङ्गनावस्कन्दः
परभार्यापहारः ।

४१० सर्वार्थसिद्धि
बह्वारम्भ••••••••॥१५॥
§. ६३८
२५०. ८ अजस्रं—अनवरतम् ।
अल्पारम्भ••••••••॥१७॥
§. ६४२
२५१. ४ तद्व्यासः—प्रपञ्चः ।
सरागसंयम••••••••॥२०॥
§. ६४८
२५२. ५ चारकनिरोधबन्धनबद्धेषु चारकेण बन्धन
विशेषेण निरोधबन्धनबद्धेषु—गाढबन्धनबद्धेषु ।
तद्विपरीत••••••॥२३॥
§. ६५४
२५३. १२ संभ्रमसद्भावोपनयन संभ्रमः—आदरः,
सद्भावेन—अमायया उप—समीपे गमनम् ।
दर्शनविशुद्धि••••••॥२४॥
§. ६५६
सत्कारः पूजा । अनिर्गृहीतवीर्यस्य प्रकटीकृतस्व-
सामर्थ्यस्य ।
२५४. ७ प्रत्यूहे विघ्ने ।
इति षष्ठोऽध्यायः ।
हिंसानृत••••••••॥१॥
§. ६६४
संभिन्नबुद्धिः विपरीतम

[Page header]
परिशिष्ट २ ४११

[स्तम्भ १]
यन्त्यामनेन भाण्डेन महान् लाभ इति तदतिक्रम्य
गच्छति ।
§. ७१९
२७९. ४ तदेवोभयं—प्रहासाशिष्टवागुभयं दुष्ट-
कायकर्मप्रयुक्तं भण्डिमाप्रदर्शककार्यव्यापारविशिष्टं ।
परत्र उपहसनीय प्राप्यन्तरे ।
§. ७२१
२८०. ४ क्षुद्भ्यर्दितत्वात्—बुभुक्षापीडितत्वात् ।
§. ७२२
२८०. ८ द्रवो वृष्यो वाभिषवः—द्रवो रात्रिचतुः-
प्रहरैः क्लिन्न ओदनादिः । वृष्यं इन्द्रियबलवर्धनं
माषविकारादि । दुष्पक्वस्य प्रासुकत्वात्तत्सेवने को
दोषः । इति चेदुच्यते दुष्पक्वोऽक्लिन्नस्तत्सेवने
चोदरपीडादिप्रादुर्भावादग्न्यादिप्रज्वालने महान्संयम
इति तत्परिहारः श्रेयान् ।
§. ७२३
२८०. १३ परव्यपदेशः कथमतीचारः । इति
चेदुच्यते, लोभावेशादतिथिवेलायामपि द्रव्योपायं
परित्यक्तुमशक्नुवताऽन्यदातृहस्तेन दाप्यते इति ।
§. ७२८
२८२. १ विधिः प्रतिग्रहादिक्रमः ।
^१पडिगहमुच्चट्ठाणं पादोदगमच्चणं च पणमं च ।
मणवय णकायसुद्धा एसणसुद्धाए णवविहं पुण्णं ॥
—[ वसु० श्रा० २२४ ]
इति सप्तमोऽध्यायः ।
§. ७३२
२८४. ७ षट्कायः षड्जीवनिकायः । चत्वारो
मनोयोगाः सत्यासत्योभयानुभयविकल्पात् । तथा

