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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 558 में से

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पृष्ठ 506

स्तम्भ १ (बायाँ स्तम्भ)

३९४
§. ९८
४३. १ एकजीवस्य मिथ्यात्वयुक्तस्त्रीवेदकालो जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । ततो गुणान्तरसंक्रमः । उत्कर्षेण-
पल्योपमशतपृथक्त्वम् । तथाहि--स्त्रीवेद्युक्तो
मिथ्यादृष्टिर्देवेषु आयुर्बध्नाति । ततस्तिर्यग्मनुष्येषु
नारकसम्मूर्च्छनवजं तावद्यावत्पल्योपमशतपृथक्त्वं ततो
वेदपरित्यागः । स्त्रीवेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रति
उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशतपल्योपमानि, गृहीतसम्यक्त्वस्य
स्त्रीवेदेनोत्पादाभावात् पर्याप्तः सम्यक्त्वं ग्रहीष्यतीति
पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्तहीनत्वाद्देशोनानि । नपुंसक-
वेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण सप्तमपृथिव्यां
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि तत्र च पर्याप्तः कियत्कालं
विश्रम्य विशुद्धो भूत्वा सम्यक्त्वं गृह्णात्यन्ते त्यजति
चेति देशोनानि ।
[ एक जीवके मिथ्यात्वयुक्त स्त्रीवेदका काल जघन्य-
से अन्तर्मुहूर्त है । उसके बाद गुणस्थान बदल जाता
है । उत्कर्षसे सौ पल्योपमपृथक्त्व है जो इस प्रकार
है—स्त्रीवेदसे युक्त मिथ्यादृष्टि देवगतिकी आयुका
बन्ध करता है । वहाँसे तिर्यंच और मनुष्योंमें उत्पन्न
होता है। इस तरह नारक और सम्मूर्छनको छोड़कर
सौ पल्योपमपृथक्त्व तक स्त्रीवेद सहित रहता है फिर
वेद बदल जाता है। स्त्रीवेद सहित असंयत सम्यग्दृष्टि
एक जीवका उत्कर्षसे पचपन पल्य काल है। सम्यग्दृष्टि
तो स्त्रीवेदके साथ उत्पन्न नहीं होता अतः स्त्रीवेदी
जीव पर्याप्त अवस्थामें सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
इसलिए पर्याप्तिकी पूर्ति में लगनेवाला अन्तर्मुहूर्त
कम कर देनेसे देशोन (कुछ कम पचपन पल्य) होता
है। नपुंसकवेदी असंयत सम्यग्दृष्टि एक जीवका
उत्कर्षसे सातवें नरकमें तेतीस सागर काल है।
क्योंकि वहाँ पर्याप्त होकर कुछ काल विश्राम करके
विशुद्ध होकर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है और अन्त-
में छोड़ देता है इसलिए देशोन (कुछ कम) तेतीस-
सागर होता है । ]
§. ९९
४३. ११ चतुःकषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
कषायगुणपरावर्तपेक्षया एकजीवं प्रति मनोयोगिवज्ज-
घन्येनेकः समयः, उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।


स्तम्भ २ (दायाँ स्तम्भ)

सर्वार्थसिद्धि
[ चारों कषायोंका मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तगुण-
स्थान पर्यन्त कषाय और गुणस्थानके बदल जानेकी
अपेक्षासे एक जीवके मनोयोगीकी तरह जघन्यसे एक
समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १००
४३. १४ विभङ्गज्ञानिमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण
नारकापेक्षया त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । पर्याप्तश्च
विभङ्गज्ञानं प्रतिपद्यत इति पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्त-
हीनत्वाद्देशोनानि ।
[ विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि एक जीवके उत्कर्षसे नारकों
की अपेक्षासे तेतीस सागर काल है । पर्याप्त जीव ही
विभंगज्ञानको प्राप्त होता है इसलिए पर्याप्तिके समापक
अन्तर्मुहूर्तके कम कर देनेसे देशोन लेना चाहिए । ]
§. १०३
४४. ७ कृष्णनीलकापोतलेश्यमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः, तिर्यग्मनुष्यापेक्षया तेषामेव लेश्या-
परावर्तसंभवात् । सर्वत्र च लेश्यायुक्तस्यान्तर्मुहूर्तः
तिर्यग्मनुष्यापेक्षया द्रष्टव्यः । उत्कर्षेण नारकापेक्षया
यथासंख्यं सप्तमपञ्चम-तृतीयपृथिव्यां त्रयस्त्रिंशत्
सप्तदशसप्तसागरोपमाणि देवनारकाणामवस्थितलेश्य-
त्वात् । व्रजन्नियमैन तल्लेश्योक्तो व्रजति आग-
च्छतो नियमो नास्तीति सातिरेकाणि । उक्तलेश्या-
युक्तासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नारका-
पेक्षया उक्तान्येव सागरोपमाणि । पर्याप्तिसमापकान्त-
र्मुहूर्ते सप्तम्यां मारणान्तिके च सम्यक्तवाभावाद्देशो-
नानि । तेजःपद्मलेश्यमिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्यैक-
जीवं प्रत्युत्कर्षेण यथासंख्यं प्रथमद्वादशस्वर्गापेक्षया
द्वे सागरोपमे अष्टादश च । तद्युक्तानां मारणान्ति-
कोत्पादः संभवतीति सातिरेकाणि । शुक्ललेश्यमिथ्या-
दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण एकत्रिंशत्सागरोपमाणि
अग्रग्रैवेयकदेवापेक्षया तेषां मारणान्तिकोत्पादावस्थाया-
मपि शुक्ललेश्यासंभवात् सातिरेकाणि । संयतासंयत-
शुक्ललेश्यैकजीवं प्रति गुणलेश्यापरावर्तपेक्षेतराभ्यां
जघन्येनेकः समयः उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।
[कृष्ण नील या कापोतलेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति जघन्यसे अन्तर्मुहूर्तकाल है क्योंकि तिर्यंच
और मनुष्यकी अपेक्षासे उनकी लेश्यामें परिवर्तन