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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 509

परिशिष्ट २ [३९७]
[ मनुष्यगतिमें सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि,
असंयतसम्यग्दृष्टि जीव अपने-अपने गुणस्थानको छोड़-
कर पूर्वकोटिपृथक्त्वकाल होनेपर भोगभूमिमें उत्पन्न
होते हैं । पीछे अपने गुणस्थानको ग्रहण करते हैं
इस तरह एक जीवके प्रति उत्कर्षसे पूर्वकोटि पृथक्त्व
अधिक तीन पल्योपम अन्तरकाल होता है । ]
§. ११२
४९. ५ देवगतौ मिथ्यादृष्टेरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेणैक-
त्रिंशत्सागरोपमाणि । तथाहि—मिथ्यात्वयुक्तोऽग्रग्रैवे-
यकेषूत्पद्यते पश्चात् सम्यक्त्वमादायैकत्रिंशत्सागरोप-
माणि तिष्ठति । अवसानकालशेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रति-
पद्यतेऽन्यथा गत्यतिक्रमः स्यादिति देशोनानि । एवम-
संयतसम्यग्दृष्टेरपि योजनीयम् ।
[ देवगतिमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
इकतीस सागर अन्तरकाल है जो इस प्रकार है—
एक द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि उपरिमग्रैवेयकमें उत्पन्न
हुआ । पीछे सम्यक्त्वको ग्रहण करके इकतीस सागर
तक रहा । अन्त समयमें पुनः मिथ्यादृष्टि हो गया ।
यदि ऐसा न हो तो गति बदल जायेगी । अतः
देशोन इकतीससागर होता है । इसी तरह असंयत
सम्यग्दृष्टिका भी अन्तरकाल लगा लेना चाहिए । ]
§. ११३
४१. ९ एकेन्द्रियैकजीवस्योत्कर्षेण द्वे सागरोपम-
सहस्रे पूर्वकोटिपृथक्त्वैः षण्णवतिपूर्वकोटिभिरभ्य-
धिकेऽन्तरम् । अग्रे हीत्थं सर्वत्र सागरोपमसहस्र-
द्वयस्य पूर्वकोटिपृथक्त्वैरभ्यधिकत्वं द्रष्टव्यम् । एके-
न्द्रियविकलेन्द्रियाणां च गुणस्थानान्तरासंभवादि-
न्द्रियेणान्तरम् । पञ्चेन्द्रियाणां तु तत्संभवान्मिथ्यात्वादेः
सम्यक्त्वादिनान्तरं द्रष्टव्यम् ।
[ एकेन्द्रिय एक जीवका अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व
छियानबे पूर्वकोटियोंसे अधिक दो हजार सागर है ।
आगे इस प्रकार सर्वत्र पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक
दो हजार सागर जानना चाहिए । एकेन्द्रिय और
विकलेन्द्रियोंके मिथ्यात्व गुणस्थानके अतिरिक्त अन्य
गुणस्थान नहीं होता इसलिए इन्द्रियोंकी अपेक्षा
अन्तर लगा लेना अर्थात् विकलेन्द्रिय जीव एके-
न्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो
और एकेन्द्रियजीव विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः
एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो तो अन्तरकाल आता है ।
किन्तु पंचेन्द्रियोंमें तो गुणस्थान बदलना सम्भव है
अतः मिथ्यात्व आदिका अन्तर सम्यक्त्व आदिके द्वारा
लगा लेना चाहिए । ]
§. ११४
५०. ५ पृथिव्यादिकायिकानां वनस्पतिकायिकैरन्तर-
मुत्कर्षेणासंख्येयाः पुद्गलपरावर्ताः । तेषां तु नैर-
न्तरमुत्कर्षेणासंख्येया लोकाः वनस्पतिकायिकेभ्योऽ-
न्येषामल्पकालत्वात् ।
[ पृथिवीकायिकोंका वनस्पतिकायिक जीवोंके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरावर्त है और
वनस्पतिकायिकोंका पृथिवीकायिक आदिके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यातलोक है क्योंकि वनस्पति-
कायिकोंसे पृथिवीकायिक आदिका काल थोड़ा है । ]
§. ११५
५१. ३ कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादि-
षड्गुणस्थानानां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवापेक्षया कथं नास्तीति चेत् कायादियोगा-
नामन्तर्मुहूर्तकालत्वात् कायादियोगे स्थितस्यात्मनो
मिथ्यात्वादिगुणस्य गुणान्तरेणान्तरं पुनस्तत्प्राप्तिश्च
संभवतीति । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामप्येकजीवा-
पेक्षया तत एव नास्त्यन्तरम् ।
[ काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत,
अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलिका नानाजीवों और
एकजीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
शंका—एक जीवकी अपेक्षा अन्तर क्यों नहीं है ?
उत्तर—क्योंकि कायादियोगोंका अन्तर्मुहूर्त काल है
इसलिए कायादि योगमें स्थित जीवके मिथ्यात्व आदि
गुणस्थानका अन्य गुणस्थानसे अन्तर करके पुनः उसी
गुणस्थानमें आना सम्भव नहीं है । सासादन
सम्यग्दृष्टि आदिका भी एक जीवकी अपेक्षा इसीलिए
अन्तर नहीं है । ]
§. ११७
५२. ६ पुंवेदे द्वयोः क्षपकयोरिति पृथग्वचनमुत्तरत्र