[स्तम्भ २]
वाग्योगाश्च । एवं काययोगा औदारिकौदारिकमिश्र-
वैक्रियकवैक्रियकमिश्रकार्मणभेदात् पञ्च । शुद्धचष्टकं
शुद्धया उपलक्षितमष्टकं शुद्धयष्टकम् । किं पुनरष्टक-
मिति चेत् । मनोवाक्काय-भैक्ष्यांपथशयनासनविनय-
प्रतिष्ठापनलक्षणम् ।
§. ७३४
२८५. ६ जठराग्न्याशयात् जठराग्निवशात् । अहस्तः
अबाहुः । मिथ्यादर्शनाद्यावेशात् मिथ्यादर्शनाद्याग्रहात्
आर्दीकृतस्य सकषायीकृतस्य । अविभागेन एका-
कारेण ।
§. ७३६
२८७. ११ अपरिणद उपशान्तकषायः । उच्छिण्णः
क्षीणकषायादिः । अथवा अपरिणदो—नित्यैकान्त-
वादी । उच्छिण्ण-क्षणिकैकान्तवादी ।
§. ७४९
२९२. ५ सरूकर्मापेक्षया—कर्मसत्तामात्रापेक्षया ।
निरुत्सुकः पराङ्मुखः । शुभपरिणामनिरुद्धस्वरसं—
शुभपरिणामनिराकृतफलदानसामर्थ्यं । सामिशुद्धस्व-
रसं ईषत्प्रक्षालितसामर्थ्यम् ।
§. ७५५.
२९५. ११ शरीरनिर्वृत्तिः—शरीरनिष्पत्तिः । अंगो-
पांगः तत्राष्टावङ्गानि ।
उक्तं च—
णलया बाहू या तहा णियंवपुट्ठी उरो य सीसं च ।
अट्ठेवदु अंगांइ सेसे^२ उवंगा दु देहस्स ॥
कर्णनासिकानयनोत्तराधरोष्ठाङ्गुल्यादीन्युपाङ्गानि ।
न्यग्रोधो वटवृक्षः । स्वातिः वल्मीकः । हुण्डसंस्थान-
मविच्छिन्नानवयवसंस्थानम् । असृक्पाटिका चिंचा ।
§ ७५५
२९७. ४ स्वयंकृतोद्वन्धन—उद्वेगाद् गले पाशं
बद्ध्वा मरणार्थं वृक्षादावलम्बनम् । मरुत्पतनं—
प्राणापातनिरोधनं गिरि पतनं च ।

[पाद-टिप्पणी]
१. वसु० श्रा०, २२४ । २. देहे सेसा उवंगाई ।-कर्म० गो०, गा० २८ ।

४१२ सर्वार्थसिद्धि
§ ७५५
२९७. १० साधारणं शरीरमनन्तकायिकानाम् ।
तदुक्तम्—
“साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च ।
साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं एदं ॥
गूढसिरसंधिपव्वं समभंगमहीरुहं च छिन्नरुहं ।
साहारणं शरीरं तव्विवरीयं च पत्तेयं ॥”
§ ७५९
दान........॥१३॥
३००. १ भेदनिर्देशः—षष्ठीनिर्देशः ।
§ ७६१
आदितस्तिसृणां........॥१४॥
३००. १२ अन्येषामप्यागमात् संप्रत्ययः । तथा हि—
एक-द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियाणामसंज्ञिपर्याप्तकानां यथासंख्यं
प्रत्येकं त्रिगुणितसप्तविभक्त एक-पञ्चविंशति-पञ्चाशच्छ-
तसहस्रसागरोपमाणि । तदुक्तम्—
'एइंदिय वियलिंदिय-असण्णिपज्जत्तयाण बोधव्वा ।
एगं तह पणुवीसं पंचासं तह सयसहस्सं च ॥
तिहयं सत्तविहत्तं सायरसंखा ठिदी एसा ॥'
तेषां चापर्याप्तकाना मियमेव स्थितिरेकेन्द्रियाणां पल्यो-
पमासंख्येयभागोना । शेषाणां संख्येयभागोना ।
उक्तं च—
'अप्पजत्ताण पुणो थावर वियलिंदियादीणं ।
ठिदि एसा परिहीणा पल्लासंखेयसंखभागेहि ॥
अंतोकोडाकोडी सण्णी अपज्जत्तयस्स णारयव्वा ।
दंसणणाणावरणे वेदे तह अंतराये य ॥'
[ अन्य जीवोंके आगमसे जानना चाहिए । वह इस
प्रकार है—एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय
और असंज्ञी पर्याप्तकोंके क्रमानुसार प्रत्येकके तीनसे
गुणित और सातसे भाजित एक सागर, पच्चीस
सागर, पचास सागर, सौ सागर और हजार सागर
प्रमाण स्थिति जाननी चाहिए । कहा भी है—एकेन्द्रिय,
दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, और असंज्ञी पंचेन्द्रिय
पर्याप्तकके तीनसे गुणित और सातसे भाजित एक
सागर, पच्चीस सागर, पचास सागर, सौ सागर और
एक हजार सागर प्रमाण स्थिति जाननी चाहिए ।
आशय यह है कि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्या-
दृष्टिके मोहनीय कर्मका उत्कृष्टबन्ध सत्तर कोड़ाकोड़ी
सागर प्रमाण होता है किन्तु एकेन्द्रिय पर्याप्तकके एक
सागर प्रमाण, दोइन्द्रिय पर्याप्तकके पच्चीस सागर
प्रमाण, तेइन्द्रिय पर्याप्तकके पचास सागर प्रमाण,
चौइन्द्रिय पर्याप्तकके सौ सागर प्रमाण और असंज्ञी

परिशिष्ट २ ४१३
[ मोहनीयकर्मकी उत्कृष्टस्थिति अन्य जीवोंके
आगमके अनुसार जानना चाहिए। वह इस प्रकार
है—एकेन्द्रिय आदि जीवोंके मोहनीयकी उत्कृष्ट
स्थिति एक सागर, पच्चीस सागर, पचास सागर,
सौ सागर और एक हजार सागर होती है। इतना
विशेष है कि मोहनीयकी इस स्थितिमें सातसे गुणा
और सातसे भाग देना चाहिए । अपर्याप्तक जीवोंके
उक्त स्थिति पूर्ववत् पल्यके असंख्यातवें भाग और
संख्यातवें भाग कम जानना । ]
विंशतिर्नाम.........॥१६॥
§ ७६५
३०१. ८ इतरेषां यथागमम्—या पूर्वं चतसृणां
कर्मप्रकृतीनां स्थितिरुक्ता सा न त्रिगुणा किन्तु द्विगुणा
कर्तव्या ततो नामगोत्रयोर्भवति । शेषं पूर्ववत् ।
[ अर्थात् पर्याप्तक एकेन्द्रिय जीवके नाम और गोत्र-
कर्मकी उत्कृष्टस्थिति एक सागरके सात भागोंमें से
दो भाग प्रमाण है। पर्याप्तक दो इन्द्रिय जीवके
पच्चीस सागरके सात भागोंमें से दो भाग है। पर्याप्तक
तीन इन्द्रिय जीवके पचास सागरके सात भागोंमें से
दो भाग है। पर्याप्तक चार इन्द्रिय जीवके सौ सागर-
के सात भागोंमें से दो भाग है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय
पर्याप्तक जीवके हजार सागरके सात भागोंमें से दो
भाग है। इनके जघन्य स्थिति पूर्ववत् पल्यके
असंख्यातवें भाग और संख्यातवें भाग कम जाननी
चाहिए । ]
त्रय.........॥१७॥
§ ७६७
३०१. १२ शेषाणामागमतः, तथाहि—असंज्ञिनः
स्थितिरायुषः पल्योपमासंख्येयभागः, तिर्यगसंज्ञी हि
स्वर्गे नरके वा पल्योपमासंख्येयभागमायुर्बध्नाति ।
एकेन्द्रियविकलेन्द्रियास्तु पूर्वकोटिप्रमाणं, पश्चाद्विदेहा-
दावुत्पद्यन्ते ।
[ असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके आयु कर्मकी
उत्कृष्ट स्थिति पल्यके असंख्यातवें भाग है क्योंकि
तिर्यंच असंज्ञी स्वर्ग या नरककी पल्योपमके
असंख्यातवें भाग आयु का बंध करता है। एकेन्द्रिय
और विकलेन्द्रिय जीव पूर्वकोटि प्रमाण आयुका
बन्ध करते हैं। पीछे विदेह आदिमें उत्पन्न होते हैं ।]
अपरा.........॥१८॥
§ ७६९
३०२. ४ सूक्ष्मसाम्पराये इति वाक्यशेषः ।
विपाकः ...॥२१॥
§ ७७४
३०३. ३ स्वमुखेन मतिज्ञानावरणं मतिज्ञानावरण-
रूपेणैव । परमुखेन श्रुतज्ञानावरणरूपेणापि
भुज्यते ।
§ ७७५
३०३. ८ प्रसंख्यातोऽन्वर्थः । अप्रसंख्यातोऽन्वर्थः ।
स यथा......॥२२॥
§ ७७६
३०३. १० दर्शनशक्त्युपरोधो—दर्शनशक्तिप्रच्छा-
दनता ।
ततश्च .......॥२३॥
§ ७७८
३०४. २ जातिविशेषावगृणिते एकेन्द्रियादिजीव -
विशेषैः संस्कृते । अनुभवोदयावली स्रोतः अनुभवो-
दयावलीप्रवाहः ।
नामप्रत्यया.......॥२४॥
§ ७८०
३०६. ६ नामप्रत्ययाः कर्मकारणभूताः । यैः
पुद्गलैः कर्माणि प्रारभ्यन्ते त एव कृष्यन्ते नान्ये
इति । एकक्षेत्रावगाहस्थिताः—जीव संलग्ना इत्यर्थः ।
पञ्चरस....मधुररसे लवणरसस्यान्तर्भावात् । स्पर्श-
स्याष्टविधत्वात्कथं चतुःस्पर्शस्ते, इति नाशङ्कनीयं,
शीतोष्णस्पर्शादीनां विरोधिना सहभावाभावात् ।
इत्यष्टमोऽध्यायः ।